रविवार, 26 मई 2019

*माँ भारती की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले गुमनाम महानायक स्वतंत्रता सेनानी रास बिहारी बोस

*माँ भारती की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले गुमनाम महानायक स्वतंत्रता सेनानी रास बिहारी बोस*
(जयंती पर विशेष)

दीपक कुमार त्यागी एडवोकेट
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार

माँ भारती के वीर सपूत रास बिहारी बोस एक ऐसे महान भारतीय क्रान्तिकारी थे जिन्होने अंग्रेजी हुकुमत को भारत से बाहर खदेड़ने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने न सिर्फ देश के अन्दर रहकर बल्कि दूसरे देशों में भी रहकर अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध क्रान्तिकारी गतिविधियों का संचालन बेहद सफलतापूर्वक किया और ताउम्र भारत को स्वतन्त्रता दिलाने का प्रयास करते रहे। बहुत ही कम लोगों को पता होगा कि रास बिहारी बोस क्रांतिकारी होने के साथ सर्वप्रथम आज़ाद हिन्द फौज के निर्माता भी थे।  25 मई 1886 के दिन पैदा हुए माँ भारती के इस महान क्रांतिकारी सपूत की आज जयंती हैं। वैसे तो देश की आजादी के लिए बहुत सारे भारत माता के सपूतों ने संघर्ष किया था, लेकिन उन सभी में रास बिहारी बोस की बात ही जुदा थी। वो पहले भारत में रह कर लड़े और फिर बाद में विदेश की धरती से देश की आजादी की लड़ाई लगातार लड़ते रहे थे।

रास बिहारी बोस का जन्म 25 मई 1886 को बंगाल के बर्धमान जिले के सुबालदह नामक ग्राम में हुआ था। इनकी शुरुवाती शिक्षा-दीक्षा चन्दननगर में हुई, जहाँ उनके पिता विनोद बिहारी बोस कार्यरत थे। जब वह मात्र तीन साल के थे तब उनकी माँ का निधन हो गया था जिसके बाद उनका लालन-पालन उनकी मामी ने किया था। बोस ने आगे की शिक्षा चन्दननगर के ही डुप्लेक्स कॉलेज से ग्रहण की थी। उन्होंने बाद में चिकित्सा शास्त्र और इंजीनियरिंग की पढ़ाई विदेश जाकर फ्रांस और जर्मनी से की थी। रास बिहारी बोस जी बचपन से ही देश को आजादी दिलाने के बारे में सोचते थे और देश के क्रान्तिकारियों की गतिविधियों में गहरी दिलचस्पी लेते थी। रास बिहारी बोस ने देहरादून के वन अनुसंधान संस्थान में कुछ समय तक क्लर्क के रूप में भी कार्य किया था।

भारत की आजादी के लिए जिस व्यक्ति ने अपना सम्पूर्ण जीवन लगा दिया हो उस महान व्यक्ति रास बिहारी बोस जी का क्रांतिकारी जीवन बहुत ही संघर्ष पूर्ण रहा है लेकिन दुख की बाद यह है कि भारत ने उनके योगदान की हमेशा अनदेखी की है। जबकि वह जापान के घर-घर में जाने जाते हैं। अभी चंद वर्ष पहले वर्ष 2013 की बात है, जब इस महान क्रांतिकारी की अस्थियां 70 वर्ष के बाद जापान से भारत लाई गयी थीं। तब ना तो भारत की राष्ट्रीय मीडिया में से किसी ने उस घटनाक्रम को कोई खास तवज्जो दी और जब उनके अपने शहर चंदन नगर में उनकी अस्थियां पहुंचीं तो वहां पर देश या प्रदेश का कोई भी बड़ा चेहरा इस मौके पर नहीं पहुंचा था। बाद में उनकी अस्थियां हुगली नदी में प्रवाहित कर दी गई, ये खबर न तो देश के किसी चैनल की सुर्खियां बनी, ना ही देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री या अन्य किसी हस्ती ने उसको तवज्जो देना जरूरी समझा। हाँ चंदन नगर के मेयर जरूर जापान से उन्हें लेकर आए थे। लेकिन हमारे यहाँ के आज के इलेक्ट्रोनिक मीडिया के दौर में जब तक कोई खबर नहीं बनती है जब तक उस खबर के साथ कोई नकारात्मक बात या विवाद ना हो। ये एक मिसाल भर है कि हमारे देश में कैसे मीडिया, इतिहासकार और राजनेता अपनी मर्जी से किसी को भी उठाकर महामानव बना देते है और किसी महामानव के बारे में देश की आने वाली पीढ़ियों को जानकारी तक नहीं देते है। भारत में जापान से सुभाष चंद्र बोस का क्या नाता रहा है यह हमारे देश में सबको पता है लेकिन आप ये जानकर चौंक जाएंगे कि जापान में इतिहास पढ़ने व पढ़ाने वाले लोगों, राजनेता-राजनयिकों और कुछ लोगों को छोड़ दिया जाए तो जापान में सुभाष चंद्र बोस से अधिक फैमस रास बिहारी बोस है जो कि जापानियों के दामाद भी थे और उनको आज भी हर जापानी के घर-घर में जाना जाता है, और जानने की वजह भी खासी हैरतअंगेज है। वो एक ऐसे महान क्रांतिकारी थे जिसने विदेशी धरती पर रहकर भारत की आजादी के लिए आजाद हिंद फौज की नींव रखी, उसका झंडा और नेतृत्व सुभाष चंद्र बोस के हवाले किया था, लेकिन उनको एक खास किस्म की खाने की करी को ईजाद करने के चलते सारे जापान में आज जाना जाता है।

बीसवीं सदी के शुरूआती दौर में देश में अंग्रेजी हकुमत के खिलाफ जितने भी बड़े क्रांतिकारी घटनाक्रम हुए थे, उन सबके सूत्रधारों में रास बिहारी बोस शामिल थे।
सन 1905 के बंगाल विभाजन के समय रास बिहारी बोस क्रांतिकारी गतिविधियों से पहली बार जुड़े। इस दौरान उन्होंने अरविंदो घोस और जतिन बनर्जी के साथ मिलकर बंगाल विभाजन के पीछे अंग्रेजी हुकुमत की मनसा को उजाकर करने का प्रयत्न किया। धीरे-धीरे उनका परिचय बंगाल के प्रमुख क्रांतिकारियों जैसे जतिन मुखर्जी की अगुआई वाले ‘युगान्तर’ क्रान्तिकारी संगठन के अमरेन्द्र चटर्जी और अरबिंदो घोष के राजनीतिक शिष्य रहे जतीन्द्रनाथ बनर्जी उर्फ निरालम्ब स्वामी से हुआ। निरालम्ब स्वामी के सम्पर्क में आने पर उनका परिचय संयुक्त प्रान्त (वर्तमान उत्तर प्रदेश) और पंजाब के प्रमुख आर्य समाजी क्रान्तिकारियों से हुआ। रास बिहारी बोस के युवा खून में क्रांति थी, जिसके चलते युवावस्था से ही वो क्रांतिकारियों के सानिध्य में आ गए थे। बंकिम चंद्र चटर्जी की किताब आनंद मठ और विवेकानंद आदि से प्रेरणा लेकर वो क्रांतिकारियों से जुड़ तो गए, लेकिन 1908 के अलीपुर बम कांड के बाद क्रांतिकारियों की इतनी तेजी से और बड़े पैमाने पर धरपकड़ हुई कि उनका भी नाम आ गया। वो वहां से शिमला चले गए, कसौली में एक नौकरी की, उसके बाद देहरादून आ गए। उस वक्त बाघा जतिन युगांतर पार्टी को बंगाल से बाहर विस्तार कर रहे थे, पंजाब और बंगाल उन दिनों क्रांतिकारियों के दो गढ़ थे। रास बिहारी दोनों प्रदेशों के बीच लिंक के तौर पर काम करने लगे। यूपी और बिहार में भी क्रांतिकारियों को उन्होंने युगांतर पार्टी से जोड़ा।  सुप्रसिद्ध गदर रिवोल्यूशन से लेकर अलीपुर बम कांड केस तक, गर्वनर जनरल हॉर्डिंग की हत्या की प्लानिंग से लेकर मशहूर क्रांतिकारी संगठन युगांतर पार्टी के उत्तर भारत में विस्तार तक। वैसे तो आप भारत के मशहूर क्रांतिकारियों के बारे में पढ़ते होंगे कि किसी ने उस कमांडर को गोली मारी, किसी ने उस जनरल की हत्या की, किसी ने ट्रेन डकैती डाली, किसी ने वहां बम फोड़ा। लेकिन रास बिहारी बोस ने अपने समय का सबसे दुस्साहस भरा काम किया था, अगर बाकी क्रांतिकारियों की घटनाओं से तुलना करेंगे तो पाएंगे ये शायद सबसे अधिक हिम्मत का काम था। भारत में वाइसराय की हैसियत उस वक्त वही होती थी जो आज हमारे देश में प्रधानमंत्री की हैसियत है, यानी कि वाइसराय देश का सर्वेसर्वा होता था। रास बिहारी बोस ने अपने साथियों के साथ मिलकर उस वक्त के वाइसराय की हत्या की ही योजना बना डाली थी, उस लॉर्ड हार्डिंग की जो कि बंगाल में क्रांतिकारियों की बढ़ती गतिविधियों को देखकर 1912 में देश की राजधानी कोलकाता से बदलकर दिल्ली बना रहा था। उस वक्त रास बिहारी बोस देहरादून की फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट में काम कर रहे थे, केमिकल्स के साथ उनका लगाव इस कदर था कि उन्होंने क्रूड बम बनाना सीख लिया था। पश्चिम बंगाल में अलीपुर बम कांड में उनका नाम आने के बाद वो देहरादून शिफ्ट हो चुके थे, लेकिन देश के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा उनका कभी भी कम नहीं हुआ था। उसी जज्बे के साथ रास बिहारी बोस ने लॉर्ड हॉर्डिंग की हत्या बम से करने की सोची। दिन चुना 23 दिसंबर 1912 यानी वो दिन जब वाइसराय लॉर्ड हार्डिंग को नई राजधानी दिल्ली में पहली बार दिल्ली आना था। दिल्ली में उसके जोरदार स्वागत की तैयारियां पूरी कर ली गई थीं। हालांकि कोलकाता से हटाकर दिल्ली को राजधानी बनाने का ऐलान 11 दिसंबर 1911 को ही कर दिया गया था। लेकिन लॉर्ड हॉर्डिंग ने बड़े ही भव्य तरीके से अपनी दिल्ली यात्रा की योजना बनाई थी, तब रास बिहारी बोस ने बंगाल के एक युवा क्रांतिकारी बसंत कुमार विश्वास को वाइसराय पर बम फेंकने की जिम्मेदारी दी थी, और उसी रणनीति के तहत वाइसराय लॉर्ड हार्डिंग पर  23 दिसम्बर 1912 को चाँदनी चौक में जुलूस के दौरान एक बम फेंका गया था, जिसमें वह बुरी तरह घायल हो गए थे। इस घटनाक्रम में हार्डिंग के हाथी के महावत की मृत्यु हो गयी थी। जब बम के हमलें से जोरदार विस्फोट हुआ तो वहां पर चारों तरफ अफरातफरी मच गई। लोगों ने मान लिया कि हॉर्डिंग की मौत हो गई है, लेकिन वो केवल घायल हुआ और बच गया, इसी अफरातफरी में रास बिहारी बोस वहां से बच कर निकल गये थे। रास बिहारी बोस ने फौरन रात की ट्रेन देहरादून के लिए ली और सुबह अपना ऑफिस भी ज्वॉइन कर लिया। महीनों तक अंग्रेज पुलिस पता नहीं कर पाई कि गवर्नर जनरल पर जानलेवा हमले का कौन मास्टर माइंड था। जो खुद उनका मुलाजिम था और एक क्लर्क की हैसियत से काम करता था। इतिहास में इस केस को 'दिल्ली कांस्पिरेसी' के नाम से जाना जाता है। बाद में इस अपराध के आरोप में बसन्त कुमार विश्वास, बाल मुकुंद, अवध बिहारी व मास्टर अमीर चंद को फांसी की सजा दे दी गयी, जबकि रासबिहारी बोस गिरफ़्तारी से बचते रहे अंग्रेजी सरकार ने उन पर बहुत मोटा ईनाम रख दिया था।

इधर इस घटना के बाद इंग्लैंड के ऊंचे हलकों में खौफ फैल गया। भारत में अब बात यहां तक पहुंच गई कि वाइसराय तक की हत्या की साजिश होने लगी। इधर कुछ क्रांतिकारी गिरफ्तार हो गए, रास बिहारी बोस को खतरा दिखा, तो वो देहरादून से निकल गए और अज्ञातवास में अपने होम टाउन चंदन नगर और बनारस के बीच आते-जाते रहे। 1913 में बंगाल में बाढ़ राहत कार्य के दौरान रास बिहारी बोस जतिन मुखर्जी के सम्पर्क में आये, जिन्होंने उनमें नया जोश भरने का काम किया। रासबिहारी बोस इसके बाद दोगुने उत्साह के साथ फिर से क्रान्तिकारी गतिविधियों के संचालन में जुट गये। उधर प्रथम विश्व युद्ध शुरू हो गया और भारत को स्वतन्त्र कराने के लिये उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान गदर की योजना बनायी। फरवरी 1915 में अनेक भरोसेमंद क्रान्तिकारियों की सेना में घुसपैठ कराने की कोशिश की गयी।
युगान्तर के कई नेताओं ने सोचा कि यूरोप में युद्ध होने के कारण चूँकि अभी अधिकतर सैनिक देश से बाहर गये हुये हैं, अत: शेष बचे सैनिकों को आसानी से हराया जा सकता है लेकिन दुर्भाग्य से उनका यह प्रयास भी असफल रहा और कई क्रान्तिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया। ब्रिटिश खुफिया पुलिस ने रास बिहारी बोस को भी पकड़ने की कोशिश की लेकिन वह उनके हत्थे नहीं चढ़े और भागकर विदेश से हथियारों की आपूर्ति के लिये जून 1915 में राजा पी. एन. टैगोर के छद्म नाम से जापान पहुँच गये जापान उन दिनों अलग-अलग देशों के क्रांतिकारियों की सुरक्षित शरणगाह बना हुआ था। जहां उनकी मुलाकात कई भारतीयों से हुई जो भारत को आजाद देखना चाहते थे। लेकिन अंग्रेज सरकार रास बिहारी बोस के पीछे बुरी तरह पड़ी थी। उसको पता चल गया था कि रास बिहारी बोस टोक्यो में कहाँ हैं। अंग्रेजों ने जापान सरकार से रास बिहारी बोस को सौंपने की मांग की। लेकिन एक ताकतवर जापानी लीडर ने उन्हें अपने घर में छुपाया। एक दिन जब पुलिस उसके घर पहुंची तो पिछले गेट से उसने दो कारों को तेजी से बाहर निकाला दिया। पुलिस ने उन कारों का पीछा किया और रास बिहारी बोस घर के आगे के रास्ते से सुरक्षित बचकर निकलने में कामयाब हो गए। रास बिहारी बोस को उस समय जापान में कुल 17 ठिकाने सुरक्षित छिपाने के लिए बदलने पड़े थे। रास बिहारी बोस को इस बार जापानियों ने बचाने के लिए उनको नाकामुराया बेकरी मालिक के घर में छुपा दिया। वो महीनों तक वहां छुपे रहे। बाहर निकलना मुमकिन नहीं था, ना बाहरी दुनिया से कोई रिश्ता था। ऐसे में वो बेकरी के लोगों और बेकरी मालिक के परिवार के साथ घुलमिल गए, बेकरी में काम करने लगे। बेकरी के लोगों को वो भारतीय खाना बनाना सिखाने लगे। इसी दौरान उन्होंने एक प्रयोग किया और एक जापानी डिश को भारतीय स्टाइल में बनाया, जो सबको बहुत पसंद आई उसे "इंडियन करी" नाम दिया गया और वह धीरे-धीरे वो इतनी मशहूर हो गई कि आज जापान के हर रेस्तरां में मिलती है। सबसे पहले नाकामुराया बेकरी ने ही उसे अपने रेस्तरां में 1927 में "इंडियन करी" के नाम से लांच किया था। इस प्रकार उन्होंने कई वर्ष निर्वासन में बिताये।
हालांकि बोस बाद में जापान के रंग में ही पूर्ण रूप से रंग गए थे उन्होंने उनकी संस्कृति, भाषा, व्यवहार को उन्होंने अपना लिया था। इधर जापान में एक ब्रिटिश शिप में आग लग गई, जिसमें रास बिहारी बोस से जुड़े समस्त जरूरी कागजात भी जलकर खाक हो गए थे। उसके बाद जापान सरकार ने भी रास बिहारी के डिपोर्टेशन का ऑर्डर वापस ले लिया, अब वह जापान में कही भी पूर्ण स्वतंत्रता के साथ आजादी से घूम सकते थे।
सन 1916 में रासबिहारी बोस ने प्रसिद्ध पैन एशियाई समर्थक सोमा आइजो और सोमा कोत्सुको की पुत्री तोशिको सोमा से विवाह कर लिया और सन 1923 में जापानी नागरिकता ग्रहण कर ली। बाद में कुछ वर्षों तक रास बिहारी घर गृहस्थी में मशगूल हो गए, दो बच्चे हुए। अचानक 1925 में उनकी पत्नी की न्यूमोनिया से मौत हो गई। तोशिका के शव के पास बैठकर उनकी आत्मा की शांति के लिए संस्कृत के श्लोक पढ़ते-पढ़ते रास बिहारी बोस मोह माया के उस भंवर से निकल गए और एक बार फिर बीड़ा उठाया, अपने देश भारत को अग्रेंजों से आजाद कराने का और फिर जापान में भी रास बिहारी बोस चुप नहीं बैठे और वहाँ के अपने जापानी क्रान्तिकारी मित्रों के साथ मिलकर देश की स्वतन्त्रता के लिये निरन्तर प्रयास करते रहे। उन्होंने जापान में अंग्रेजी अध्यापन के साथ लेखक व पत्रकार के रूप में भी काम प्रारम्भ कर दिया। उन्होंने वहाँ न्यू एशिया नाम से एक समाचार-पत्र भी निकाला। केवल इतना ही नहीं, उन्होंने जापानी भाषा भी सीखी और 16 पुस्तकें लिखीं। 'रामायण' का जापानी भाषा में अनुवाद किया।
रास बिहारी बोस ने जापानी अधिकारियों  को भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन और राष्ट्रवादियों के पक्ष में खड़ा करने और भारत की आजादी की लड़ाई में उनका सक्रिय समर्थन दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने भारत की आजादी के लिए सर्वप्रथम टोक्यो में इंडिया क्लब बनाया, और कैसे देश को गुलामी से मुक्ति मिले इस पर बहुत तेजी से विचार करना शुरू कर दिया। भारतीय सैनिकों के विदेशी युद्धों में इस्तेमाल करने पर रास बिहारी बोस ने जमकर विरोध किया और इस मसले पर जापानी रेडियो और अखबारों में लिखा, अमेरिका के अखबारों आदि में भी लिखा। तब तक देश में गांधीजी सबसे बड़े नेता के तौर पर उभर चुके थे। रास बिहारी ने गांधी जी का पेपर यंग इंडिया जापान में मंगाना शुरू कर दिया, लेकिन उनको लगा कि वो संत हैं, वो बीते कल के नेता हैं, आज और आने वाले कल का नेता उन्हें एक दूसरे बोस में दिखाई दिया, वो थे सुभाष चंद्र बोस। दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो गया, मोहन सिंह ने इंडियन नेशनल आर्मी बनाई, फिर से भारत को आजाद करने की आवाजें तेज होने लगीं, तो रास बिहारी ने भी साउथ ईस्ट एशिया के देशों के दौरे करने शुरू कर दिए। भारत की आजादी की जंग के लिए वे विश्वसमुदाय का समर्थन जुटाने लगे। उस समय थाइलैंड जापान के कब्जे में था, बैंकाक में तय किया गया कि मोहन सिंह की आईएनए को इंडियन इंडिपेंडेंस लीग के अधीन लाया जाए और रास बिहारी बोस को इंडियन इंडिपेंडेंस लीग का प्रेसीडेंट बना दिया गया। जिसका काम था आजादी के लिए दुनिया भर से समर्थन और मदद लेना। यानी सुभाष चंद्र बोस के लिए एक सैनिक यूनिट और पॉलिटिकल यूनिट की आधारशिला उनके वहां आने से पहले ही रास बिहारी बोस और मोहन सिंह ने रख दी थी। जिसके कुल 1.2 लाख सदस्य बन चुके थे और साउथ ईस्ट एशिया के देशों से पचास हजार भारतीय सैनिक उसमें शामिल हो चुके थे।

जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारत छोड़कर जर्मनी पहुंचे तो रास बिहारी बोस को लगा कि सुभाष चंद्र बोस से बेहतर कोई करिश्माई नेतृत्व नहीं हो सकता। वेटरन बोस ने यंग बोस को आमंत्रित किया। बैंकाक में हुई लीग की दूसरी कॉन्फ्रेंस में रास बिहारी बोस ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को आमंत्रित करने का फैसला लिया। जर्मनी से यू बोट में बैठकर 20 जून 1943 को सुभाष चंद्र बोस टोक्यो पहुंचे। जापान पहुंचे तो रास बिहारी बोस उनसे मिले, रास बिहारी बोस को सुभाष चंद्र बोस से काफी आशाएं थीं, दोनों बोस थे, बंगाली थे, क्रांतिकारी थे, एक दूसरे के प्रशंसक थे। 5 जुलाई को वो सिंगापुर पहुंचे, नेताजी का जोरदार स्वागत हुआ और उसी दिन रास बिहारी बोस ने लीग और इंडियन नेशनल आर्मी की कमान नेताजी को सौंप दी, और खुद को सलाहकार के रोल तक सीमित कर लिया। यहां से नेताजी सुभाष चंद्र बोस की असली आजादी की लड़ाई शुरू होती है। रास बिहारी बोस उसके बाद उनका ज्यादा साथ नहीं दे पाए क्योंकि फेफड़ों में संक्रमण के चलते उनको हॉस्पिटल में भर्ती होना पड़ा था, लेकिन जापान में अपने नाम और रिश्तों के जरिए सुभाष चंद्र बोस की जो मदद हो सकती थी, उन्होंने वह की थी। आज हमारे देश के हालत ये है कि इतिहास विषय के अध्येताओं को छोड़ दिया जाए तो आजाद हिंद फौज के गठन में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के अलावा किसी और को कोई जानता तक नहीं है, मोहन सिंह या रास बिहारी बोस के उस अनमोल योगदान का जिक्र कहीं भी नहीं होता है। किसी ने कभी नहीं सोचा कि सुभाष चंद्र बोस कैसे विदेशी धरती पर जाकर इतनी बड़ी फौज कुछ दिनों में ही तैयार कर लेते हैं। सोचिए कितना मुश्किल हुआ होगा विदेशी धरती पर विदेशी सेनाओं से भारतीय सैनिकों को इकट्ठा करके इतनी बड़ी आजाद हिंद फौज खड़ी करना, उनका खर्चा, हथियार, वर्दी और विदेशी धरती पर राजनीतिक समर्थन जुटाना। यह सब रास बिहारी बोस के व्यक्तित्व व उनके जापान में बेहद मजबूत रिश्तों के चलते ही परवान चढ़ा था। बाद में सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिन्द फौज के नाम से आईएनए का पुनर्गठन किया था।

भारत को अंग्रेजी हुकुमत से मुक्ति दिलाने का सपना लिए भारत माता के इस वीर सपूत रास बिहारी बोस का 21 जनवरी 1945 को निधन हो गया। बाद में जापानी सरकार ने अपने इस भारतीय दामाद 'रास बिहारी बोस' को जापान के दूसरे सबसे बड़े अवॉर्ड  ‘आर्डर आफ द राइजिंग सन’ के सम्मान से सम्मानित किया था।

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