"मेरे पिता जैसा कोई नहीं" फादर्स डे पर दुनिया के हर पिता को समर्पित
हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी एडवोकेट,
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार
जून माह के तीसरे रविवार को भारत समेत विश्व में 'फादर्स डे' के रूप में सेलिब्रेट किया जाता है। इस दिन को पिता के सम्मान के रूप में माना जाता है। वैसे तो किसी भी व्यक्ति के लिए माता-पिता दुनिया में सबसे अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। क्योंकि उनके बिना इस धरती पर जन्म लेना संभव ही नहीं हैं और वो माता-पिता ही है जो नन्हें से बच्चों का लालन-पालन से लेकर उनको उंगली पकड़कर चलना सिखाने से लेकर जीवन में अच्छे बुरे और संस्कार की सीख देते हैं। इसलिए ही माता-पिता को साक्षात भगवान का दर्जा दिया जाता है। जीवन में इनके बिना किसी भी व्यक्ति के अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। अगर इनमें से किसी एक की भी कमी रह जाती है तो बच्चे का जीवन बहुत ही कठिन हो जाता हैं। जीवन में जिस तरह से माँ जन्मदाता के रूप में प्यार और करुणा के साथ बच्चों की मजबूत नींव रखने के लिए जानी पहचानी जाती हैं। वहीं जीवन में पिता बच्चों के लिए एक ऐसा सहारा होता हैं जो उन्हें मजबूत, ताकतवर और तमाम कठिनाईयों से लड़ना सिखाता है। इसलिए दुनिया का हर बच्चा कहता है कि "मेरे पिता जैसा कोई नहीं" हर बच्चे की नज़रों में उसके माता-पिता सर्वश्रेष्ठ होते हैं।
प्रत्येक परिवार में माता पिता ही वह शख्स होते है, जो अपने बच्चों का आदर्श बनते है। हर बच्चा सबसे पहले आदर्श के रूप में अपने माता पिता को ही देखता है। यह माना जा सकता है कि माँ यदि बच्चे की पहली पाठशाला होती है, तो जीवन के उतार चढ़ाव पर प्रथम आदर्श पिता ही होता है। जीवन जीने की सही कला एक बच्चा अपने पिता से ही सीख पाता है। बच्चों के जीवन में आत्म विश्वास का संचार पिता के द्वारा ही हो पाता है। सुरक्षा की भावना से लेकर बच्चों के मन में व्याप्त भय भी पिता ही खत्म कर पाता है। पिता के सामाजिक और पारिवारिक व्यवहार का असर बच्चों पर प्रत्यक्ष रूप से पड़ता है। एक पिता जो अपने माता-पिता और बड़े भाई-बहनों की मान-मर्यादा का ख्याल रखता है, वही व्यवहार उसके बच्चे भी अपना लेते है। जिंदगी की कठिन से कठिन डगर पर एक पिता का धैर्य न खोना बच्चों को भी प्रोत्साहन प्रदान करने वाला होता है। अपने बच्चे के हर दुःख, दर्द व तकलीफ को कठोर चट्टान की तरह आगे खड़ें होकर उसे हार मानने पर पिता ही विवश कर सकता है। क्योंकि माँ तो हर तकलीफ पर बहुत ही कोमल हृदयी होने से भावनाओं पर नियंत्रण ना रखने के चलते रो देती है। परंतु एक पिता मुश्किल से मुश्किल हालातों में भी उससे संघर्ष करने की अपार शक्ति का प्रदर्शन कर बच्चों के आदर्श के रूप में उभरता है।
अब भारत समेत कई देशों में पिता को प्यार और सम्मान देने के लिए साल में एक दिन यानी 'फादर्स डे' के रूप में सेलिब्रेट किया जाता है। लेकिन आजकल हम लोगो ने 'फादर्स डे' को भी सिर्फ एक दिन के समय में बांध दिया है जिस दिन फादर्स डे रहता है उस दिन हम सभी लोग सोशल मीडिया या अन्य माध्यम से एक दूसरे को और पिता से 'फादर्स डे' की शुभकामनाएँ साझा करके अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते है। लेकिन हमको जीवन में पिता की अहमियत समझाने के लिए एक 'फादर्स डे' काफी नहीं है पिता का सम्मान कोई एक दिन का सम्मान नहीं होता है उनका सम्मान जीवन भर दिल से होता है। हम माता-पिता के आजीवन ऋणी रहते हैं और चाहें हम कितना भी प्रयास करले उनका ऋण कभी नहीं उतार सकते हैं।
वैसे तो फादर्स डे या पिता दिवस हर वर्ष मनाया जाता है पर इसका इतिहास बहुत कम लोग की जानते होंगे की इस दिन को किस लिए और क्यों मनाया जाता है आज हम 'फादर्स डे' के इतिहास को देखते हैं।
इस दिन की अवधारणा इसलिए बनाई गई थी कि कम से कम हम उस पिता के लिए एक दिन बेहतर जश्न मनाये और सम्मान करे। जिन्होंने बचपन से लेकर आज तक हमारे ख्वाबों को पूरा करने के लिए ना जाने कितने कष्टों और परेशानी का सामना किया। दरअसल, विश्व के अधिकांश देशों में 'फादर्स डे' हर साल जून के तीसरे रविवार को मनाया जाता है, जो साल 1966 से सेलिब्रेट किया जाता रहा है। साल 1966 को अमेरिका के राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने इसे जून के तीसरे रविवार को मनाए जाने का फैसला किया था। हालांकि 'फादर्स डे' सबसे पहले अमेरिका के वॉशिंगटन में साल 1909 को मनाया गया था, जिसे वॉशिंगटन के स्पोकेन शहर में सोनोरा डॉड ने अपने पिता के लिए सेलिब्रेट किया था। सोनोरा डॉड के बचपन में ही उनकी माता का निधन हो गया था। तभी से पिता ने ही उनकी परवरिश की थी। वहीं कुछ लोगों का मानना है कि पहली बार फादर्स डे अमेरिका के पश्चिम वर्जीनिया में 5 जुलाई 1908 को मनाया गया था। दरअसल, इससे पहले 6 दिसंबर 1907 को पश्चिम वर्जीनिया के मोनोंगाह की एक फैक्ट्री में बड़ा हादसा हुआ था जिसमें 362 लोगों की जान चली गई थी। इस हादसे के बाद करीब 1000 बच्चों ने अपने पिता को हमेशा के लिए खो दिया था। तब बच्चों की ओर से पिता को सम्मान देने के लिए ग्रेस गोल्डन क्लेटन नाम की महिला ने 5 जुलाई को फादर्स डे के रूप में मनाया था। इसके बाद साल 1916 में अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने इस दिवस को मनाने के प्रस्ताव को स्वीकृति दी। फिर 1924 में राष्ट्रपति कैल्विन कुलिज ने इसे राष्ट्रीय आयोजन के रूप में घोषित किया। साल 1966 में पहली बार राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने इसे जून के तीसरे रविवार को मनाए जाने का फैसला किया और 1972 में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन द्वारा इस दिन यूनाइटेड स्टेट्स में छुट्टी की घोषणा कर दी गई थी। आज यह दिन अमेरिकी ही नहीं बल्कि भारत और अन्य कई देशों में बड़े जोश के साथ सेलिब्रेट किया जाता है। बच्चे अपने पिता को उपहार देते हैं और पिता के साथ समय व्यतीत करते हैं।
अगर हम व्याख्या करे तो आज के भागदौड़ भरे दौर में 'फादर्स डे' पिता के सम्मान में एक व्यापक रूप से मनाया जाने वाला आधुनिक पर्व हैं जिसे पितृत्व (फादरहुड), पितृत्व-बंधन तथा समाज में पिता की अहमियत को दिखाने के लिए समारोह पूर्वक मनाया जाता है। अनेक देशों में इसे जून के तीसरे रविवार, तथा बाकी देशों में अन्य दिन मनाया जाता है। यह माता के सम्मान हेतु मनाये जाने वाले 'मदर्स डे' (मातृ-दिवस) का पूरक है।
वैसे तो माता-पिता दिन रात हमारे जीवन को सुख साधनों से पूर्ण अच्छा बनाने के लिए कार्य करते रहते हैं और अपने बच्चों पर हर मुसीबत को आने से पहले ही रोक देते हैं। माता-पिता का अपने बच्चों के साथ एक बहुत ही पवित्र रिश्ता होता है। सिर्फ माता-पिता ही होते हैं जो हमें जीवन देते हैं और अच्छे संस्कारों से सींचकर एक सभ्य इंसान बनाते हैं। माता पिता हमारे जन्म से लेकर हर कदम पर हमारे साथ होते हैं। वह जिंदगी में हमें संस्कार देकर इस समाज में रहने योग्य बनाते हैं और वो ही हमें सही-गलत की पहचान करा करके सही मार्गदर्शन करते हैं। अपने जीवन की कठिन डगर पर चलते हुए मिले अनुभव से बच्चों के लिए आशियाना बनाने वाले पिता का साथ ही बच्चों एवं उनकी माता के लिए बहुत बड़ा सहारा होता है। जीवन में पिता का साया व आशिर्वाद बच्चों को बहुत ऊर्जा प्रदान करता है, बच्चे उस शक्ति और आशिर्वाद के बल पर हर कठिन से कठिन परिस्थिति में हौसले के साथ विजयी पताका फहराने में सफलता प्राप्त करते है।
मैं जब अपने पिता "चौधरी महेन्द्र सिंह त्यागी" जी व माता जी "श्रीमती राजेन्द्री त्यागी" जी के जीवन को देखता हूँ उससे हमेशा मुझे बहुत अधिक प्रेरणा मिलती है।
मुझे अच्छी तरह से याद हैं कि पिताजी ने कठिन से कठिन परिस्थिति होने के बाद भी परिवार के सभी रिश्तों व जिम्मेदारियों को बहुत ही शानदार ढंग से संभालने का काम किया है। वो परिवार में वह बहुत ही शक्तिशाली स्तंभ है, जो न केवल सारे संयुक्त परिवार को संभाले हुए है। बल्कि
आज जब भी मेरा मन विचलित होता है या जीवन में उठने वाली कठिन भंवर में कभी नैय्या फंस जाती है तो पिताजी मुझे एक कुशल नाविक की तरह उस भंवर से बहुत आसानी से निकालने का काम करते है।
इसी तरह जीवन में हर पिता विपरीत परिस्थिति में बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ाते हुए उसे मुश्किल का सामना करना सिखाते हैं। यह कहना सही होगा कि पिता को ईश्वर ने अपने बच्चों के मजबूत सहारे के लिए ही धरती पर भेजा है। जीवन की उन राहों पर जब बच्चा सही-गलत पर उचित निर्णय न ले पाने की स्थिति में होता है, तो पिता ही उसे सही रास्ता दिखाकर भविष्य का लक्ष्य बताते हुए आगे बढ़ने का हौसला प्रदान करता है। बचपन से अपने बच्चे को दुलारते और सहलाते हुए बड़ा करने वाली माता का प्यार जगजाहिर हो जाता है। इसके ठीक उल्ट पिता का प्यार खुली आंखों से दिखाई नहीं पड़ता उसका प्यार आंख बंद करके अहसास करना पड़ता है। एक पिता अपनी विवशता के चलते जब बच्चे की इच्छा पूरी नहीं कर पाता है, तब उसका दिल और आत्मा किस प्रकार तड़पती और आंसू बहाती है, उसे केवल वही पिता बयां कर सकता है। बंद कमरे की दीवारें पिता के इस दुःख की सबसे बड़ी गवाह होती है। वह परिजनों के सामने अपनी विवशता को बयां नहीं करता। कारण यह कि बच्चों की इच्छा कहीं दम न तोड़ दें, वह उसे पूरा करने के लिए और अधिक जतन से प्रयास करने लगता है। हर पिता को अपने बच्चों की इच्छा को पूरा करने पर जो आनंद मिलता है, उसको शब्दों में बंया करना असंभव है। एक पिता अपने बच्चों के लिए इस तरह का प्रबंधन पूरे जीवन करने में लगा रहता है। एक पिता के स्नेह में इतनी ताकत और सामर्थ्य होता है कि वह अपने बच्चों की ओर देखकर ही समझ सकता है कि उसे किस चीज की आवश्यकता है। एक बात तो पूरी दुनिया को माननी पड़ेगी कि पिता के प्यार और दुलार को, दौलत और ऐशो-आराम की दुनिया से नहीं तौला जा सकता। दुनिया की सारी दौलत व ऐशो-आराम तराजू के एक पल्ले में भर दी जाएं तब भी वह पिता या माता के प्यार से अधिक भारी नहीं हो सकती है।
माता पिता की ममता और त्याग का कर्ज हम जीवन में कभी भी नहीं चुका सकते हैं पर हमें भी हमेशा उन्हें खुश रखने की कोशिश करनी चाहिए। आजकल जिस तरह से लोग माता पिता के महत्व को भूलते जा रहे हैं वह बहुत ही चिंताजनक है आज के समय में बच्चे बड़े होते ही माँ बाप का प्यार भूल जाते हैं कुछ नाकारा बच्चे तो अपने माँ बाप को वृद्धाश्रम तक में छोड़ आते हैं जो कि बहुत ही दुःखद है। माता पिता का निरादर करना भगवान के निरादर के समान हैं। हमें अपने माता पिता का सम्मान करते हुए उनका कहना मानना चाहिए और उन्हें हमेशा खुश रखना चाहिए। माता पिता अद्वितीय है उनके समान दुनिया में दूसरा कोई भी नहीं है। हमें हमेशा अपने माता पिता का सम्मान करना चाहिए क्योंकि वह जीवन में सिर्फ एक बार ही मिलते हैं। इसलिए पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित होकर हम फादर्स डे मनाये अवश्य लेकिन भारतीय संस्कृति हमको रोजाना माता-पिता का ध्यान रखने के लिए कहकर रोज फादर्स डे व मदर्स डे मनाने के लिए प्रेरित करती हैं उसका पालन अवश्य करें।।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें