*प्रकाशनार्थ*
*हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी एडवोकेट* *स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार*
*बेटी गुडिया हम शर्मिंदा हैं इंसानियत के दुश्मन तेरे कातिल अभी जिंदा हैं*
देश की राजधानी दिल्ली से मात्र 110 किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जनपद के टप्पल इलाके में ढाई साल साल की बच्ची की नृशंस हत्या ने हम सभी देशवासियों को झकझोर कर रख दिया। छोटी बच्ची गुडिया (बदला हुआ नाम) जिस तरह से 30 मई को घर के बाहर खेलते समय लापता हो गई थी और बाद में 2 जून को दरिंदगी का शिकार हुआ बच्ची का क्षत-विक्षत शव कूड़े के ढेर से बरामद हुआ था, अब इस हैवानियत भरे मामले पर देश के सभी वर्गों के लोगों में बहुत गुस्सा देखा जा रहा है। जिसे लोग अब सड़क पर विरोध प्रदर्शन करके व सोशल मीडिया पर मुहिम चला कर व्यक्त कर रहे हैं। हालांकि पुलिस ने बच्ची के पिता की शिकायत पर इस मामले में जाहिद और असलम को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। लेकिन लोगों में फिर भी जबरदस्त आक्रोश व्याप्त हैं। लोग यह सोचकर हैरान व परेशान है कि दरिंदों ने किस हैवानियत से एक ढाई साल की अबोध बच्ची की पाशविक-बर्बर तरीक़े से हत्या की है वह इंसानियत को शर्मसार करने वाली बेहद निंदनीय घटना है, सबसे बड़ी सोचने वाली बात यह है कि हमारे देश में पिछ़ले कुछ वर्षों में छोटे बच्चों व बच्चियों के साथ आयेदिन बर्बरता, बलात्कार और हत्या जैसी घटना हो रही है, जिन्होंने हमारे समाज को झकझोर के रख दिया है। इन शर्मनाक घटनाओं ने एक बार फिर हमारे इंसान होने पर प्रश्नचिन्ह लगा कर मानवता को शर्मशार किया है। आज किसी भी इंसान को यकीन नहीं हो रहा कि कोई मनुष्य महज दस हजार रुपये की देनदारी नहीं चुका पाने के आपसी विवाद में किसी अबोध बच्ची को इस निर्ममता व हैवानियत के साथ कैसे कत्ल कर सकता है।
इस घटना के बाद से देश में एकबार फिर बहुत जनआक्रोश है लोग अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंतित है, लोगों की मांग है कि पुलिस इस मसले की जल्द से जल्द जांच करे और शासन प्रशासन इस मामले पर फास्टट्रैक कोर्ट में जल्दी निर्णय कराये जिसे कि आरोपियों को जल्द से जल्द फांसी दी जाये। लेकिन सोचने वाली सबसे बड़ी बात यह है कि आज 21वीं सदी के भारत में हम किस बर्बर और असभ्य, मध्ययुगीन जाहिल समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ बहुत सारे लोगों के मन में ना तो नियम, कायदे, कानून का कोई भय है ना ही किसी तरह का सम्मान बचा है। आज देश में राक्षसी प्रवृत्ति के लोगों के चलते पुलिस, सुरक्षा, कानून-व्यवस्था सब बेमानी साबित हो रहे हैं। सोचने वाली बात यह है कि देश में सरकार चाहे किसी भी राजनैतिक दल की हो उनके नेतृत्व और मंत्रियों के लिए किसी बच्ची की क्षत-विक्षत लाश का उसके लापता होने के चार दिन बाद कूड़े के ढेर से मिलना, आए दिन होने वाली एक सामान्य मामूली घटना कैसे हो जाती है यह सभी आमजनमानस की सोच से परे हैं। इंसानियत को शर्मसार करने वाली इस तरह की हैवानियत भरी घटनाओं पर हमारे भाग्यविधाताओं के ओछे बयान यह बताते है कि हमारे देश के अधिकतर राजनीतिज्ञों की संवेदनाएं किस कदर दिन-प्रतिदिन मरती जा रही हैं। इसलिए अब अंत:मन से बार-बार एक सवाल उठता है कि हम कैसे राक्षसी सोच वाले जाहिल समाज में जी रहे हैं। जहाँ अपनी दुश्मनी निकालने के लिए बच्चों को भी नहीं छोड़ा जाता हैं।
आज में सोचता हूँ कि बेटी 'गुडिया' तुम एक ऐसे देश में पैदा हुई जहाँ वैसे तो बच्चियों की पूजा होती हैं कहा जाता है कि जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं और जहाँ स्त्रियों की पूजा नहीं होती है, उनका सम्मान नहीं होता है वहाँ किये गये समस्त अच्छे कर्म निष्फल हो जाते हैं। लेकिन उसी देश में बच्चियों के साथ ऐसे जघन्य अपराध क्यों हो रहे हैं। आज एक तरफ तो सरकार 'बेटी बचाओ बेटी पढाओं' का नारा बुलंद करती है लेकिन सच यह है कि बेटी गुडिया जहाँ तुमने कभी नन्हीं सी परी बनकर जन्म लिया था आज वहाँ नारी के प्रति बढ़ते अपराधों को देखकर लगता है कि देश में नारी को देवी मानकर पूजा करना आज एक ढोंग बनता जा रहा है और बहुत ही अफसोस की बात यह है कि उन ही ढोंगी हैवान राक्षसों की राक्षसी सोच का बेटी गुडिया तुम भी आसान शिकार बन गयी हो। मुझे बहुत ही अफसोस है कि तुम कुछ जाहिल दंरिदों की इंसानियत को शर्मसार करने वाली हरकतों के चलते आज इस दुनिया में नहीं हो। क्योंकि बिटिया हमारे देश में आजकल एक जुर्म को छुपाने के लिए लोगों में दूसरे जुर्म को अंजाम देना फैशन बनता जा रहा हैं। जिस देश में आजकल अपनी ओछी राजनीति चमकने के लिए जहाँ जुर्म से पीड़ित-पीड़िता के दुःख दर्द के बारे में सोचने के बजाय एक राक्षसी सोच का वह अपराधी और उसका धर्म महत्वपूर्ण हो जाता है वहाँ न्याय की बात करना बेमानी हैं। जिस देश में आज हम लोग अपने राजनैतिक स्वार्थों के हिसाब से अपराध व अपराधी को भी धर्म का चश्मा लगा कर कभी बचाने का कभी सजा दिलाने का कार्य करते हैं। उस देश में इन हैवानों पर अंकुश लगा बहुत कठिन कार्य हैं। लेकिन मेरा मानना यह है कि अगर हम अपने देश में ही अपने बच्चों व बच्चियों की इज्जत आबरू और जिंदगी की हिफाजत के लिए कुछ नहीं कर पा रहे हैं तो फिर हम आखिर किस लिए और क्यों जी रहे हैं! क्यों हमारे लिए किसी और की मासूम बच्ची के साथ होने वाली बर्बरता पूर्ण घटना, केवल एक अपराध की घटना भर बनकर रह जाती है। क्यों हम सभी देशवासी किसी मासूम बच्ची की हत्या और बलात्कार को अपनी जातिवाद, धार्मिक, व राजनीतिक प्रतिबद्धताओं से इतर नहीं देख पाते हैं। इसलिए यह बहुत आवश्यक है कि आज इस तरह की आयेदिन होने वाली हैवानियत को रोकने के लिए व बच्ची गुडिया को तत्काल न्याय दिलाने के लिए और उसके गुनहगारों को उनके किए की ऐसी कठोर सजा मिले जो भविष्य में किसी और बच्ची को पाशविक-बर्बरता का शिकार होने से रोकने के मामले में उदाहरण बन सके।
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