बुधवार, 17 अगस्त 2022

श्रीकांत त्यागी प्रकरण - 'त्यागी समाज' के आक्रोश की अनदेखी 'भाजपा' को पड़ सकती है भारी! दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक


श्रीकांत त्यागी प्रकरण - 'त्यागी समाज' के आक्रोश की अनदेखी 'भाजपा' को पड़ सकती है भारी!

दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप
वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक

देश की आज़ादी से लेकर के नव निर्माण तक में बुद्धिजीवी, बेहद मेहनती, देशभक्त व स्वाभिमानी 'त्यागी समाज' के सम्मानित लोगों का अपना एक अनमोल योगदान हमेशा से रहा है। त्यागी समाज के बहुत सारे महापुरुषों ने निस्वार्थ भाव से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, लालबहादुर शास्त्री आदि जैसे दिग्गज लोगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर देश निर्माण के लिए कार्य किया था। मां भारती की सेवा में अपने प्राण को न्यौछावर करने के लिए मेजर आशाराम त्यागी जैसे वीर योद्धा हमेशा तत्पर रहें हैं, समाज के लोगों ने हमेशा निस्वार्थ भाव से देश व समाज की सेवा करने का कार्य हर तरह की अच्छी या बुरी परिस्थितियों में किया है। देश में चाहे किसी भी राजनीतिक दल की सरकार हो 'त्यागी समाज' के लोगों ने हमेशा ओछी राजनीति से दूर रहकर हर वक्त देश व समाज के हित में सोचते हुए कार्य करने में विश्वास रखा है, उन्होंने देश व समाज हित में जाति-धर्म के बंधन को तोड़ते हुए समाज के सभी लोगों को एकजुट करके कार्य करने में विश्वास रखा है। लेकिन जिस तरह से नोएडा में घटित एक आपसी विवाद की घटना पर देश के कुछ राजनीतिक दलों के चंद बड़े राजनेताओं व चंद मीडिया घरानों विशेषकर के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने जातिवाद के बेहद घातक जहर को फैलाते हुए पूरे 'त्यागी समाज' को अपमानित करते हुए अपने निशाने पर ले लिया है, वह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। श्रीकांत त्यागी के प्रकरण के उस एक घटनाक्रम के बाद से बेहद सभ्य व देशभक्त 'त्यागी समाज' के सभी लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ करके कुछ लोगों के द्वारा जानबूझकर बहुत पीड़ा पहुंचाने का निंदनीय कार्य किया गया है। हालात देखकर लगता है कि देश के कुछ राजनेताओं व चंद मीडिया घरानों ने टीआरपी के लालच, क्षणिक स्वार्थ व ओछी राजनीति के लिए श्रीकांत त्यागी के आपसी विवाद की एक घटना के द्वारा पूरे सम्मानित 'त्यागी समाज' के मान सम्मान को ठेस पहुंचाने का दुस्साहस किया है, जिसके चलते धरातल पर 'त्यागी समाज' के लोगों के साथ-साथ अब देश के सर्वसमाज के लोगों में भी बेहद जबरदस्त ढंग से दिन प्रतिदिन आक्रोश बढ़ता जा रहा है, जिसके चलते सर्वसमाज के लोग अब इस प्रकरण पर बहुत तेजी से एकजुट होते जा रहे हैं। वहीं रही-सही कसर 'बकरी को हाथी' बना देने वाली पुलिस ने  श्रीकांत त्यागी की निर्दोष पत्नी, उसके छोटे-छोटे से बच्चों व मामा-मामी के साथ दुर्व्यवहार करके पूरी कर दी है। वैसे तो श्रीकांत त्यागी विवाद के इस प्रकरण पर अधिकांश लोगों का यह मानना है कि जिस विवाद को पुलिस का संबंधित चौकी इंचार्ज भी बहुत आसानी से तुरंत सुलझा सकता था, उस विवाद को उत्तर प्रदेश के पुलिस-प्रशासन के बेहद शीर्ष अधिकारियों ने गैर जरूरी हस्तक्षेप व राजनीतिक दबाव में आने के चलते बहुत ज्यादा ही उलझा कर 'राई का पहाड़ बना'  दिया है। आपसी विवाद के मामले का 'तिल का ताड़' बनता देखकर अब तो आम लोग श्रीकांत त्यागी के प्रकरण में पुलिस-प्रशासन की कार्यवाही देखकर व्यंग्य कर रहे हैं कि ऐसा लगता है कि जैसे कि श्रीकांत त्यागी नाम का कोई एक व्यक्ति देश-दुनिया का एक सबसे बड़ा और बेहद कुख्यात वांछित आतंकवादी है, जिसका एक पल भी खुलेआम घूमना हमारे देश व समाज के लिए बेहद घातक है। हालांकि सूत्रों के अनुसार कभी इस पुलिस-प्रशासन के चंद लोग, देश व उत्तर प्रदेश के चंद प्रमुख राजनेता जब श्रीकांत त्यागी की धन-दौलत, गाड़ी घोड़े व अन्य सभी सुख-सुविधाओं के भौकाल का आयेदिन आनंद ले रहे थे, तब उन लोगों को श्रीकांत त्यागी में कोई कमी नज़र नहीं आ रही थी। विचारणीय तथ्य यह है कि फिर अचानक से ही ऐसा क्या घटित हो गया की श्रीकांत त्यागी को चंद दिनों में ही पच्चीस हज़ारी इनाम वाला एक बहुत बड़ा अपराधी एक दम से बना दिया जाता है। देश के आम व खास सभी वर्ग के लोगों को श्रीकांत त्यागी के इस पूरे प्रकरण से एक बहुत ही बड़े षड्यंत्र की बू आती है। आम लोग  शासन-प्रशासन व राजनेताओं से अब यह जानना चाहते हैं कि एक महिला के सम्मान की रक्षा करने के नाम पर दूसरी महिला व बच्चों के अपमान करने का हक भारत का कौन सा कानून देता है।

*"इस प्रकरण में महिला व बच्चों से दुर्व्यवहार के चलते सर्वसमाज में तेजी से आक्रोश व्याप्त होता जा रहा है, धरातल के हालात अब धीरे-धीरे से ऐसे बनते जा रहे हैं कि अगर यूं ही भाजपा सरकार में बैठे लोगों ने तमाशबीन बनकर के चुप्पी साधने का कार्य किया, तो इस क्षेत्र में भविष्य में फिर से एक बहुत बड़े आंदोलन की मजबूत नींव अब धीरे-धीरे रखी जाने लगी है। जिस तरह से सरकार में बैठे हुए कुछ लोगों के द्वारा श्रीकांत त्यागी के मामले में देश के नियम-कायदे व कानून के अनुसार न्यायसंगत कार्यवाही करवाने की जगह, एक सनक पर आधारित और एक पक्षीय कार्रवाई की गयी है, उससे अब  लोगों के एक बहुत बड़े वर्ग में जबरदस्त नाराज़गी व्याप्त हो गयी है। जिसके चलते ही अब यह मुद्दा सर्वसमाज के बहुत सारे लोगों लिए श्रीकांत त्यागी की पत्नी-बच्चों व मामा-मामी के सम्मान और राजनीतिक दबाव में जेल भेजे गये लोगों के हक व मुकदमा निरस्त करवाने की लड़ाई का बन गया है।"*

देश के अधिकांश राजनीतिक दल व राजनेता यह जानते हैं कि 'त्यागी समाज' के अधिकांश लोग भाजपा के परंपरागत वोटर हैं। 'त्यागी समाज' के अधिकांश लोग भाजपा के प्रत्याशी के सामने किसी भी अन्य दल से अपनी 'त्यागी बिरादरी' के एक मात्र प्रत्याशी होने के बावजूद भी हमेशा भाजपा के प्रत्याशी को वोट देना पंसद करते हैं, यही एक सबसे बड़ा कारण है कि विभिन्न राजनीतिक दलों के राजनेताओं ने नोएडा के श्रीकांत त्यागी विवाद के प्रकरण में पूरी 'त्यागी बिरादरी' के मान सम्मान को ठेस पहुंचाने का दुस्साहस किया है, वहीं इस आग में भाजपा के ही कुछ बड़े राजनेताओं ने खुद घी डालकर विवाद को भड़काने का कार्य किया है। वैसे तो अन्य दलों के राजनेताओं को कहीं ना कहीं यह लगता है कि 'त्यागी समाज' के लोग उनको तो किसी भी हाल में फिर भी वोट देंगे नहीं तो वह उनके साथ खड़े क्यों हों। वहीं दूसरी तरफ कहीं ना कहीं भाजपा के राजनेताओं को भी यह लगता है कि 'त्यागी समाज' तो उनका कट्टर समर्थक है, वह हर हाल में और विकट से विकट परिस्थिति में भी भाजपा को ही वोट करेगा, जिसके चलते वह 'त्यागी समाज' के हक की धरातल पर बात करने के लिए अब तैयार नहीं हैं। वैसे भी आज़ाद भारत में स्वाभिमानी 'त्यागी समाज' के लोगों ने कभी भी राजनीतिक रूप से अपने समाज के नाम पर राजनीति में भागीदारी मांगने का कार्य नहीं किया है, उन्होंने हमेशा व्यक्तिगत हैसियत के स्तर पर हक मांगा है, जिसका अब सभी राजनीतिक दल नाजायज फायदा उठा रहे हैं।
लेकिन श्रीकांत त्यागी प्रकरण के बाद से अब धरातल पर जिस तरह की राजनीतिक स्थिति बन रही है, वह भविष्य में उन सभी चंद बड़बोले राजनेताओं के साथ साथ भाजपा को भी बहुत महंगी पड़ सकती है, क्योंकि आज जिस तरह से 'त्यागी बिरादरी' के मान सम्मान की रक्षा के लिए शहर दर शहर सर्वसमाज के लोग एकजुट हो रहे हैं, वह भाजपा और 'त्यागी समाज' के सम्मान से खिलवाड़ करने का दुस्साहस करने वाले अन्य दलों के लिए अच्छा संकेत नहीं है।

*"हालांकि सर्वसमाज के इन लोगों के निशाने पर विशेष रूप से भाजपा के वह सभी चंद दिग्गज राजनेता निरंतर बने हुए हैं, जिन्होंने श्रीकांत त्यागी के इस आपसी विवाद के छोटे से प्रकरण में आग में घी डालकर बड़ी चालाकी से बात का बतंगड़ बनाने में अपनी पूर्ण भूमिका निभाई थी, ना जाने क्यों इन लोगों ने जरा भी यह सोचना तक भी आवश्यक नहीं समझा कि उनकी यह एक क्षणिक स्वार्थ वाली ओछी राजनीतिक हरकत के चलते, भाजपा को दशकों से निस्वार्थ भाव से एक तरफा वोट देने वाला परंपरागत 'त्यागी समाज' का वोटबैंक भाजपा से छिटक कर हमेशा-हमेशा के लिए दूर हो सकता है।"*

वैसे भी भाजपा के कर्ताधर्ताओं को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उत्तर प्रदेश में दोबारा योगी आदित्यनाथ की सरकार का गठन  करवाने में 'त्यागी समाज' ने बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का कार्य किया है, जिस पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अपना सूपड़ा साफ मान रहा था, वहां पर 'त्यागी समाज' के वोटरों की एकजुटता ने एक बहुत बड़ा संदेश देकर के पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा का सूपड़ा साफ होने से तो बचाया ही, साथ ही भाजपा को इस क्षेत्र में भारी बहुमत से विजयी बनवाने का कार्य किया था। हालांकि बाद में उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्रीमंडल में किसी भी 'त्यागी बिरादरी' के सम्मानित व्यक्ति को शामिल नहीं किया गया था, जिसके चलते 'त्यागी समाज' के लोगों में भाजपा के खिलाफ एक गुस्सा व्याप्त था। लेकिन अब श्रीकांत त्यागी के प्रकरण के बाद जिस तरह से पुलिस-प्रशासन ने बात का बतंगड़ बनाकर के एक पक्षीय कार्रवाई करते हुए, महिला के सम्मान के नाम पर श्रीकांत त्यागी की पत्नी, बच्चों, मामा व मामी से ग़लत व्यवहार किया है, उससे 'त्यागी समाज' के लोगों में जबरदस्त आक्रोश व्याप्त हो गया है। इस पूरे प्रकरण पर आंख बंद करके बैठे भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को यह समझना चाहिए कि अगर उसने जल्द ही 'त्यागी समाज' के लोगों की नाराज़गी को दूर नहीं किया तो और जो हालात धरातल पर बन रहे हैं उससे अगर 'त्यागी समाज' भाजपा से खफा हो गया तो 2024 के आगामी लोकसभा के चुनावों में भाजपा को एक दर्जन से अधिक लोकसभा सीटों पर व भविष्य में तीन दर्जन से अधिक विधानसभा की सीटों पर भारी नुक़सान उठाना पड़ सकता है।

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।

*"परशुराम के वंशज हैं"* दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप। स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार, राजनीतिक विश्लेषक व रचनाकार

*"परशुराम के वंशज हैं"*

हम भगवान परशुराम के वंशज हैं,
जप तप पूजा पाठ करना जानते हैं,
सनतान धर्म व संस्कृति की रक्षा के लिए,
दुश्मनों को युद्ध में परास्त करना जानते हैं।

हिम्मत व हौसले के दम पर युद्ध में हम,
विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी,
मानव व मानवता की रक्षा की खातिर,
अद्वितीय वीरता से लड़ना जानते हैं।

अन्याय होता है जब किसी पर भी,
हम चुपचाप बैठकर तमाशबीन बनकर,
मजबूरी का तमाशा देखने की जगह,
उसके हक की लड़ाई को लड़ना जानते हैं।

देश में न्याय का राज स्थापित करने के लिए,
हम अपराधियों से लड़ना जानते हैं,
सत्य की रक्षा के लिए हम त्यागी,
दुनिया में किसी से भी भिड़ना जानते हैं।

मेहनत करके शान से खाते हैं दो रोटी हम,
देश का नव निर्माण व विकास के लिए,
बिना रात दिन देखें करते हैं हम त्यागी,
पूरी ईमानदारी से दिन-रात एक करके काम।

भगवान परशुराम के दिखाएं मार्ग पर चलकर,
शस्त्र व शास्त्रों की शिक्षा के साथ साथ,
देश का नाम कैसे दुनिया में रोशन हो,
उस पर अमल करना है हम त्यागियों का काम।

कोई लाख बुरा चाहे ए दुनिया वालों हमारा,
हम भगवान परशुराम के वंशज चिंता करते नहीं,
बिना शोर मचाएं व दिखावे के बिना,
हम सफलता पर लिखते हैं त्यागियों का नाम।

रग-रग में कूट-कूट कर भरी हुई है,
देशभक्ति हमारे लहू में ए दुनिया वालों,
देश व समाज हित करने की यह शक्ति देते हैं,
हमारे आराध्य सर्वशक्तिमान भगवान परशुराम।

देश के अलग-अलग प्रांतों में रहते हैं,
हम त्यागी लगाकर अलग-अलग उपनाम,
देश समाज धर्म संस्कृति के हित के मार्ग पर चलकर,
भगवान परशुराम के वंशज करते हैं दुनिया में नाम।


।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।


दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप 
स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार, राजनीतिक विश्लेषक व रचनाकार

ट्विटर हैंडल - @DeepakTyagiIND

बुधवार, 10 अगस्त 2022

ओछी राजनीति व क्षणिक राजनीतिक स्वार्थ के चलते 'त्यागी समाज' के सम्मान को ठेस पहुंचाना उचित नहीं दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार राजनीतिक विश्लेषक

ओछी राजनीति व क्षणिक राजनीतिक स्वार्थ के चलते 'त्यागी समाज' के सम्मान को ठेस पहुंचाना उचित नहीं


दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप
वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार राजनीतिक विश्लेषक 

जिस तरह से श्रीकांत त्यागी को गिरफ्तार करने वाली उत्तर प्रदेश पुलिस की टीम की पीठ शासन-प्रशासन में दिग्गज पदों को सुशोभित कर रहे चंद लोगों के द्वारा थपथपायी जा रही है, उसे देखकर लगता है कि उत्तर प्रदेश की जांबाज पुलिस ने भारत के एक सबसे बड़े कुख्यात आतंकवादी को गिरफ्तार करके सलाखों के पीछे पहुंचाने कार्य किया है, जिस तरह से मीडिया के ट्रायल व चंद अन्य लोगों ने श्रीकांत त्यागी प्रकरण को  हवा दी है, वह हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या आज देश में सबसे बड़ी समस्या श्रीकांत त्यागी है, बाकी सब तरह से देश में हालात बहुत अच्छे बने हुए हैं। वैसे आपको यहां बता दें कि देश की राजधानी दिल्ली से एकदम सटा हुआ व उत्तर प्रदेश की आर्थिक राजधानी माने जाने वाला नोएडा विभिन्न कारणों के चलते आयेदिन मीडिया की सुर्खियों में बना रहता है। नोएडा में देश का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का सबसे बड़ा हब होने के चलते ही कभी सकारात्मक व कभी कोई बेहद नकारात्मक छोटा या बड़ा कोई भी घटनाक्रम चंद मिनटों में ही देश-दुनिया की मीडिया कि हैडलाइन बन कर जबरदस्त सुर्खियों में छा जाता है। ऐसा ही एक गालीगलौच और अभद्रता के आपसी विवाद का प्रकरण नोएडा सेक्टर 93 की बेहद पॉश सोसाइटी ग्रैंड ओमैक्स सोसाइटी में 5 अगस्त को घटित हो गया था। इस विवाद के एक वायरल वीडियो में यह देखा जा सकता है कि सोसाइटी की एक महिला ने अपनी आवासीय सोसाइटी में नियमों के उल्लंघनों का हवाला देते हुए स्वयं को भाजपा नेता कहने वाले श्रीकांत त्यागी के द्वारा वहां पर लगाये जा रहे पेड़ों पर आपत्ति जताई थी, जिसको लेकर दोनों पक्षों में हुई गर्मागर्म बहस में श्रीकांत त्यागी ने उक्त महिला को अपशब्द बोलते हुए पीछे धकेल दिया था। लेकिन बाद में जब यह वीडियो सोशल मीडिया पर बहुत तेजी से वायरल हुआ, तो नोएडा पुलिस तेजी से हरकत में आई और उसने तत्काल इस मामले में केस दर्ज करने का कार्य किया, जिसके बाद से श्रीकांत त्यागी घटनास्थल से फरार हो गया था। फिलहाल मुख्य आरोपी श्रीकांत त्यागी पुलिस की गिरफ्त में आ चुका है और उसके खिलाफ पुलिस-प्रशासन की कार्यवाही चल रही है। हालांकि यह तो आने वाले समय में न्यायालय ही तय करेगा कि आखिरकार दोषी कौन है।

लेकिन इस मसले पर देश में ओछी राजनीति जारी है, जब देश के विभिन्न राजनीतिक दलों को यह पता चला कि श्रीकांत त्यागी का कुछ ना कुछ जुड़ाव चाहे वो एकतरफा हो सत्ता पक्ष भाजपा से है तो इस मसले को बहुत तेजी के साथ जबरदस्त ढंग से तूल दिया गया, देखते ही देखते आपसी विवाद का यह मसला अब देश के चंद राजनेताओं व मीडिया की कृपा से एक बहुत बड़ा मुद्दा बन गया है। आरोप प्रत्यारोप से बचने के लिए ही आननफानन में भाजपा ने भी तत्काल समझदारी दिखाते हुए श्रीकांत त्यागी का पार्टी से कभी कोई नाता नहीं रहा है यह कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया है। सूत्रों के अनुसार साथ ही वह सभी चंद राजनेता, खास व आम लोग भी अब सार्वजनिक रूप से श्रीकांत त्यागी का बचाव करने से बचने लगे जो कभी उसके धन दौलत व भौकाल का लंबे समय से आनंद भोग रहे थे। आपसी विवाद के एक बेहद छोटे से मसले का तुरंत समाधान करने की जगह आज चंद राजनेताओं की कृपा से धरातल पर ऐसे तनावपूर्ण हालात बना दिये गये, जिसके बाद से श्रीकांत त्यागी पुलिस-प्रशासन, मीडिया, सोशल एक्टिविस्ट, आम व खास लोगों व देश के विभिन्न राजनेताओं के निशाने पर एक बड़े अपराधी के रूप में आ गया, मीडिया की टीआरपी की भूख को पूरा करने खातिर यह मामला चंद घंटों में ही बेहद गंभीर होता चला गया। सूत्रों की मानें तो इस मसले पर कहीं ना कहीं भारी दबाव में कार्य कर रही पुलिस ने हद तो उस वक्त कर दी जब वह खुद एक महिला के सम्मान के नाम पर छोटे-छोटे बच्चों की मां व श्रीकांत त्यागी की पत्नी को लंबे समय तक थाने में बिठाकर रखने का अघोषित अपराध जाने अंजाने कर बैठती है। उसके बाद धरातल पर जिस तरह के हालात बनाये गये और हमारे शासन प्रशासन, राजनेताओं व मीडिया का रवैया देखकर यह लगता है कि श्रीकांत त्यागी देश-दुनिया का सबसे बड़ा कुख्यात आतंकवादी है। हालात पर नज़र दौड़ाएं तो यह स्पष्ट है कि कभी श्रीकांत त्यागी के इशारे पर नाचकर उसकी सेवा करके माल कमाने में व्यस्त रहने वाला तथाकथित सिस्टम और उसको खुली छूट देना वाला सिस्टम ही आज श्रीकांत त्यागी की दुनिया को बहुत लंबी चौड़ी अपराध की सल्तनत बताकर उसको तबाह करके स्वयं ही अपनी पीठ थपथपाने में लगा हुआ है। 

लेकिन देश में हद तो उस वक्त हो जाती है कि जब बेहद अहंकार में वशीभूत होकर के हमारे प्यारे देश के चंद सम्मानित दिग्गज राजनेता व मीडिया का एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसे बेहद सभ्य, देशभक्त व बेहद बुद्धिजीवी, समाजसेवी, त्यागी समाज को टीआरपी के अपने क्षणिक स्वार्थों को पूरा करने के लिए निशाने पर लेकर के उसकी छवि खराब करने पर आमादा हो जाते हैं। देश में अभद्रता का आलम यह हो गया है कि शीर्ष मीडिया घराने, देश के चंद दिग्गज राजनेता व चंद बेहद जिम्मेदार लोगों ने भी सार्वजनिक रूप से व देश दुनिया के सोशल मीडिया के विभिन्न ताकतवर प्लेटफॉर्मों पर त्यागी समाज की छवि को ठेस पहुंचाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। इन चंद लोगों की बेहद ग़लत करतूतों ने उस देशभक्त, नियम-कायदे-कानून पसंद, बेहद सभ्य, समाजसेवा के लिए हमेशा तत्पर रहने वाले व बेहद सम्मानित त्यागी समाज को गालीबाज़ त्यागी, लंगड़ा त्यागी, गुंडा त्यागी, भगोड़ा त्यागी, गोलीबाज़ त्यागी, दबंग त्यागी आदि ना जाने कितने ग़लत जातिसूचक संबोधनों से संबोधित करने का जघन्य अपराध किया है, जो स्थिति देश व समाज की एकता अखंडता के लिए बिल्कुल भी उचित नहीं है। जिस तरह से श्रीकांत त्यागी के मसले पर हमारे देश के चंद दिग्गज राजनेताओं ने एक व्यक्ति के कृत्य के लिए पूरी जाति विशेष को निशाना बनाया है वह सरासर ग़लत है। वहीं हर वक्त टीआरपी की अंधी दौड़ में उतावली रहने वाली भारतीय मीडिया ने अपनी एकतरफा रिपोर्टिंग में जिस तरह से त्यागी समाज को बेहद आपत्तिजनक जातिसूचक विश्लेषणों से नवाजा है वह देश के सभ्य समाज के लिए बिल्कुल भी उचित नहीं है। आज हम लोगों के साथ-साथ, देश के सभी बेहद जिम्मेदार राजनेताओं, मीडिया संस्थानों व शासन प्रशासन मैं बैठे लोगों को भी यह समझना होगा कि एक व्यक्ति के द्वारा किये गये कृत्य के लिए चंद लोग कैसे किसी भी पूरे समाज को जिम्मेदार ठहराते हुए उसके मान सम्मान व भावनाओं से खिलवाड़ कर सकते हैं।

देश के जिम्मेदार पदों पर आसीन लोगों व संस्थानों को समय रहते यह समझना चाहिए कि भारत में तो जाति धर्म के नाम पर वैसे ही दिन-प्रतिदिन लोगों के बीच चौड़ी खाई बनती जा रही है, फिर वह क्षणिक लाभ के लिए ऐसी ग़लती बार-बार क्यों कर रहे हैं। आज मेरा देश के नीतिनिर्माताओं से विनम्र अनुरोध है कि देश में फिर कभी किसी जाति या धर्म के साथ भविष्य में ऐसी स्थिति ना बने सके इसके लिए तत्काल कानून बनाकर रोक लगानी चाहिए। वहीं एक व्यक्ति के कृत्य के चलते पूरे समाज को कटघरे में खड़ा करके इस तरह बदनाम करने वाले लोगों व संस्थानों को तत्काल सख्त चेतावनी देने की कानूनी कार्यवाही करनी चाहिए, जिससे कि भविष्य में वह फिर कभी किसी के साथ इस तरह के शर्मनाक कृत्य की पुनरावृति ना कर सकें। वहीं श्रीकांत त्यागी के इस पूरे मसले के बाद धरातल पर लगातार जिस तरह से देश के बेहद सम्मानित, देशभक्त त्यागी समाज को निशाने पर लिया जा रहा है, उन हालातों पर भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को भी शांतचित्त से विचार अवश्य करना चाहिए कि कहीं यह किसी व्यक्ति या दल के द्वारा भाजपा के परंपरागत त्यागी वोटबैंक को उससे दूर करने का कोई बड़ा षड्यंत्र तो नहीं है। कहीं यह सब कुछ लोगों के द्वारा हिन्दू धर्म के बेहद मजबूत स्तंभ त्यागी समाज को बदनाम करने की कोई  सुनियोजित बहुत बड़ी साजिश तो नहीं है। क्योंकि जिस तरह से इस पूरे घटनाक्रम के बाद देश में चंद दिग्गज राजनेताओं व मीडिया घरानों ने त्यागी समाज के मान सम्मान व छवि को धूमिल करने का दुस्साहस किया है, वह स्थिति केवल त्यागी समाज के खिलाफ़ ही नही है, बल्कि देश की एकता अखंडता व पूरे हिन्दू धर्म के खिलाफ है। वैसे भी इन चंद लोगों को यह ध्यान रखना चाहिए कि देश की आज़ादी की जंग से लेकर के, आज के आधुनिक भारत के नव निर्माण में देशभक्त व मेहनतकश 'त्यागी समाज' का अपना एक बेहद अनमोल योगदान हमेशा रहा है, उस पर क्षणिक राजनीतिक स्वार्थ व ओछी राजनीति के लिए यूं बेवजह प्रश्नचिन्ह लगा कर सवाल खड़ा करना बिल्कुल भी उचित नहीं है।

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।

सोमवार, 8 अगस्त 2022

महात्मा गांधी का 'ग्राम स्वराज' का सपना आखिर कब होगा पूरा! दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक


महात्मा गांधी का 'ग्राम स्वराज' का सपना आखिर कब होगा पूरा!

दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप
वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक

भारत की आज़ादी को 15 अगस्त 2022 को 75 वर्ष पूरे हो जायेंगे,  भारतीय इतिहास के इस बेहद महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अवसर को यादगार बनाने के लिए केन्द्र की नरेंद्र मोदी सरकार आजादी की गौरवशाली 75वीं वर्षगांठ को पूरे देश में 'अमृत महोत्सव' के रूप में विभिन्न प्रकार के भव्य कार्यक्रमों का आयोजन करके धूमधाम से मना रहा है। इस महोत्सव की शुरुआत 12 मार्च 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के अहमदाबाद में स्थित स्वयं महात्मा गांधी के द्वारा स्थापित ऐतिहासिक 'साबरमती आश्रम' में 'दांडी मार्च’ को हरी झंडी दिखा कर की थी। इस पल को यादगार बनाने के लिए केन्द्र सरकार देश की आजादी के 75 वर्ष पूरे होने से 75 हफ्ते पहले यानी की 12 मार्च 2021 से ही देश में 'अमृत महोत्सव' के रूप में विभिन्न छोटे व बड़े कार्यक्रमों का आयोजन करके मना रहा है, जो कि एक वर्ष बाद 15 अगस्त 2023 तक निरंतर चलते रहेंगे। आज़ादी की 75वीं वर्षगांठ का यह अवसर सभी देशवासियों के लिए बेहद अहम है। हालांकि देशवासियों के मन में देश के सर्वांगीण विकास को लेकर आज भी बहुत सारे ज्वलंत सवाल उठ रहे हैं, वह देश के सिस्टम से उनका स्थाई निदान चाहते हैं, ऐसा ही एक सवाल देश के ग्रामीण अंचलों के विकास का है।

*" लेकिन 'अमृत महोत्सव' के इस बेहद गौरवशाली अवसर पर हम सभी देशवासियों को, देश के सभी नीतिनिर्माताओं व ताकतवर कर्ताधर्ताओं को हर हाल में यह आत्ममंथन अवश्य करना चाहिए कि क्या हम लोग देश की आज़ादी के लिए प्राण न्यौछावर व संघर्ष करने वाले मां भारती के वीर सपूतों के सपनों के वास्तविक भारत का 75 वर्ष बाद भी धरातल पर वास्तव में निर्माण कर पाये हैं क्या। आज़ादी के 75 वर्ष बाद भी क्या हमारा सिस्टम देश के गांवों में निवास करने वाली सत्तर फीसदी ग्रामीण आबादी का समुचित सर्वांगीण विकास कर पाया है क्या।"*

वैसे भी आजकल देश में जिस तरह का माहौल व्याप्त हो गया है, वह महात्मा गांधी के सपने को पूरा करने में व देश के सर्वांगीण विकास में खुद ही एक बहुत बड़ा बाधक है। आज सरकार व आम जनमानस को तत्काल ही इस तरह के तनाव पूर्ण माहौल को समाप्त करने के लिए धरातल पर बेहद सख्त ठोस पहल करनी चाहिए। हम लोगों को समय रहते यह समझना होगा कि सर्वांगीण विकास, एकता-अखंडता के लिए देश में शांति व आपसी भाईचारे को हर हाल में कायम रखना बेहद जरूरी है। आज जो स्थिति देश में बनी हुई है उस हाल में हम सभी देशवासियों, शासन व प्रशासन में बैठे हुए लोगों व नीतिनिर्माताओं के लिए विचारणीय तथ्य यह है कि क्या देश की आज़ादी की 75वीं वर्षगांठ तक भी देश में अमन चैन, शांति, अनुशासन व नियम-कायदे-कानून का राज स्थापित होकर के महात्मा गांधी के 'ग्राम स्वराज' का सपना पूरा हो पाया है क्या। आम जनमानस से यह प्रश्न पूछने पर देश में हर तरफ से केवल एक ही आवाज़ आयेगी की आज़ादी के 75 वर्षों के बाद भी हम महात्मा गांधी के सपनों का भारत व 'ग्राम स्वराज' की कल्पना को धरातल पर मूर्त रूप देने में पूर्णतः विफल रहे हैं।

*" हालांकि देश-दुनिया में यह सर्वविदित है कि गांधीवादी विकास की अवधारणा में 'ग्राम स्वराज' का विशेष महत्व है। महात्मा गांधी ही हमेशा मानते थे कि आज़ाद भारत के पुनर्निर्माण में देश के ग्रामीण अंचल के क्षेत्रों का सबसे अहम योगदान रहेगा। महात्मा गांधी अच्छे से जानते थे कि गांव के पुनर्निर्माण व विकास पर ही देश का सर्वांगीण विकास निर्भर करता है, इसलिए महात्मा गांधी ने 'ग्राम स्वराज' का सपना देखा था। वैसे भी महात्मा गांधी ने जिस स्वराज की परिकल्पना की थी, वह देश में दूर-दूर तक नज़र नहीं आता है। आज 'ग्राम स्वराज' के केंद्र में वर्ष 2022 के आंकड़ों के अनुसार देश के 6,28,221 गांव विशेष रूप से आते हैं। गांधी की इस 'ग्राम स्वराज' परिकल्पना में देश के सभी गावों को पूर्ण रूप से  आत्मनिर्भर बनाते हुए, गावों की स्वतंत्र, स्वावलंबी एवं  प्रबंधन सत्ता का लक्ष्य हासिल करना था, लेकिन अफसोस आज आज़ादी के 75 वर्ष बाद भी गांधी का यह सपना बहुत दूर की बात बना हुआ है "*

महात्मा गांधी अच्छे से जानते थे कि भारत को विश्वगुरु बनाने का रास्ता देश के गांवों से निकलता है, इसके लिए देश के ग्रामीण अंचल को हर हाल में अपने पैरों पर खड़ा करना होगा। इसलिए ही महात्मा गांधी ने 'ग्राम स्वराज' की परिकल्पना के रूप में एक बेहद विस्तृत खाका आत्मनिर्भर गांवों के एक महत्वपूर्ण विचार के साथ ताकतवर भारत की परिकल्पना को धरातल पर साकार करने के लिए भारत की आजादी से वर्षों पहले ही बना लिया था। महात्मा गांधी के इस प्रस्तावित 'ग्राम स्वराज' के सपने में देश की सत्तर फीसदी ग्रामीण आबादी के जीवन स्तर को सुधारने के लिए एक बृहद रणनीति थी। महात्मा गांधी ग्रामीण क्षेत्रों के पुनर्निर्माण के लिए देश में 'ग्राम स्वराज' की एक अनूठी अवधारणा पर कार्य करना चाहते थे। उनके इस दृष्टिकोण का मुख्य लक्ष्य देश के लाखों गांव का विकास करते हुए वहां की ग्रामीण आबादी को अपने पैरों पर खड़ा करने का था। महात्मा गांधी यह अच्छे से जानते थे कि भारत का पुनर्निर्माण देश के ग्रामीण क्षेत्रों के पुनर्निर्माण पर ही निर्भर करता है। लेकिन अफसोस आज हमारा सिस्टम आज़ादी के 75 वर्षों के बाद भी महात्मा गांधी व देश के अन्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के सपनों के भारत का निर्माण करने में विफल रहा है। देश में गांवों का विकास करने का प्रयास तो किया गया, लेकिन महात्मा गांधी के 'ग्राम स्वराज' की अवधारणा के अनुरूप देश के गांवों का पुनर्निर्माण करने के मामले में हमारा सिस्टम बहुत पिछड़ गया है। जिसके चलते ही आज धरातल पर स्थित बेहद भयावह होती जा रही है, ग्रामीण अंचलों से शिक्षा, चिकित्सा जैसी मूलभूत सुविधाओं व रोजीरोटी की तलाश में गांवों से बड़े पैमाने पर लोगों का शहरों की तरफ पलायन हो रहा है, जिसके चलते देश के विभिन्न शहरों का बहुत ही अव्यवस्थित ढंग से विस्तार होकर अंधाधुंध शहरीकरण होता जा रहा है, जिसकी वजह से शहरों में भी एक बहुत बड़ी आबादी नारकीय हालत में जीवनयापन करने के लिए मजबूर है। फिर भी निरंतर बड़ी संख्या में ग्रामीण आबादी गांवों से पलायन करके भारत के विभिन्न शहरी क्षेत्रों में काम धंधे की तलाश करने के लिए पहुंच रही है, क्योंकि गांव में मूलभूत सुविधाओं का पूर्ण रूप से अभाव है। उसके बावजूद भी हमारे देश का सिस्टम ग्रामीण आबादी के शहरी क्षेत्रों में पलायन करके आने के मुख्य कारणों का निदान करने में नाकाम है। वह आज़ादी के 75 वर्ष बाद भी ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों के दुष्कर जीवन स्तर को सरल बनाकर बेहतर बनाने में विफल रहा है। लेकिन अब वह समय आ गया है जब हमें देश व समाज के हित में महात्मा गांधी के सपने को पूरा करते हुए देश के ग्रामीण अंचल के पुनर्निर्माण के लिए 'ग्राम स्वराज' की परिकल्पना को धरातल पर अमलीजामा पहनाना होगा, अंधाधुंध शहरीकरण रोकने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूदा आय के विभिन्न स्रोतों जैसे कृषि, विभिन्न प्रकार के कुटिर उधोगों को बढ़ावा देकर लोगों की आय को बढ़ाकर गांव में ही बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा करके, ग्रामीण अंचल में कम आय व बेरोजगारी जैसे बेहद गंभीर मुद्दों का निदान करना होगा। सरकार को ग्रामीण अंचल में निवास करने वाले लोगों के जीवन स्तर को सरल बनाते हुए उसको ऊपर उठाने के लिए तेजी से कार्य करना होगा। आज समय की मांग है कि देश के लाखों गांव को भी आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित किया जाये, ग्रामीण अंचल में उच्च गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा व चिकित्सा सेवाओं को सुलभता से उपलब्ध करवाया जाये। हमारे सिस्टम को समझना होगा कि महात्मा गांधी ने अपने अनुभवों के आधार पर ही देश के ग्रामीण अंचल के पुनर्निर्माण के लिए आर्थिक विचारों का परिचय समय-समय पर दिया था, जिसमें वर्ष 1917 में चंपारण में ग्रामीण पुनर्निर्माण के प्रयोग, वर्ष 1920 में सेवाग्राम के प्रयोग, वर्ष 1938 में वर्धा का प्रयोग मुख्य हैं। गांधी ने हमेशा ग्रामीण पुनर्निर्माण के विचारों को पेश करते हुए अपने अनुयायियों और सहयोगियों से ग्रामीण क्षेत्रों के पुनर्निर्माण पर विशेष ध्यान केंद्रित करने का आग्रह किया था। महात्मा गांधी ने अपने 'ग्राम स्वराज' के सपने को पूरा करने के लिए समय-समय पर पंडित जवाहरलाल नेहरू से लिखित व मौखिक चर्चा की थी। उन्होंने नेहरू को लिखे अपने एक पत्र में प्रत्येक व्यक्ति के मानसिक, आर्थिक, राजनीतिक और नैतिक विकास के लिए समान अधिकार और अवसर देने का सुझाव दिया था। लेकिन ना जाने क्यों आज़ादी के बाद से ही देश में महात्मा गांधी के 'ग्राम स्वराज' के विचारों की उपेक्षा की जाने लगी, जिसका देश में परिणाम यह हुआ कि देश में गांवों से तेज़ी से पलायन हुआ और देश अंधाधुंध अव्यवस्थित  शहरीकरण की गंभीर बीमारी से ग्रस्त हो गया, जिसके चलते आज देश में गंभीर समस्याओं का अंबार लग गया है जो धन देश के विकास के लिए ख़र्च होना चाहिए था, वह धन देश में समस्याओं के निदान पर खर्च हो रहा है, जो कि भारत को विश्वगुरु बनाने की राह में बहुत बड़ा बाधक है।

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।