सोमवार, 25 जुलाई 2022

सोशल मीडिया को असभ्यता का अड्डा बनने से रोकना होगा! दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक

सोशल मीडिया को असभ्यता का अड्डा बनने से रोकना होगा!

दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप
वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक

भारतीय संविधान देश के प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की पूर्ण आज़ादी प्रदान करता है, लेकिन कानून के दृष्टिकोण से देखा जाए तो इसके बहुत सारे अपवाद भी मौजूद हैं। आप अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर किसी भी दूसरे व्यक्ति की अवमानना नहीं कर सकते हैं, किसी भी दूसरे व्यक्ति के मान-सम्मान को ठेस नहीं पहुंचा सकते हैं, समाज में  धार्मिक व जातिगत आधार पर किसी भी प्रकार की दुर्भावना व नफ़रत नहीं फैला सकते हैं। वैसे भी अभिव्यक्ति की आज़ादी का यह मतलब नहीं होता है कि आप देश में सर्वोच्च पदों पर आसीन लोगों के बारे में सोशल मीडिया के बेहद सशक्त प्लेटफार्म पर सार्वजनिक रूप से असंसदीय व असभ्य हैशटैग तक चलवाने का असभ्यता की पराकाष्ठा वाला कृत्य करो। यहां आपको मैं याद दिला दूं कि जिस तरह से सोशल मीडिया के सशक्त माध्यम के दुरुपयोग का नमूना 24 जुलाई 2022 को भारतीय राजनीति के संदर्भ में पूरी दुनिया ने देखा है, वह बेहद शर्मनाक था। उसके संदर्भ में कहा जा सकता है कि यह दिन भारतीय राजनीति के इतिहास में अंध भक्तों के भारी भीड़ के चलते एक ऐसे शर्मनाक दिन के रूप में दर्ज हो गया है, जब भारत के ही लोग अपने चुनें हुए संवैधानिक पदों पर आसीन जन प्रतिनिधियों के बारे गालियों का असभ्यता से परिपूर्ण हैशटैग बनाकर उसको खुद ही टॉप पर ट्रैंड करवाकर खुद अपनी पीठ थपथपा रहे थे। हालांकि सरकार को व आईटी कंपनियों को मिलकर यह तय करना चाहिए कि इस तरह के कृत्य की भविष्य में फिर कभी पुनरावृति ना होने पाये। इन असभ्य हैशटैग ने ना केवल व्यक्तिगत रूप से बल्कि मोदी व केजरीवाल सरनेम वाले सभी लोगों की भावनाओं को आहत करने का कार्य किया है। देश की केन्द्रीय जांच एजेंसियों को तत्काल इन असभ्य हैशटैगों की शुरुआत करने वाले लोगों की पहचान करनी चाहिए और उन सभी लोगों के खिलाफ मामला दर्ज करके इसके लिए जिम्मेदार सभी दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए, जिससे कि भविष्य फिर कोई व्यक्ति इस तरह की ओछी मानसिकता के द्वारा समाज में नफ़रत फ़ैलाने का व संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के बारे में ऐसे बेहूदगी भरे असभ्य शब्दों का उपयोग करने की जरूरत ना कर सकें। 

*" वैसे भी जिस तरह का दौर चल रहा है उसमें आज महात्मा गांधी के देश में लोकतांत्रिक मूल्यों की हर हाल में रक्षा व राजनीतिक सुचिता को बनाएं रखना बेहद अहम हो गया है। इसलिए अब आवश्यक हो गया है कि देश के प्रत्येक छोटे-बड़े राजनेताओं व उनके राजनीतिक समर्थकों के द्वारा जिस तरह से एक दूसरे के प्रति सार्वजनिक रूप से आयेदिन बेहद बेहूदगी पूर्ण व असभ्य असंसदीय भाषा का उपयोग किया जाने लगा है वह सब तत्काल बंद होना चाहिए। इन लोगों को समझना चाहिए कि क्षणिक राजनीतिक लाभ के लिए इस तरह की बेहद ओछी मानसिकता से परिपूर्ण विचार व राजनीतिक सोच पर अब लगाम लगनी चाहिए। क्योंकि इन चंद प्रभावशाली लोगों की एक-एक हरकतों को देश का आम जनमानस हूबहू कॉपी करके उपयोग करने का कार्य करता है, जिसके चलते सभ्य समाज में तेजी से असभ्यता बढ़ने का खतरा उत्पन्न हो गया है।"* 

वैसे तो भारतीय कानून सोशल मीडिया पर लोगों को केन्द्र की मोदी सरकार, केजरीवाल व अन्य किसी भी सरकार की नीतियों की आलोचना करने का पूरा हक भी प्रदान करता है। क्योंकि कोई भी सरकार जब जनता से किये गये अपने वादों को पूरे नहीं करेगी या जनता उसके कार्यों से संतुष्ट नहीं होगी, तो आम जनमानस के पास उस सरकार पर जमकर हमला बोलने का कार्य करने का सबसे सरल माध्यम सोशल मीडिया ही है। लेकिन सभ्य समाज में हमेशा शब्दों की गरिमा का ध्यान रखना हम सभी लोगों का नैतिक कर्तव्य व दायित्व है, सभ्य समाज में किसी भी व्यक्ति को असभ्यता करके उद्दंडता पूर्ण व्यवहार करने का अधिकार नहीं है, किसी की भावनाओं से खिलवाड़ करने का अधिकार नहीं है।

हम सभी लोगों को यह समझना होगा कि सोशल मीडिया अपने विचारों को दुनिया तक पहुंचाने का आज सबसे सशक्त व तेज प्लेटफॉर्म बन गया है। हम लोगों को इसका सकारात्मक उपयोग करते हुए देश, समाज, परिजनों व अपने हित में सदुपयोग करना चाहिए, ना कि सोशल मीडिया के द्वारा हम लोग समाज में असभ्य  व नफ़रती जहरीली सोच को फ़ैलाने के लिए प्रयोग करें। आज के व्यवसायिक दौर में यह हम सभी लोगों की व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म उपलब्ध करवाने वाली सभी कंपनियों की बेहद अहम जिम्मेदारी है कि सोशल मीडिया पर ऐसा तालमेल बनाएं कि लोगों की अभिव्यक्ति की आज़ादी के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक सदभाव की व्यवस्था भी पूर्णतः बरक़रार रहे। वैसे भी हम लोगों को सोशल मीडिया पर वायरल हो रही बातों को लेकर सचेत रहना होगा, उस पर आंख बंद करके विश्वास करने से बचना होगा, हमें यह समझना होगा कि सोशल मीडिया पर इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट मीडिया की तरह कोई एडिटर नाम की चीज़ नहीं होती है, जिससे कि गलत, भ्रामक, असभ्य व अश्लील तथ्यों को प्रकाशित होने से रोका जा सके या उसके लिए कंपनी के किसी व्यक्ति विशेष की जवाबदेही तय की जा सके। वैसे भी दुनिया में सोशल मीडिया का प्लेटफॉर्म उपलब्ध करवाने वाली आईटी कंपनियों को आईटी एक्ट के तहत बहुत सारी ज़िम्मेदारियों से छूट मिली हुई है, जिसके चलते वह केवल अपनी कंपनी का लाभ बढ़ाने में लगे रहते हैं और खर्च से बचने के लिए सोशल मीडिया के इस बड़े प्लेटफॉर्म को अभिव्यक्ति की आज़ादी की आड़ में फ्री छोड़ देते हैं। जिसके चलते ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का ग़लत कार्यों के लिए धड़ल्ले से उपयोग हो रहा है, षड्यंत्रकारी लोग विभिन्न फ़र्ज़ी नामों से आईडी बना कर सोशल मीडिया के माध्यम से अपना ग़लत अनैतिक मकसद पूरा करते हैं और बड़े पैमाने पर लोग पोस्ट को लाईक, कमेंट व शेयर करके अंजाने में उनका सहयोगी बन जाते हैं। आज सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म उपलब्ध करवाने वाली आईटी कंपनियों को यह समझना होगा कि अगर इस तरह से ही उनके प्लेटफॉर्म पर अश्लीलता, नफ़रती व जहरीली सोच और असभ्यता का प्रचार-प्रसार होता रहा तो वह दिन दूर नहीं है जब सभ्य समाज के अधिकांश सभ्य लोग सोशल मीडिया से पूरी तरह से किनारा करने लगेंगे।।

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।

मंगलवार, 19 जुलाई 2022

आखिरकार कब होगी हरनंदी (हिंडन) नदी प्रदूषण मुक्त दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक



 आखिरकार कब होगी हरनंदी (हिंडन) नदी प्रदूषण मुक्त

दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप
वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक

देश में प्रदूषण की मार झेल रही विभिन्न नदियों को स्वच्छ बनाने के लिए केन्द्र व राज्य सरकारों के स्तर पर विभिन्न प्रकार के छोटे-बड़े प्रोजेक्टों के माध्यम से प्रदूषण मुक्त करने का कार्य चल रहा है। हालांकि यह बात अलग है कि कहीं यह कार्य अभी तक भी केवल फाइलों में ही चल रहा है और कहीं धरातल पर कछुए की धीमी रफ्तार के साथ कार्य चल रहा है। धरातल पर आलम यह है कि देश की राजधानी दिल्ली से चंद किलोमीटर दूर होकर गुजरने वाली पोराणिक व ऐतिहासिक महत्व वाली हरनंदी (हिंडन) नदी मृतप्राय होने के कगार पर है और हमारा सिस्टम तमाशबीन बनकर बैठा हुआ तमाशा देख रहा है। सिस्टम व आम जनमानस की उपेक्षा का शिकार होने के चलते पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जनपदों से होकर गुजरने वाली हरनंदी (हिंडन) नदी भी आज उन नदियों में शुमार है जो लापरवाही के चलते आज एक गंदे नाले में तब्दील होकर रह गयी है। वैसे देखा जाये तो मुख्य रूप से हरनंदी (हिंडन) नदी वर्षा पर निर्भर रहने वाली एक बड़ी बरसाती नदी है, जो कि उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जनपद में शाकुंभरी देवी रेंज के ऊपरी हिस्से शिवालिक रेंज से निकलती है। हरनंदी (हिंडन) नदी की काली  नदी व कृष्णा प्रमुख सहायक नदी है, जो स्वयं आज इतना अधिक प्रदूषित है कि बहुत सारे लोग तो इनको नदी की जगह गंदा नाला ही मानते हैं। हरनंदी (हिंडन) नदी से जुड़े कुछ आंकड़ों की बात करें तो इस नदी का अनुमानित जलग्रहण क्षेत्र 7,083 वर्ग किलोमीटर (2,735 वर्ग मील) है और यह यमुना नदी की एक प्रमुख सहायक नदी है, जो कि उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर जनपद में पहुंचकर यमुना नदी में मिल जाती है।

*"आज गंगा -यमुना के दोआब के बीच बहने वाली हरनंदी (हिंडन) नदी की हालत यह हो गयी है कि उसमें जलीय जीव लगभग खत्म हो चुकें हैं, हमारे सिस्टम की जबरदस्त लापरवाही के चलते अब यह नदी शहरों का गंदा पानी व औद्योगिक कचरों के भार को ढोती हुए एक बड़े गंदे नाले के रूप नज़र आती है, अब तो प्रदूषण के चलते नदी के जल का आलम यह हो गया है कि नदी का जल तेजी से भूजल को भी प्रदूषित करने का कार्य कर रहा है।"*  

वैसे देखा जाये तो पिछले कई वर्षों से हरनंदी (हिंडन) नदी देश की मीडिया की निरंतर सुर्खियों में बनी हुई है, क्योंकि कभी इसको निर्मल बनाने के लिए केन्द्र व राज्य सरकार पहल करती है, कभी इसकी स्वच्छता के लिए एनजीटी पहल करती है, कभी इसकी स्वच्छता के लिए विभिन्न जनपदों का जिला प्रशासन पहल करता है और कभी देश की विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाएं इसकी स्वच्छता के लिए पहल करती है, जिसके चलते हरनंदी (हिंडन) नदी अक्सर मीडिया की चर्चाओं में रहती है।

*"लेकिन हरनंदी (हिंडन) नदी के मौके पर जाकर हालात देखें तो धरातल पर स्थिति 'ढ़ाक के तीन पात' से ज्यादा कुछ नहीं है, नदी के स्वच्छता अभियान के नाम पर 'थोथा चना बाजे घना' की नीति पर काम चल रहा है, किसी भी स्वच्छता के अभियान को लंबा चलाकर धरातल पर कार्य नहीं किया जा रहा है। नदी की सफाई के लिए सिस्टम के द्वारा चलाए गए अभी तक के अभियान केवल क्षणिक इवेंट बनकर सीमित रह गये हैं।"* 

सिस्टम के द्वारा हरनंदी (हिंडन) नदी के लिए चलाए गए स्वच्छता अभियानों की हालात देखकर यह स्पष्ट है कि देश में नदियों की सफाई के नाम होना वाले कार्य मीडिया की सुर्खियों में बनने वाले एक क्षणिक इवेंट से ज्यादा कुछ नहीं है। इन अभियानों में नदी की स्वच्छता के लिए मौके पर सिस्टम के द्वारा बड़ी-बड़ी घोषणाएं की जाती है, लेकिन ना जाने क्यों वह घोषणाएं बीतते हुए समय के ठंडे बस्ते में चली जाती हैं। यही हाल हरनंदी (हिंडन) नदी के लिए समय-समय पर चले स्वच्छता अभियानों की है। कभी तो उत्तर प्रदेश सरकार हरनंदी (हिंडन) नदी को स्वच्छ करने की बात करती है, लेकिन वह उसमें डलने वाले गंदे पानी के नालों तक को भी वह बंद नहीं करवा पाती है, कभी वह हम लोगों को सपना दिखाया जाता है कि हरनंदी (हिंडन) नदी को साफ करके उसके दोनों किनारे की तरफ भूमि को कब्ज़ा मुक्त करवाकर उस पर वृक्षारोपण करके भविष्य में भूमि को अवैध कब्जे से मुक्त रखने व जल प्रवाह को गति प्रदान करने का कार्य किया जायेगा। उत्तर प्रदेश सरकार ने सपना दिखाया था कि हरनंदी (हिंडन) नदी के दोनों किनारों पर सौंदर्यीकरण करके लभभग 37 किलोमीटर लंबा एक बहुत ही शानदार रिवर फ्रंट बनाया जायेगा। लेकिन अफसोस की बात यह है कि धरातल इनमें से कोई भी कार्य होता दिखता नज़र नहीं आता है। उसके उल्ट उत्तर प्रदेश सरकार का तंत्र तो हरनंदी (हिंडन) नदी के संदर्भ में एनजीटी के द्वारा दिये गये आदेशों तक का सही ढंग से पालन ना होने के चलते आयेदिन एनजीटी से फटकार तक खाता रहता है।

लेकिन आज हम लोगों के सामने विचारणीय तथ्य यह है कि जिस तरह से देश दुनिया में आबादी बहुत तेजी के साथ बढ़ रही है,  वहीं जीवन के लिए बेहद जरूरी स्वच्छ जल के स्रोत बहुत तेजी के साथ दिन प्रतिदिन घटते जा रहे हैं, आखिर हम समय रहते इस हालात पर नियंत्रण करने के लिए कार्य क्यों नहीं कर रहे हैं। जबकि देश व दुनिया का एक छोटा सा समझदार बच्चा भी यह अच्छी तरह से जानता है कि 'जल ही जीवन है' फिर भी हमारे देश का सिस्टम धरातल पर नदियों को स्वच्छ बनाने के कार्य की गति को ना जाने क्यों गति नहीं दे पा रहा है, देश में नदी स्वच्छता अभियान की गति ना जाने क्यों बेहद धीमी है। सरकार, सिस्टम व हम लोगों को समय रहते यह समझना होगा कि जिस तेजी के साथ देश में भूजल का स्तर गिर रहा है और इस्तेमाल योग्य स्वच्छ जल के स्रोत घट रहे हैं, भविष्य में हम लोगों को स्वच्छ पेय जल उपलब्ध करवाना किसी भी सरकार के सामने एक बहुत बड़ा चुनौती पूर्ण कार्य होगा, इसलिए समय से समझ जाये कि 'जल है तो ही कल है' भविष्य के लिए जल को स्वच्छ रखें और एक-एक बूंद बचाएं यह सरकार सिस्टम व हम सभी लोगों का दायित्व है।।

।। जय हिन्द जय भारत।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।

बुधवार, 13 जुलाई 2022

श्रीलंका - ग़लत नीतियों के चलते बर्बादी के कगार पर एक मुल्क!

श्रीलंका - ग़लत नीतियों के चलते बर्बादी के कगार पर एक मुल्क!

दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप
वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक 

हुँकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,
साँसों के बल से ताज हवा में उड़ता है,
जनता की रोके राह, समय में ताव कहाँ ?
वह जिधर चाहती, काल उधर ही मुड़ता है।।

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की 'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है' कविता की यह चंद पंक्तियां अक्सर मुझे उसे वक्त  जरूर याद आ आती हैं, जब देश या दुनिया के किसी भी क्षेत्र से आम जनमानस के द्वारा बड़े जन विद्रोह की कोई आहट सुनाई देने लगती है। आज हमारे देश भारत के पड़ोसी देश श्रीलंका के मौजूदा हालात पर 'दिनकर' की कविता की यह चंद पंक्तियां एकदम से सटीक बैठती है। क्योंकि आम जन मानस के बड़े पैमाने पर विद्रोह के चलते श्रीलंका में 13 जुलाई को आपातकाल घोषित कर दिया गया है, राष्ट्रपति के गुपचुप ढंग से देश छोड़कर भाग जाने के चलते लंका का राजनीतिक तंत्र पूरी तरह से ध्वस्त हो गया है, लेकिन फिर भी आम लोगों का आक्रोश जस का तस बना हुआ है, ऐसी आपात स्थिति में आम जनता के हाथों लंका का दहन होने से रोकने के लिए पुलिस-प्रशासन व सेना के कंधों पर देश के जानमाल को बचाने के लिए तत्काल ही मोर्चा सम्हालने की जिम्मेदारी आ गयी है, हालात चिंताजनक बने हुए हैं।
कभी दुनिया के विभिन्न देशों के पर्यटकों के लिए बेहद आकर्षण का केंद्र रहने वाला एक छोटा सा यह समुद्री द्वीप पर बसा देश श्रीलंका था। हालांकि दुनिया के अन्य देशों की तरह पिछले कुछ वर्षों से श्रीलंका भी कोरोना महामारी के जबरदस्त प्रकोप के चलते मंदी से ग्रस्त था, लेकिन मंदी के बावजूद भी कोई यह नहीं कह सकता था कि चंद माह के बाद ही यह देश अचानक दिवालिया होने के कगार पर खड़ा हो जायेगा। लेकिन ऐसा हो गया आज श्रीलंका अपने हुक्मरानों की ग़लत आर्थिक नीतियों, भ्रष्टाचार के चलते आज जबरदस्त आर्थिक संकट में फंसकर के दिवालिया होने के कगार पर पहुंच चुका है। देश की सत्ता पर आसीन चंद राजनेताओं की अदूरदर्शिता के चलते आज श्रीलंका राजनीतिक व आर्थिक अस्थिरता के मोर्चे पर एक अघोषित जंग लड़ रहा है। पिछले कुछ माह में ही श्रीलंका के हालात बेहद बद से बदतर हो चले गए हैं, अब तो श्रीलंका के आ​र्थिक हालात इस कदर बिगड़ गये हैं कि वहां के आम जनमानस के लिए भोजन व पानी समय से उपलब्ध करवाने का भी गंभीर संकट पैदा हो गया है। हालात इतने भयावह हो गये हैं कि श्रीलंका में आम जनमानस के रोजमर्रा के उपभोग की आम वस्तुओं की भी बाजार में किल्लत होने के चलते कालाबाजारी व महंगाई अपने चरम पर पहुंच गयी है, आज श्रीलंका में लगभग सभी वस्तुओं के मूल्यों ने महंगाई की चपेट में आकर के आसमान को छू लिया है।

वैसे श्रीलंका के संदर्भ में हम अगर कुछ आंकड़ों को देखें तो वर्ष 2020 के मानव विकास सूचकांक यानी ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स के आंकड़ों में जहां भारत दुनिया में 0.645 अंक के साथ 131वें स्थान पर था, वहीं इस सूची में श्रीलंका 0.782 अंक के साथ 72वें स्थान पर था। यानी की दुनिया के 189 देशों की सूची में श्रीलंका भारत से बहुत ऊपर था। यहां आपको बता दें कि मानव विकास सूचकांक मानव विकास के 3 मूल मानदंडों यानी जीवन प्रत्याशा, शिक्षा और प्रति व्यक्ति आय में देशों की औसत उपलब्धि को मापता है। इसके आंकड़ों को देखा जाये तो वर्ष 2020 में श्रीलंका की प्रति व्यक्ति आय भी भारत से कहीं बहुत ज्यादा थी। विचारणीय तथ्य यह है कि ऐसी मजबूत स्थिति होने के बाद भी दो वर्षों में ही श्रीलंका में ऐसा आखिरकार क्या हुआ कि एक हंसता खेलता हुआ खुशहाल देश अचानक तबाही के कगार पर आ गया। श्रीलंका के हालातों पर एक-एक पल की नजर रखने वाले देश-दुनिया के विशेषज्ञों के विचारों को देखें तो उन विचारों का मूल सार यह है कि श्रीलंका के  हुक्मरानों ने परिवारवाद व भ्रष्टाचार के चंगुल में फंसकर देश व अपनी बर्बादी की पटकथा की पूरी कहानी स्वयं ही अपने हाथों से लिखने का कार्य किया है, वह इस भयावह हालात के लिए किसी दूसरे व्यक्ति व देश को दोषी ठहरा कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकते हैं। पिछले कुछ वर्षों में श्रीलंका की सरकार में बैठे हुए हुक्मरानों की लगातार ग़लत आर्थिक नीतियों व जबरदस्त भ्रष्टाचार के चलते आज पूरा देश दिवालिया होने के कगार पर पहुंच गया है।


*"श्रीलंका के इस बेहद चिंताजनक हालात के लिए 
राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे और उनके भाई पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे को जिम्मेदार माना जा रहा है, क्योंकि चंद दिनों पहले तक भी राजपक्षे बंधुओं व सत्ता का आनंद ले रहे उनके परिजनों से पक्ष, विपक्ष व सिस्टम के लोगों में से कोई भी प्रश्न करने की ताकत नहीं रखता था। जिसके चलते लंबे समय से श्रीलंका के शासन व प्रशासन में ऊपर से नीचे तक पूरे तंत्र में देश व समाज के हित की जगह एक परिवार के प्रति जी-हुज़ूरी व्याप्त हो गयी थी और सिस्टम ने सही व गलत निर्णय पर अपने विचार ना देकर के केवल राजपक्षे बंधुओं की हां में हां मिलाना जारी रखा हुआ था। जिसकी वजह से शासक निरंकुश होते चले गये और राजनीतिक स्तर पर भ्रष्टाचार अपने चरम पर पहुंच गया था। आज श्रीलंका दुनिया में एक उदाहरण बन गया है कि कैसे वहां के राजनीतिक लोगों, उनके परिजनों, ब्यूरोक्रेसी व सिस्टम में बैठे चंद लोगों ने भ्रष्टाचार के दम पर देश की मजबूत जड़ों को दीमक की तरह खोखला करके चंद वर्षों में ही बर्बादी के कगार पर पहुंचा दिया है। लेकिन अब देश में धीरे-धीरे हालात खराब होने लगे और श्रीलंका के सिस्टम के सामने लोगों का पेट भरने की समस्या के साथ-साथ देश में विभिन्न प्रकार की सामाजिक, आर्थिक और शासन-प्रशासन से संबंधी गंभीर चुनौतियां खड़ी होने लगी, परंतु उस समय तक स्थिति को नियंत्रण करने के लिए बहुत देर हो चुकी थी। हालांकि इस सब हालात के बाद भी श्रीलंका का राजनीतिक नेतृत्व अपने तुगलकी फरमान जारी करने में ही व्यस्त रहा, वह देश व आम जनता की वास्तविक जरूरतों की अनदेखी करता रहा, जिसके फलस्वरूप श्रीलंका में बहुत बड़े स्तर पर जन विद्रोह हो गया है।"*

आज सरकार की विभिन्न ग़लत नीतियों के चलते ही श्रीलंका की सरकार पर 51 बिलियन डॉलर का बहुत भारी-भरकम कर्ज हो गया है, हालात यह हो गये है कि श्रीलंका की सरकार इसका ब्याज तक भी चुकाने में पूर्णतः नाकाम है। क्योंकि श्रीलंका में राजनीतिक भ्रष्टाचार बहुत बड़े पैमाने पर रहा है, उसने सुरसा राक्षसी के खुले हुए मुंह की तरह फैलकर श्रीलंका के आम जनमानस की खुशियों को लीलने का कार्य ही किया है। राजनीतिक व आर्थिक भ्रष्टाचार के चलते ही श्रीलंका के हुक्मरानों ने अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने की जगह उसको हर पल अपनी तिजोरी भरने के उद्देश्य से केवल फिजूलखर्च करने की राह पर धकेलने का कार्य किया था। श्रीलंका की सरकार ने अपनी आय में बढ़ोत्तरी करने के लिए पिछले दो-तीन वर्षों से कोई भी ठोस प्रयास धरातल नहीं किये थे, हुक्मरानों ने अपने शाही खर्चों में कटौती तक नहीं की थी। बल्कि ठीक उसके उल्टा चलकर वर्ष 2019 में अपनी लोकलुभावन चुनावी घोषणाओं को पूरा करने के उद्देश्य से टेक्स की दरों में 15 फीसदी की भारी कटौती कर दी, जिसके चलते अचानक से ही श्रीलंका सरकार की प्रति वर्ष आय में लगभग 60 हजार करोड़ रुपये का भारी भरकम कटौती हो गयी। लेकिन श्रीलंका की अदूरदर्शी सरकार ने समय रहते उस मोटे नुक़सान की भरपाई करने के लिए किसी भी ठोस विचार को धरातल पर अमलीजामा नहीं पहनाने का कार्य किया। जिसके नकारात्मक परिणामस्वरूप आज श्रीलंका एक-एक पैसे के लिए दुनिया के सामने हाथ फ़ैलाने के लिए मोहताज हो गया है। दुनिया के विभिन्न देशों से बार-बार मिलने वाली सहायता राशि व कर्ज की धनराशि के बावजूद भी आज के हालात में श्रीलंका की अर्थव्यवस्था को बचाने के रास्ते अब बेहद जटिल हो गये हैं। वैसे श्रीलंका में कोरोना महामारी और वर्ष 2019 के चर्चों पर हुए आतंकी हमलों के बाद से विदेशों से आने वाले पर्यटकों की रुचि बेहद कम हो गयी थी, जिसकी वजह से बड़े पैमाने पर पर्यटन क्षेत्र की आय पर निर्भर रहने वाले श्रीलंका में आम जनमानस व सरकार की आय में बेहद कमी आ गयी थी, जिसकी वजह से श्रीलंका के आर्थिक विकास का पहिया एक दम से रुक गया और देश को जबरदस्त मंदी के बेहद बुरे दौर की चपेट में आना पड़ गया है। आज श्रीलंका में एक तरफ तो खाद्यान्न वस्तुओं की जबरदस्त महंगाई ने वहां के सभी लोगों की कमर तोड़कर रख दी है, वहीं दूसरी तरफ देश की बेहद खस्ताहाल आर्थिक स्थिति के लेखा-जोखा ने श्रीलंका व दुनिया के अर्थशास्त्रियों व उसके सभी मददगार देशों की चिंता बढ़ा दी है। श्रीलंका में आलम यह हो गया है कि ईंधन, गैसोलीन व खाद्यान्नों आदि की कमी की वजह से लोगों को दो वक्त की रोटी खाने के भी अब तो लाले पड गये हैं। हालांकि वैसे देखा जाये तो श्रीलंका को एक उष्णकटिबंधीय देश होने के चलते खाद्यान्न की वस्तुओं के लिए कभी भी बहुत ज्यादा दूसरे देशों पर निर्भर नहीं होना चाहिए था, लेकिन वहां की अदूरदर्शी सरकार ने कभी इस पर विचार ही नहीं किया। देश को बर्बाद करने में रही-सही कसर को श्रीलंका की राजपक्षे सरकार पर दुनिया में पहला पूर्ण रूप से 100 फीसदी जैविक खेती करने वाला देश श्रीलंका को बनाने के भूत सवार होने ने पूरा करने का कार्य कर दिया। अचानक ही बिना किसी पूर्व तैयारी के वर्ष 2021 के अप्रैल माह में श्रीलंका के नासमझ हुक्मरानों ने अपने जैविक खेती के सपने को पूरा करने के लिए रसायनिक उर्वरकों के देश में आयात करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिये थे। जबकि जिस देश की 90 फीसदी से अधिक खेती पूर्णतः रसायनिक उर्वरकों पर निर्भर हो वहां पर बिना किसी चरणबद्ध तरीके के रसायनिक उर्वरकों पर अचानक से ही प्रतिबंध लगा देना, वहां की सरकार व सिस्टम का बेहद नासमझी भरा कदम था, ना जाने श्रीलंका के हुक्मरानों ने क्यों ऐसा करके रातों-रात ही श्रीलंका की अर्थव्यवस्था को ध्वस्त कर देने वाला आत्मघाती कदम स्वयं ही उठाने का कार्य किया था। क्योंकि देश में अचानक ही जैविक खेती पर जोर दिए जाने से आगामी तीन-चार वर्षों में फसलों की उपज की मात्रा में भारी कमी आना तय होता है, श्रीलंका के हठधर्मी हुक्मरानों के इस निर्णय से श्रीलंका व दुनिया के अन्य देशों के अर्थशास्त्री भी अचंभित थे। इसका सीधा असर तत्काल ही खाद्यान्न की वस्तुओं के उत्पादन पर जबरदस्त रूप से पड़ने लग गया था‌। वहीं यूक्रेन व रूस का युद्ध शुरू होने के चलते दुनिया में वैसे ही ईंधन व खाद्यान्न की सभी वस्तुओं के मूल्यों में एकदम से भारी बढ़ोत्तरी होने लगी थी, जिसके चलते पेट भरने के लिए जरूरी वस्तुओं की कीमतें पूरी दुनिया में चंद दिनों में ही 60 फीसदी तक मंहगी होकर के अचानक से ही आसमान छूने लगीं थीं। श्रीलंका में तो हालात और ज्यादा खराब हो गये थे लोगों को ईंधन, दूध, चावल आदि तक भी बहुत महंगी दरों पर मिलने लगा। श्रीलंका के हुक्मरानों के एक ग़लत निर्णय के चलते वहां पर अचानक ही स्थिति ऐसी बन गयी कि देश के आयात व निर्यात के संतुलन के बीच एक बहुत बड़ा फासला बन गया था, जिसके कारण से सरकार के पास विदेशी मुद्रा का कोष बहुत तेजी के साथ खत्म होने लगा। उसका अंतिम परिणाम यह हुआ कि आज श्रीलंका के नागरिक भूखे रहने के लिए मजबूर हो गये हैं, संयुक्त राष्ट्र संघ के वर्ल्ड फूड प्रोग्राम के आंकड़े देखें तो वह दर्शातें हैं कि 10 में 9 श्रीलंकाई परिवार एक समय का भोजन त्याग कर अपना व अपने परिजनों को पालने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जिसकी वजह से श्रीलंका में आजकल अराजकता की ऐसी भयावह स्थिति हो गयी है कि राष्ट्रपति भवन पर श्रीलंका की आम जनता का पूर्णतः कब्जा हो गया है। राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे के बारे में आशंका व्यक्त की जा रही है कि वह शायद देश छोड़कर भागने में सफल हो गये हैं, वह मालदीव में कहीं सुरक्षित जगह पर छिप गये हैं। वहीं सूत्रों से खबर आ रही हैं कि फिलहाल श्रीलंका के पास 25 मिलिय़न डॉलर मात्र का विदेशी मुद्रा भंडार बचा है, जो कि रोजमर्रा की  जरूरतमंद वस्तुओं के आयात के लिए नाकाफी है, जिसकी वजह से श्रीलंका ईंधन, दवाई, खाद्यान्न आदि जैसी रोजमर्रा की जरूरत की तमाम वस्तुओं का भी अब आयात करने की स्थिति में नहीं रहा है। देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान छू रही हैं, ईंधन का स्टॉक पूरी तरह से खत्म होने की कगार पर पहुंच गया है, जरुरी समय के लिए बिजली और फ्यूल को बचाने के लिए अब स्कूल और दफ्तरों तक को बंद कराया जा रहा है। देश में व्याप्त इस प्रकार की बेहद विकट आर्थिक परिस्थितियों के चलते श्रीलंका की मुद्रा का 80 फीसदी तक अवमूल्यन हो चुका है, एक अमेरिकी डॉलर अब लगभग 360.65 श्रीलंकाई रुपए तक का हो गया है। जिसके चलते वर्ष 2009 तक दशकों लंबे चले गृहयुद्ध को झेल चुका श्रीलंका अब हुक्मरानों के गलत फैसलों के चलते एक बहुत ही गंभीर आर्थिक व राजनीतिक संकट में फंस कर पुनः गृहयुद्ध के मुहाने पर खड़ा होकर के अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। हालांकि दुनिया के अर्थशास्त्रियों को श्रीलंका के पुनः अपने पैरों पर खडे होने की पूरी  उम्मीद है, क्योंकि श्रीलंका के हिस्से में दुनिया का एक बहुत ही व्यस्त समुद्री मार्ग आता है, जो कि भविष्य उसकी अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए संजीवनी बूटी साबित हो सकता है। लेकिन उसके लिए देश में पूर्ण निष्ठा व ईमानदारी से श्रीलंका का नेतृत्व करने वाला एक योग्य देशभक्त राजनेता लंकावासियों को चाहिए, तब ही देश व उनका भविष्य पुनः पटरी पर आकर सामान्य हो सकता है।

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।