गुरुवार, 27 अक्टूबर 2022

शख्सियत - राजनीति में विरले ही मिलते हैं "रमेश चन्द्र कौशिक" जैसी शख्सियत वाले लोग दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक

शख्सियत - राजनीति में विरले ही मिलते हैं "रमेश चन्द्र कौशिक" जैसी शख्सियत वाले लोग

दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप
वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक 

अपनी कार्यशैली के दम पर लोगों के दिलों में राज करते सोनीपत सांसद "रमेश चंद्र कौशिक"


अपने व्यवहार व काम के दम पर लोकप्रिय जननेता की छवि बनाने में सफल "रमेश चन्द्र कौशिक"

अपने दायित्व को पूरी निष्ठा व ईमानदारी से निभाने के लिए जाने जाते हैं "रमेश चन्द्र कौशिक"

अपने काम व छवि के दम पर जातिगत समीकरण को ध्वस्त करने में हर बार चुनावी रणभूमि में सफल रहते हैं "रमेश चन्द्र कौशिक" 

देश की राजधानी दिल्ली से एक दम सटी हुई बेहद महत्वपूर्ण माने जाने वाली औधोगिक नगरी वाली सोनीपत लोकसभा के क्षेत्र का हरियाणा की राजनीति में हमेशा दबदबा रहा है। अपनी जातिगत, भौगोलिक व औधोगिक खूबी के चलते यह लोकसभा क्षेत्र राज्य व देश की राजनीति में बेहद अहम महत्वपूर्ण स्थान हमेशा से ही रखता आया है। वैसे तो इस सीट के अंतर्गत नौ विधानसभा क्षेत्र आते हैं, जिसमें छह सीटें गन्नौर, राई, खरखौदा, सोनीपत, गोहाना और बरौदा सोनीपत जनपद के अन्तर्गत आती हैं, वहीं बाकी तीन जींद, जुलाना और सफीदों जींद जनपद के अन्तर्गत आती हैं। 10 लोकसभा सीट वाले हरियाणा में सोनीपत लोकसभा क्षेत्र को जाटलैंड के प्रभाव वाली दूसरी सबसे अहम सीट माना जाता है, इस सीट पर जाट मतदाता अकेले ही निर्णायक स्थिति में हैं। लेकिन यहां पर राजनीतिक दृष्टिकोण से विचारणीय तथ्य यह भी है कि इस सीट से जातिगत समीकरणों को ध्वस्त करके अभी तक तीन बार गैर जाट प्रत्याशी भी सांसद निर्वाचित हो चुके हैं, इस सीट से वर्ष 1996 में अरविंद शर्मा निर्दलीय के बाद वर्ष 2014 व 2019 में लगातार दो बार से भाजपा से रमेश चन्द्र कौशिक निरंतर चुनावी रणभूमि में सफलता हासिल कर रहें हैं। 16वीं लोकसभा के चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के जगबीर सिंह मलिक को हराया था। वहीं 17वीं लोकसभा के पिछले चुनाव में तो रमेश चन्द्र कौशिक ने कांग्रेस के दिग्गज राजनेता व हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भुपेंद्र सिंह हुड्डा को चुनावों में भारी मतों से सियासी पटखनी देने का कार्य किया था।

*"इस क्षेत्र के चुनावी कुरुक्षेत्र के हर गुणा-भाग से वाफिक दिग्गजों की मानें तो भाजपा के सांसद रमेश चन्द्र कौशिक ने इस सोनीपत संसदीय क्षेत्र में अपनी दिन-रात की मेहनत, व्यवहार कुशलता, छवि व दमदार कार्यशैली के दम पर जातिगत समीकरण को ध्वस्त करने में बहुत बड़ी महारत हासिल कर रखी है, वह अपने व्यवहार के दम पर क्षेत्र में जातियों का बंधन तोड़कर के सभी के बीच लोकप्रिय हैं।"*

हरियाणा की राजनीति में और सोनीपत लोकसभा के क्षेत्र में रमेश चन्द्र कौशिक की जबरदस्त लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि जाटलैंड के गढ़ में ही उन्होंने वर्ष 2019 में संपन्न हुए 17वीं लोकसभा के चुनाव में हरियाणा के दिग्गज राजनेता भुपेंद्र सिंह हुड्डा को 1 लाख 64 हजार 864 वोटों के बड़े अंतर से हरा कर के जीता था, आज उनकी मज़बूत पैठ क्षेत्र में हर जाति व धर्म के लोगों के बीच में है। हालांकि चुनावी रणभूमि में जीत हार जनता के हाथ में होती है वह जिसे चाहे जो बना देती है, लेकिन क्षेत्र में एक लोकप्रिय जननेता के रूप में स्थापित होना आज के दौर की राजनीति में भी किसी भी राजनेता के लिए एक सबसे बड़ी व वास्तविक उपलब्धि होती है, देश व प्रदेश की राजनीति में क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले एक सांसद के रूप में रमेश चन्द्र कौशिक क्षेत्र में लोकप्रिय जननेता के रूप में पूरी तरह से स्थापित हो चुके हैं, आज क्षेत्र के लोग उनको विकास पुरुष मानते हैं क्योंकि उन्होंने सोनीपत लोकसभा क्षेत्र को केजीपी और केएमपी की बड़ी सौगात दिलवाने का कार्य किया। उन्होंने ही दशकों से खस्ताहाल रहे बागपत से रोहतक नेशनल हाईवे और सोनीपत से जींद मार्ग को भी नेशनल हाईवे घोषित करवा करके उसके चौड़ीकरण का काम करवा कर आम जनमानस के जीवन पथ को सुगम बनाने का कार्य किया। उन्होंने जींद में बाइपास निर्माण और सोनीपत-जींद रेलवे लाइन का काम पूरा करवाकर तीन ट्रेन चलवाने का भी काम किया था। उनके प्रयास से ही अब गन्नौर में रेल कोच कारखाना बनकर तैयार खड़ा है, जिससे क्षेत्र में रोजगार के काफी सारे अवसर पैदा होंगे। उनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह संसद में भी अपना पूरा समय देते हैं, वहीं साथ ही साथ व क्षेत्र की जनता के बीच भी उपस्थित रहकर के निरंतर जनता के साथ बेहतर जन संपर्क बनाकर रखते हैं‌, जो हर राजनेता के बस की बात नहीं है। यहां आपको बता दें कि रमेश चन्द्र कौशिक का जन्म 3 दिसम्बर 1956 को सोनीपत लोकसभा क्षेत्र के समासपुर गांव में ही हुआ था, उन्होंने सोनीपत के हिन्दू कॉलेज और उत्तर प्रदेश के मेरठ विश्वद्यालय से बीए और एलएलबी की शिक्षा प्राप्त की थी और फिर वह परिवार के जीवन यापन के लिए वकालत करने में लग गये थे। लेकिन समय को कुछ और ही मंजूर था वकालत करते हुए जब उनका आयेदिन तरह-तरह की जन समस्याओं से जब वास्ता पड़ने लगा तो उन्हे इनसे निपटने के लिये राजनीति सबसे कारगर व सशक्त माध्यम लगा और वह क्षेत्र की सक्रिय राजनीति में कूद पड़े। हालांकि वर्ष 1991 में उन्हें पहली बार हरियाणा विकास पार्टी के टिकट पर कैलाना हलके (वर्तमान में गन्नौर) से टिकट मिला था, लेकिन पहली बार में किस्मत ने उनका साथ नहीं दिया, उनको चुनावी रणभूमि में हार का सामना करना पड़ा था। लेकिन कुछ वर्षों के बाद 1996 में कैलाना हलके से रमेश चन्द्र कौशिक चुनाव में विजयी होकर के विधायक बने। उसके बाद जब राज्य में हरियाणा विकास पार्टी (हविपा) की बंसीलाल के नेतृत्व में सरकार बनी तो उसमें रमेश कौशिक का कद दिन प्रतिदिन तेजी के साथ बढ़ता चला गया। वह 1996-97 में हरियाणा सरकार में सीपीएस रहे, तो 1997 में उनको राज्यमंत्री बनाया गया था। लेकिन उनको  चंद महीनों के बाद ही बंसीलाल ने कैबिनेट मंत्री बनाते हुए श्रम समेत तीन अहम मंत्रालय सौंपने का कार्य किया था। उन्होंने राजनीति में अपने व्यवहार व कार्यशैली के दम पर अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाने का काम किया। दूसरी बार वह वर्ष 2005 में कांग्रेस के टिकट पर राई सीट से विधायक बने और भुपेंद्र सिंह हुड्डा की सरकार में मुख्य संसदीय सचिव बनने। लेकिन अब क्षेत्र व कांग्रेस पार्टी में उनकी तेजी से बढ़ती लोकप्रियता से कांग्रेस पार्टी के अंदर ही उनके कई राजनीतिक विरोधी पैदा हो गये थे, जिसके चलते ही वर्ष 2009 के विधानसभा चुनावों में मौजूदा विधायक होते हुए भी कांग्रेस पार्टी ने उनका टिकट काट दिया। इसी राजनीतिक उठापटक के चलते वर्ष 2013 में कांग्रेस पार्टी को छोड़कर वह भाजपा में शामिल हो गये। वर्ष 2014 के लोकसभा के चुनावों में भाजपा ने उन्हें सोनीपत संसदीय क्षेत्र से प्रत्याशी बनाया, इस चुनाव में सभी को लगता था कि मोदी लहर के बावजूद भी जाटलैंड की इस बेहद अहम सीट पर भाजपा की जीत बेहद मुश्किल है, लेकिन जब चुनाव परिणाम आये तो भाजपा प्रत्याशी के रूप में रमेश चन्द्र कौशिक ने कांग्रेस पार्टी के जगबीर सिंह मलिक को 77 हजार 414 वोटों से हराया, उस वक्त वह पहली बार सांसद चुने गए थे, जो कि उनकी पूर्व में की गयी क्षेत्र में जनसेवा का एक बड़ा महत्वपूर्ण प्रतिफल था। जिसके बाद सोलहवीं लोकसभा में 1 सितंबर 2014 से सदस्‍य के रूप में नियम समिति सदस्‍य, परामर्शदात्री समिति, उपभोक्‍ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय सदस्‍य, रेल संबंधी स्‍थायी समिति के सदस्य के रूप में महत्वपूर्ण दायित्व का उन्होंने सफलता पूर्वक निर्वहन किया। 1 सितम्बर, 2018 से सदस्य, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पर्यावरण और वन संबंधी स्थायी समिति का दायित्व बखूबी निभाने का कार्य किया। 16वीं व 17वीं लोकसभा के अपने कार्यकाल में वह संसद व क्षेत्र दोनों में बेहद सक्रिय रहे हैं, संसद में हर एक महवपूर्ण विषयों पर होने वाली चर्चाओं में वह अवश्य शामिल रहते हैं, संसद में उनकी शत प्रतिशत उपस्थिति का रिपोर्टकार्ड काबिलेतारिफ है। उन्होंने समय समय पर संसद में अपने क्षेत्र से जुड़े मुद्दों के साथ-साथ गृह, वित्त, जल संसाधन, रेलवे, परिवार कल्याण, सड़क एवं परिवहन, उपभोक्ता मामलों, पर्यटन, श्रम एवं रोजगार, क़ानून, कृषि, वाणिज्य, महिला एवं बाल विकास, पेट्रोलियम और शहरी विकास तथा अन्य मंत्रालयों से जनता से जुड़े हुए विभिन्न गंभीर मुद्दों पर निरंतर सवाल उठाकर उनका समाधान करवाने का लगातार प्रयास किया है। वह सितंबर 2019 से ऊर्जा की स्टैंडिंग कमेटी के सदस्य है, अक्टूबर 2019 में वह पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस और सरकारी आश्वासन समिति के सदस्य बनाये गये थे। सोनीपत के सांसद के तौर पर रमेश चन्द्र कौशिक की यह हमेशा कोशिश रहती है कि क्षेत्र की जनता से जुड़ी हुई हर समस्या का हर हाल में जल्द से जल्द निदान हो, समस्याओं का स्थाई समाधान हो। उनका सपना है कि क्षेत्र के लोगों को भरपूर रोजगार मिले क्षेत्र में व्यवस्थित औधोगिक विकास तेजी से हो, जिस सपने को पूरा करने के क्रम में ही उन्होने गन्नौर में रेल कोच मरम्मत कारखाने का निर्माण करवाया है, जिसका प्रधानमंत्री मोदी से समय मिलने पर कभी भी उद्घाटन संभव है। वह हरियाणा के लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई के लिए सतलुज यमुना लिंक (एसवाईएल) नहर के मसले को निरंतर दमदार ढंग से उठाते रहते हैं। वह अपने संसदीय क्षेत्र के लोगों के लिए शिक्षा, रोजगार, स्वच्छ पेयजल व बेहतर संपर्क मार्ग उपलब्ध करवाने को हमेशा अपनी मुख्य प्राथमिकता मानते हैं। क्षेत्र के लोगों के अनुसार रमेश चन्द्र कौशिक जनता का दिल अपने काम व अपनी कार्यशैली के दम पर जीतना बखूबी जानते हैं, इसी वजह से ही वह जातिगत समीकरणों को पूरी तरह से ध्वस्त करके चुनाव जीत जाते हैं।

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।

शनिवार, 22 अक्टूबर 2022

*खुशियों का दीपोत्सव आया*

*खुशियों का दीपोत्सव आया* 


देश में चहुं ओर छाया उजियारा,
खुशियों का पर्व दीपोत्सव आया।
 
टिमटिमाते छोटे-छोटे दीपकों से,
धरा से अंधकार को मिटाने आया।
 
प्रकाशोत्सव का यह पावन पर्व,
सबके लिए ढेरों खुशियां लाया।

मिट्टी के प्रज्ज्वलित दीपकों से,
हर घर अद्भुत रोशनियों से नहाया ।

आओ सब मिलकर हाथ बढ़ाओं,
भूलकर मनमुटाव दु:ख-दर्द सब।


दिल से खुशियां मनाते हुए अब,
दीपोत्सव का धूमधाम से स्वागत करें हम।

मन के कोने में छिपकर बैठे हुए,
घने अंधेरे को हटाने की पहल करें हम।

ऐसा कर अपनी व अपनों की दुनिया को,
दिल से वास्तव में रोशन करें हम।

आओ सब मिलकर सर्वशक्तिमान पालनहार,
ईश्वर का दिल से करें शुक्रिया हम।

प्रार्थना करें देश के हर घर-घर में,
खुशहाली लाएं मिलजुलकर हम।

अपनी मेहनत के बलबूते पर जल्द,
अब देश को विश्वगुरु बनाएं हम।

आंतक, धार्मिक उन्माद, अपराध व भ्रष्टाचार,
रूपी राक्षस को मिटाकर देश को स्वर्ग बनाएं हम।

हर घर में मां लक्ष्मी व सरस्वती का वास हो,
ऐसा खुशहाल नव भारत बनाएं हम।

देश के कोने-कोने से घने अंधेरे को,
दीपक जलाकर हमेशा के लिए भगाएं हम।

एकता अखंडता ऐश्वर्या वैभव से परिपूर्ण,
अमनचैन वाला नव भारत बनाएं हम।

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।


दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप
स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार, राजनीतिक विश्लेषक व रचनाकार

ट्विटर हैंडल -: DeepakTyagiIND

मंगलवार, 18 अक्टूबर 2022

"खेती-किसानी अनपढ़ों का काम है" इस धारणा को तोड़ते देश के उच्च शिक्षा प्राप्त किसान "डॉक्टर राजाराम त्रिपाठी"

आंकड़ेबाजी के चलते देश की खेती-किसानी आईसीयू में - डॉक्टर राजाराम त्रिपाठी 

"खेती-किसानी अनपढ़ों का काम है" इस धारणा को तोड़ते देश के उच्च शिक्षा प्राप्त किसान "डॉक्टर राजाराम त्रिपाठी" 

किसानों की ज्वलंत समस्याओं पर राजनीतिक पैंतरेबाजी की जगह खुले मन व सकारात्मक विचारों की जरूरत - डॉक्टर राजाराम त्रिपाठी 

कृषि क्षेत्र के हित के लिए "आईएएस" के तर्ज पर "भारतीय कृषि अधिकारी सेवा" के गठन की जरूरत - डॉक्टर राजाराम त्रिपाठी

दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप
वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक 

हमारे प्यारे देश के नीतिनिर्माता यह अच्छे से जानते हैं कि भारत एक कृषि प्रधान देश है और यहां की बहुत बड़ी आबादी कृषि आय पर पूरी तरह से निर्भर है, लेकिन बेहद अफसोस की बात यह है कि उसके बावजूद भी आज़ादी के 75 वर्षों के बाद भी देश में आज भी किसानों के सामने विभिन्न प्रकार की ज्वलंत समस्याओं का अंबार लगा हुआ, आज तक भी धरातल पर किसानों की बहुत सारी समस्याओं का कोई ठोस समाधान नहीं हो पाया है। आज किसानों से जुड़े विभिन्न मुद्दों को लेकर के वरिष्ठ पत्रकार दीपक कुमार त्यागी ने "अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा)" के राष्ट्रीय संयोजक व वरिष्ठ किसान नेता डॉक्टर राजाराम त्रिपाठी से विस्तार से चर्चा की, हमारे सभी सम्मानित पाठकों के लिए पेश हैं उस विस्तृत चर्चा के महत्वपूर्ण अंश -


सवाल - आपकी पारिवारिक व सामाजिक पृष्ठभूमि क्या है?

जवाब - मैं देश के सबसे पिछड़े छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल बस्तर जनपद के एक बेहद ही पिछड़े आदिवासी वन ग्राम 'ककनार' में पैदा हुआ था, वहीं आदिवासी समुदाय के बीच में ही पला बढ़ा और जंगल व जड़ी बूटियों का व्यावहारिक ज्ञान मुझे मेरे इन आदिवासी गुरुओं से ही मिला था। मेरे दादाजी उन्नत खेती के जबरदस्त जानकार माने जाते थे, वह लगभग 70 वर्ष पूर्व उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ से बस्तर इसी सिलसिले में आए थे और फिर यहीं के ही होकर रह गए। खेती का ज्ञान तो हमें बचपन से ही एक तरह से घुट्टी के रूप में मिला था। वैसे तो मेरे पिता जी व चाचा जी शिक्षक थे लेकिन वह साथ में किसान भी थे। घर में मेरी अम्मा, चाची, अन्य महिलाएं व बच्चे सभी खेती में उनका पूरा हाथ बंटाते थे। आज भी हमारा 43 लोगों का संयुक्त परिवार है, जो कि मूल रूप से खेती से ही जुड़ा हुआ है। लेकिन अब हमारे "मां दंतेश्वरी हर्बल समूह" के जैविक किसानों के इस महा-परिवार में हजारों की संख्या में स्थानीय आदिवासी परिवार भी शामिल हो गए हैं, अब हमारा परिवार काफी बड़ा हो गया है। हम सभी मिल जुलकर विशुद्ध जैविक पद्धति से उच्च लाभदायक खेती के अंतर्गत स्टीविया, दालचीनी, सफेद मूसली, काली मिर्च, अश्वगंधा हल्दी, इंसुलिन पौधे, दुर्लभ व विलुप्तप्राय जड़ी बूटियों की खेती तथा बहुमूल्य इमारती लकड़ी देने वाले आस्ट्रेलियन टीक के पेड़ों का वृक्षारोपण कर रहे हैं। अपने से जुड़े हुए इन सभी जैविक किसानों के कृषि उत्पादों के विपणन के लिए वर्ष 2002 में हमने सहकारिता के सिद्धांत पर आधारित "सेंट्रल हर्बल एग्रो मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया" (चैम्फ) नाम का एक राष्ट्रीय संगठन बनाया था। इस संगठन को वर्ष 2005 में भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के द्वारा राष्ट्रीय संगठन की मान्यता दी गयी थी। इसने लाखों किसानों की मार्केटिंग की समस्या को काफी हद तक सुलझाने का कार्य किया है। मैं वर्तमान में देश के 45 किसान संगठनों के महासंघ "अखिल भारतीय किसान महासंघ" (आईफा) का राष्ट्रीय-संयोजक हूं, सेंट्रल हर्बल एग्रो मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया (चैम्प) का अध्यक्ष हूं, आयुष मंत्रालय के मेडिशनल प्लांट बोर्ड का सदस्य हूं, अरोमैटिक प्लांट्स ग्रोवर एसोसिएशन ऑफ इंडिया का मेम्बर सेक्रेट्री सहित कई अन्य किसान संगठनों में अपनी भूमिका निर्वहन का ईमानदारी से प्रयास कर रहा हूं।

सवाल - एक आम धारणा बनी हुई है कि खेती-किसानी अनपढ़ों का काम है, इस पर आपके क्या विचार हैं?

जवाब - आपकी बात सही है देश में प्रायः किसानों को अनपढ़ अथवा कम पढ़ा लिखा माना जाता है, लेकिन वास्तव में धरातल पर ऐसा नहीं है, एक से एक पढ़े-लिखे विद्वान लोग खेती किसानी करते आये हैं और कर भी रहे हैं, मैंने खुद ने बीएससी (गणित) से करके, एल.एल.बी. व इंटरनेशनल कारपोरेट-ला में डिप्लोमा किया है। अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान, अंग्रेजी साहित्य, हिंदी साहित्य तथा इतिहास पांच विषयों में एम ए किया व डाक्टरेट पूर्ण किया, मेरी पढ़ाई अभी भी पढाई जारी है, अब में जनजातियों के परंपरागत चिकित्सा पद्धति जैसे बेहद महत्वपूर्ण विषय पर शासकीय विश्वविद्यालय में शोधरत हूं और सरकारी बैंक की नौकरी को छोड़कर के अपने व परिवार के जीवनयापन के साथ-साथ किसानों की मदद करने के उद्देश्य से खेती-किसानी कर रहा हूं। मैंने कृषि क्षेत्र में सफलता हासिल करके देश में दशकों से बनी हुई उस धारणा को तोड़ने का कार्य किया है कि "खेती-किसानी केवल अनपढ़ों का काम है!"


सवाल - आप देश के बहुत सारे किसान संगठनों से जुड़े हुए हैं, आज़ादी के 75 वर्ष बाद भी देश में आप किसानों को किस हाल में पाते हैं?

जवाब - वैसे आज हकीकत तो यहीं है कि देश में सही मायनों में कोई भी 'राष्ट्रीय किसान संगठन' नहीं हैं। तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ खड़े हुए आंदोलन को छोड़ दें तो किसानों और किसान संगठनों में भी सदैव एकजुटता का अभाव ही रहता है। जो भी छिटपुट किसान संगठन सक्रिय भी रहते हैं, वह भी प्रायः स्थानीय तथा क्षेत्रीय मुद्दों तक ही सीमित रहते हैं, राष्ट्रीय मुद्दों पर वह कभी भी केंद्रित नहीं रह पाते हैं। वैसे भी आज देश के सभी राष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने अपनी वोट बैंक की राजनीति के तहत अपने-अपने अलग-अलग किसान विंग / किसान संगठन बनाकर कर देश के किसानों में गांव-गांव, मोहल्ला-मोहल्ला यहां तक कि परिवारों में भी फूट डाल दी है। इन गंभीर परिस्थितियों को देखते हुए ही हमने 7-8 वर्ष पहले देश के 45 किसान संगठनों को एक साथ जोड़ते हुए राष्ट्रीय मुद्दों पर एकजुटता हेतु "अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा)" का गठन किया था, जिसके अच्छे परिणाम भी आए हैं। अन्य किसान संगठनों के साथ मिलकर 'आईफा' ने मोदी सरकार के प्रथम कार्यकाल में भूमि अधिग्रहण को सरल बनाने के नाम पर लाये गये नये भूमि अधिग्रहण कानून को वापस करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, बाद में कृषि कानूनों को वापस करवाने में भी अपनी बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 

सवाल - क्या आपको यह नहीं लगता कि देश के कुछ किसान संगठनों के नेता किसानों की समस्याओं के समाधान की आड़ में किसानों का भला करने की जगह अपना राजनीतिक हित साधने में ज्यादा व्यस्त रहते हैं?

जवाब - मैं हमेशा कहता हूं कि यह सही है कि देश के हुक्मरानों ने किसानों के साथ हमेशा दोयम दर्जे का सौतेला व्यवहार किया है, लेकिन साथ ही यह भी कटु सत्य है कि किसानों के असली दुश्मन यह हमारे मौकापरस्त किसान नेता और उनके जेबी, पिछलग्गू किसान-संगठन हैं। इन किसान संगठनों ने हमेशा किसान हितों को बेच कर अपना उल्लू साधा है। ज्यादातर किसान नेता भीतर खाने किसी न किसी राजनेता से या राजनीतिक दलों से जुड़े रहते हैं, जिसके चलते ही यह किसान नेता किसानों के आंदोलनों के समय किसानों के ज्वलंत मुद्दों के समाधान को तरजीह देने की जगह उन राजनीतिक पार्टियों की हितों की रक्षा को अपना परम धर्म व कर्तव्य मानकर कार्य करते हैं, देश की खेती तथा किसानों को ऐसे किसान नेताओं तथा इनकी गोपनीय दुरभसंधियों ने सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। लेकिन अब वक्त आ गया है कि देश के समस्त किसान अपने हितों के लिए स्वयं जागरूक बनें, आज किसानों को देश में बिके हुए किसान नेताओं और इनके बिकाऊ किसान-संगठनों को पहचान कर, इन तथाकथित किसान नेताओं की नेतागिरी चमकाने वाली खुल्ली दुकानों के चंगुल से जल्द से जल्द मुक्ति पाकर अपनी असल समस्या के निदान के लिए एकजुट होना होगा, तब ही उनकी समस्याओं का भविष्य में उचित समाधान हो पायेगा। वैसे भी देश के नीतिनिर्माताओं को किसानों की ज्वलंत समस्याओं पर राजनीतिक पैंतरेबाजी करने की जगह खुले मन से व सकारात्मक विचारों के साथ मनन करके मूल समस्या का निदान समय रहते करने की जरूरत है, तब ही देश का सर्वांगीण विकास हो पायेगा।
सवाल - आज देश में किसानों की ज्वलंत समस्याएं क्या-क्या हैं?

जवाब - भाई, आज हमारे देश में खेती-किसानी आईसीयू में पड़ी हुई है। किसानों की हालत उस मरीज की तरह से है, जिससे अगर पूछें कि भाई आपको कहां कहां दर्द है ? तो वह कराहते हुए कहता है कि जनाब शरीर में जहां भी हाथ रख दो वहां-वहां दर्द है। देश में आजादी के 75 वर्ष बीतने के बाद भी, आज भी खेती में ढांचागत निवेश आवश्यकता से बहुत ही कम हुआ है। पूर्व की सरकारों के साथ ही यह सरकार भी कृषि तथा कृषकोन्मुखी बिल्कुल भी नहीं है। केवल बड़े कारपोरेट्स, बड़े उद्योगो व चुनिंदा शीर्ष उद्योगपतियों की भलाई तथा उनकी सुरक्षा ही इनका प्रथम लक्ष्य है। आजादी के 75 वर्ष बाद भी देश में हर खेत को सिंचाई, सभी को उचित मूल्य पर सही खाद, सही कीटनाशक, सही बीज की व्यवस्था, जरूरी छोटी-छोटी कृषि मशीनरी तथा नवीन तकनीकें, ग्राम पंचायत व तहसील स्तर पर समुचित भंडारण व्यवस्था तथा लघु प्रसंस्करण इकाइयों की व्यवस्था, किसान के खेतों से लेकर देश तथा विदेश के बाजार तक सशक्त लॉजिस्टिक सपोर्ट, उत्पादन का समुचित लाभकारी कारी मूल्य प्रदान करने वाली सशक्त विपणन व्यवस्था, धरातल पर हमारी फसलों को जोखिमों से वास्तविक सुरक्षा देने वाली एक सक्षम बीमा प्रणाली, पर्याप्त सरल वित्त पोषण आदि दर्जनों मुख्य समस्याएं देश का किसान लगातार झेल रहा है और वह इन छोटी-छोटी समस्याओं का निदान चाहता है, लेकिन लंबे समय से किसानों को हर सरकार में केवल और केवल झूठे आश्वासन देकर छला जाता रहा है।

सवाल - किसानों की समस्याओं का धरातल पर कारगर निदान क्या है?

जवाब - मेरा मानना है कि खेती- किसानी देश के राजनीतिज्ञों की प्राथमिकता में कभी रही ही नहीं है। सरकारी कृषि योजनाओं के निर्माण में कृषि मंत्रालयों, राज्य तथा केंद्र के सभी कृषि तथा कृषि से संबद्ध विभागों में आईएएस अधिकारियों की ही प्रमुख, अंतिम व निर्णायक भूमिका होती है। मुझे उनकी योग्यता पर कोई शक नहीं है, लेकिन यह भी तय है कि कृषि का विषय एक विशुद्ध तकनीकी तथा जमीनी प्रायोगिक विषय है और इसके लिए जमीनी तथा तकनीकी ज्ञान होना बेहद जरूरी है। यही कारण है कि पिछले 75 वर्षों में आईएएस अधिकारियों के नेतृत्व में बनाई गई राज्य तथा केंद्र की अधिकांश कृषि योजनाएं बुरी तरह से असफल हुई हैं। सरकार की इन सैकड़ों योजनाओं के बावजूद भी आज देश में खेती तथा किसानों की दशा आजादी के पहले से भी ज्यादा बदतर है। मेरी सरकार से गुजारिश है कि देश में "आईएएस" के तर्ज पर "भारतीय कृषि अधिकारी सेवा" का गठन करके कृषि विषय के वशिष्ठ जानकारों का चयन करने का कार्य तत्काल शुरू करें। वैसे भी देश में खेती तथा किसानों की दशा एवं विविध कृषि उत्पादन को लेकर फर्जी आंकड़ेबाजी पेश कर सब कुछ ठीक है, सब कुछ अच्छा हो रहा है, ऐसा झूठा माहौल तैयार करने की कोशिश लगातार की जाती है, जबकि हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। मैं कई बार कहता हूं कि मुझे लगता है कि हमारा देश विशेषकर हमारा कृषि मंत्रालय झूठे आंकड़ों के पिरामिड के शीर्ष पर विराजमान हैं, सचमुच यह बहुत ही खतरनाक स्थिति है। इसके लिए जरूरी है कि आंकड़ों का शुद्धीकरण कर संशोधन किया जाए। किसानों से संबंधित समस्त योजनाएं, नियम, कानून उन्नत, अनुभवी किसानों, गैर राजनीतिक किसान संगठनों के साथ मिल बैठकर बनाई जाएं।
सवाल - "न्यूनतम समर्थन मूल्य" (एमएसपी) पर आपके क्या विचार हैं? 

जवाब - एमएसपी यानि कि "न्यूनतम समर्थन मूल्य" दरअसल किसानों के लिए यह प्राण-वायु यानि कि आक्सीजन की तरह है, इसके अभाव में देश का किसान घुट-घुट कर मर रहा है। सरकार को इसके लिए एक सक्षम "एमएसपी गारंटी कानून" लाना ही होगा। आईफा पिछले कई वर्षों से इसके लिए संघर्षरत है। हमारा मानना है कि इस कानून के लागू होने से देश के खजाने पर 1 रूपए का भी बोझ नहीं पड़ेगा, बस व्यापारियों को किसान भाइयों को उनके खून पसीने की मेहनत का उचित मूल्य देना होगा, बस इतनी सी बात है। आईफा यह बिल्कुल नहीं कहती कि पूरे देश के किसानों का पूरा उत्पादन सरकार खरीदे, हम तो कहते हैं कि सरकार चाहे तो किसानों से 1 ग्राम भी अनाज ना खरीदे, आप तो बस कानून द्वारा यह सुनिश्चित कर दीजिए कि सरकार द्वारा निर्धारित "न्यूनतम समर्थन मूल्य" से कम पर कोई भी, कहीं भी न खरीदें। वैसे आज भी सरकार किसानों से जितना भी खाद्यान्न खरीदती है, वह न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ही खरीद करती है, यानी कि सरकार पर इस कानून को लाने से कोई बोझ नहीं पड़ने वाला। आप मेरी बात लिखकर रख लें, यह सरकार हो अथवा कोई और सरकार, सरकार को सभी किसानों को उनके समस्त कृषि उत्पादों का लाभकारी "न्यूनतम समर्थन मूल्य गारंटी कानून" जल्द से जल्द देना ही होगा।

सवाल - देश में किस तरह की फसलों के "एमएसपी" जरूर तय होने चाहिए?

जवाब - देश के प्रत्येक किसान द्वारा उत्पादित हर फसल का एक लाभकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य तय होना चाहिए। इसमें खाद्यान्न, दलहन, तिलहन ,गन्ना, कंद, मूल, फल, सब्जी, पशुपालन, मछली पालन, मधुमक्खी पालन, मसाले , नारियल, केला, औषधीय व सुगंधीय पौधे, नर्सरी सहित खेती के सभी उत्पाद शामिल होनी चाहिए।

सवाल - किसानों के हित के लिए सरकार से आपकी क्या मांग है और क्या सुझाव हैं?

जवाब - सरकार गैर राजनीतिक किसान संगठनों के साथ मिल बैठकर बात करें और किसानों के समस्त उत्पादों के लिए "न्यूनतम समर्थन मूल्य गारंटी कानून" का बिल शीघ्र अति शीघ्र ले आएं। देश के चुनिंदा उन्नत, अनुभवी किसानों तथा गैर राजनीतिक किसान संगठनों के साथ मिल बैठकर देश में चल रही सभी कृषि योजनाओं के वर्तमान स्वरूप , क्रियान्वयन विधि की पुनर्समीक्षा करें और इन सभी योजनाओं को धरातल पर किसानों के हित में युक्ति-युक्त, कारगर, व्यावहारिक एवं परिणाम मूलक बनाया जाए। 
सवाल - आपका देश के किसानों के लिए क्या संदेश है?

जवाब - आज देश में किसानों के लिए खेती घाटे का सौदा बन गई है, इसके अलावा भी खेती में बहुत सारी परेशानियां हैं। इन कठिन परिस्थितियों को देखते हुए वर्तमान में देश की नई पीढ़ी खेती से दूर भाग रही है। पिछले कुछ महीनों में ही करीब 3 करोड़ लोगों ने खेती को छोड़ा है। यह स्थिति देश की खेती तथा देश दोनों के लिए बेहद चिंताजनक है। मेरा स्पष्ट मानना है कि देश तथा पूरे विश्व में आने वाला वक्त अब खेती तथा किसानों का ही होगा। अब हमारे देश के अन्नदाता किसानों के ऊपर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है और हमें अपनी जिम्मेदारी से नहीं भागना है। हम सब मिलजुल कर थोड़े से अतिरिक्त साहस, उद्यम, नई तकनीकों तथा कारगर सफल नवाचारों के जरिए और एक नए नजरिए से हम खेती की हारी बाजी को पलट सकते हैं। 

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।


शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2022

श्रद्धांजलि - देश में हमेशा याद किए जाएंगे धरती पुत्र 'मुलायम सिंह यादव'




श्रद्धांजलि - देश में हमेशा याद किए जाएंगे धरती पुत्र 'मुलायम सिंह यादव' 

दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप
वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक

भारतीय राजनीति के एक दिग्गज पुरोधा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से लेकर देश के रक्षामंत्री तक का सफर अपनी मेहनत के दम पर सफलतापूर्वक तय करने वाले व देश-दुनिया में 'धरतीपुत्र’ के नाम से मशहूर मुलायम सिंह यादव का 10 अक्टूबर 2022 को लंबी बीमारी के चलते गुरुग्राम के एक अस्पताल में निधन हो गया है। उनका निधन आम जनमानस व राजनीति के क्षेत्र दोनों के लिए ही एक बहुत बड़ी अपूरणीय क्षति है। क्योंकि राजनीति के क्षेत्र में मुलायम सिंह यादव जैसी दूरदृष्टी, बेबाक, सरल, सहज व दूसरों के दुःख दर्द को अपना मान करके उसका निदान करने के लिए हर वक्त तत्पर रहने वाली शानदार शख्सियत विरले ही जन्म लेती है। वह देश के राजनीतिक पटल पर किसानों, गरीबों, नौजवानों व आम जनमानस की एक दमदार बुलंद आवाज थे। मुलायम सिंह यादव का ओरा ऐसा था कि उनके द्वारा बोली गयी छोटी-बड़ी बात को राजनेताओं, शासन-प्रशासन व मीडिया में विशेष तव्वजो दी जाती थी। 

राजनीति की शुरुआत करते हुए 
मुलायम सिंह यादव ने देश-दुनिया की राजनीति की एक बहुत बड़ी प्रयोगशाला माने जाने वाले उत्तर प्रदेश की राजनीति के दुर्गम रास्ते को चुनकर के अपनी मेहनत से उसको सुगम बनाते हुए दिल्ली की केन्द्र की राजनीति तक का सफर बखूबी तय किया था। देश की राजनीति में मुलायम सिंह यादव को राजनीतिक दावं-पेंचों का एक माहिर बड़ा खिलाड़ी माना जाता था। मुलायम सिंह यादव ने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में वह सब कुछ पाया जो कि एक राजनीतिज्ञ अपने जीवन काल में पाना चाहता है। वह 8 बार विधायक 7 बार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए, मुलायम सिंह यादव तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर आसीन रहे और केंद्र में संयुक्‍त मोर्चा की सरकार में उन्होंने बेहद अहम रक्षामंत्री के दायित्व को भी दमदार ढंग से निभाने का कार्य किया था।

मुलायम सिंह यादव का जन्म 22 नवम्बर 1939 को इटावा जनपद के सैफई गांव के एक साधारण किसान परिवार में हुआ था, उनके पिता सुघर सिंह यादव सामान्य किसान परिवार से ताल्लुक रखते थे, उनकी माता मूर्ति देवी भी एक आम घरेलू महिला थी। मुलायम सिंह यादव अपने पाँच भाई-बहनों में रतनसिंह यादव से छोटे थे और अभयराम सिंह यादव, शिवपाल सिंह यादव, राजपाल सिंह और कमला देवी से बड़े थे। वैसे तो मुलायम सिंह यादव के पिता की इच्छा थी कि वह एक प्रसिद्ध पहलवान बने, किन्तु समय का पहिया ऐसा घूमा कि क्षेत्र में पहलवानी करते हुए ही मुलायम सिंह यादव का राजनीति में पदार्पण हो गया, उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु चौधरी नत्थूसिंह को मैनपुरी में आयोजित एक कुश्ती-प्रतियोगिता में अपनी कार्यशैली से बेहद प्रभावित किया और इस घटना के बाद ही उनका नत्थूसिंह के परम्परागत विधान सभा क्षेत्र जसवन्त नगर से अचानक ही राजनीतिक सफर शुरू हो गया था। इसके बाद मुलायम सिंह यादव ने अपने राजनीतिक जीवन के पथ में फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा, उन्होंने सफलता की नित-नयी कहानी खुद की मेहनत के दम पर लिखने का कार्य किया। राजनीति की शुरुआत में ही मुलायम सिंह यादव ने बहुत मेहनत  करनी शुरू कर दी थी, उन्होंने राजनीति के क्षेत्र में सफलता हासिल करने के उद्देश्य की पूर्ति के लिए पहले आसपास फिर बदलते समय के साथ उत्तर प्रदेश के गांव-गांव व शहर-शहर में पैदल, साइकिल, मोटर साइकिल, घोड़ा गाड़ी, कार, जीप, बस, रेलगाड़ी आदि से दिन रात एक करके घूमना शुरू कर दिया था और अपने बेहद मिलनसार सरल व्यवहार के बलबूते रोजाना नए-नए साथियों से मिलना जारी रखते हुए, वह एक बहुत बड़ा कारवां बनाते चले गये। जिसके परिणाम स्वरूप ही  उन्होंने सहकारी बैंक के निदेशक से लेकर के विधायक, मुख्यमंत्री, सांसद व देश के रक्षामंत्री तक का सफर सफलतापूर्वक तय किया था। आज उनकी पहचान देश व दुनिया में एक बड़े धर्मनिरपेक्ष व समाजवादी विचारधारा को मानने वाले दिग्गज राजनेता के रूप में होती थी।

चुनावी रणभूमि में मुलायम सिंह यादव वर्ष 1967 में पहली बार विधायक बने, उसके बाद जीवन में फिर कभी उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और वर्ष दर वर्ष राजनीति के क्षेत्र में सफलता हासिल करते चले गये। पहले मंत्री बने फिर 5 दिसंबर 1989 को मुलायम सिंह यादव पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और 24 जनवरी 1991 तक रहे। मुलायम सिंह यादव ने वर्ष 1992 में अपनी समाजवादी पार्टी का गठन किया था। समय का पहिया जब आगे बढ़ा तो वह एक बार फिर से 5 दिसम्बर 1993 को वह दूसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और 3 जून 1996 तक रहे। इसके बाद वर्ष 1996 में मुलायम सिंह यादव ग्यारहवीं लोकसभा के लिए मैनपुरी लोकसभा क्षेत्र से चुने गए थे और केन्द्र की संयुक्त मोर्चा सरकार में मुलायम सिंह यादव भी शामिल हुए और देश के रक्षामंत्री बने थे। हालांकि केंद्र की यह सरकार बहुत लंबे समय तक नहीं चल पायी थी। लेकिन उस समय तक देश की राजनीति में मुलायम सिंह यादव एक बहुत बड़े पुरोधा बनकर उभर चुके थे, उसी के चलते ही मुलायम सिंह यादव को प्रधानमंत्री बनाने तक की भी बात राजनीतिक गलियारों में गंभीरता पूर्वक चलने लगी थी, वह प्रधानमंत्री पद की दौड़ में अन्य प्रतिद्वंद्वियों से बहुत आगे थे, किंतु उस वक्त उनके कुछ सजातियों राजनेताओं ने उनका जरा भी साथ नहीं दिया, जिसके चलते मुलायम सिंह यादव देश के प्रधानमंत्री बनने से अंतिम समय में चूक गये थे। देश के राजनीतिक गलियारों में ऐसा माना जाता है कि उस समय पिछड़ों के दिग्गज राजनेता लालू प्रसाद यादव और शरद यादव ने अपने-अपने राजनीतिक हितों को साधने की खातिर मुलायम सिंह यादव के प्रधानमंत्री बनने के सपने पर पानी फेरने का कार्य किया था। हालांकि इसके बाद जब लोकसभा चुनाव हुए तो मुलायम सिंह यादव ने कन्नौज व संभल से जीतकर पुनः लोकसभा में दमदार ढंग से अपनी वापसी करने का कार्य किया था। बाद में उन्होंने कन्नौज से अपने पुत्र अखिलेश यादव को लोकसभा के चुनाव में जितवाकर के सांसद बनवाकर राजनीतिक शुरुआत करवाने का कार्य किया था। राजनीति में धोबी पछाड़ दांव के जबरदस्त खिलाड़ी मुलायम सिंह यादव एकबार फिर सभी को अपने धोबी पछाड़ दांव से मात देते हुए 29 अगस्त 2003 को तीसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और 11 मई 2007 तक रहे थे।

मुलायम सिंह यादव आम जनता के बीच नेता जी के नाम से भी बहुत मशहूर हैं, लोगों को उन्हें इस नाम से पुकारते वक्त अपने पन का आभास होता था, लेकिन लोगों चहेता समाजवाद के यह दिग्गज पुरोधा अब दुनिया में नहीं हैं, लेकिन अब उनकी विचारधारा को जीवित रखने के लिए उस पर चलते हुए उसको धरातल पर साकार करने की जिम्मेदारी उन सभी लोगों, सपा नेताओं व उनके पुत्र अखिलेश यादव पर है जो कि उन्हें बेहद प्यार करते थे। देश में राजनीति के क्षेत्र का हर व्यक्ति यह बहुत अच्छे से जानता है कि मुलायम सिंह यादव एक राजनेता मात्र नहीं थे, बल्कि वह एक  विचारधारा थे। देश में राम मनोहर लोहिया के समाजवाद का यह चमकता सूरज आज हमेशा के लिए अस्त हो गया है, लेकिन अब भी लोगों को उनके जीवन पथ की संघर्ष की विभिन्न गाथाओं से प्रेरणा हमेशा मिलती रहेगी। देश के राजनीतिक पटल पर मुलायम सिंह यादव की उपलब्धियों का एक बहुत लंबा इतिहास है, जो हमें हमेशा उनकी याद दिलाता रहेगा। मुलायम सिंह यादव देश की राजनीति में किसानों की सशक्त आवाज बनकर के धरती पुत्र कहलाए, तो पिछड़ों-शोषितों गरीबों के हक़ का पहरेदार बनकर देश के गली मोहल्ले में नेता जी की उपाधि से नवाजें गये। देश के राजनीतिक गलियारों में मुलायम सिंह यादव को नाम के अनुरूप मन से मुलायम माने जाने वाला एक ऐसा राजनेता माना जाता है जिसका दृढ़संकल्प व इरादे बेहद सख्त लोहे के थे। मुलायम सिंह यादव की सबसे बड़ी खासियत थी कि वह किसी पार्टी कार्यकर्ता या आम जन से एक बार मिल लें तो लोग उनके मुरीद हो जाते थे और फिर कभी उनखो भूल नहीं पाते थे। हालांकि आज मुलायम सिंह यादव के निधन से भारतीय राजनीति के एक युग का अंत बेशक हो गया है, लेकिन यह भी एक कटु सत्य है कि मुलायम सिंह यादव के संघर्ष और सफलता की दास्तान युगों-युगों तक हम सभी लोगों के जहन व दिलों में हमेशा जिंदा रहेगी!