मंगलवार, 4 जून 2019

*देश में बढ़ता प्रदूषण पर्यावरण सुरक्षा के लिए बहुत बड़ी चुनौती* (विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष)

*प्रकाशनार्थ*

*हस्तक्षेप* / *दीपक कुमार त्यागी एडवोकेट,*
*स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार*

*देश में बढ़ता प्रदूषण पर्यावरण सुरक्षा के लिए बहुत बड़ी चुनौती*
(विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष)




5 जून को "विश्व पर्यावरण दिवस" के रूप में पर्यावरण की सुरक्षा और संरक्षण के उद्देश्य से मनाया जाता है। इस दिवस को मनाने की घोषणा संयुक्त राष्ट्र ने पर्यावरण के प्रति वैश्विक स्तर पर सामाजिक रूप से जनमानस में जागृति लाने हेतु वर्ष 1972 में की थी। जिसको 5 जून से 16 जून तक संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा आयोजित विश्व पर्यावरण सम्मेलन में लम्बी चर्चा के बाद शुरू किया गया था। इसके बाद 5 जून 1974 को पहला "विश्व पर्यावरण दिवस" मनाया गया था। आज हम सभी अपने चारों तरफ ध्यान से देखे तो भगवान की बनाई इस अद्भुत दुनिया के प्राकृतिक सोन्दर्य को जब देखते है तो हमारा मन प्रफुल्लित हो जाता है। प्रकृति की गोद में हर तरफ तरह-तरह के जीव-जंतु, सुंदर फूल, लताये, हरे-भरे वृक्ष, प्यारे-प्यारे चहचहाते पक्षी है जो कि हम सभी के आकर्षण के हमेशा केंद्र बिंदु होते है। लेकिन आज इंसान ने अपनी जिज्ञासा और नई-नई खोज की अभिलाषा में जब से प्रकृति के कार्यो में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया है तब से पर्यावरण दिन-प्रतिदिन बेहद प्रदूषित होता जा रहा है। जिस तरह से हम अपने परिवारों, दोस्तों व परिचितों का बहुत ख्याल रखते हैं परंतु जब बात पर्यावरण के संरक्षण की आती है तो हम केवल प्रथ्वी दिवस, पर्यावरण दिवस, गांधी जयंती, आदि पर वृक्षारोपण करके या फिर स्वच्छ भारत अभियान चला करके पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपने दायित्व की इतिश्री कर लेते है। लेकिन अब समय आ गया है कि हमको पृथ्वी को प्रदूषण से मुक्त करने के बारे में ठोस कारगर पहल कागजों से निकलकर धरातल पर करनी होगी तब ही हम प्रकृति का संरक्षण करके इस प्रदूषण से बच सकते हैं।
हालांकि वर्तमान समय में 143 से अधिक देश "विश्व पर्यावरण दिवस" को हर साल मनाते है और वर्ष 2019 में 45वाँ “विश्व पर्यावरण दिवस” मना रहे हैं। इस वर्ष इसकी थीम “वायु प्रदुषण” है और हाल में ही सरकार ने इस थीम पर तैयार विशेष गीत ‘हवा आने दे’ को रिलीज किया है।
यहाँ उल्‍लेखनीय है कि वायु प्रदूषण की गम्भीर समस्‍या से निपटने के लिए पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने हाल ही में राष्‍ट्रीय स्‍वच्‍छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) शुरू किया है। यह सरकार की एक मध्‍यमकालिक पंचवर्षीय कार्य योजना है जिसमें देश के 102 शहरों में पीएम 2.5 और पीएम 10 (सूक्ष्‍म धूल कण) के स्‍तर में 20-30 प्रतिशत की उल्‍लेखनीय कमी करने के लक्ष्‍य रखे गये हैं। इन 102 शहरों में से 84 शहरों ने अपनी-अपनी कार्य योजनाएं पहले ही पेश कर दी हैं। एनसीएपी का मुख्‍य उद्देश्‍य देश भर में वायु प्रदूषण को नियंत्रण में रखते हुए उसमें उल्‍लेखनीय कमी सुनिश्चित करना है। क्योंकि आज हमारे देश में जिस तरह से दिन-प्रतिदिन प्रदूषण बढ़ता जा रहा है उसका निदान करना आमजन के साथ-साथ सरकार के लिए भी बहुत बड़ी चुनौती है। क्योंकि देश में अब वायु प्रदूषण का स्तर बेहद घातक व जानलेवा होता जा रहा है, जो की हम सभी देशवासियों के स्वास्थ्य के लिये बेहद खतरनाक साबित हो रहा है। जिस तरह से हाल के वर्षों में बहुत ही तेजी से हमारे देश का वायुमंडल जहरीले गैस चैम्बर में तब्दील होता जा रहा है लेकिन फिर भी हम सभी देशवासी व सरकार इस ज्वंलत समस्या से आँख बंद करके बेफिक्र बैठे हुए है, यह सोचनीय है।

आज देश में जहरीली होती आवोहवा की वजह से साँस, एलर्जी सम्बन्धी व अन्य तरह-तरह की गम्भीर बीमारियों का खतरा हम सभी देशवासियों पर बहुत तेजी से मंडरा रहा है। जहरीली हवा के चलते रोगप्रतिरोधक क्षमता घटने से व गम्भीर बीमारियों के बढ़ने से देश में मृत्युदर में काफी इजाफा हुआ है। प्रदूषण की वजह से दम तोड़ते लोगों के आकडों में साल दर साल बहुत ही तेजी से वृद्धि हो रही हैं। विश्व में हर साल करोड़ों लोग वायु प्रदूषण जनित गम्भीर बीमारियों के चलते असमय दम तोड़ रहे हैं। जहरीले वायु प्रदूषण की भयावहता का अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आज हमारे देश का हर छोटा व बड़ा शहर एक गैस चैम्बर के रूप में परिवर्तित होता जा रहा हैं, जिसको अगर जल्दी ही नियंत्रित नहीं किया गया तो भविष्य में बहुत बड़ी संख्या में देश के लोग वायु प्रदूषण की वजह से असमय काल के ग्रास बन जायेंगे। अभी हाल में ही विश्व प्रसिद्ध अमेरिका के दो संस्थान "हेल्थ इफेक्ट्स इंस्टिट्यूट" (HEI) एवं "इंस्टिट्यूट फॉर हेल्थ मैट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन" (IHME) ने हाल ही में विश्व भर में वायु की गुणवत्ता से सम्बंधित आकडों पर अपनी एक बहुत ही विस्तृत रिपोर्ट जारी की है। जिस रिपोर्ट का शीर्षक है - "स्टेट ऑफ़ ग्लोबल एयर-2019" इस रिपोर्ट के अनुसार विश्व भर में वायु प्रदूषण से होने वाली 5 मिलियन मौतों में से 50% मौत भारत और चीन में ही होती है जो कि बहुत ही भयावह आकड़ा हैं। इस विस्तृत रिपोर्ट में कहा गया है कि लंबे समय तक घर से बाहर रहने या घर में वायु प्रदूषण के चलते वर्ष 2017 में स्ट्रोक, डायबिटीज, हार्ट अटैक, फेफड़े के कैंसर या फेफड़े आदि की गम्भीर बीमारियों से विश्व में लगभग 50 लाख लोगों की मौत हुई है।

इस रिपोर्ट के अनुसार आज भारत में वायु प्रदूषण अब स्वास्थ्य के लिए सबसे खतरनाक जोखिमों के तीसरे पायदान पर पहुँच गया है जो कि अब देश में मौत का तीसरा सबसे बड़ा गम्भीर कारक बन गया है जो धूम्रपान से होने वाली मौतों के ठीक ऊपर है। रिपोर्ट के आंकडों के अनुसार वर्ष 2017 में असुरक्षित वायु के संपर्क में आने से 673,100 मौतें बाह्य PM2.5 के संपर्क में आने के कारण हुईं और 481,700 से अधिक मौतें भारत में घरेलू वायु प्रदूषण के कारण हुईं थी। 2017 में भारत की लगभग 60% आबादी घरेलू प्रदूषण के संपर्क में थी। आंकड़ों पर गौर करे तो आज हमारे देश की अधिकांश आबादी 10 µg / m3 के WHO वायु गुणवत्ता दिशा-निर्देश के ऊपर PM2.5 सांद्रता वाले क्षेत्रों में रहती है तथा केवल 15% आबादी ही WHO के कम-से-कम कड़े लक्ष्य 35 µg / m3 के नीचे PM2.5 सांद्रता वाले क्षेत्रों में रहती है जो कि बहुत ही चिंताजनक हालात है। इस रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि यदि प्रदूषण इसी प्रकार बरकरार रहता है तो भविष्य में लोगों के सामने बहुत ही गम्भीर स्वास्थ्य संकट उत्पन्न होंगे जिससे भविष्य में लोगों की जीवन प्रत्याशा (एक व्यक्ति के औसत जीवनकाल) में 20 महीने कम हो जाएगी। रिपोर्ट में जब भारत की वायु गुणवत्ता का अध्ययन किया गया है, तो पाया कि विश्व में सबसे अधिक भारत में वायु प्रदूषण की वजह से लोगों की मृत्यु हो रही हैं जो कि देशहित के लिए ठीक नहीं है। यहाँ उल्लेखनीय है कि नाइट्रोजन, सल्फर ऑक्साइड और कार्बन खासकर पीएम 2.5 जैसे वायु प्रदूषक तत्वों को विश्व में असमय मौत का एक बहुत बड़ा कारक माना जाता है।  ठीक उसी प्रकार "केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड" ने अपनी रिपोर्ट में जिन शहरों को सबसे अधिक प्रदूषित शहर माना है। लेकिन फिर भी सरकार ना जानें क्यों उन शहरों के वायु प्रदूषण के संदर्भ रिपोर्टों को तवज्जो नहीं देती हैं जिस के चलते देश में ना तो प्रदूषण नियंत्रण हो पा रहा है ना ही सही आंकड़े देशवासियों के सामने आ रहे है। लेकिन रिपोर्ट में दी गयी इस बात से तो सहमत हुआ जा सकता है कि वायु प्रदूषण की वजह से देश में होने वाली मौतों की जो संख्या व इस रिपोर्ट में दी गई मौतों की संख्या है उसकी संख्या कम या ज्यादा तो हो सकती हैं, लेकिन यह भी कड़वा सत्य है कि वायु प्रदूषण के चलते देश के शहर दिन-प्रतिदिन "जहरीले गैस के चैम्बर" बनते जा रहे है और उससे अब लोग असमय काल का ग्रास बन रहे है। इस सच्चाई से अब ना तो सरकार और ना ही आम-आदमी मुँह मोड़ सकता हैं। क्योंकि अब यह सबको समझ आ गया है कि वायु प्रदूषण एक बहुत ही गम्भीर पर्यावरणीय समस्या है जिसका जल्द से जल्द कारगर समाधान करने के लिए सरकार व आम-जनमानस को प्रभावी कदम उठाने होंगे वरना इस जहरीले वायु प्रदूषण के चलते देश में लोगों की आये-दिन जान जाती रहेंगी। इतना कुछ होने के बाद भी आज देश में प्रदूषण को लेकर बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि अब तक तमाम सरकारों व आम-जनमानस ने वायु प्रदूषण की समस्या को कभी गम्भीरता से नहीं लिया है जो कि बहुत ही घातक हैं। देश में आज भी हालत यह है कि वायु प्रदूषण कम करने की कोशिशें केवल देश के चंद बड़े शहरों दिल्ली, मुम्बई आदि जैसे बड़े-बड़े महानगरों तक केन्द्रित रहीं हैं। इस गम्भीर समस्या के मसले पर सरकारों ने छोटे शहरों के निवासियों को भगवान भरोसे छोड़ दिया है जो लोगों के स्वास्थ्य के लिए घातक है। यह हालात तब है जब वर्ष 2016 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों की सूची जारी की थी, उनमें भारत के 10 शहर शामिल थे। फिर भी अभी तक सरकार ने छोटे शहरों के प्रदूषण रोकने के लिए कोई ठोस पहल नहीं की हैं। सबसे अचरज की बात यह है कि हम व स्थानीय प्रशासन अपने शहरों में वायु प्रदूषण का अन्दाजा ठीक से नहीं लगा पा रहे हैं, तो इसकी वजह से आम जनता की सेहत पर पड़ने वाले कुप्रभावों का अन्दाज हम कैसे ठीक प्रकार से लगा पाएँगे? इसके लिये जरूरी है कि बुनियादी ढाँचे के अभाव की स्थिति में हम वैश्विक स्तर पर किये जा रहे इन विदेशी अध्ययनों के आकड़ों पर विश्वास करके प्रदूषण से निपटने के लिए प्रभावी कदम उठाये जब तक हमारा ढाँचा विकसित नहीं हो जाता है तब तक विदेशी रिपोर्ट पर विश्वास करने के अलावा हमारे पास अन्य कोई विकल्प नहीं बचता है।
लेकिन यह भी कटु सत्य है कि भविष्य में जब संसाधन हो जायेंगे और हम वास्तव में अपने छोटे-छोटे शहरों और गाँवों केे प्रदूषणों के आंकड़े संग्रहित करेंगे तो सच्चाई इस विदेशी रिपोर्ट के आंकड़ों से भी कहीं अधिक भयावह होगी। ऐसे में  पर्यावरण मंत्रालय के लिये तब तक इस तरह की विदेशी रिपोर्ट को प्रभावी कदम उठाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता हैं। जिससे की आने वाले समय में देश में जहरीले वायु प्रदूषण को नियंत्रित किये जाने की दिशा में कारगर प्रभावी कदम उठाने में मदद मिल सकेगी।

वर्तमान समय में पर्यावरण को जल प्रदूषण, भूमि प्रदुषण, वायु प्रदुषण एवं ध्वनी प्रदूषण से बहुत खतरा हो गया है इसका निदान बहुत बड़ी चुनौती हैं। इसके लिए बहुत सारे कारक जिम्मेदार है
आज हमारे देश की नदियाँ बहुत प्रदूषित हो चुकी है गंगा, यमुना, गोमती, गोदावरी, कावेरी, ब्रह्मपुत्र के साथ-साथ अन्य सभी नदियों, झील व अन्य जल स्रोतों में से अधिकांश प्रदूषित हो चुके है। क्योंकि आज जिस तरह से बेरोकटोक फैक्टरियों का कचरा, दूषित जल, रासायनिक अपशिष्ट पदार्थ को नदियों व अन्य जल स्रोतों में अंधाधुंध ढंग से डाला जा रहा है उससे बहुत गम्भीर हालात होते जा रहे हैं।  इस तरह प्रदुषण के लिए हम स्वयं ही जिम्मेदार है। हम सभी का कर्तव्य है की नदियों व अन्य जल स्रोतों की रक्षा करके पर्यावरण की सुरक्षा करें। क्योंकि जल ही जीवन है और बिना जल के कोई भी सभ्यता जीवित नही रह सकती है। हम सभी जिस तरह के सुंदर प्राकृतिक माहौल से घिरे हुए है। हर तरफ पेड़ पौधे, पृथ्वी, जमीन, पहाड़, पर्वत, नदियां, जीव-जंतु, भूमि सब-कुछ प्रकृति व पर्यावरण का हिस्सा है और हम सभी लोगों का यह नैतिक कर्तव्य है की जिस पृथ्वी और पर्यावरण में हम रहते है उसका संरक्षण व सुरक्षा स्वयं अच्छे ढंग से करें और उसे प्रदूषित न होने दे। लेकिन बड़े दुःख की बात है की आज का इंसान इतना स्वार्थी हो गया है की पर्यावरण की तरफ वह कोई ध्यान नही दे रहा है। आज हम लोग केवल अधिक से अधिक मुनाफा कमाने के लिए प्राकृतिक संसाधनों दोहन कर रहे है जिसके लिए हम अंधाधुंध पेड़ काट रहे है, गृहकार्य, कृषि व फैक्ट्री के लिए भूमिगत जल का जिस तरह से बेहिसाब दोहन कर रहे है वह बेहद चिंताजनक है। फैक्ट्रियों, अव्यवस्थित शहरीकरण और विकास के नाम पर आज हर दिन हम लोग अपने हाथों से पर्यावरण को दूषित कर रहे है। आज प्रदूषण के चलते देश की आवोहवा में रोजाना कार्बन डाईऑक्साइड (CO2) की मात्रा बढ़ती जा रही है।

ग्लोबल वार्मिंग की वजह से पिछ़ले कुछ वर्षों से पृथ्वी का तापमान धीरे-धीरे बढ़ रहा है जिसके चलते जलवायु परिवर्तन का खतरा बहुत ही तेजी से बढ़ रहा है। ग्लेशियर पिघल रहे है। जीव-जंतुओं व वनस्पतियों की अनेक प्रजातियाँ विलुप्त हो गयी है और बहुत सारी विलुप्त होने के कगार पर है। जलवायु परिवर्तन की वजह से जगह-जगह असमय बाढ़, तूफ़ान, सूखा, सुनामी, महामारी जैसी प्राकृतिक आपदा उत्पन्न हो रही है। इन सभी समस्याओं के लिए मनुष्य ही स्वयं जिम्मेदार है। वैसे तो 5 जून को हर वर्ष “विश्व पर्यावरण दिवस” मनाने का मकसद यही है की हम अपने रोजमर्रा के क्रियाकलापों को देखे और फिर जीवन की रक्षा के लिए पर्यावरण को बचाने के लिए जरूरी प्रभावी कारगर कदम उठाये। आज हम सभी के सामने सवाल है की हम पर्यावरण की रक्षा कैसे करेंगे। तो उसके लिए हमकों अपनी रोजमर्रा की दिनचर्या में छोटे-छोटे बदलाव करना होंगे जैसे कि आज के युग में डिजिटल होकर हम कागज व वृक्ष बचा सकते है। पॉलिथीन का इस्तेमाल हमको फौरन बंद कर देना चाहिये। बाजार से खरीददारी करने के लिए हमे कपड़े से बने थैले का इस्तेमाल करना चाहिये। खेतों में अधिक उपज के लिए आज सभी किसान जिस तरह से कीटनाशक और रसायनिक दवाओं का इस्तेमाल कर रहे है उससे भूमि प्रदूषित होकर बंजर हो रही है। जिसके चलते उस भूमि पर होने वाली फसले, सब्जियाँ और फल भी सेहत के लिए हानिकारक हो रहे है जिससे लोगों में गम्भीर प्रकृति के रोग बढ़ रहे है। इसलिए अब किसानों को आधुनिक तकनीक के साथ सामंजस्य बैठाकर देशी दवाओं और जैविक खाद का इस्तेमाल करना चाहिये जिसे की प्रथ्वी को प्रदूषित होने से बचाया जा सकें। आज जिस तरह किसी भी शहर में जाने पर कूड़े और कचरे का बड़ा-बड़ा पहाड़ देखने को मिलता है और सरकार कूड़ा का निस्तारण करने में असमर्थ हो रही है वह  चिंताजनक है। अब सरकार को इस समस्या का स्थाई निदान करना चाहिए।
लेकिन अब समय आ गया है की हम सभी देशवासी संकल्प ले कि प्रकृति से हम केवल लेंगे ही नही बल्कि उसकी सुरक्षा के लिए प्रभावी कदम उठाकर प्रकृति को कुछ वापिस भी करेंगे। आजकल सभी शहरों में इतना प्रदूषण और शोर है की पक्षी तक वहां से पलायन करने लगे है। अब पक्षियों के नाम पर यहाँ सिर्फ कुछ गिने चुने पक्षी ही देखने को मिलते है। आज शहर व गाँव में तरह-तरह के प्रदूषण की वजह से लोग गम्भीर बीमारियाँ से ग्रसित हो रहे है। प्रदूषण के चलते शहर का तो हर दूसरा व्यक्ति किसी न किसी प्रकार के रोग से ग्रसित हो गया है। देश की राजधानी दिल्ली व उसके आसपास के इलाकों में तो अब इतना वायु प्रदूषण बढ़ गया की लोगों का साँस लेना मुश्किल हो गया। देश में बढ़ते भूमि प्रदूषण की वजह से अधिकांश जगह पेयजल भी दूषित हो गया है। देश में जगह-जगह पानी में पारे की मात्रा और अन्य कैमिकलों की मात्रा काफी अधिक पाई जाने लगी है। जिसके चलते शुद्ध पेयजल की गम्भीर स्थिति है। इसलिए अब समय आ गया है कि हम सभी देशवासी सरकार के साथ मिलकर फाईलों से बाहर आकर धरातल पर पर्यावरण के सरंक्षण व सुरक्षा के लिए हर संभव ठोस कारगर उपाय करें।

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