रविवार, 26 मई 2019

देश निर्माण में जवाहरलाल नेहरू का योगदान" (पुण्यतिथि पर विशेष)

"देश निर्माण में जवाहरलाल नेहरू का योगदान"
(पुण्यतिथि पर विशेष)

दीपक कुमार त्यागी एडवोकेट
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार


हिन्दुस्तान के शिल्पकार स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित जवाहरलाल नेहरू, अदभुत आकर्षक व्यक्तित्व के धनी, ओजस्वी वक्ता, उत्कृष्ट लेखक, इतिहासकार, आधुनिक भारत के स्वपनदृष्टा थे और सबसे बड़ी बात यह है कि देश में आधुनिक भारत के शिल्पकार के ख़िताब से नवाज़े जाने का श्रेय अगर किसी एक व्यक्ति को जाता है तो वो नि:संदेह हिन्दुस्तान के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु को ही जाता हैं। उन्होंने देश की आज़ादी की लड़ाई में अग्रणी भूमिका निभाने के साथ-साथ सशक्त हिन्दुस्तान का निर्माण करके देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था की बेहद मजबूती के साथ नींव स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनके इस अनमोल योगदान के लिए हिन्दुस्तान हमेशा उनका ऋणी रहेगा। वैसे तो राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को ही अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी माना था  लेकिन वो आजादी से पहले गठित अंतरिम सरकार और आजाद भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री बने थे और स्वतन्त्रता के पूर्व और पश्चात् की भारतीय राजनीति में केन्द्रीय व्यक्तित्व थे। महात्मा गांधी के संरक्षण में, वे भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के सर्वोच्च नेता के रूप में उभरे और वो सन् 1947 में भारत के एक स्वतन्त्र राष्ट्र के रूप में स्थापना से लेकर सन् 1964 तक अपने निधन तक, भारत के प्रधानमंत्री रहे थे।
नेहरू आधुनिक भारतीय राष्ट्र-राज्य – एक सम्प्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, और लोकतान्त्रिक गणतन्त्र - के शिल्पकार मानें जाते हैं और उन्हें भारतीय बच्चे चाचा नेहरू के रूप में जानते हैं।

जवाहरलाल नेहरू का जन्म 14 नवम्बर 1889 को ब्रिटिश सरकार के आधीन भारत के इलाहाबाद शहर में हुआ था । उनके पिता, मोतीलाल नेहरू एक धनी बैरिस्टर जो कश्मीरी पण्डित समुदाय से थे और वो देश के स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दो बार अध्यक्ष चुने गए थे। उनकी माता स्वरूपरानी जो लाहौर में बसे एक सुपरिचित कश्मीरी ब्राह्मण परिवार से थी, जवाहरलाल तीन बच्चों में से सबसे बड़े थे, जिनमें बाकी दो लड़कियाँ थी। बड़ी बहन, विजया लक्ष्मी, बाद में संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष बनी और सबसे छोटी बहन, कृष्णा हठीसिंग, एक सुप्रसिद्ध लेखिका बनी। जवाहरलाल नेहरू को दुनिया के बेहतरीन स्कूलों और विश्वविद्यालयों में शिक्षा प्राप्त करने का मौका मिला था। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा हैरो और वह केंब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज गए, जहाँ उन्होंने तीन वर्ष तक अध्ययन करके प्रकृति विज्ञान में स्नातक उपाधि प्राप्त की। उनके विषय रसायनशास्त्र, भूगर्भ विद्या और वनस्पति शास्त्र थे। केंब्रिज छोड़ने के बाद लंदन के इनर टेंपल में दो वर्ष बिताकर उन्होंने अपनी लॉ की पढ़ाई पूरी की। इंग्लैंड में उन्होंने सात साल व्यतीत किए जिसमें वहां के फैबियन समाजवाद और आयरिश राष्ट्रवाद के लिए एक तर्कसंगत दृष्टिकोण विकसित किया।

जवाहरलाल नेहरू 1912 में भारत लौटे और वकालत शुरू की। 1916 में उनकी शादी कमला नेहरू से हुई  सन् 1917 में जवाहरलाल व कमला नेहरू को इंदिरा के रूप में एक पुत्री की प्राप्ति हुई। 1917 में जवाहर लाल नेहरू होम रुल लीग‎ में शामिल हो गए। राजनीति में उनकी असली दीक्षा दो साल बाद 1919 में हुई जब वे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के संपर्क में आए। उस समय महात्मा गांधी ने रॉलेट अधिनियम के खिलाफ एक अभियान शुरू किया था। नेहरू, महात्मा गांधी के सक्रिय लेकिन शांतिपूर्ण, सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रति खासे आकर्षित हुए।

पंडित जवाहरलाल नेहरू देश को प्रगति के पथ पर ले जाने वाले खास पथप्रदर्शक थे। वो शुरू से ही गांधीजी से बहुत प्रभावित रहे और नेहरू ने महात्मा गांधी के उपदेशों के अनुसार खुद को व अपने परिवार को भी ढाल लिया था । जवाहरलाल और मोतीलाल नेहरू ने पश्चिमी कपडों और महंगी संपत्ति का त्याग कर दिया था। वे अब एक खादी कुर्ता और गाँधी टोपी पहनने लगे। जवाहर लाल नेहरू ने 1920-1922 में असहयोग आंदोलन में सक्रिय हिस्सा लिया और इस दौरान पहली बार गिरफ्तार किए गए। कुछ महीनों के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। जवाहरलाल नेहरू 1924 में इलाहाबाद नगर निगम के अध्यक्ष चुने गए और उन्होंने शहर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में दो वर्ष तक सेवा की। 1926 में उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों से सहयोग की कमी का हवाला देकर इस्तीफा दे दिया। 1920 के प्रतापगढ़ के पहले किसान मोर्चे को संगठित करने का श्रेय उन्हीं को जाता है। 1928 में लखनऊ में साइमन कमीशन के विरोध में नेहरू घायल हुए और 1930 के नमक आंदोलन में गिरफ्तार हुए। उन्होंने 6 माह जेल काटी। 1935 में अलमोड़ा जेल में 'आत्मकथा' लिखी। नेहरू अपने जीवन काल कुल 9 बार 3259 दिन जेल में रहे।

उन्होंने विश्वभ्रमण किया और अंतरराष्ट्रीय नायक के रूप में अपनी पहचान छोड़ी। उन्होंने 6 बार कांग्रेस अध्यक्ष के पद (लाहौर 1929, लखनऊ 1936, फैजपुर 1937, दिल्ली 1951, हैदराबाद 1953 और कल्याणी 1954) को सुशोभित किया। नेहरू ने सन् 1929 में जब कांग्रेस अध्यक्ष का पद ग्रहण किया तो रावी के तट पर प्रस्ताव पारित किया उन्होंने कहा कि ‘हम भारत के प्रजाजन अन्य राष्ट्रों की भांति अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं कि हम स्वतंत्र होकर ही रहें, अपने परिश्रम का फल स्वयं भोगें, हमें जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक सुविधाएं प्राप्त हों, जिसमें हमें भी विकास का पूरा अवसर मिले।’ सन् 1942 के 'भारत छोड़ो' आंदोलन में नेहरूजी 9 अगस्त 1942 को बंबई में गिरफ्तार हुए और अहमदनगर जेल में रहे, जहां से 15 जून 1945 को रिहा किए गए। 15 अगस्त सन् 1947 में भारत को आजादी मिलने पर जवाहरलाल नेहरू को देश का प्रधानमंत्री बनाया गया। वह देश को उस मुकाम पर खड़ा देखना चाहते थे जहां हर भारतवासी  अमनचैन, सुखी और समृद्धि से सराबोर हो। आजादी मिलने के तुरंत बाद ही उन्होंने देश में पहली एशियाई कांफ्रेंस बुलाई और उसमें साफ-साफ कहा कि ‘हमारा मकसद है कि दुनिया में अमनचैन और तरक्की हो, लेकिन यह तभी हो सकता है जब सब मुल्क आजाद हों और इंसानों की सब जगह सुरक्षा हो और आगे बढ़ने का मौका मिले।’ नेहरू ने 'पंचशील' का सिद्धांत प्रतिपादित किया और 1954 में 'भारतरत्न' से अलंकृत हुए नेहरूजी ने तटस्थ राष्ट्रों को संगठित किया और उनका नेतृत्व किया।
उन्होंने अपने प्रधानमंत्री के कार्यकाल में देश में लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत करते हुए, राष्ट्र और संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को स्थायी भाव प्रदान किया। उनका विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से देश की जनता और देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करना हमेशा मुख्य उद्देश्य रहा।

नेहरू पाकिस्तान और चीन के साथ भारत के संबंधों में सुधार नहीं कर पाए। उन्होंने चीन की तरफ मित्रता का हाथ भी बढ़ाया, लेकिन 1962 में चीन ने धोखे से आक्रमण कर दिया। चीन का आक्रमण जवाहरलाल नेहरू के लिए एक बड़ा झटका था और शायद इसी वजह से उनकी मौत भी हुई। जवाहरलाल नेहरू को 27 मई 1964 को दिल का दौरा पड़ा जिसमें उनकी मृत्यु हो गई थी।
नेहरू का पूंजीवाद, साम्राज्यवाद, जातिवाद, एवं उपनिवेश के खिलाफ  संघर्ष हमेशा अनुकरणीय रहेगा। वो देश में धर्मनिरपेक्षता और भारत की जातीय एवं धार्मिक विभिन्नताओं के बावजूद भी वे देश की मौलिक एकता को लेकर सजग रहे और सभी को एक सूत्र में पिरोने के लिए कार्य करते रहे। कभी ऐसा निर्णय नहीं लिया जिससे कि उन पर धार्मिक या सांप्रदायिक पक्षपात का आरोप लगे। उनका हमेशा स्पष्ट मानना था कि भारत के विकास लिए सभी लोगों को प्यार मोहब्बत से मिलजुलकर एक साथ रहना होगा। नेहरू वैज्ञानिक खोजों एवं तकनीकी विकास में गहरी अभिरुचि रखते थे उन्होंने देश के विकास में इसका खूब उपयोग किया। उन्होंने देश को आर्थिक रूप से मजबूत करने के लिए पंचवर्षीय योजनाएं बनाईं। वे हमेशा से मानते थे कि देश के किसानों और कृषि क्षेत्र को मजबूती प्रदान किए बिना देश को तरक्की की राह पर कभी आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। इसलिए उन्होंने कृषि भूमि की सिंचाई के उचित प्रबंध के लिए देश में बहुउद्देश्यीय परियोजनाओं का शुभारंभ किया। इन योजनाओं को उन्होंने आधुनिक भारत का तीर्थ कहा। साथ ही देश में रोजगार सृजन और तरक्की की राह को और आसान करने के लिए उन्होंने बड़े-बड़े कल-कारखानों की स्थापना की।

पंडित नेहरू एक महान राजनीतिज्ञ और प्रभावशाली वक्ता ही नहीं, बल्कि महान लेखक भी थे। उनकी रचनाओं में भारत और विश्व, सोवियत रूस, विश्व इतिहास की एक झलक, भारत की एकता और स्वतंत्रता प्रचलित है लेकिन उनकी सबसे लोकप्रिय किताबों में डिस्कवरी ऑफ इंडिया रही, जिसकी रचना 1944 में अप्रैल-सितंबर के बीच अहमदनगर की जेल में हुई। इस पुस्‍तक को नेहरू ने अंग्रज़ी में लिखा और बाद में इसे हिंदी और अन्‍य बहुत सारे भाषाओं में अनुवाद किया गया है। भारत की खोज पुस्‍तक को क्‍लासिक का दर्जा हासिल है। नेहरू जी ने इसे स्‍वतंत्रता आंदोलन के दौर में 1944 में अहमदनगर के किले में अपने 5 महीने के कारावास के दिनों में लिखा था। यह 1946 में पुस्‍तक के रूप में प्रकाशित हुई। इस पुस्‍तक में नेहरू जी ने सिंधु घाटी सभ्‍यता से लेकर भारत की आज़ादी तक विकसित हुई भारत की संस्‍कृति, धर्म और जटिल अतीत को वैज्ञानिक द्रष्टि से विलक्षण भाषा शैली में बयान किया है।


नेहरू जी ने जो काम किये थे आज उसी की नींव पर बुलंद व सशक्त भारत की नई तस्वीर रची जा रही है। नेहरू का मानवीय पक्ष भी अत्यंत उदार और समावेशी था। उन्होंने देशवासियों में निर्धनों और अछूतों के प्रति सामाजिक चेतना पैदा की। हिंदू सिविल कोड में सुधार लाकर उत्तराधिकार और संपति के मामले में विधवाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार दिया। नेहरू के कुशल नेतृत्व में, कांग्रेस राष्ट्रीय और राज्य-स्तरीय चुनावों में लगातार प्रभुत्व दिखाते हुएँ और 1951, 1957, और 1962 के लगातार चुनाव जीतते हुएँ, एक सर्व-ग्रहण पार्टी के रूप में उभरी। उनके अन्तिम वर्षों में राजनीतिक मुसीबतों और 1962 के चीनी-भारत युद्ध में उनके नेतृत्व की असफलता के बावजूद, वे भारत के लोगों के बीच हमेशा लोकप्रिय बने रहें। भारत में, उनका जन्मदिन बाल दिवस के रूप में मनाया जाता हैं। आज पुण्यतिथि पर हम जवाहरलाल नेहरू जी को कोटि-कोटि नमन् करते हैं।

*माँ भारती की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले गुमनाम महानायक स्वतंत्रता सेनानी रास बिहारी बोस

*माँ भारती की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले गुमनाम महानायक स्वतंत्रता सेनानी रास बिहारी बोस*
(जयंती पर विशेष)

दीपक कुमार त्यागी एडवोकेट
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार

माँ भारती के वीर सपूत रास बिहारी बोस एक ऐसे महान भारतीय क्रान्तिकारी थे जिन्होने अंग्रेजी हुकुमत को भारत से बाहर खदेड़ने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने न सिर्फ देश के अन्दर रहकर बल्कि दूसरे देशों में भी रहकर अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध क्रान्तिकारी गतिविधियों का संचालन बेहद सफलतापूर्वक किया और ताउम्र भारत को स्वतन्त्रता दिलाने का प्रयास करते रहे। बहुत ही कम लोगों को पता होगा कि रास बिहारी बोस क्रांतिकारी होने के साथ सर्वप्रथम आज़ाद हिन्द फौज के निर्माता भी थे।  25 मई 1886 के दिन पैदा हुए माँ भारती के इस महान क्रांतिकारी सपूत की आज जयंती हैं। वैसे तो देश की आजादी के लिए बहुत सारे भारत माता के सपूतों ने संघर्ष किया था, लेकिन उन सभी में रास बिहारी बोस की बात ही जुदा थी। वो पहले भारत में रह कर लड़े और फिर बाद में विदेश की धरती से देश की आजादी की लड़ाई लगातार लड़ते रहे थे।

रास बिहारी बोस का जन्म 25 मई 1886 को बंगाल के बर्धमान जिले के सुबालदह नामक ग्राम में हुआ था। इनकी शुरुवाती शिक्षा-दीक्षा चन्दननगर में हुई, जहाँ उनके पिता विनोद बिहारी बोस कार्यरत थे। जब वह मात्र तीन साल के थे तब उनकी माँ का निधन हो गया था जिसके बाद उनका लालन-पालन उनकी मामी ने किया था। बोस ने आगे की शिक्षा चन्दननगर के ही डुप्लेक्स कॉलेज से ग्रहण की थी। उन्होंने बाद में चिकित्सा शास्त्र और इंजीनियरिंग की पढ़ाई विदेश जाकर फ्रांस और जर्मनी से की थी। रास बिहारी बोस जी बचपन से ही देश को आजादी दिलाने के बारे में सोचते थे और देश के क्रान्तिकारियों की गतिविधियों में गहरी दिलचस्पी लेते थी। रास बिहारी बोस ने देहरादून के वन अनुसंधान संस्थान में कुछ समय तक क्लर्क के रूप में भी कार्य किया था।

भारत की आजादी के लिए जिस व्यक्ति ने अपना सम्पूर्ण जीवन लगा दिया हो उस महान व्यक्ति रास बिहारी बोस जी का क्रांतिकारी जीवन बहुत ही संघर्ष पूर्ण रहा है लेकिन दुख की बाद यह है कि भारत ने उनके योगदान की हमेशा अनदेखी की है। जबकि वह जापान के घर-घर में जाने जाते हैं। अभी चंद वर्ष पहले वर्ष 2013 की बात है, जब इस महान क्रांतिकारी की अस्थियां 70 वर्ष के बाद जापान से भारत लाई गयी थीं। तब ना तो भारत की राष्ट्रीय मीडिया में से किसी ने उस घटनाक्रम को कोई खास तवज्जो दी और जब उनके अपने शहर चंदन नगर में उनकी अस्थियां पहुंचीं तो वहां पर देश या प्रदेश का कोई भी बड़ा चेहरा इस मौके पर नहीं पहुंचा था। बाद में उनकी अस्थियां हुगली नदी में प्रवाहित कर दी गई, ये खबर न तो देश के किसी चैनल की सुर्खियां बनी, ना ही देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री या अन्य किसी हस्ती ने उसको तवज्जो देना जरूरी समझा। हाँ चंदन नगर के मेयर जरूर जापान से उन्हें लेकर आए थे। लेकिन हमारे यहाँ के आज के इलेक्ट्रोनिक मीडिया के दौर में जब तक कोई खबर नहीं बनती है जब तक उस खबर के साथ कोई नकारात्मक बात या विवाद ना हो। ये एक मिसाल भर है कि हमारे देश में कैसे मीडिया, इतिहासकार और राजनेता अपनी मर्जी से किसी को भी उठाकर महामानव बना देते है और किसी महामानव के बारे में देश की आने वाली पीढ़ियों को जानकारी तक नहीं देते है। भारत में जापान से सुभाष चंद्र बोस का क्या नाता रहा है यह हमारे देश में सबको पता है लेकिन आप ये जानकर चौंक जाएंगे कि जापान में इतिहास पढ़ने व पढ़ाने वाले लोगों, राजनेता-राजनयिकों और कुछ लोगों को छोड़ दिया जाए तो जापान में सुभाष चंद्र बोस से अधिक फैमस रास बिहारी बोस है जो कि जापानियों के दामाद भी थे और उनको आज भी हर जापानी के घर-घर में जाना जाता है, और जानने की वजह भी खासी हैरतअंगेज है। वो एक ऐसे महान क्रांतिकारी थे जिसने विदेशी धरती पर रहकर भारत की आजादी के लिए आजाद हिंद फौज की नींव रखी, उसका झंडा और नेतृत्व सुभाष चंद्र बोस के हवाले किया था, लेकिन उनको एक खास किस्म की खाने की करी को ईजाद करने के चलते सारे जापान में आज जाना जाता है।

बीसवीं सदी के शुरूआती दौर में देश में अंग्रेजी हकुमत के खिलाफ जितने भी बड़े क्रांतिकारी घटनाक्रम हुए थे, उन सबके सूत्रधारों में रास बिहारी बोस शामिल थे।
सन 1905 के बंगाल विभाजन के समय रास बिहारी बोस क्रांतिकारी गतिविधियों से पहली बार जुड़े। इस दौरान उन्होंने अरविंदो घोस और जतिन बनर्जी के साथ मिलकर बंगाल विभाजन के पीछे अंग्रेजी हुकुमत की मनसा को उजाकर करने का प्रयत्न किया। धीरे-धीरे उनका परिचय बंगाल के प्रमुख क्रांतिकारियों जैसे जतिन मुखर्जी की अगुआई वाले ‘युगान्तर’ क्रान्तिकारी संगठन के अमरेन्द्र चटर्जी और अरबिंदो घोष के राजनीतिक शिष्य रहे जतीन्द्रनाथ बनर्जी उर्फ निरालम्ब स्वामी से हुआ। निरालम्ब स्वामी के सम्पर्क में आने पर उनका परिचय संयुक्त प्रान्त (वर्तमान उत्तर प्रदेश) और पंजाब के प्रमुख आर्य समाजी क्रान्तिकारियों से हुआ। रास बिहारी बोस के युवा खून में क्रांति थी, जिसके चलते युवावस्था से ही वो क्रांतिकारियों के सानिध्य में आ गए थे। बंकिम चंद्र चटर्जी की किताब आनंद मठ और विवेकानंद आदि से प्रेरणा लेकर वो क्रांतिकारियों से जुड़ तो गए, लेकिन 1908 के अलीपुर बम कांड के बाद क्रांतिकारियों की इतनी तेजी से और बड़े पैमाने पर धरपकड़ हुई कि उनका भी नाम आ गया। वो वहां से शिमला चले गए, कसौली में एक नौकरी की, उसके बाद देहरादून आ गए। उस वक्त बाघा जतिन युगांतर पार्टी को बंगाल से बाहर विस्तार कर रहे थे, पंजाब और बंगाल उन दिनों क्रांतिकारियों के दो गढ़ थे। रास बिहारी दोनों प्रदेशों के बीच लिंक के तौर पर काम करने लगे। यूपी और बिहार में भी क्रांतिकारियों को उन्होंने युगांतर पार्टी से जोड़ा।  सुप्रसिद्ध गदर रिवोल्यूशन से लेकर अलीपुर बम कांड केस तक, गर्वनर जनरल हॉर्डिंग की हत्या की प्लानिंग से लेकर मशहूर क्रांतिकारी संगठन युगांतर पार्टी के उत्तर भारत में विस्तार तक। वैसे तो आप भारत के मशहूर क्रांतिकारियों के बारे में पढ़ते होंगे कि किसी ने उस कमांडर को गोली मारी, किसी ने उस जनरल की हत्या की, किसी ने ट्रेन डकैती डाली, किसी ने वहां बम फोड़ा। लेकिन रास बिहारी बोस ने अपने समय का सबसे दुस्साहस भरा काम किया था, अगर बाकी क्रांतिकारियों की घटनाओं से तुलना करेंगे तो पाएंगे ये शायद सबसे अधिक हिम्मत का काम था। भारत में वाइसराय की हैसियत उस वक्त वही होती थी जो आज हमारे देश में प्रधानमंत्री की हैसियत है, यानी कि वाइसराय देश का सर्वेसर्वा होता था। रास बिहारी बोस ने अपने साथियों के साथ मिलकर उस वक्त के वाइसराय की हत्या की ही योजना बना डाली थी, उस लॉर्ड हार्डिंग की जो कि बंगाल में क्रांतिकारियों की बढ़ती गतिविधियों को देखकर 1912 में देश की राजधानी कोलकाता से बदलकर दिल्ली बना रहा था। उस वक्त रास बिहारी बोस देहरादून की फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट में काम कर रहे थे, केमिकल्स के साथ उनका लगाव इस कदर था कि उन्होंने क्रूड बम बनाना सीख लिया था। पश्चिम बंगाल में अलीपुर बम कांड में उनका नाम आने के बाद वो देहरादून शिफ्ट हो चुके थे, लेकिन देश के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा उनका कभी भी कम नहीं हुआ था। उसी जज्बे के साथ रास बिहारी बोस ने लॉर्ड हॉर्डिंग की हत्या बम से करने की सोची। दिन चुना 23 दिसंबर 1912 यानी वो दिन जब वाइसराय लॉर्ड हार्डिंग को नई राजधानी दिल्ली में पहली बार दिल्ली आना था। दिल्ली में उसके जोरदार स्वागत की तैयारियां पूरी कर ली गई थीं। हालांकि कोलकाता से हटाकर दिल्ली को राजधानी बनाने का ऐलान 11 दिसंबर 1911 को ही कर दिया गया था। लेकिन लॉर्ड हॉर्डिंग ने बड़े ही भव्य तरीके से अपनी दिल्ली यात्रा की योजना बनाई थी, तब रास बिहारी बोस ने बंगाल के एक युवा क्रांतिकारी बसंत कुमार विश्वास को वाइसराय पर बम फेंकने की जिम्मेदारी दी थी, और उसी रणनीति के तहत वाइसराय लॉर्ड हार्डिंग पर  23 दिसम्बर 1912 को चाँदनी चौक में जुलूस के दौरान एक बम फेंका गया था, जिसमें वह बुरी तरह घायल हो गए थे। इस घटनाक्रम में हार्डिंग के हाथी के महावत की मृत्यु हो गयी थी। जब बम के हमलें से जोरदार विस्फोट हुआ तो वहां पर चारों तरफ अफरातफरी मच गई। लोगों ने मान लिया कि हॉर्डिंग की मौत हो गई है, लेकिन वो केवल घायल हुआ और बच गया, इसी अफरातफरी में रास बिहारी बोस वहां से बच कर निकल गये थे। रास बिहारी बोस ने फौरन रात की ट्रेन देहरादून के लिए ली और सुबह अपना ऑफिस भी ज्वॉइन कर लिया। महीनों तक अंग्रेज पुलिस पता नहीं कर पाई कि गवर्नर जनरल पर जानलेवा हमले का कौन मास्टर माइंड था। जो खुद उनका मुलाजिम था और एक क्लर्क की हैसियत से काम करता था। इतिहास में इस केस को 'दिल्ली कांस्पिरेसी' के नाम से जाना जाता है। बाद में इस अपराध के आरोप में बसन्त कुमार विश्वास, बाल मुकुंद, अवध बिहारी व मास्टर अमीर चंद को फांसी की सजा दे दी गयी, जबकि रासबिहारी बोस गिरफ़्तारी से बचते रहे अंग्रेजी सरकार ने उन पर बहुत मोटा ईनाम रख दिया था।

इधर इस घटना के बाद इंग्लैंड के ऊंचे हलकों में खौफ फैल गया। भारत में अब बात यहां तक पहुंच गई कि वाइसराय तक की हत्या की साजिश होने लगी। इधर कुछ क्रांतिकारी गिरफ्तार हो गए, रास बिहारी बोस को खतरा दिखा, तो वो देहरादून से निकल गए और अज्ञातवास में अपने होम टाउन चंदन नगर और बनारस के बीच आते-जाते रहे। 1913 में बंगाल में बाढ़ राहत कार्य के दौरान रास बिहारी बोस जतिन मुखर्जी के सम्पर्क में आये, जिन्होंने उनमें नया जोश भरने का काम किया। रासबिहारी बोस इसके बाद दोगुने उत्साह के साथ फिर से क्रान्तिकारी गतिविधियों के संचालन में जुट गये। उधर प्रथम विश्व युद्ध शुरू हो गया और भारत को स्वतन्त्र कराने के लिये उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान गदर की योजना बनायी। फरवरी 1915 में अनेक भरोसेमंद क्रान्तिकारियों की सेना में घुसपैठ कराने की कोशिश की गयी।
युगान्तर के कई नेताओं ने सोचा कि यूरोप में युद्ध होने के कारण चूँकि अभी अधिकतर सैनिक देश से बाहर गये हुये हैं, अत: शेष बचे सैनिकों को आसानी से हराया जा सकता है लेकिन दुर्भाग्य से उनका यह प्रयास भी असफल रहा और कई क्रान्तिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया। ब्रिटिश खुफिया पुलिस ने रास बिहारी बोस को भी पकड़ने की कोशिश की लेकिन वह उनके हत्थे नहीं चढ़े और भागकर विदेश से हथियारों की आपूर्ति के लिये जून 1915 में राजा पी. एन. टैगोर के छद्म नाम से जापान पहुँच गये जापान उन दिनों अलग-अलग देशों के क्रांतिकारियों की सुरक्षित शरणगाह बना हुआ था। जहां उनकी मुलाकात कई भारतीयों से हुई जो भारत को आजाद देखना चाहते थे। लेकिन अंग्रेज सरकार रास बिहारी बोस के पीछे बुरी तरह पड़ी थी। उसको पता चल गया था कि रास बिहारी बोस टोक्यो में कहाँ हैं। अंग्रेजों ने जापान सरकार से रास बिहारी बोस को सौंपने की मांग की। लेकिन एक ताकतवर जापानी लीडर ने उन्हें अपने घर में छुपाया। एक दिन जब पुलिस उसके घर पहुंची तो पिछले गेट से उसने दो कारों को तेजी से बाहर निकाला दिया। पुलिस ने उन कारों का पीछा किया और रास बिहारी बोस घर के आगे के रास्ते से सुरक्षित बचकर निकलने में कामयाब हो गए। रास बिहारी बोस को उस समय जापान में कुल 17 ठिकाने सुरक्षित छिपाने के लिए बदलने पड़े थे। रास बिहारी बोस को इस बार जापानियों ने बचाने के लिए उनको नाकामुराया बेकरी मालिक के घर में छुपा दिया। वो महीनों तक वहां छुपे रहे। बाहर निकलना मुमकिन नहीं था, ना बाहरी दुनिया से कोई रिश्ता था। ऐसे में वो बेकरी के लोगों और बेकरी मालिक के परिवार के साथ घुलमिल गए, बेकरी में काम करने लगे। बेकरी के लोगों को वो भारतीय खाना बनाना सिखाने लगे। इसी दौरान उन्होंने एक प्रयोग किया और एक जापानी डिश को भारतीय स्टाइल में बनाया, जो सबको बहुत पसंद आई उसे "इंडियन करी" नाम दिया गया और वह धीरे-धीरे वो इतनी मशहूर हो गई कि आज जापान के हर रेस्तरां में मिलती है। सबसे पहले नाकामुराया बेकरी ने ही उसे अपने रेस्तरां में 1927 में "इंडियन करी" के नाम से लांच किया था। इस प्रकार उन्होंने कई वर्ष निर्वासन में बिताये।
हालांकि बोस बाद में जापान के रंग में ही पूर्ण रूप से रंग गए थे उन्होंने उनकी संस्कृति, भाषा, व्यवहार को उन्होंने अपना लिया था। इधर जापान में एक ब्रिटिश शिप में आग लग गई, जिसमें रास बिहारी बोस से जुड़े समस्त जरूरी कागजात भी जलकर खाक हो गए थे। उसके बाद जापान सरकार ने भी रास बिहारी के डिपोर्टेशन का ऑर्डर वापस ले लिया, अब वह जापान में कही भी पूर्ण स्वतंत्रता के साथ आजादी से घूम सकते थे।
सन 1916 में रासबिहारी बोस ने प्रसिद्ध पैन एशियाई समर्थक सोमा आइजो और सोमा कोत्सुको की पुत्री तोशिको सोमा से विवाह कर लिया और सन 1923 में जापानी नागरिकता ग्रहण कर ली। बाद में कुछ वर्षों तक रास बिहारी घर गृहस्थी में मशगूल हो गए, दो बच्चे हुए। अचानक 1925 में उनकी पत्नी की न्यूमोनिया से मौत हो गई। तोशिका के शव के पास बैठकर उनकी आत्मा की शांति के लिए संस्कृत के श्लोक पढ़ते-पढ़ते रास बिहारी बोस मोह माया के उस भंवर से निकल गए और एक बार फिर बीड़ा उठाया, अपने देश भारत को अग्रेंजों से आजाद कराने का और फिर जापान में भी रास बिहारी बोस चुप नहीं बैठे और वहाँ के अपने जापानी क्रान्तिकारी मित्रों के साथ मिलकर देश की स्वतन्त्रता के लिये निरन्तर प्रयास करते रहे। उन्होंने जापान में अंग्रेजी अध्यापन के साथ लेखक व पत्रकार के रूप में भी काम प्रारम्भ कर दिया। उन्होंने वहाँ न्यू एशिया नाम से एक समाचार-पत्र भी निकाला। केवल इतना ही नहीं, उन्होंने जापानी भाषा भी सीखी और 16 पुस्तकें लिखीं। 'रामायण' का जापानी भाषा में अनुवाद किया।
रास बिहारी बोस ने जापानी अधिकारियों  को भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन और राष्ट्रवादियों के पक्ष में खड़ा करने और भारत की आजादी की लड़ाई में उनका सक्रिय समर्थन दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने भारत की आजादी के लिए सर्वप्रथम टोक्यो में इंडिया क्लब बनाया, और कैसे देश को गुलामी से मुक्ति मिले इस पर बहुत तेजी से विचार करना शुरू कर दिया। भारतीय सैनिकों के विदेशी युद्धों में इस्तेमाल करने पर रास बिहारी बोस ने जमकर विरोध किया और इस मसले पर जापानी रेडियो और अखबारों में लिखा, अमेरिका के अखबारों आदि में भी लिखा। तब तक देश में गांधीजी सबसे बड़े नेता के तौर पर उभर चुके थे। रास बिहारी ने गांधी जी का पेपर यंग इंडिया जापान में मंगाना शुरू कर दिया, लेकिन उनको लगा कि वो संत हैं, वो बीते कल के नेता हैं, आज और आने वाले कल का नेता उन्हें एक दूसरे बोस में दिखाई दिया, वो थे सुभाष चंद्र बोस। दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो गया, मोहन सिंह ने इंडियन नेशनल आर्मी बनाई, फिर से भारत को आजाद करने की आवाजें तेज होने लगीं, तो रास बिहारी ने भी साउथ ईस्ट एशिया के देशों के दौरे करने शुरू कर दिए। भारत की आजादी की जंग के लिए वे विश्वसमुदाय का समर्थन जुटाने लगे। उस समय थाइलैंड जापान के कब्जे में था, बैंकाक में तय किया गया कि मोहन सिंह की आईएनए को इंडियन इंडिपेंडेंस लीग के अधीन लाया जाए और रास बिहारी बोस को इंडियन इंडिपेंडेंस लीग का प्रेसीडेंट बना दिया गया। जिसका काम था आजादी के लिए दुनिया भर से समर्थन और मदद लेना। यानी सुभाष चंद्र बोस के लिए एक सैनिक यूनिट और पॉलिटिकल यूनिट की आधारशिला उनके वहां आने से पहले ही रास बिहारी बोस और मोहन सिंह ने रख दी थी। जिसके कुल 1.2 लाख सदस्य बन चुके थे और साउथ ईस्ट एशिया के देशों से पचास हजार भारतीय सैनिक उसमें शामिल हो चुके थे।

जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारत छोड़कर जर्मनी पहुंचे तो रास बिहारी बोस को लगा कि सुभाष चंद्र बोस से बेहतर कोई करिश्माई नेतृत्व नहीं हो सकता। वेटरन बोस ने यंग बोस को आमंत्रित किया। बैंकाक में हुई लीग की दूसरी कॉन्फ्रेंस में रास बिहारी बोस ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को आमंत्रित करने का फैसला लिया। जर्मनी से यू बोट में बैठकर 20 जून 1943 को सुभाष चंद्र बोस टोक्यो पहुंचे। जापान पहुंचे तो रास बिहारी बोस उनसे मिले, रास बिहारी बोस को सुभाष चंद्र बोस से काफी आशाएं थीं, दोनों बोस थे, बंगाली थे, क्रांतिकारी थे, एक दूसरे के प्रशंसक थे। 5 जुलाई को वो सिंगापुर पहुंचे, नेताजी का जोरदार स्वागत हुआ और उसी दिन रास बिहारी बोस ने लीग और इंडियन नेशनल आर्मी की कमान नेताजी को सौंप दी, और खुद को सलाहकार के रोल तक सीमित कर लिया। यहां से नेताजी सुभाष चंद्र बोस की असली आजादी की लड़ाई शुरू होती है। रास बिहारी बोस उसके बाद उनका ज्यादा साथ नहीं दे पाए क्योंकि फेफड़ों में संक्रमण के चलते उनको हॉस्पिटल में भर्ती होना पड़ा था, लेकिन जापान में अपने नाम और रिश्तों के जरिए सुभाष चंद्र बोस की जो मदद हो सकती थी, उन्होंने वह की थी। आज हमारे देश के हालत ये है कि इतिहास विषय के अध्येताओं को छोड़ दिया जाए तो आजाद हिंद फौज के गठन में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के अलावा किसी और को कोई जानता तक नहीं है, मोहन सिंह या रास बिहारी बोस के उस अनमोल योगदान का जिक्र कहीं भी नहीं होता है। किसी ने कभी नहीं सोचा कि सुभाष चंद्र बोस कैसे विदेशी धरती पर जाकर इतनी बड़ी फौज कुछ दिनों में ही तैयार कर लेते हैं। सोचिए कितना मुश्किल हुआ होगा विदेशी धरती पर विदेशी सेनाओं से भारतीय सैनिकों को इकट्ठा करके इतनी बड़ी आजाद हिंद फौज खड़ी करना, उनका खर्चा, हथियार, वर्दी और विदेशी धरती पर राजनीतिक समर्थन जुटाना। यह सब रास बिहारी बोस के व्यक्तित्व व उनके जापान में बेहद मजबूत रिश्तों के चलते ही परवान चढ़ा था। बाद में सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिन्द फौज के नाम से आईएनए का पुनर्गठन किया था।

भारत को अंग्रेजी हुकुमत से मुक्ति दिलाने का सपना लिए भारत माता के इस वीर सपूत रास बिहारी बोस का 21 जनवरी 1945 को निधन हो गया। बाद में जापानी सरकार ने अपने इस भारतीय दामाद 'रास बिहारी बोस' को जापान के दूसरे सबसे बड़े अवॉर्ड  ‘आर्डर आफ द राइजिंग सन’ के सम्मान से सम्मानित किया था।

बुधवार, 22 मई 2019

महावीर त्यागी जी के व्यक्तित्व ने देश के संसदीय इतिहास को एक नया आयाम प्रदान किया*

*प्रकाशनार्थ* दिनांक -22-05-2019,

*महावीर त्यागी जी के व्यक्तित्व ने देश के संसदीय इतिहास को एक नया आयाम प्रदान किया*
(22 मई पुण्यतिथि पर विशेष)

दीपक कुमार त्यागी एडवोकेट,
स्वतंत्रता पत्रकार व स्तंभकार 

कभी महात्मा गांधी, नेहरू, पटेल के साथ बैठ कर देश के भविष्य की नीतियों का निर्धारण करने वाले महावीर त्यागी जी की आज पुण्यतिथि है। देश के महान स्वतंत्रता सेनानी श्री महावीर त्यागी जी का देश को गुलामी की जंजीरों से मुक्ति दिलाने में बहुत ही अहम योगदान रहा है। बिजनौर जनपद के नूरपुर क्षेत्र के रतनगढ़ निवासी महावीर त्यागी जी का जन्म 31 दिसंबर 1899 को हुआ था । वो एक अनूठे इंसान थे वे 1919 में जलियावाला बाग़ हत्या कांड के बाद ब्रिटिश सेना से त्यागपत्र देकर वे देश के स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। वो हमेशा अपने आदर्शों पर अडिग रहे चाहें वो लम्बे समय तक जेल में रहे थे लेकिन फिर भी कभी उन्होंने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।
महावीर त्यागी जी की वर्ष 1920 में जिला कांग्रेस के संस्थापकों में उनकी गिनती होती थी। उसके बाद में उन्होंने अपना कार्यक्षेत्र देहरादून बना लिया। देहरादून, बिजनौर (उत्तर-पश्चिम), सहारनपुर (पश्चिम) लोकसभा क्षेत्र से 1952, 57 व 62 में सांसद रहे महावीर त्यागी जी वर्ष 1951 से 53 तक केन्द्रीय राजस्व मंत्री रहे। वर्ष 1953 से 57 तक श्री त्यागी मिनिस्टर फार डिफेंस ऑर्गेनाइजेशन (1956 तक पंडित नेहरू के पास रक्षा मंत्री का कार्यभार भी था।) रहे। उनके कार्यकाल के दौरान देश में ही रक्षा सम्बंधी सामान बड़े पैमाने पर बनाने का कार्य शुरू हुआ। वर्ष 1957 के बाद भी वह विभिन्न कमेटियों और पुनर्वास मंत्रालय में रहे।
लेकिन आज देश के संसदीय इतिहास में महावीर त्यागी जी सरीखे नेताओं का पूर्ण रूप से अभाव है अब हम देशवासियों को देश की राजनीति में कही भी इस तरह के ओजस्वी व्यक्तित्व के धनी नेता नजर नहीं आते हैं। श्री महावीर त्यागी जी को सरकार व सामाजिक जो भी दायित्व मिला उन्होंने उसका पूर्ण निष्ठा व ईमानदारी के साथ के निर्वाह किया। वो सविधान सभा, लोकसभा, राज्य सभा व मंत्री रहते हुए भी हमेशा अपने आदर्शो पर अडिग रहे। देश के स्वतंत्रता सेनानियों में त्यागी जी का व्यक्तित्व बड़ा ही आकर्षक था वे बेहद हाजिरजवाब, सत्य के प्रहरी, ईमानदार, भावुक और निडर व्यक्तित्व के धनी थे। उन्होंने जिस तरह से देश की स्वतंत्रता से पूर्व के आंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और देश की आजादी के लिए बहुत लम्बा कारावास भी भुगता उसके देश हमेशा उनका ऋणी रहेगा।

वो देश की पहली सरकार में केंद्रीय राजस्व मंत्री रहे महावीर त्यागी जी का
उत्तर प्रदेश में देहरादून इलाके में कोई सानी नहीं था सारा जिला त्यागी जी का अपना घर था वो आम जनमानस के बीच बहुत ही लोकप्रिय थे उन्हें जो अनुचित लगता था उसका वो तर्कसंगत ढंग से विरोध भी करते थे मगर किसी से मन में द्वेष भाव नहीं रखते।
इसी तरह जब संसद में बहस होती थी वो अपनी तार्किक बातों से सभी का ध्यान आकर्षित कर लेते थे उनके बारे में एक वाकया बहुत प्रसिद्ध है कि 1962 के भारत-चीन युद्ध को लेकर संसद में बहस चल रही थी। उन दिनों अक्साई चिन के चीन के कब्जे में चले जाने को लेकर विपक्ष ने जबरदस्त हंगामा काट रखा था। लेकिन जवाहरलाल नेहरू जी ने कभी नहीं सोचा होगा कि इस मसले पर विरोध में सबसे बड़ा चेहरा उनके अपने मंत्रिमंडल के सदस्य महावीर त्यागी जी के रूप में होगा। इस मसले पर जवाहर लाल नेहरू जी ने जब संसद में ये बयान दिया था कि अक्साई चिन में तिनके के बराबर भी घास तक नहीं उगती, वो बंजर इलाका है इसलिए छोड़ दिया है तो संसद में महावीर त्यागी जी ने अपनी टोपी उतारकर गंजा सिर नेहरू जी को दिखाया और कहा- यहां भी कुछ नहीं उगता तो क्या मैं इसे कटवा दूं या फिर किसी और को दे दूं। सोचिए इस तार्किक जवाब को सुनकर पूरी संसद व नेहरू जी का क्या हाल हुआ होगा? क्या आज कोई ऐसा कह सकता है ।
आज अगर ऐसे मंत्री हों तो विपक्ष की किसी को भी जरूरत नहीं है। महावीर त्यागी जी ने हमेशा यह साबित किया कि उनके लिये व्यक्ति पूजा के बजाय देश की पूजा महत्वपूर्ण है। उनको देश की एक इंच जमीन भी किसी को देना गवारा नहीं था, चाहे वो बंजर ही क्यों ना हो और व्यक्ति पूजा के खिलाफ कांग्रेस पार्टी में बोलने वालों में वो सबसे आगे थे। उन्होंने ही इंदिरा गांधी जी को पार्टी का अध्यक्ष बनाये जाने का वाकायदा पत्र लिखकर विरोध किया था। लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर संसद में सत्ता पक्ष के नेताओं का किसी मुद्दे को लेकर एक हो जाना आम है, अब कोई अपनी सरकार का मुद्दों पर आधारित विरोध करने की भी हिम्मत नहीं रखता है। वही देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू सरकार में शामिल रहे स्वतंत्रता सेनानी महावीर त्यागी ऐसे थे, जो कई मुद्दों पर अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा करने में पीछे नहीं रहते थे। उनका संसद की गरिमा को ऊंचाईयों को पहुंचाने में अहम योगदान रहा।

देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू जी की सरकार में वित्त, राजस्व और रक्षा जैसे अहम मंत्रालय संभालने वाले महावीर त्यागी जी 1967 का लोकसभा चुनाव एकदम अंजान नए चेहरे और निर्दलीय प्रत्याशी यशपाल सिंह से हार गए थे।। कांग्रेस के दिग्गज नेता महावीर त्यागी के लिए यह चुनाव आखिरी चुनाव साबित हुआ था।

महावीर त्यागी जी वर्ष 1962 से 64 तक संसद की लोक लेखा समिति के चेयरमैन रहे। जनवरी 1966 में ताशकंद समझौते में कुछ स्थानों को पाकिस्तान को लौटाने के प्रश्न पर उन्होंने मंत्रीमंडल से इस्तीफा दे दिया। महात्मा गांधी जी का सानिध्य पाने वाले श्री त्यागी सरदार पटेल, पंडित नेहरू, रफी अहमद किदवई और मदनमोहन मालवीय जी के भी बेहद करीबी रहे। उन्होंने देश में भाषाई आधार पर राज्यों के गठन का जबरदस्त विरोध किया था। उनके देशप्रेम के कई किस्से बहुत मशहूर है।
ऐसे महान व्यक्तित्व के धनी महावीर त्यागी जी का 22 मई 1980 को नई दिल्ली में निधन हो गया था आज पुण्यतिथि पर हम उनको कोटि-कोटि नमन् करते हैं।

सोमवार, 20 मई 2019

*इक्कीसवीं सदी के आधुनिक भारत के शिल्पकार राजीव गांधी*

*इक्कीसवीं सदी के आधुनिक भारत के शिल्पकार राजीव गांधी*

राजीव गाँधी एक ऐसे दूरदर्शी नेता थे जिन्होंने देशवासियों को 21वीं सदी के आधुनिक भारत के निर्माण का सपना दिखाया और इस सपने को धरातल पर उतारने के लिए उन्होंने अपने प्रधानमंत्री के बहुत छोटे कार्यकाल में ही बहुत तेजी से कार्य करना भी शुरू कर दिया था। लेकिन ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था जिसके चलते उन्होंने हम से राजीव जी को बहुत ही जल्दी छीन लिया था।
वो दिन था 21 मई 1991 को जिस दिन अचानक सभी देशवासियों को अंदर तक झकझोर देने वाली खबर प्रसारित हुई की भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की हत्या तमिलनाडु के श्रीपेराम्बदूर में एक आत्मघाती विस्फोट हमले में कर दी गयी है। लोगों को झकझोर देने वाली इस दुखद खबर से देश में हर तरफ शोक की लहर दौड़ पड़ी प्रत्येक भारतवासी अवाक रह गया, करोड़ों लोग स्तब्ध रह गये कि ये अचनाक वज्रपात कैसे हो गया। उस समय देश के  अधिकतर लोगों की आँखों में आंसू थे, लोगों की आँखों के ये आंसू भारत के महान सपूत अपने लाड़ले नेता के लिए थे ना कि ये आंसू किसी राजनैतिक दल के नेता के लिए थे। ये उस   आंसू व्यक्ति के लिए थे जिसे ये लोगों दिलोजान से चहते जो आतंकियों की हमले के चलते असमय काल का ग्रास बन गया था। लोगों की ये पीढ़ा भारतीय राजनीति के उज्जवल भविष्य के चेहरे राजीव गाँधी के लिए थी। वह दिन  देश में हर तरफ शोक का गमगीन माहौल लोगों को बार-बार यह एहसास जरूर करवाता था कि आज देश में कोई बहुत बड़ी त्रासदी हुई है। राजीव गाँधी के बाद कई नेताओं का दुनिया व हमारे देश में देहांत हुआ है लेकिन देश को वैसी पीड़ा और कष्ट शायद फिर कभी हो। इस सबके लिए जिम्मेदार था राजीव गाँधी जी का कुशल व्यवहार व देश के आमजनमानस के उज्जवल भविष्य के लिए दिल से सोच कर नीतियों को बनाने वाली उनकी कार्यशैली। इसलिए यह कहना उचित होगा कि कु्छ लोग ताउम्र लोगों के दिलोदिमाग पर छा जाते है। राजीव गाँधी भी एक ऐसी शख़्सियत थे, जिन्होंने प्रधानमंत्री के रूप में भारत की ज़मीन पर राज ना करके बल्कि देशवासियों की सेवा करके उनके दिलों पर हुकूमत की थी। भले ही आज वो इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन फिर भी वो करोड़ों लोगों के दिलों में हमेशा ज़िंदा हैं।

राजीव गाँधी स्वभाव से गंभीर लेकिन आधुनिक सोच और निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता वाले व्यक्ति थे वो भारत को विश्व की अत्याधुनिक तकनीकों से लैस करके भारत को विकसित देशों की श्रेणी में लाना चाहते थे। वो अक्सर कहा करते थे कि भारत की एकता और अखंडता को बनाए रखते हुए उनका सबसे बड़ा सपना इक्कीसवीं सदी के भारत के निर्माण करने का है।

राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त, 1944 को मुंबई में हुआ था। वे सिर्फ़ तीन साल के थे, जब देश आज़ाद हुआ और उनके नाना जवाहर लाल नेहरू आज़ाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने। राजीव गाँधी ने अपना बचपन अपने नाना के साथ तीन मूर्ति हाउस में बिताया, जहां इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री की परिचारिका के रूप में काम करती थी। वे कुछ वक़्त के लिए देहरादून के वेल्हम स्कूल गए, लेकिन जल्द ही उन्हें हिमालय की तलहटी में स्थित आवासीय दून स्कूल में भेज दिया गया। बाद में उनके छोटे भाई संजय गाँधी को भी इसी स्कूल में भेजा गया, जहां दोनों साथ रहे। स्कूल से निकलने के बाद राजीव गांधी कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज गए, लेकिन जल्द ही वे वहां से हटकर लंदन के इम्पीरियल कॉलेज चले गए वहां उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। उनके सहपाठियों के मुताबिक़ उनके पास दर्शन, राजनीति या इतिहास से संबंधित पुस्तकें न होकर विज्ञान एवं इंजीनियरिंग की कई पुस्तकें हुआ करती थीं। हालांकि उनकी संगीत में बहुत दिलचस्पी थी उन्हें पश्चिमी और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय और आधुनिक संगीत पसंद था। उन्हें फ़ोटोग्राफ़ी और रेडियो सुनने का भी ख़ासा शौक़ था, हवाई उड़ान उनका सबसे बड़ा जुनून था। इंग्लैंड से घर लौटने के बाद उन्होंने दिल्ली फ़्लाइंग क्लब की प्रवेश परीक्षा पास की और व्यावसायिक पायलट का लाइसेंस हासिल किया। इसके बाद वे 1968 में घरेलू राष्ट्रीय जहाज़ कंपनी इंडियन एयरलाइंस के पायलट बन गए। बाद में उन्होंने कैम्ब्रिज में पढ़ रही इटली की एंटोनियो माइनो ( सोनिया गाँधी) जो उस वक़्त वहां अंग्रेज़ी की पढ़ाई कर रही थीं से 1968 में नई दिल्ली में शादी कर ली। वे अपने दोनों बच्चों राहुल और प्रियंका के साथ नई दिल्ली में इंदिरा गांधी के निवास पर रहकर ख़ुशी-ख़ुशी अपनी ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे। तब ही  23 जून 1980 को एक विमान दुर्घटना में उनके भाई संजय गांधी की मौत ने उनके जीवन के हालात बदल कर रख दिए। उन पर राजनीति में आकर अपनी माँ इंदिरा की मदद करने का जबरदस्त दबाव बनने लगा। फिर कई अंदरूनी और बाहरी चुनौतियां भी राजीव जी के सामने आईं। पहले उन्होंने इन सबका काफ़ी विरोध किया, लेकिन बाद में उन्हें अपनी माँ इंदिरा गाँधी की बात माननी पड़ी और वो इस तरह न चाहते हुए भी देश की सियासत में आ ही गए। राजीव जून 1981 में अपने भाई संजय की मौत की वजह से ख़ाली हुई उत्तर प्रदेश के अमेठी लोकसभा क्षेत्र से उपचुनाव लड़कर विजयी बने। फिर उन्हें नवंबर 1982 में भारत में हुए एशियाई खेलों से संबंधित महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी दी गई, जिसे उन्होंने बख़ूबी अंजाम दिया। साथ ही कांग्रेस के महासचिव के तौर पर उन्होंने उसी लगन से काम करते हुए पार्टी संगठन को व्यवस्थित और सक्रिय किया।

31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद मात्र चालीस वर्ष की उम्र में प्रधानमंत्री बनने वाले युवा राजीव गाँधी देश के सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री थे। जब 31 अक्टूबर 1984 को वे कांग्रेस अध्यक्ष और देश के प्रधानमंत्री बने थे तो उस समय देश के सामने बहुत सारी ज्वलंत समस्याएं थी जैसे कि पंजाब, असम और मिजोरम हिंसा में जल रहे थे।
ऑपरेशन ब्लू स्टार और इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पंजाब और दिल्ली में सिख विरोधी दंगे चल रहे थे। अवैध प्रवासियों के खिलाफ नस्लीय हिंसा से भी असम झुलस रहा था। मिजोरम में भी विद्रोह के बिगुल बज रहे थे। लेकिन उन्होंने देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री और कम अनुभवी होते हुए भी समस्याओं से मुंह नहीं चुराया और  अपनी व्यवहार कुशलता, सादगी और बिना अहंकार की भावना के गलतियां सुधारने की कोशिश से उन्होंने समस्याओं का धीरे-धीरे समाधान करना शुरू किया। हालांकि इस बीच उन्होंने देश में लोकसभा के चुनाव कराने का आदेश दिया और बेहद दुखी होने के बावजूद भी उन्होंने अपनी हर ज़िम्मेदारी को बख़ूबी निभाया। महीने भर की लंबी चुनावी मुहिम के दौरान उन्होंने पृथ्वी की परिधि के डेढ़ गुना के बराबर दूरी की यात्रा करते हुए देश के तक़रीबन सभी हिस्सों में जाकर 250 से अधिक जनसभाएं कीं और लाखों लोगों से रूबरू हुए। उस लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी को रिकॉर्ड 401 सीटें हासिल हुई थी। जिसके बाद उन्होंने अपने इक्कीसवीं सदी के भारत के सपने को साकार करने के लिए देश के कई क्षेत्रों में बहुत तेजी से नई पहल करने की शुरुआत की, जिनमें संचार क्रांति, कंप्यूटर क्रांति, शिक्षा का प्रसार, 18 साल के युवाओं को मताधिकार, पंचायती राज आदि मुख्य रूप से शामिल हैं। राजीव जी देश की कंप्यूटर क्रांति के जनक के रूप में भी जाने जाते हैं। वे युवाओं के साथ-साथ देश के हर वर्ग की उम्र के लोगों व समाज के लोकप्रिय नेता थे। लोग उनका भाषण सुनने के लिए घंटों-घंटों तक इंतज़ार किया करते थे। श्री राजीव गाँधी के कुशल व्यवहार के विपक्षी दलों के नेता भी भी कायल थे वह अपने विरोधियों की मदद के लिए भी हमेशा तैयार रहते थे।
उन्होंने अपने प्रधानमंत्री कार्यकाल में कई ऐसे महत्वपूर्ण फ़ैसले लिए, जिसका असर आज देश के विकास में स्पष्ट देखने को मिलता है। आज हर हाथ में दिखने वाला मोबाइल व हर घर में कम्प्यूटर उन्हीं शानदार फ़ैसलों का शानदार नतीजा है। राजीव गाँधी को सुरक्षाकर्मियों का घेरा बिलकुल पसंद नहीं था। वे अपनी जीप खुद ड्राइव करना पसंद करते थे। राजीव गाँधी जी ने जी ने भारतीय राजनीति के पन्नों पर जब अपनी सोच, अपने सपनों को उकेरना शुरू किया, तो सबको स्पष्ट नज़र आने लगा कि उनकी सोचा देश में चल रही पुराने ढर्रे की राजनीति से बिल्कुल अलग है।

अपने कार्यकाल में राजीव गाँधी जी ने देश के निर्माण के लिए काफी महत्वपूर्ण कार्य थे। उन्हें जब वर्ष 1982 में एशियाई खेलों की आयोजन समिति में शामिल किया गया तो उन्होंने सफलतापूर्वक इन खेलों का आयोजन करा कर ज़िम्मेदारी को बख़ूबी अंजाम दिया था । राजीव गांधी भारत में सूचना क्रांति के जनक माने जाते हैं, देश में कंप्यूटराइजेशन और टेलीकम्युनिकेशन क्रांति का श्रेय उन्हें जाता है। राजीव ने वर्ष 1986 में अपने प्रधानमंत्री कार्यकाल में देश में आईटी और टेलीकॉम क्षेत्र में जबरदस्त क्रांति लाने का काम किया वो सूचना प्रौद्योगिकी में भारत की भूमिका बहुत अहम मानते थे। उन्होंने ही देश में सबसे खास तकनीक कंप्यूटर के इस्तेमाल को आम करने की शुरुआत की थी।  साइंस और टेक्नॉलोजी को बढ़ावा देने के लिए सरकारी बजट बढ़ाए। जिसके चलते ही आज भी देश में रोजगार के भरपूर अवसर मिल रहे है व अर्थव्यवस्था काफी मजबूत हुई हैं।

राजीव ने वर्ष 1986 में शिक्षा का स्तर सुधरे सुधारने के उद्देश्य से राष्ट्रीय शिक्षा नीति का एलान किया। जिसके चलते ही देश में जवाहर नवोदय विद्यालयों का निर्माण किया गया जिस में आज लाखों ग्रामीण बच्चों को उच्च गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा मिल रही है।

राजीव ने वर्ष 1986 में महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड (एमटीएनएल) की स्थापना की थी। जिसकी पब्लिक कॉल ऑफिस (PCO) के जरिए एक तरफ जहां देश के शहरी व ग्रामीण इलाकों में संचार सेवा का बहुत तेजी से विस्तार हुआ था वहीं दूसरी तरफ लोगों के लिए रोजगार के नये अवसर मिले थे। राजीव जी ने गांव-गांव को टेलीफोन से जोड़ने और कंप्यूटर के जरिए महीनों का काम मिनटों में करने की बात की थी राजीव गाँधी का सपना था कि गांव-गांव में टेलीफोन पहुंचे और कंप्‍यूटर शिक्षा का देश में जमकर प्रचार-प्रसार हो।

अपने प्रधानमंत्री कार्यकाल में श्री गाँधी ने देश की युवाशक्ति को अत्याधिक बढ़ावा दिया था, क्योंकि उनका मानना था कि देश का विकास युवाओं के द्वारा ही हो सकता है। देश के युवाओं को रोजगार मिले, इसके लिए वो हमेशा प्रयासरत रहे और उन्होंने इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए जवाहर रोजगार योजना शुरू की थी।

राजीव ने स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं में महिलाओं को 33% रिजर्वेशन दिलवाने का काम किया उन्होंने मतदाता की उम्र 21 वर्ष से कम करके 18 वर्ष तक के युवाओं को चुनाव में वोट देने का अधिकार दिलवाया।

राजीव गांधी ने अपने ‘पावर टू द पीपल’ आइडिया के चलते ही देश में पंचायती राज व्यवस्था लागू करवाने की दिशा में कदम उठाये थे और उनकी इसी सोच के चलते अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (एआईसीसी) सत्रों ने हमेशा देश के लिये नीतियां बनाने की बुनियाद रखी है और फरवरी 1989 का सत्र भी इस दृष्टि से ऐतिहासिक माना जाता है क्योंकि उस समय कांग्रेस ने संकल्प पारित किया था कि ‘‘स्वतंत्र भारत में दसवां मील का पत्थर पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा देना है।’’ एक ही झटके में श्री राजीव गांधी और कांग्रेस पार्टी ने ग्रामीण बेरोजगार, अनुसूचित जनजाति एवं अनुसूचित जाति, महिलाओं और ग्रामीण भारत के अन्य अल्पसंख्यक समूहों को संवैधानिक शासन के दायरे में ला दिया। ये सारे वर्ग ऐसे हैं जो पहले लोकतंत्र के फायदों और भारत की विकास प्रक्रिया से से अछूते रहते थे। लोकतांत्रिक भारत की बुनियाद तैयार हो चुकी थी। यह कदम ही राजीव जी के सपनों के भारत की बुनियाद था क्योंकि उन्होंने पंचायती राज के जरिए देश में एक साथ दो काम करके गांवों को अपने विकास का अधिकार और उसमें महिलाओं को एक तिहाई हिस्सेदारी दे दी थी।

उन्होंने देश की नौकरशाही में सुधार लाने और देश की अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के लिए काफी कारगर क़दम उठाए। सत्ता के विकेंद्रीकरण के अलावा राजीव ने सरकारी कर्मचारियों के लिए 1989 में 5 दिन काम का प्रावधान भी लागू किया था।

राजीव ने कुछ सेक्टर्स में सरकारी नियंत्रण को खत्म करने की कोशिश भी की थी। यह सब देश से बड़े पैमाने पर नियंत्रण और लाइसेंस राज के खात्मे की एक शुरुआत थी।

राजीव गाँधी जी ने इनकम और कॉर्पोरेट टैक्स घटाया, लाइसेंस सिस्टम सरल किया और कंप्यूटर, ड्रग और टेक्सटाइल जैसे क्षेत्रों से सरकारी नियंत्रण खत्म किया। साथ ही कस्टम ड्यूटी भी घटाई और निवेशकों को बढ़ावा दिया। देश की बंद अर्थव्यवस्था को बाहरी दुनिया की खुली हवा महसूस करवाने का यह पहला मौका था इसलिए देश में आर्थिक उदारवाद की शुरुआत करने का थोड़ा बहुत श्रेय श्री राजीव गाँधी को भी मिलना चाहिए।

राजीव जी देश की सियासत व सिस्टम को भ्रष्टाचार से मुक्त करना चाहते थे, लेकिन यह विडंबना है कि बाद में उन्हें खुद  भ्रष्टाचार की वजह से ही सबसे ज़्यादा आलोचना का सामना करना पड़ा।

राजीव गाँधी के सपनों का भारत एक सशक्त सैन्य शक्ति वाला देश था वो विश्व में अमनचैन के पैरोकार थे, लेकिन जानते थे कि शांति और अहिंसा की बातें किसी कमजोर देश को नहीं बल्कि मजबूत देश को ही शोभा देती हैं। यही वजह है कि उन्होंने मजबूत सैन्य शक्ति वाले भारत के अपने सपने को पूरा करने के लिए मिसाइल और परमाणु कार्यक्रमों की रफ्तार बढ़ाने का फैसला किया था।

अपने कार्यकाल में उन्होंने कई साहसिक क़दम उठाए, जिनमें श्रीलंका में आईपीकेएफ (शांति सेना) का भेजा जाना, असम समझौता, पंजाब समझौता, मिज़ोरम समझौता आदि शामिल हैं। इसकी वजह से ही  चरमपंथी ताकतें उनके दुश्मन बन गयी थी। नतीजतन, श्रीलंका में सलामी गारद के निरीक्षण के वक़्त उन पर जानलेवा हमला किया गया, जिसमें वो बाल-बाल बच गए थे।

साल 1989 में उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया, भारत का दिल कहलाने वाले गांवों की याद आज सभी राजनीतिक पार्टियों को आने लगी है, अपनी राजनीतिक साख को बचाने के लिए जिस तरह से नेता शहर से निकलकर गांवों के चक्कर लगाने लगे हैं, उसकी शुरूआत भी राजीव गाँधी जी ने बहुत पहले ही कर दी थी। 31 अक्टूबर 1984 से 2 दिसम्बर 1989 तक भारत के प्रधानमंत्री की गद्दी संभालने वाले राजीव ने 1989 में अपनी हार के बाद दिल्ली दरबार से बाहर निकलने का फैसला किया था ।

राजीव गाँधी ने भ्रष्टाचार को देश के विकास का सबसे बड़ा दुश्मन बताया था. उनका सबसे चर्चित बयान था कि 'सरकार के आवंटित एक रुपये में से सिर्फ 15 पैसे ही गाँव तक पहुंचते हैं" वो पहले ऐसे नेता थे जिन्होंने सरकारी तंत्र के इस भ्रष्टाचार को इतना करीब से पहचाना और सार्वजनिक रूप से इसे स्वीकार किया। भ्रष्टाचार से निपटने के लिए राजीव ने कठोर कानूनों को सख्ती से लागू कराया, जो उस समय देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को रोकने में ताकतवर भी साबित हुए। यही नहीं उन्होंने दल-बदल विरोधी कानून भी लागू कराया जिससे राजनीति में भ्रष्टाचार पर रोक लग सके। हालांकि बाद में राजीव गाँधी पर खुद भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे। उन पर बोफोर्स तोप की खरीद में घूस लेने के आरोप लगे, लेकिन ये आरोप अदालत में साबित नहीं हो पाए। आखिरकार उनकी मौत के कई वर्ष बाद देश की सर्वोच्च अदालत ने उन्हें अपने फैसले में बेगुनाह बताया था।

श्री राजीव गाँधी जब देश में आगामी आम चुनाव के प्रचार के लिए  21 मई, 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेराम्बदूर गए, जहां एक आत्मघाती हमले में उनकी मौत हो गई और भारत के लिए नई सदी की सोच का सपना लिए कांग्रेस के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी हमेशा-हमेशा के लिए खामोश हो गए। लेकिन तब तक नई सोच के इस नौजवान नेता ने भारत को प्रगति की राह पर बाखूबी चलना सिखा दिया था। जिसे आज के भारत में हम बखूबी महसूस कर सकते हैं। राजीव गाँधी की देश सेवा को राष्ट्र ने उनके दुनिया से विदा होने के बाद स्वीकार करते हुए उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया, जिसे श्रीमती सोनिया गांधी ने 6 जुलाई, 1991 को अपने पति की ओर से ग्रहण किया था।

राजीव गाँधी कहते थे कि -:
"भारत एक प्राचीन देश, लेकिन एक युवा राष्ट्र है,
मैं जवान हूँ और मेरा भी एक सपना है,
मेरा सपना है भारत को मजबूत, स्वतंत्र,
आत्मनिर्भर
और दुनिया के सभी देशों में से प्रथम रैंक
में लाना और मानव जाति की सेवा करना"।

वो किसानों के बारे में कहते थे कि -:

"यदि किसान कमजोर हो जाते हैं तो देश
आत्मनिर्भरता खो देता है, लेकिन अगर
वे मजबूत हैं तो देश की स्वतंत्रता भी मजबूत हो जाती है। अगर हम कृषि की प्रगति को बरकरार नहीं रख पाए तो देश से हम गरीबी नहीं मिटा पाएंगे। लेकिन हमारा सबसे बड़ा कार्यक्रम गरीबी
उन्मूलन हमारे किसानों के जीवन स्तर में
सुधार लायेगा। गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम का मकसद किसानों का उत्थान करना है।

आज राजीव गांधी जी की हत्या को वर्षों हो गए हैं। इन वर्षों में भारत राजीव के सपनों का देश बना है या नहीं, यह कहना बहुत मुश्किल होगा। राजीव ने ही कभी भारत को मजबूत, महफूज़ और तरक्की की राह पर रफ्तार से दौड़ता मुल्क बनाने का सपना देखा था। देश की तरक्की पसंद राजीव ने ही कभी भारत को विश्व समुदाय व वक्त के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना सिखाया था। राजीव गाँधी देश को अत्याधुनिक नवीनतम तकनीक से लैस करके इक्कीसवीं सदी का आधुनिक भारत बनाने का सपने देखते थे और हमेशा उसी रास्ते पर आगे भी बढ़े। यह कहना गलत नहीं होगा कि आज जिस भारत में हम सांस ले रहे हैं। जिस आधुनिक भारत का लोहा आज पूरी दुनिया मान रही है, जिस भारत पर आज पूरी दुनिया की नजरें इनायत हैं। जिस भारत को आने वाले कल की विश्वशक्ति माना जा रहा है और कहा जा रहा है कि भविष्य में एक बार फिर भारत पूरे विश्व को एक नई राह दिखाएगा, इस स्थिति की ठोस नींव रखने का श्रेय भारत माता के महान सपूत राजीव गांधी को ही जाता है।

।।जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।
लेखक
दीपक कुमार त्यागी एडवोकेट,
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार,
अध्यक्ष, श्री सिद्धिविनायक फॉउंडेशन (SSVF)