मंगलवार, 8 नवंबर 2022

शख्सियत - संकट के समय में संकटमोचक की भूमिका का बार-बार निर्वहन करते 'जनरल वीके सिंह'

शख्सियत - संकट के समय में संकटमोचक की भूमिका का बार-बार निर्वहन करते 'जनरल वीके सिंह'

दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप
वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक
[बाक्स]

मॉं भारती की सेवा के लिए समर्पित योद्धा 'जनरल वीके सिंह'

कमांडो से सेनाध्यक्ष अब एक सफल राजनेता 'जनरल वीके सिंह'

देश के दुश्मनों के साथ-साथ सियासी रणभूमि में भी विरोधियों को हराने में माहिर 'जनरल वीके सिंह' 


हमारे यहां एक कहावत बहुत ही प्रचलित है कि एक फौजी अपने पूरे जीवन भर फौजी ही रहता है।
अपने सेवाकाल में एक फौजी के लिए देश के प्रति जो सेवा और समर्पण के भाव का जज्बा होता है, वही भाव सेवानिवृत्त होने के बाद भी जीवन काल में बिल्कुल भी कम नहीं होता है। देश में ऐसी ही एक शानदार व्यक्तित्व वाली बेहद प्रभावशाली शख्सियत हैं पूर्व सेनाध्यक्ष व मौजूदा केन्द्रीय मंत्री 'जनरल वीके सिंह' की, वह सेना में कमांडो व सेनाध्यक्ष के रूप मां भारती की सेवा करते हुए देश के दुश्मनों से टकराने में भी हमेशा आगे रहे हैं और सियासी रणभूमि में भी विरोधियों को हराने में आगे रहे हैं। उन्होंने सेना में सेवाकाल के दौरान राजस्थान के तपते रेगिस्तान से लेकर जम्मू कश्मीर व नार्थ ईस्ट भारत की जमा देने वाली बर्फ से ढकी दुर्गम पहाड़ियों और देश की समुद्री सरहद वाले क्षेत्रों में भी सफलतापूर्वक कार्य किया। वह आयेदिन चीन से होने वाली झड़प के सैन्य मोर्चा पर भी काम करते हुए सफल रहे, वहीं जम्मू-कश्मीर की दुर्गम पर्वत मालाओं पर भी उन्होंने देश के दुश्मनों के खिलाफ समय-समय पर सैन्य अभियान चलाकर आतंकियों का चुन-चुन कर सफलतापूर्वक सफाया करवाने का कार्य किया। उन्होंने बंग्लादेश के मुक्ति संग्राम में भी भाग लिया, वहीं श्रीलंका में शांति स्थापित करने के लिए भी कार्य किया। वह देश-दुनिया की भूमि पर एक भारतीय सैन्य अधिकारी के रूप में अपने विभिन्न अभियानों को सफलतापूर्वक निभाने के बाद सेना के सर्वोच्च पद से सेवानिवृत्त हुए। लेकिन सेवानिवृत्त होने के वाबजूद भी एक जांबाज योद्धा की तरह ही 'जनरल वीके सिंह' संकटमोचक के रूप में देश की सेवा करने के लिए आज भी पूरी निष्ठा, ईमानदारी व तत्परता से निरंतर उपलब्ध हैं। वह सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद भी देश के एक देशभक्त व जागरूक आम नागरिक के रूप में आम जनमानस के सरोकारों के विभिन्न ज्वलंत मुद्दों को लेकर के तत्कालीन मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार से भी टकराने में आगे रहे हैं। अब वह एक राजनेता के रूप में उत्तर प्रदेश की गाजियाबाद लोकसभा से सांसद के रूप में दायित्व का निर्वहन कर रहें हैं। 'जनरल वीके सिंह' केंद्र सरकार में मंत्री भी हैं और उनकी गिनती देश के एक ऐसे राजनेता के रूप में होती है, जो नरेंद्र मोदी सरकार में मिलने वाली प्रत्येक छोटी हो या बड़ी किसी भी जिम्मेदारी का निर्वहन करने में भी हमेशा आगे ही रहते हैं। यहां आपको बता दें कि 'जनरल वीके सिंह' ने 31 मार्च 2010 को भारतीय सेना के बेहद महत्वपूर्ण सर्वोच्च पद थल सेना के सेनाध्यक्ष के रूप में जिम्मेदारी को संभालने का कार्य किया था, वह देश के ऐसे पहले कमांडो हैं जो सेनाध्यक्ष के सर्वोच्च पद तक पहुंचे और वह 31 मई 2012 को एक इतिहास में दर्ज होने वाले बेहद सफल सेनाध्यक्ष के रूप में इस पद से सेवानिवृत्त हो गए थे। 'जनरल वीके सिंह' को सेना में सेवा काल के दौरान सेवा के लिए परम विशिष्ट सेवा मेडल, अति विशिष्ट सेवा मेडल और युद्ध सेवा मेडल आदि से समय-समय पर नवाजा गया है। 'जनरल वीके सिंह' ने मार्च 2012 में सेना में व्याप्त समस्याओं व खरीद में भ्रष्टाचार के मसलों को अपने साक्षात्कार व पत्र के माध्यम से दमदार ढंग से उठाने का कार्य किया था। उन्होंने संसाधनों व आधुनिक तकनीक की जबरदस्त कमी से जूझ रही भारतीय सेना की बेहद गंभीर हो चुकी समस्या को तुरंत पहचान कर तत्कालीन रक्षामंत्री व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी समस्या से अवगत करवाने का साहसिक कार्य किया था। उन्होंने देश की सेना के टैंकों में गोला-बारूद खत्म होने के कगार पर है और सिस्टम के बेहद ढुलमुल रवैए से अप्रचलित तकनीक फौजियों के जीवन व देश की सुरक्षा को खतरे में डाल रही है, जैसे बहुत सारे सेना व देश की सुरक्षा के हित से जुड़े हुए बेहद महत्वपूर्ण ज्वलंत मसलों को उठाकर के कुंभकर्णी नींद लेने में व्यस्त देश के कर्ताधर्ताओं व नीतिनिर्माताओं को समय रहते हुए जगाने कार्य किया था।

सेना से सेवानिवृत्त होने के पश्चात 'जनरल वीके सिंह' ने देश की बेहद मजबूत नींव की जड़ों को  खोखला कर रहे अपने चरम पर पहुंच चुके भ्रष्टाचार के मुद्दों को उठाने का कार्य शुरू किया था, भ्रष्टाचार विरोधी व जनहित के बहुत सारे मसलों को लेकर के वह देश में तत्कालीन यूपीए सरकार के खिलाफ चल रहे अन्ना हजारे के आंदोलन को अपना समर्थन देकर उसमें भाग लेने का कार्य किया था। देश के सियासी गलियारों में ऐसा माना जाता है कि उस वक्त अन्ना हजारे के आंदोलन को सफल बनाने में 'जनरल वीके सिंह' की भी बेहद अहम व महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। इसके पश्चात 'जनरल वीके सिंह' मार्च 2014 में अपनी आधिकारिक रूप से राजनीतिक पारी की शुरुआत करते हुए भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गये थे और वर्ष 2014 के लोकसभा के चुनावों में वह उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद लोकसभा क्षेत्र से चुनावी रणभूमि में उतर गये थे। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में 'जनरल वीके सिंह' ने कांग्रेस के दिग्गज स्टार उम्मीदवार प्रसिद्ध फिल्म स्टार राज बब्बर को भारी मतों से हराने का कार्य किया था, उस वक्त 'जनरल वीके सिंह' को कुल 7 लाख 58 हजार 4 सौ 82 वोट मिले थे और राज बब्बर दूसरे नंबर पर रहे, 'जनरल वीके सिंह' ने 5 लाख 67 हजार 2 सौ 60 मतों के भारी अंतर से चुनावी जीत हासिल करके एक रिकॉर्ड बनाने का कार्य किया था। जिसके पश्चात उन्होंने नरेंद्र मोदी सरकार में विदेश राज्य मंत्री, उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के विकास राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) के रूप में कार्य किया था। वहीं गाजियाबाद लोकसभा क्षेत्र से ही वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों में 'जनरल वीके सिंह' को 9 लाख 44 हजार 5 सौ 03 वोट मिले थे। उन्होंने गठबंधन प्रत्याशी सुरेश बंसल को 5 लाख 01 हजार 5 सौ मतों के भारी अंतर से हराकर जीत दर्ज करने का कार्य किया था, फिलहाल 'जनरल वीके सिंह' केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग राज्य मंत्री के साथ-साथ नागरिक उड्डयन मंत्रालय में राज्य मंत्री के रूप में अपने बेहद महत्वपूर्ण दायित्व का निर्वहन अपनी लोकसभा के लोगों का पूरी तरह से ध्यान रखते हुए सफलतापूर्वक निर्वहन करने का कार्य कर रहे हैं।

*" 'जनरल वीके सिंह' ने अपनी विशिष्ट कार्यशैली, मेहनत व जुझारू तेवरों का समय-समय पर देश व दुनिया को बखूबी  परिचय देना का कार्य किया है। वह एक ऐसे जांबाज जिंदादिल योद्धा हैं जो चाहे वर्दी में रहे हों या फिर देश के एक आम आदमी के लिबास में या देश में एक राजनेता के रूप में हमेशा मान सम्मान व स्वाभिमान के साथ एक जिम्मेदार नागरिक की तरह अनुशासित जीवन यापन करते हुए मां भारती की सेवा करने के लिए तत्पर तैयार खड़े रहते हैं।"*
'जनरल वीके सिंह' ने सेना में रहते हुए एक आम सैनिक से लेकर सर्वोच्च पदों पर आसीन जांबाजों की विकट परिस्थितियों में काम करने की क्षमता से देश दुनिया को अवगत करवाने का कार्य बखूबी किया था। उन्होंने देश के सामने विकट परिस्थितियों में मां भारती की सेवा का कार्य करने वाले सेना के जांबाज़ सैन्यकर्मियों के वर्षों से लंबित दुख-दर्द व समस्याओं को लाकर के उनके निदान के लिए अपने कार्यकाल में धरातल पर बहुत सारे सकारात्मक प्रयास किये थे। उन्होंने सेनाध्यक्ष के रूप में जंग लगे दशकों पुराने खस्ताहाल हथियारों के भरोसे संघर्ष कर रही वीर जांबाज़ भारतीय सेना के आधुनिकीकरण करने पर पूरा जोर दिया था और उसके लिए धरातल पर कारगर कार्य करने का काम किया था। 'जनरल वीके सिंह' ने सेना में सेवा के उस काल खंड के दौरान सेना के शीर्ष व निचले स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार की आयेदिन पोल खोलकर भ्रष्टाचार की गंदगी को साफ करने का कार्य बखूबी से किया था, हालांकि उनके इस साहसिक कदम ने उस वक्त देश-दुनिया की मीडिया में बहुत ही जबरदस्त चर्चा बटोरने का कार्य भी किया था। उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान भारतीय सेना की रीढ़ माने जाने वाले लाखों पैदल सैनिकों के दर्द को समझा, क्योंकि वह बेहद निम्नस्तर की गुणवत्तापूर्ण वाले कपड़ों और घटिया उपकरणों आदि से लैस थे, उनको बेहतर आधुनिक संसाधनों से सुसज्जित करवाने की पहल करने के एक बहुत बड़े असंभव कार्य को दृढ़ संकल्प के दम पर 'जनरल वीके सिंह' ने संभव करके देश-दुनिया को दिखाया था, क्योंकि देश की सुरक्षा से जुड़ा यह महत्वपूर्ण कार्य भी ग़लत नीतियों, भ्रष्टाचार व लालफीताशाही के चलते दशकों से फाइलों से बाहर निकल कर धरातल पर मूर्त रूप लेने के लिए तैयार ही नहीं था। सबसे बड़ी बात यह है कि 'जनरल वीके सिंह' ने ही देश के तत्कालीन नीति निर्माताओं को याद दिलवाने का कार्य किया कि हमारी जांबाज सेना के पास अब मात्र चंद दिनों की ही युद्ध लड़ने की सामग्री बची है, जिसके बाद से ही दशकों से सोए हुए सिस्टम अपनी कुंभकर्णी नींद से जागा और देश में सेना के लिए एकाएक युद्ध सामग्री खरीद कर एकत्र करने के लिए विभिन्न रक्षा सौदों को धरातल पर अंतिम रूप देने में बहुत तेजी आयी थी। 

*"वैसे देखा जाए तो भारतीय सेना को 21वीं सदी की अत्याधुनिक सेना बनाने की मजबूत नींव रखने का श्रेय 'जनरल वीके सिंह' को ही जाता है, इस उपलब्धि के लिए उनका नाम पर हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया है, उनको हमेशा भारतीय सेना के आधुनिकीकरण के लिए याद रखा जायेगा।"*

जनरल वीके सिंह' ने समय-समय पर दुनिया के अलग-अलग देशों की युद्धग्रस्त व हिंसाग्रस्त विदेशी भूमि पर भारत सरकार के द्वारा देश के लोगों को वहां से निकालने के लिए चलाए गये बेहद जटिल व चुनौतीपूर्ण राहत अभियानों को अपनी कुशल कारगर रणनीति व नेतृत्व क्षमता के दम पर बेहद विपरीत परिस्थितियों में भी सफलतापूर्वक चलाकर-

*"देश दुनिया को यह संदेश देने का कार्य किया है कि ‘‘भारत का एक फौजी, जीवनपर्यंत हमेशा फौजी ही रहता है, वह विकट से विकट परिस्थितियों में देश की सेवा करने के लिए अपनी जान की परवाह किए बिना ही 'जनरल वीके सिंह' की तरह तत्पर खड़ा रहता है।"*

'जनरल वीके सिंह' ने युद्धग्रस्त यमन से भारतीयों को निकलने के अभियान की निगरानी करने का कार्य सफलतापूर्वक किया था। यमन में मार्च 15 में गृह युद्ध छिड़ने के कारण संकट की स्थिति पैदा हो जाने पर जब भारत सरकार ने देखा कि यमन में जगह-जगह लगभग 4000 भारतीयों को तत्काल वहां से सुरक्षित निकालने की जरूरत है। तो उस वक्त विदेश मंत्रालय, भारतीय वायु सेना, भारतीय नौसेना और एयर इंडिया ने 'जनरल वीके सिंह' की देखरेख में मिलकर भारतीय नागरिकों को निकालने की एक संयुक्त योजना बनाई थी। भारतीय नौसेना के जहाजों ने भारतीयों को यमन के बंदरगाहों से जिबूती पहुंचाया और एयर इंडिया ने साना में फंसे भारतीयों को जिबूती पहुंचाया, भारतीय वायु सेना ने भारतीय नागरिकों को जिबूती से कोच्चि और मुंबई पहुंचाने के लिए तीन सी-17 वायुयानों को तैनात किया। इस अभियान से 4,741 भारतीय नागरिकों के साथ-साथ अत्यंत कठिन परिस्थितियों में 48 देशों के 1,947 विदेशी नागरिकों को भी सुरक्षित बाहर निकाला गया था, जिसको अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने बेहद सराहने का कार्य किया था। वहीं देश की जनता ने 'जनरल वीके सिंह' को संकटमोचक की उपाधि से नवाजने का कार्य किया था।

वहीं 13 जुलाई, 2016 को केंद्र सरकार ने जब हिंसाग्रस्त दक्षिण सूडान में जारी गृहयुद्ध में फंसे भारतीयों को सुरक्षित निकालने के उद्देश्य से एक बड़ा "ऑपरेशन संकटमोचन" शुरू किया था। तो उस वक्त भी इस बेहद ख़तरनाक अभियान की अगुवाई देश के संकटमोचक योद्धा बन चुके 'जनरल वीके सिंह' ने ही की थी, 14-15 जुलाई 2016 को इस अभियान के तहत दक्षिण सूडान के शहर जूबा के लिए दो सी-17 सैन्य परिवहन विमानों से 153 भारतीयों और नेपाल के 2 नागरिकों को हिंसाग्रस्त इलाकों से सफलतापूर्वक निकाला गया था, यह अभियान राजनेता के रूप में 'जनरल वीके सिंह' के नाम पर एक बहुत बड़ी उपलब्धि के रूप में इतिहास के पन्नों में दर्ज है।

'जनरल वीके सिंह' ने कुछ माह पूर्व फरवरी 2022 में भी भारत सरकार ने जब रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते यूक्रेन में फंसे भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकाल कर लाने के लिए 'ऑपरेशन गंगा' चलाया था, उस वक्त भी 'जनरल वीके सिंह' ने पोलैंड में जाकर भारतीय नागरिकों को युद्ध भूमि से सुरक्षित सफलतापूर्वक निकालने का कार्य किया था, विदेशी धरती पर फंसे भारतीयों को सुरक्षित देश वापस लाने के अभियान चलाने के 'जनरल वीके सिंह' सबसे बड़े विशेषज्ञ बन गये हैं।
'जनरल वीके सिंह' के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खूबी यह है कि
देश-दुनिया में समय-समय पर अपनी विभिन्न प्रकार की भूमिका को सफलतापूर्वक निभाने के साथ-साथ भी वह हमेशा अपने लोकसभा क्षेत्र गाजियाबाद की जनता से सीधे जुड़े रहते हैं, वह नियमित रूप से क्षेत्रवासियों के सुख व दुःख दोनों में शामिल होते रहते हैं। उन्होंने अपने छोटे से कार्यकाल में गाजियाबाद जनपद के विकास को विश्व स्तरीय नये आयाम देने के लिए निरंतर केंद्र व प्रदेश सरकार के स्तर पर प्रयास करके क्षेत्र में विकास कराने का कार्य किया है। 'जनरल वीके सिंह' ने गाजियाबाद जनपद को विश्व स्तरीय दिल्ली मेरठ एक्सप्रेसवे की सौगात देकर के, ना केवल जाम के झाम से रोजाना जूझने वाली उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड की जनता को बहुत बडी राहत दिलवाने का कार्य किया है। बल्कि उन्होंने अपने लोकसभा क्षेत्र में हिंडन एयरपोर्ट का निर्माण करवा कर विभिन्न शहरों के लिए फ्लाइट चलवाने का कार्य किया है। उन्होंने गाजियाबाद से लखनऊ तक ग्रीनफील्ड इकोनॉमिक कॉरिडोर के निर्माण को मंजूरी दिलवाने का कार्य किया है, इस 380 किलोमीटर लंबे कॉरिडोर के बनने के बाद गाजियाबाद, हापुड़ और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बड़े हिस्से से जुड़े लोगों को यमुना एक्सप्रेसवे पर जाने की जरूरत नहीं होगी और गाजियाबाद से लखनऊ के बीच की दूरी 3 से 4 घंटे में कार से तय की जा सकती है। उनके प्रयासों से ही एनएच-9 का दिल्ली से पिलखुवा तक 14 लेन हाईवे का चौड़ीकरण एवं सुदृढ़ीकरण का कार्य को लगभग 4200 करोड़ की लागत से पूर्ण किया गया है। उनके प्रयासों से ही एनएच-58 का चौड़ीकरण हुआ। उनके प्रयासों से ही एनएच-9, दिल्ली मेरठ एक्सप्रेसवे और ईस्टन पेरीफेल को बनाते समय गाजियाबाद लोकसभा क्षेत्र की क्षतिग्रस्त 20 सड़कों का एनएचएआई द्वारा निर्माण किया जा रहा है। उन्होंने दिल्ली ज्ञानी बोर्ड से लाल कुँआ (पुराना जीटी रोड़) का वन टाइम सौन्दर्यकरण के लगभग 14 किलोमीटर का निर्माण कार्य एनएचएआई से स्वीकृत करवाया है। उन्होंने दिल्ली-सहारनपुर एनएच-709बी का निर्माण कार्य, गाजियाबाद को जोड़ते हुए ईस्टन पेरीफेल एक्सप्रेसवे का निर्माण कार्य, दिल्ली से मेरठ पुराने एनएच-58 को जाम की समस्या से मुक्ति दिलाने के लिए सौंदा अपर गंगनहर से नाले की पटरी व सुल्तानपुर माईनर का बांई पटरी का चौड़ीकरण कर वाया काकड़ा, साई मंदिर सलेमाबाद की झाल, मिलक चाकपुर होते हुए पाईप लाईन को क्रास करते हुये भोवापुर रोड़ से राजनगर एक्सटेंशन तक के मार्ग का निर्माण कार्य स्वीकृत करवाया। उन्होंने पाईप लाईन रोड का निर्माण कार्य, बंथला फलाईओवर का निर्माण कार्य, लोनी और मुरादनगर को जोड़ने के लिए हिंडन नदी पर दो पुलों का निर्माण कार्य, दिल्ली खजुरी पुस्ता रोड़ से लोनी शहर तक डबल रोड़ का निर्माण कार्य, दशकों से लंबित चली आ रही विजय नगर लाइनपार क्षेत्र की जनता की मांग को पूरा करवाते हुए विजयनगर लाईनपार क्षेत्र से गाजियाबाद शहर को जोड़ने के लिए गाजियाबाद रेलवे स्टेशन पर  आरओबी (ROB) का निर्माण कार्य शुरू करवाया। गाजियाबाद में रेलवे स्टेशन को हवाई अड्डे की तर्ज पर बनाने की स्वीकृति, एलीवेटेड, रिज़नल रैपिड़ रेल का निर्माण कार्य, मुरादनगर में ऑर्डिनेंस फैक्ट्री पर आरओबी (ROB) का निर्माण कार्य, इंदिरापुरम में कैलाश मानसरोवर भवन का निर्माण, इसके साथ ही 'जनरल वीके सिंह' अपने संसदीय क्षेत्र में शिक्षा, सुरक्षा, चिकित्सा, खेलकूद आदि के लिए बड़े पैमाने पर कार्य करके लोकसभा क्षेत्र के सर्वांगीण विकास के लिए निरंतर प्रयास कर रहे हैं।

हालांकि निष्पक्ष व दलगत राजनीति से ऊपर उठकर आज के दौर के नेताओं के व्यवहार का आंकलन किया जाए तो भारतीय राजनीति में ऐसी बहुत ही कम शख्सियत देखने को मिलती हैं जोकि केन्द्रीय मंत्री के रूप में भी अपनी अधिकांश जिम्मेदारियों का सफलतापूर्वक निर्वहन भी करते हो और साथ ही साथ वह अपनी लोकसभा क्षेत्र में भी आम जनमानस से लगातार जनसंपर्क करके उनकी समस्याओं का निस्तारण व क्षेत्र के विकास के लिए निरंतर कार्य करते हो। लेकिन इस मामले में जनता की अदालत में 'जनरल वीके सिंह' इन दोनों मापदंड पर पूर्ण रूप से खरें उतरते हैं। वह अपनी मातृभूमि व कर्मभूमि दोनों की सेवा को सबसे बड़ी अपनी जिम्मेदारी मानकर हर वक्त उसके लिए तत्पर खड़े रहते हैं, भारतीय राजनीति के आज के दौर में ऐसे शानदार व्यक्तित्व वाली बेहतरीन शख्सियत विरले ही देखने को मिलती है।

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।

गुरुवार, 27 अक्टूबर 2022

शख्सियत - राजनीति में विरले ही मिलते हैं "रमेश चन्द्र कौशिक" जैसी शख्सियत वाले लोग दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक

शख्सियत - राजनीति में विरले ही मिलते हैं "रमेश चन्द्र कौशिक" जैसी शख्सियत वाले लोग

दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप
वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक 

अपनी कार्यशैली के दम पर लोगों के दिलों में राज करते सोनीपत सांसद "रमेश चंद्र कौशिक"


अपने व्यवहार व काम के दम पर लोकप्रिय जननेता की छवि बनाने में सफल "रमेश चन्द्र कौशिक"

अपने दायित्व को पूरी निष्ठा व ईमानदारी से निभाने के लिए जाने जाते हैं "रमेश चन्द्र कौशिक"

अपने काम व छवि के दम पर जातिगत समीकरण को ध्वस्त करने में हर बार चुनावी रणभूमि में सफल रहते हैं "रमेश चन्द्र कौशिक" 

देश की राजधानी दिल्ली से एक दम सटी हुई बेहद महत्वपूर्ण माने जाने वाली औधोगिक नगरी वाली सोनीपत लोकसभा के क्षेत्र का हरियाणा की राजनीति में हमेशा दबदबा रहा है। अपनी जातिगत, भौगोलिक व औधोगिक खूबी के चलते यह लोकसभा क्षेत्र राज्य व देश की राजनीति में बेहद अहम महत्वपूर्ण स्थान हमेशा से ही रखता आया है। वैसे तो इस सीट के अंतर्गत नौ विधानसभा क्षेत्र आते हैं, जिसमें छह सीटें गन्नौर, राई, खरखौदा, सोनीपत, गोहाना और बरौदा सोनीपत जनपद के अन्तर्गत आती हैं, वहीं बाकी तीन जींद, जुलाना और सफीदों जींद जनपद के अन्तर्गत आती हैं। 10 लोकसभा सीट वाले हरियाणा में सोनीपत लोकसभा क्षेत्र को जाटलैंड के प्रभाव वाली दूसरी सबसे अहम सीट माना जाता है, इस सीट पर जाट मतदाता अकेले ही निर्णायक स्थिति में हैं। लेकिन यहां पर राजनीतिक दृष्टिकोण से विचारणीय तथ्य यह भी है कि इस सीट से जातिगत समीकरणों को ध्वस्त करके अभी तक तीन बार गैर जाट प्रत्याशी भी सांसद निर्वाचित हो चुके हैं, इस सीट से वर्ष 1996 में अरविंद शर्मा निर्दलीय के बाद वर्ष 2014 व 2019 में लगातार दो बार से भाजपा से रमेश चन्द्र कौशिक निरंतर चुनावी रणभूमि में सफलता हासिल कर रहें हैं। 16वीं लोकसभा के चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के जगबीर सिंह मलिक को हराया था। वहीं 17वीं लोकसभा के पिछले चुनाव में तो रमेश चन्द्र कौशिक ने कांग्रेस के दिग्गज राजनेता व हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भुपेंद्र सिंह हुड्डा को चुनावों में भारी मतों से सियासी पटखनी देने का कार्य किया था।

*"इस क्षेत्र के चुनावी कुरुक्षेत्र के हर गुणा-भाग से वाफिक दिग्गजों की मानें तो भाजपा के सांसद रमेश चन्द्र कौशिक ने इस सोनीपत संसदीय क्षेत्र में अपनी दिन-रात की मेहनत, व्यवहार कुशलता, छवि व दमदार कार्यशैली के दम पर जातिगत समीकरण को ध्वस्त करने में बहुत बड़ी महारत हासिल कर रखी है, वह अपने व्यवहार के दम पर क्षेत्र में जातियों का बंधन तोड़कर के सभी के बीच लोकप्रिय हैं।"*

हरियाणा की राजनीति में और सोनीपत लोकसभा के क्षेत्र में रमेश चन्द्र कौशिक की जबरदस्त लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि जाटलैंड के गढ़ में ही उन्होंने वर्ष 2019 में संपन्न हुए 17वीं लोकसभा के चुनाव में हरियाणा के दिग्गज राजनेता भुपेंद्र सिंह हुड्डा को 1 लाख 64 हजार 864 वोटों के बड़े अंतर से हरा कर के जीता था, आज उनकी मज़बूत पैठ क्षेत्र में हर जाति व धर्म के लोगों के बीच में है। हालांकि चुनावी रणभूमि में जीत हार जनता के हाथ में होती है वह जिसे चाहे जो बना देती है, लेकिन क्षेत्र में एक लोकप्रिय जननेता के रूप में स्थापित होना आज के दौर की राजनीति में भी किसी भी राजनेता के लिए एक सबसे बड़ी व वास्तविक उपलब्धि होती है, देश व प्रदेश की राजनीति में क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले एक सांसद के रूप में रमेश चन्द्र कौशिक क्षेत्र में लोकप्रिय जननेता के रूप में पूरी तरह से स्थापित हो चुके हैं, आज क्षेत्र के लोग उनको विकास पुरुष मानते हैं क्योंकि उन्होंने सोनीपत लोकसभा क्षेत्र को केजीपी और केएमपी की बड़ी सौगात दिलवाने का कार्य किया। उन्होंने ही दशकों से खस्ताहाल रहे बागपत से रोहतक नेशनल हाईवे और सोनीपत से जींद मार्ग को भी नेशनल हाईवे घोषित करवा करके उसके चौड़ीकरण का काम करवा कर आम जनमानस के जीवन पथ को सुगम बनाने का कार्य किया। उन्होंने जींद में बाइपास निर्माण और सोनीपत-जींद रेलवे लाइन का काम पूरा करवाकर तीन ट्रेन चलवाने का भी काम किया था। उनके प्रयास से ही अब गन्नौर में रेल कोच कारखाना बनकर तैयार खड़ा है, जिससे क्षेत्र में रोजगार के काफी सारे अवसर पैदा होंगे। उनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह संसद में भी अपना पूरा समय देते हैं, वहीं साथ ही साथ व क्षेत्र की जनता के बीच भी उपस्थित रहकर के निरंतर जनता के साथ बेहतर जन संपर्क बनाकर रखते हैं‌, जो हर राजनेता के बस की बात नहीं है। यहां आपको बता दें कि रमेश चन्द्र कौशिक का जन्म 3 दिसम्बर 1956 को सोनीपत लोकसभा क्षेत्र के समासपुर गांव में ही हुआ था, उन्होंने सोनीपत के हिन्दू कॉलेज और उत्तर प्रदेश के मेरठ विश्वद्यालय से बीए और एलएलबी की शिक्षा प्राप्त की थी और फिर वह परिवार के जीवन यापन के लिए वकालत करने में लग गये थे। लेकिन समय को कुछ और ही मंजूर था वकालत करते हुए जब उनका आयेदिन तरह-तरह की जन समस्याओं से जब वास्ता पड़ने लगा तो उन्हे इनसे निपटने के लिये राजनीति सबसे कारगर व सशक्त माध्यम लगा और वह क्षेत्र की सक्रिय राजनीति में कूद पड़े। हालांकि वर्ष 1991 में उन्हें पहली बार हरियाणा विकास पार्टी के टिकट पर कैलाना हलके (वर्तमान में गन्नौर) से टिकट मिला था, लेकिन पहली बार में किस्मत ने उनका साथ नहीं दिया, उनको चुनावी रणभूमि में हार का सामना करना पड़ा था। लेकिन कुछ वर्षों के बाद 1996 में कैलाना हलके से रमेश चन्द्र कौशिक चुनाव में विजयी होकर के विधायक बने। उसके बाद जब राज्य में हरियाणा विकास पार्टी (हविपा) की बंसीलाल के नेतृत्व में सरकार बनी तो उसमें रमेश कौशिक का कद दिन प्रतिदिन तेजी के साथ बढ़ता चला गया। वह 1996-97 में हरियाणा सरकार में सीपीएस रहे, तो 1997 में उनको राज्यमंत्री बनाया गया था। लेकिन उनको  चंद महीनों के बाद ही बंसीलाल ने कैबिनेट मंत्री बनाते हुए श्रम समेत तीन अहम मंत्रालय सौंपने का कार्य किया था। उन्होंने राजनीति में अपने व्यवहार व कार्यशैली के दम पर अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाने का काम किया। दूसरी बार वह वर्ष 2005 में कांग्रेस के टिकट पर राई सीट से विधायक बने और भुपेंद्र सिंह हुड्डा की सरकार में मुख्य संसदीय सचिव बनने। लेकिन अब क्षेत्र व कांग्रेस पार्टी में उनकी तेजी से बढ़ती लोकप्रियता से कांग्रेस पार्टी के अंदर ही उनके कई राजनीतिक विरोधी पैदा हो गये थे, जिसके चलते ही वर्ष 2009 के विधानसभा चुनावों में मौजूदा विधायक होते हुए भी कांग्रेस पार्टी ने उनका टिकट काट दिया। इसी राजनीतिक उठापटक के चलते वर्ष 2013 में कांग्रेस पार्टी को छोड़कर वह भाजपा में शामिल हो गये। वर्ष 2014 के लोकसभा के चुनावों में भाजपा ने उन्हें सोनीपत संसदीय क्षेत्र से प्रत्याशी बनाया, इस चुनाव में सभी को लगता था कि मोदी लहर के बावजूद भी जाटलैंड की इस बेहद अहम सीट पर भाजपा की जीत बेहद मुश्किल है, लेकिन जब चुनाव परिणाम आये तो भाजपा प्रत्याशी के रूप में रमेश चन्द्र कौशिक ने कांग्रेस पार्टी के जगबीर सिंह मलिक को 77 हजार 414 वोटों से हराया, उस वक्त वह पहली बार सांसद चुने गए थे, जो कि उनकी पूर्व में की गयी क्षेत्र में जनसेवा का एक बड़ा महत्वपूर्ण प्रतिफल था। जिसके बाद सोलहवीं लोकसभा में 1 सितंबर 2014 से सदस्‍य के रूप में नियम समिति सदस्‍य, परामर्शदात्री समिति, उपभोक्‍ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय सदस्‍य, रेल संबंधी स्‍थायी समिति के सदस्य के रूप में महत्वपूर्ण दायित्व का उन्होंने सफलता पूर्वक निर्वहन किया। 1 सितम्बर, 2018 से सदस्य, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पर्यावरण और वन संबंधी स्थायी समिति का दायित्व बखूबी निभाने का कार्य किया। 16वीं व 17वीं लोकसभा के अपने कार्यकाल में वह संसद व क्षेत्र दोनों में बेहद सक्रिय रहे हैं, संसद में हर एक महवपूर्ण विषयों पर होने वाली चर्चाओं में वह अवश्य शामिल रहते हैं, संसद में उनकी शत प्रतिशत उपस्थिति का रिपोर्टकार्ड काबिलेतारिफ है। उन्होंने समय समय पर संसद में अपने क्षेत्र से जुड़े मुद्दों के साथ-साथ गृह, वित्त, जल संसाधन, रेलवे, परिवार कल्याण, सड़क एवं परिवहन, उपभोक्ता मामलों, पर्यटन, श्रम एवं रोजगार, क़ानून, कृषि, वाणिज्य, महिला एवं बाल विकास, पेट्रोलियम और शहरी विकास तथा अन्य मंत्रालयों से जनता से जुड़े हुए विभिन्न गंभीर मुद्दों पर निरंतर सवाल उठाकर उनका समाधान करवाने का लगातार प्रयास किया है। वह सितंबर 2019 से ऊर्जा की स्टैंडिंग कमेटी के सदस्य है, अक्टूबर 2019 में वह पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस और सरकारी आश्वासन समिति के सदस्य बनाये गये थे। सोनीपत के सांसद के तौर पर रमेश चन्द्र कौशिक की यह हमेशा कोशिश रहती है कि क्षेत्र की जनता से जुड़ी हुई हर समस्या का हर हाल में जल्द से जल्द निदान हो, समस्याओं का स्थाई समाधान हो। उनका सपना है कि क्षेत्र के लोगों को भरपूर रोजगार मिले क्षेत्र में व्यवस्थित औधोगिक विकास तेजी से हो, जिस सपने को पूरा करने के क्रम में ही उन्होने गन्नौर में रेल कोच मरम्मत कारखाने का निर्माण करवाया है, जिसका प्रधानमंत्री मोदी से समय मिलने पर कभी भी उद्घाटन संभव है। वह हरियाणा के लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई के लिए सतलुज यमुना लिंक (एसवाईएल) नहर के मसले को निरंतर दमदार ढंग से उठाते रहते हैं। वह अपने संसदीय क्षेत्र के लोगों के लिए शिक्षा, रोजगार, स्वच्छ पेयजल व बेहतर संपर्क मार्ग उपलब्ध करवाने को हमेशा अपनी मुख्य प्राथमिकता मानते हैं। क्षेत्र के लोगों के अनुसार रमेश चन्द्र कौशिक जनता का दिल अपने काम व अपनी कार्यशैली के दम पर जीतना बखूबी जानते हैं, इसी वजह से ही वह जातिगत समीकरणों को पूरी तरह से ध्वस्त करके चुनाव जीत जाते हैं।

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।

शनिवार, 22 अक्टूबर 2022

*खुशियों का दीपोत्सव आया*

*खुशियों का दीपोत्सव आया* 


देश में चहुं ओर छाया उजियारा,
खुशियों का पर्व दीपोत्सव आया।
 
टिमटिमाते छोटे-छोटे दीपकों से,
धरा से अंधकार को मिटाने आया।
 
प्रकाशोत्सव का यह पावन पर्व,
सबके लिए ढेरों खुशियां लाया।

मिट्टी के प्रज्ज्वलित दीपकों से,
हर घर अद्भुत रोशनियों से नहाया ।

आओ सब मिलकर हाथ बढ़ाओं,
भूलकर मनमुटाव दु:ख-दर्द सब।


दिल से खुशियां मनाते हुए अब,
दीपोत्सव का धूमधाम से स्वागत करें हम।

मन के कोने में छिपकर बैठे हुए,
घने अंधेरे को हटाने की पहल करें हम।

ऐसा कर अपनी व अपनों की दुनिया को,
दिल से वास्तव में रोशन करें हम।

आओ सब मिलकर सर्वशक्तिमान पालनहार,
ईश्वर का दिल से करें शुक्रिया हम।

प्रार्थना करें देश के हर घर-घर में,
खुशहाली लाएं मिलजुलकर हम।

अपनी मेहनत के बलबूते पर जल्द,
अब देश को विश्वगुरु बनाएं हम।

आंतक, धार्मिक उन्माद, अपराध व भ्रष्टाचार,
रूपी राक्षस को मिटाकर देश को स्वर्ग बनाएं हम।

हर घर में मां लक्ष्मी व सरस्वती का वास हो,
ऐसा खुशहाल नव भारत बनाएं हम।

देश के कोने-कोने से घने अंधेरे को,
दीपक जलाकर हमेशा के लिए भगाएं हम।

एकता अखंडता ऐश्वर्या वैभव से परिपूर्ण,
अमनचैन वाला नव भारत बनाएं हम।

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।


दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप
स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार, राजनीतिक विश्लेषक व रचनाकार

ट्विटर हैंडल -: DeepakTyagiIND

मंगलवार, 18 अक्टूबर 2022

"खेती-किसानी अनपढ़ों का काम है" इस धारणा को तोड़ते देश के उच्च शिक्षा प्राप्त किसान "डॉक्टर राजाराम त्रिपाठी"

आंकड़ेबाजी के चलते देश की खेती-किसानी आईसीयू में - डॉक्टर राजाराम त्रिपाठी 

"खेती-किसानी अनपढ़ों का काम है" इस धारणा को तोड़ते देश के उच्च शिक्षा प्राप्त किसान "डॉक्टर राजाराम त्रिपाठी" 

किसानों की ज्वलंत समस्याओं पर राजनीतिक पैंतरेबाजी की जगह खुले मन व सकारात्मक विचारों की जरूरत - डॉक्टर राजाराम त्रिपाठी 

कृषि क्षेत्र के हित के लिए "आईएएस" के तर्ज पर "भारतीय कृषि अधिकारी सेवा" के गठन की जरूरत - डॉक्टर राजाराम त्रिपाठी

दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप
वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक 

हमारे प्यारे देश के नीतिनिर्माता यह अच्छे से जानते हैं कि भारत एक कृषि प्रधान देश है और यहां की बहुत बड़ी आबादी कृषि आय पर पूरी तरह से निर्भर है, लेकिन बेहद अफसोस की बात यह है कि उसके बावजूद भी आज़ादी के 75 वर्षों के बाद भी देश में आज भी किसानों के सामने विभिन्न प्रकार की ज्वलंत समस्याओं का अंबार लगा हुआ, आज तक भी धरातल पर किसानों की बहुत सारी समस्याओं का कोई ठोस समाधान नहीं हो पाया है। आज किसानों से जुड़े विभिन्न मुद्दों को लेकर के वरिष्ठ पत्रकार दीपक कुमार त्यागी ने "अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा)" के राष्ट्रीय संयोजक व वरिष्ठ किसान नेता डॉक्टर राजाराम त्रिपाठी से विस्तार से चर्चा की, हमारे सभी सम्मानित पाठकों के लिए पेश हैं उस विस्तृत चर्चा के महत्वपूर्ण अंश -


सवाल - आपकी पारिवारिक व सामाजिक पृष्ठभूमि क्या है?

जवाब - मैं देश के सबसे पिछड़े छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल बस्तर जनपद के एक बेहद ही पिछड़े आदिवासी वन ग्राम 'ककनार' में पैदा हुआ था, वहीं आदिवासी समुदाय के बीच में ही पला बढ़ा और जंगल व जड़ी बूटियों का व्यावहारिक ज्ञान मुझे मेरे इन आदिवासी गुरुओं से ही मिला था। मेरे दादाजी उन्नत खेती के जबरदस्त जानकार माने जाते थे, वह लगभग 70 वर्ष पूर्व उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ से बस्तर इसी सिलसिले में आए थे और फिर यहीं के ही होकर रह गए। खेती का ज्ञान तो हमें बचपन से ही एक तरह से घुट्टी के रूप में मिला था। वैसे तो मेरे पिता जी व चाचा जी शिक्षक थे लेकिन वह साथ में किसान भी थे। घर में मेरी अम्मा, चाची, अन्य महिलाएं व बच्चे सभी खेती में उनका पूरा हाथ बंटाते थे। आज भी हमारा 43 लोगों का संयुक्त परिवार है, जो कि मूल रूप से खेती से ही जुड़ा हुआ है। लेकिन अब हमारे "मां दंतेश्वरी हर्बल समूह" के जैविक किसानों के इस महा-परिवार में हजारों की संख्या में स्थानीय आदिवासी परिवार भी शामिल हो गए हैं, अब हमारा परिवार काफी बड़ा हो गया है। हम सभी मिल जुलकर विशुद्ध जैविक पद्धति से उच्च लाभदायक खेती के अंतर्गत स्टीविया, दालचीनी, सफेद मूसली, काली मिर्च, अश्वगंधा हल्दी, इंसुलिन पौधे, दुर्लभ व विलुप्तप्राय जड़ी बूटियों की खेती तथा बहुमूल्य इमारती लकड़ी देने वाले आस्ट्रेलियन टीक के पेड़ों का वृक्षारोपण कर रहे हैं। अपने से जुड़े हुए इन सभी जैविक किसानों के कृषि उत्पादों के विपणन के लिए वर्ष 2002 में हमने सहकारिता के सिद्धांत पर आधारित "सेंट्रल हर्बल एग्रो मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया" (चैम्फ) नाम का एक राष्ट्रीय संगठन बनाया था। इस संगठन को वर्ष 2005 में भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के द्वारा राष्ट्रीय संगठन की मान्यता दी गयी थी। इसने लाखों किसानों की मार्केटिंग की समस्या को काफी हद तक सुलझाने का कार्य किया है। मैं वर्तमान में देश के 45 किसान संगठनों के महासंघ "अखिल भारतीय किसान महासंघ" (आईफा) का राष्ट्रीय-संयोजक हूं, सेंट्रल हर्बल एग्रो मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया (चैम्प) का अध्यक्ष हूं, आयुष मंत्रालय के मेडिशनल प्लांट बोर्ड का सदस्य हूं, अरोमैटिक प्लांट्स ग्रोवर एसोसिएशन ऑफ इंडिया का मेम्बर सेक्रेट्री सहित कई अन्य किसान संगठनों में अपनी भूमिका निर्वहन का ईमानदारी से प्रयास कर रहा हूं।

सवाल - एक आम धारणा बनी हुई है कि खेती-किसानी अनपढ़ों का काम है, इस पर आपके क्या विचार हैं?

जवाब - आपकी बात सही है देश में प्रायः किसानों को अनपढ़ अथवा कम पढ़ा लिखा माना जाता है, लेकिन वास्तव में धरातल पर ऐसा नहीं है, एक से एक पढ़े-लिखे विद्वान लोग खेती किसानी करते आये हैं और कर भी रहे हैं, मैंने खुद ने बीएससी (गणित) से करके, एल.एल.बी. व इंटरनेशनल कारपोरेट-ला में डिप्लोमा किया है। अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान, अंग्रेजी साहित्य, हिंदी साहित्य तथा इतिहास पांच विषयों में एम ए किया व डाक्टरेट पूर्ण किया, मेरी पढ़ाई अभी भी पढाई जारी है, अब में जनजातियों के परंपरागत चिकित्सा पद्धति जैसे बेहद महत्वपूर्ण विषय पर शासकीय विश्वविद्यालय में शोधरत हूं और सरकारी बैंक की नौकरी को छोड़कर के अपने व परिवार के जीवनयापन के साथ-साथ किसानों की मदद करने के उद्देश्य से खेती-किसानी कर रहा हूं। मैंने कृषि क्षेत्र में सफलता हासिल करके देश में दशकों से बनी हुई उस धारणा को तोड़ने का कार्य किया है कि "खेती-किसानी केवल अनपढ़ों का काम है!"


सवाल - आप देश के बहुत सारे किसान संगठनों से जुड़े हुए हैं, आज़ादी के 75 वर्ष बाद भी देश में आप किसानों को किस हाल में पाते हैं?

जवाब - वैसे आज हकीकत तो यहीं है कि देश में सही मायनों में कोई भी 'राष्ट्रीय किसान संगठन' नहीं हैं। तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ खड़े हुए आंदोलन को छोड़ दें तो किसानों और किसान संगठनों में भी सदैव एकजुटता का अभाव ही रहता है। जो भी छिटपुट किसान संगठन सक्रिय भी रहते हैं, वह भी प्रायः स्थानीय तथा क्षेत्रीय मुद्दों तक ही सीमित रहते हैं, राष्ट्रीय मुद्दों पर वह कभी भी केंद्रित नहीं रह पाते हैं। वैसे भी आज देश के सभी राष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने अपनी वोट बैंक की राजनीति के तहत अपने-अपने अलग-अलग किसान विंग / किसान संगठन बनाकर कर देश के किसानों में गांव-गांव, मोहल्ला-मोहल्ला यहां तक कि परिवारों में भी फूट डाल दी है। इन गंभीर परिस्थितियों को देखते हुए ही हमने 7-8 वर्ष पहले देश के 45 किसान संगठनों को एक साथ जोड़ते हुए राष्ट्रीय मुद्दों पर एकजुटता हेतु "अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा)" का गठन किया था, जिसके अच्छे परिणाम भी आए हैं। अन्य किसान संगठनों के साथ मिलकर 'आईफा' ने मोदी सरकार के प्रथम कार्यकाल में भूमि अधिग्रहण को सरल बनाने के नाम पर लाये गये नये भूमि अधिग्रहण कानून को वापस करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, बाद में कृषि कानूनों को वापस करवाने में भी अपनी बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 

सवाल - क्या आपको यह नहीं लगता कि देश के कुछ किसान संगठनों के नेता किसानों की समस्याओं के समाधान की आड़ में किसानों का भला करने की जगह अपना राजनीतिक हित साधने में ज्यादा व्यस्त रहते हैं?

जवाब - मैं हमेशा कहता हूं कि यह सही है कि देश के हुक्मरानों ने किसानों के साथ हमेशा दोयम दर्जे का सौतेला व्यवहार किया है, लेकिन साथ ही यह भी कटु सत्य है कि किसानों के असली दुश्मन यह हमारे मौकापरस्त किसान नेता और उनके जेबी, पिछलग्गू किसान-संगठन हैं। इन किसान संगठनों ने हमेशा किसान हितों को बेच कर अपना उल्लू साधा है। ज्यादातर किसान नेता भीतर खाने किसी न किसी राजनेता से या राजनीतिक दलों से जुड़े रहते हैं, जिसके चलते ही यह किसान नेता किसानों के आंदोलनों के समय किसानों के ज्वलंत मुद्दों के समाधान को तरजीह देने की जगह उन राजनीतिक पार्टियों की हितों की रक्षा को अपना परम धर्म व कर्तव्य मानकर कार्य करते हैं, देश की खेती तथा किसानों को ऐसे किसान नेताओं तथा इनकी गोपनीय दुरभसंधियों ने सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। लेकिन अब वक्त आ गया है कि देश के समस्त किसान अपने हितों के लिए स्वयं जागरूक बनें, आज किसानों को देश में बिके हुए किसान नेताओं और इनके बिकाऊ किसान-संगठनों को पहचान कर, इन तथाकथित किसान नेताओं की नेतागिरी चमकाने वाली खुल्ली दुकानों के चंगुल से जल्द से जल्द मुक्ति पाकर अपनी असल समस्या के निदान के लिए एकजुट होना होगा, तब ही उनकी समस्याओं का भविष्य में उचित समाधान हो पायेगा। वैसे भी देश के नीतिनिर्माताओं को किसानों की ज्वलंत समस्याओं पर राजनीतिक पैंतरेबाजी करने की जगह खुले मन से व सकारात्मक विचारों के साथ मनन करके मूल समस्या का निदान समय रहते करने की जरूरत है, तब ही देश का सर्वांगीण विकास हो पायेगा।
सवाल - आज देश में किसानों की ज्वलंत समस्याएं क्या-क्या हैं?

जवाब - भाई, आज हमारे देश में खेती-किसानी आईसीयू में पड़ी हुई है। किसानों की हालत उस मरीज की तरह से है, जिससे अगर पूछें कि भाई आपको कहां कहां दर्द है ? तो वह कराहते हुए कहता है कि जनाब शरीर में जहां भी हाथ रख दो वहां-वहां दर्द है। देश में आजादी के 75 वर्ष बीतने के बाद भी, आज भी खेती में ढांचागत निवेश आवश्यकता से बहुत ही कम हुआ है। पूर्व की सरकारों के साथ ही यह सरकार भी कृषि तथा कृषकोन्मुखी बिल्कुल भी नहीं है। केवल बड़े कारपोरेट्स, बड़े उद्योगो व चुनिंदा शीर्ष उद्योगपतियों की भलाई तथा उनकी सुरक्षा ही इनका प्रथम लक्ष्य है। आजादी के 75 वर्ष बाद भी देश में हर खेत को सिंचाई, सभी को उचित मूल्य पर सही खाद, सही कीटनाशक, सही बीज की व्यवस्था, जरूरी छोटी-छोटी कृषि मशीनरी तथा नवीन तकनीकें, ग्राम पंचायत व तहसील स्तर पर समुचित भंडारण व्यवस्था तथा लघु प्रसंस्करण इकाइयों की व्यवस्था, किसान के खेतों से लेकर देश तथा विदेश के बाजार तक सशक्त लॉजिस्टिक सपोर्ट, उत्पादन का समुचित लाभकारी कारी मूल्य प्रदान करने वाली सशक्त विपणन व्यवस्था, धरातल पर हमारी फसलों को जोखिमों से वास्तविक सुरक्षा देने वाली एक सक्षम बीमा प्रणाली, पर्याप्त सरल वित्त पोषण आदि दर्जनों मुख्य समस्याएं देश का किसान लगातार झेल रहा है और वह इन छोटी-छोटी समस्याओं का निदान चाहता है, लेकिन लंबे समय से किसानों को हर सरकार में केवल और केवल झूठे आश्वासन देकर छला जाता रहा है।

सवाल - किसानों की समस्याओं का धरातल पर कारगर निदान क्या है?

जवाब - मेरा मानना है कि खेती- किसानी देश के राजनीतिज्ञों की प्राथमिकता में कभी रही ही नहीं है। सरकारी कृषि योजनाओं के निर्माण में कृषि मंत्रालयों, राज्य तथा केंद्र के सभी कृषि तथा कृषि से संबद्ध विभागों में आईएएस अधिकारियों की ही प्रमुख, अंतिम व निर्णायक भूमिका होती है। मुझे उनकी योग्यता पर कोई शक नहीं है, लेकिन यह भी तय है कि कृषि का विषय एक विशुद्ध तकनीकी तथा जमीनी प्रायोगिक विषय है और इसके लिए जमीनी तथा तकनीकी ज्ञान होना बेहद जरूरी है। यही कारण है कि पिछले 75 वर्षों में आईएएस अधिकारियों के नेतृत्व में बनाई गई राज्य तथा केंद्र की अधिकांश कृषि योजनाएं बुरी तरह से असफल हुई हैं। सरकार की इन सैकड़ों योजनाओं के बावजूद भी आज देश में खेती तथा किसानों की दशा आजादी के पहले से भी ज्यादा बदतर है। मेरी सरकार से गुजारिश है कि देश में "आईएएस" के तर्ज पर "भारतीय कृषि अधिकारी सेवा" का गठन करके कृषि विषय के वशिष्ठ जानकारों का चयन करने का कार्य तत्काल शुरू करें। वैसे भी देश में खेती तथा किसानों की दशा एवं विविध कृषि उत्पादन को लेकर फर्जी आंकड़ेबाजी पेश कर सब कुछ ठीक है, सब कुछ अच्छा हो रहा है, ऐसा झूठा माहौल तैयार करने की कोशिश लगातार की जाती है, जबकि हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। मैं कई बार कहता हूं कि मुझे लगता है कि हमारा देश विशेषकर हमारा कृषि मंत्रालय झूठे आंकड़ों के पिरामिड के शीर्ष पर विराजमान हैं, सचमुच यह बहुत ही खतरनाक स्थिति है। इसके लिए जरूरी है कि आंकड़ों का शुद्धीकरण कर संशोधन किया जाए। किसानों से संबंधित समस्त योजनाएं, नियम, कानून उन्नत, अनुभवी किसानों, गैर राजनीतिक किसान संगठनों के साथ मिल बैठकर बनाई जाएं।
सवाल - "न्यूनतम समर्थन मूल्य" (एमएसपी) पर आपके क्या विचार हैं? 

जवाब - एमएसपी यानि कि "न्यूनतम समर्थन मूल्य" दरअसल किसानों के लिए यह प्राण-वायु यानि कि आक्सीजन की तरह है, इसके अभाव में देश का किसान घुट-घुट कर मर रहा है। सरकार को इसके लिए एक सक्षम "एमएसपी गारंटी कानून" लाना ही होगा। आईफा पिछले कई वर्षों से इसके लिए संघर्षरत है। हमारा मानना है कि इस कानून के लागू होने से देश के खजाने पर 1 रूपए का भी बोझ नहीं पड़ेगा, बस व्यापारियों को किसान भाइयों को उनके खून पसीने की मेहनत का उचित मूल्य देना होगा, बस इतनी सी बात है। आईफा यह बिल्कुल नहीं कहती कि पूरे देश के किसानों का पूरा उत्पादन सरकार खरीदे, हम तो कहते हैं कि सरकार चाहे तो किसानों से 1 ग्राम भी अनाज ना खरीदे, आप तो बस कानून द्वारा यह सुनिश्चित कर दीजिए कि सरकार द्वारा निर्धारित "न्यूनतम समर्थन मूल्य" से कम पर कोई भी, कहीं भी न खरीदें। वैसे आज भी सरकार किसानों से जितना भी खाद्यान्न खरीदती है, वह न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ही खरीद करती है, यानी कि सरकार पर इस कानून को लाने से कोई बोझ नहीं पड़ने वाला। आप मेरी बात लिखकर रख लें, यह सरकार हो अथवा कोई और सरकार, सरकार को सभी किसानों को उनके समस्त कृषि उत्पादों का लाभकारी "न्यूनतम समर्थन मूल्य गारंटी कानून" जल्द से जल्द देना ही होगा।

सवाल - देश में किस तरह की फसलों के "एमएसपी" जरूर तय होने चाहिए?

जवाब - देश के प्रत्येक किसान द्वारा उत्पादित हर फसल का एक लाभकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य तय होना चाहिए। इसमें खाद्यान्न, दलहन, तिलहन ,गन्ना, कंद, मूल, फल, सब्जी, पशुपालन, मछली पालन, मधुमक्खी पालन, मसाले , नारियल, केला, औषधीय व सुगंधीय पौधे, नर्सरी सहित खेती के सभी उत्पाद शामिल होनी चाहिए।

सवाल - किसानों के हित के लिए सरकार से आपकी क्या मांग है और क्या सुझाव हैं?

जवाब - सरकार गैर राजनीतिक किसान संगठनों के साथ मिल बैठकर बात करें और किसानों के समस्त उत्पादों के लिए "न्यूनतम समर्थन मूल्य गारंटी कानून" का बिल शीघ्र अति शीघ्र ले आएं। देश के चुनिंदा उन्नत, अनुभवी किसानों तथा गैर राजनीतिक किसान संगठनों के साथ मिल बैठकर देश में चल रही सभी कृषि योजनाओं के वर्तमान स्वरूप , क्रियान्वयन विधि की पुनर्समीक्षा करें और इन सभी योजनाओं को धरातल पर किसानों के हित में युक्ति-युक्त, कारगर, व्यावहारिक एवं परिणाम मूलक बनाया जाए। 
सवाल - आपका देश के किसानों के लिए क्या संदेश है?

जवाब - आज देश में किसानों के लिए खेती घाटे का सौदा बन गई है, इसके अलावा भी खेती में बहुत सारी परेशानियां हैं। इन कठिन परिस्थितियों को देखते हुए वर्तमान में देश की नई पीढ़ी खेती से दूर भाग रही है। पिछले कुछ महीनों में ही करीब 3 करोड़ लोगों ने खेती को छोड़ा है। यह स्थिति देश की खेती तथा देश दोनों के लिए बेहद चिंताजनक है। मेरा स्पष्ट मानना है कि देश तथा पूरे विश्व में आने वाला वक्त अब खेती तथा किसानों का ही होगा। अब हमारे देश के अन्नदाता किसानों के ऊपर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है और हमें अपनी जिम्मेदारी से नहीं भागना है। हम सब मिलजुल कर थोड़े से अतिरिक्त साहस, उद्यम, नई तकनीकों तथा कारगर सफल नवाचारों के जरिए और एक नए नजरिए से हम खेती की हारी बाजी को पलट सकते हैं। 

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।


शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2022

श्रद्धांजलि - देश में हमेशा याद किए जाएंगे धरती पुत्र 'मुलायम सिंह यादव'




श्रद्धांजलि - देश में हमेशा याद किए जाएंगे धरती पुत्र 'मुलायम सिंह यादव' 

दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप
वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक

भारतीय राजनीति के एक दिग्गज पुरोधा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से लेकर देश के रक्षामंत्री तक का सफर अपनी मेहनत के दम पर सफलतापूर्वक तय करने वाले व देश-दुनिया में 'धरतीपुत्र’ के नाम से मशहूर मुलायम सिंह यादव का 10 अक्टूबर 2022 को लंबी बीमारी के चलते गुरुग्राम के एक अस्पताल में निधन हो गया है। उनका निधन आम जनमानस व राजनीति के क्षेत्र दोनों के लिए ही एक बहुत बड़ी अपूरणीय क्षति है। क्योंकि राजनीति के क्षेत्र में मुलायम सिंह यादव जैसी दूरदृष्टी, बेबाक, सरल, सहज व दूसरों के दुःख दर्द को अपना मान करके उसका निदान करने के लिए हर वक्त तत्पर रहने वाली शानदार शख्सियत विरले ही जन्म लेती है। वह देश के राजनीतिक पटल पर किसानों, गरीबों, नौजवानों व आम जनमानस की एक दमदार बुलंद आवाज थे। मुलायम सिंह यादव का ओरा ऐसा था कि उनके द्वारा बोली गयी छोटी-बड़ी बात को राजनेताओं, शासन-प्रशासन व मीडिया में विशेष तव्वजो दी जाती थी। 

राजनीति की शुरुआत करते हुए 
मुलायम सिंह यादव ने देश-दुनिया की राजनीति की एक बहुत बड़ी प्रयोगशाला माने जाने वाले उत्तर प्रदेश की राजनीति के दुर्गम रास्ते को चुनकर के अपनी मेहनत से उसको सुगम बनाते हुए दिल्ली की केन्द्र की राजनीति तक का सफर बखूबी तय किया था। देश की राजनीति में मुलायम सिंह यादव को राजनीतिक दावं-पेंचों का एक माहिर बड़ा खिलाड़ी माना जाता था। मुलायम सिंह यादव ने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में वह सब कुछ पाया जो कि एक राजनीतिज्ञ अपने जीवन काल में पाना चाहता है। वह 8 बार विधायक 7 बार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए, मुलायम सिंह यादव तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर आसीन रहे और केंद्र में संयुक्‍त मोर्चा की सरकार में उन्होंने बेहद अहम रक्षामंत्री के दायित्व को भी दमदार ढंग से निभाने का कार्य किया था।

मुलायम सिंह यादव का जन्म 22 नवम्बर 1939 को इटावा जनपद के सैफई गांव के एक साधारण किसान परिवार में हुआ था, उनके पिता सुघर सिंह यादव सामान्य किसान परिवार से ताल्लुक रखते थे, उनकी माता मूर्ति देवी भी एक आम घरेलू महिला थी। मुलायम सिंह यादव अपने पाँच भाई-बहनों में रतनसिंह यादव से छोटे थे और अभयराम सिंह यादव, शिवपाल सिंह यादव, राजपाल सिंह और कमला देवी से बड़े थे। वैसे तो मुलायम सिंह यादव के पिता की इच्छा थी कि वह एक प्रसिद्ध पहलवान बने, किन्तु समय का पहिया ऐसा घूमा कि क्षेत्र में पहलवानी करते हुए ही मुलायम सिंह यादव का राजनीति में पदार्पण हो गया, उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु चौधरी नत्थूसिंह को मैनपुरी में आयोजित एक कुश्ती-प्रतियोगिता में अपनी कार्यशैली से बेहद प्रभावित किया और इस घटना के बाद ही उनका नत्थूसिंह के परम्परागत विधान सभा क्षेत्र जसवन्त नगर से अचानक ही राजनीतिक सफर शुरू हो गया था। इसके बाद मुलायम सिंह यादव ने अपने राजनीतिक जीवन के पथ में फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा, उन्होंने सफलता की नित-नयी कहानी खुद की मेहनत के दम पर लिखने का कार्य किया। राजनीति की शुरुआत में ही मुलायम सिंह यादव ने बहुत मेहनत  करनी शुरू कर दी थी, उन्होंने राजनीति के क्षेत्र में सफलता हासिल करने के उद्देश्य की पूर्ति के लिए पहले आसपास फिर बदलते समय के साथ उत्तर प्रदेश के गांव-गांव व शहर-शहर में पैदल, साइकिल, मोटर साइकिल, घोड़ा गाड़ी, कार, जीप, बस, रेलगाड़ी आदि से दिन रात एक करके घूमना शुरू कर दिया था और अपने बेहद मिलनसार सरल व्यवहार के बलबूते रोजाना नए-नए साथियों से मिलना जारी रखते हुए, वह एक बहुत बड़ा कारवां बनाते चले गये। जिसके परिणाम स्वरूप ही  उन्होंने सहकारी बैंक के निदेशक से लेकर के विधायक, मुख्यमंत्री, सांसद व देश के रक्षामंत्री तक का सफर सफलतापूर्वक तय किया था। आज उनकी पहचान देश व दुनिया में एक बड़े धर्मनिरपेक्ष व समाजवादी विचारधारा को मानने वाले दिग्गज राजनेता के रूप में होती थी।

चुनावी रणभूमि में मुलायम सिंह यादव वर्ष 1967 में पहली बार विधायक बने, उसके बाद जीवन में फिर कभी उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और वर्ष दर वर्ष राजनीति के क्षेत्र में सफलता हासिल करते चले गये। पहले मंत्री बने फिर 5 दिसंबर 1989 को मुलायम सिंह यादव पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और 24 जनवरी 1991 तक रहे। मुलायम सिंह यादव ने वर्ष 1992 में अपनी समाजवादी पार्टी का गठन किया था। समय का पहिया जब आगे बढ़ा तो वह एक बार फिर से 5 दिसम्बर 1993 को वह दूसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और 3 जून 1996 तक रहे। इसके बाद वर्ष 1996 में मुलायम सिंह यादव ग्यारहवीं लोकसभा के लिए मैनपुरी लोकसभा क्षेत्र से चुने गए थे और केन्द्र की संयुक्त मोर्चा सरकार में मुलायम सिंह यादव भी शामिल हुए और देश के रक्षामंत्री बने थे। हालांकि केंद्र की यह सरकार बहुत लंबे समय तक नहीं चल पायी थी। लेकिन उस समय तक देश की राजनीति में मुलायम सिंह यादव एक बहुत बड़े पुरोधा बनकर उभर चुके थे, उसी के चलते ही मुलायम सिंह यादव को प्रधानमंत्री बनाने तक की भी बात राजनीतिक गलियारों में गंभीरता पूर्वक चलने लगी थी, वह प्रधानमंत्री पद की दौड़ में अन्य प्रतिद्वंद्वियों से बहुत आगे थे, किंतु उस वक्त उनके कुछ सजातियों राजनेताओं ने उनका जरा भी साथ नहीं दिया, जिसके चलते मुलायम सिंह यादव देश के प्रधानमंत्री बनने से अंतिम समय में चूक गये थे। देश के राजनीतिक गलियारों में ऐसा माना जाता है कि उस समय पिछड़ों के दिग्गज राजनेता लालू प्रसाद यादव और शरद यादव ने अपने-अपने राजनीतिक हितों को साधने की खातिर मुलायम सिंह यादव के प्रधानमंत्री बनने के सपने पर पानी फेरने का कार्य किया था। हालांकि इसके बाद जब लोकसभा चुनाव हुए तो मुलायम सिंह यादव ने कन्नौज व संभल से जीतकर पुनः लोकसभा में दमदार ढंग से अपनी वापसी करने का कार्य किया था। बाद में उन्होंने कन्नौज से अपने पुत्र अखिलेश यादव को लोकसभा के चुनाव में जितवाकर के सांसद बनवाकर राजनीतिक शुरुआत करवाने का कार्य किया था। राजनीति में धोबी पछाड़ दांव के जबरदस्त खिलाड़ी मुलायम सिंह यादव एकबार फिर सभी को अपने धोबी पछाड़ दांव से मात देते हुए 29 अगस्त 2003 को तीसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और 11 मई 2007 तक रहे थे।

मुलायम सिंह यादव आम जनता के बीच नेता जी के नाम से भी बहुत मशहूर हैं, लोगों को उन्हें इस नाम से पुकारते वक्त अपने पन का आभास होता था, लेकिन लोगों चहेता समाजवाद के यह दिग्गज पुरोधा अब दुनिया में नहीं हैं, लेकिन अब उनकी विचारधारा को जीवित रखने के लिए उस पर चलते हुए उसको धरातल पर साकार करने की जिम्मेदारी उन सभी लोगों, सपा नेताओं व उनके पुत्र अखिलेश यादव पर है जो कि उन्हें बेहद प्यार करते थे। देश में राजनीति के क्षेत्र का हर व्यक्ति यह बहुत अच्छे से जानता है कि मुलायम सिंह यादव एक राजनेता मात्र नहीं थे, बल्कि वह एक  विचारधारा थे। देश में राम मनोहर लोहिया के समाजवाद का यह चमकता सूरज आज हमेशा के लिए अस्त हो गया है, लेकिन अब भी लोगों को उनके जीवन पथ की संघर्ष की विभिन्न गाथाओं से प्रेरणा हमेशा मिलती रहेगी। देश के राजनीतिक पटल पर मुलायम सिंह यादव की उपलब्धियों का एक बहुत लंबा इतिहास है, जो हमें हमेशा उनकी याद दिलाता रहेगा। मुलायम सिंह यादव देश की राजनीति में किसानों की सशक्त आवाज बनकर के धरती पुत्र कहलाए, तो पिछड़ों-शोषितों गरीबों के हक़ का पहरेदार बनकर देश के गली मोहल्ले में नेता जी की उपाधि से नवाजें गये। देश के राजनीतिक गलियारों में मुलायम सिंह यादव को नाम के अनुरूप मन से मुलायम माने जाने वाला एक ऐसा राजनेता माना जाता है जिसका दृढ़संकल्प व इरादे बेहद सख्त लोहे के थे। मुलायम सिंह यादव की सबसे बड़ी खासियत थी कि वह किसी पार्टी कार्यकर्ता या आम जन से एक बार मिल लें तो लोग उनके मुरीद हो जाते थे और फिर कभी उनखो भूल नहीं पाते थे। हालांकि आज मुलायम सिंह यादव के निधन से भारतीय राजनीति के एक युग का अंत बेशक हो गया है, लेकिन यह भी एक कटु सत्य है कि मुलायम सिंह यादव के संघर्ष और सफलता की दास्तान युगों-युगों तक हम सभी लोगों के जहन व दिलों में हमेशा जिंदा रहेगी!

मंगलवार, 27 सितंबर 2022

*कृपा करो मां दुर्गा*

*कृपा करो मां दुर्गा* 

तेरे इंतज़ार में मां दुर्गा हम लोग,
कब से तेरे दर पर यूं ही बैठे हैं।

काश तुम जल्दी से दर्शन दे दो,
यह आस हम लोग लगाए बैठे हैं।

दृढ़ विश्वास है हमें कि एक दिन,
आप हालात हमारे अवश्य समझोगी।

दिल में छुपे हुए जज़्बातों का तुम,
मां दुर्गा मोल अवश्य एक दिन समझोगी। 

दुःख दर्द चलते रहते हैं दुनिया में,
यह जगत जननी मां दुर्गा की सब माया है।

मुझ नादान की गलतियों को मां,
आप ने कर्मों से ठीक करवाया है।

तेरे चरणों में जगह मिल जाएं माता,
यह इच्छा पूरी करने को जीवन पाया है।

आपके आशिर्वाद से जान गया मां,
धरा पर सब झूठी मोह माया है।

पूरी कर दो मुराद हमारी मां दुर्गा,
उम्मीद लगा मैं शरण तुम्हारी आया हूं। 

मैं भक्त नादन तेरी चौखट पर मां,
अपने ग़लत कर्मों को त्यागने आया हूं।

भला हो सारे जगत का मां दुर्गा,
दर पर यह अरदास मैं लेकर आया हूं।

ज्योति जले सदा सनातन धर्म की
दुनिया में,
मां आपसे यह प्रार्थना करने आया हूं।

सद्बुद्धि मिले जल्द नादान लोगों को मां,
मैं तेरी चौखट पर भीख मांगने यह आया हूं।

सुख शांति समृद्धि वैभव ऐश्वर्य रहे देश में मां,
इस आस से मां दर पर तेरे आया हूं।

हे मां दुर्गा मैं तेरा एक भक्त नादन,
कोटि-कोटि नमन वंदन करने तेरे दर पर आया हूं।



✍️लेखक✍️

दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप
स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार, राजनीतिक विश्लेषक व रचनाकार

ट्विटर हैंडल :- DeepakTyagiIND

बुधवार, 17 अगस्त 2022

श्रीकांत त्यागी प्रकरण - 'त्यागी समाज' के आक्रोश की अनदेखी 'भाजपा' को पड़ सकती है भारी! दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक


श्रीकांत त्यागी प्रकरण - 'त्यागी समाज' के आक्रोश की अनदेखी 'भाजपा' को पड़ सकती है भारी!

दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप
वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक

देश की आज़ादी से लेकर के नव निर्माण तक में बुद्धिजीवी, बेहद मेहनती, देशभक्त व स्वाभिमानी 'त्यागी समाज' के सम्मानित लोगों का अपना एक अनमोल योगदान हमेशा से रहा है। त्यागी समाज के बहुत सारे महापुरुषों ने निस्वार्थ भाव से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, लालबहादुर शास्त्री आदि जैसे दिग्गज लोगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर देश निर्माण के लिए कार्य किया था। मां भारती की सेवा में अपने प्राण को न्यौछावर करने के लिए मेजर आशाराम त्यागी जैसे वीर योद्धा हमेशा तत्पर रहें हैं, समाज के लोगों ने हमेशा निस्वार्थ भाव से देश व समाज की सेवा करने का कार्य हर तरह की अच्छी या बुरी परिस्थितियों में किया है। देश में चाहे किसी भी राजनीतिक दल की सरकार हो 'त्यागी समाज' के लोगों ने हमेशा ओछी राजनीति से दूर रहकर हर वक्त देश व समाज के हित में सोचते हुए कार्य करने में विश्वास रखा है, उन्होंने देश व समाज हित में जाति-धर्म के बंधन को तोड़ते हुए समाज के सभी लोगों को एकजुट करके कार्य करने में विश्वास रखा है। लेकिन जिस तरह से नोएडा में घटित एक आपसी विवाद की घटना पर देश के कुछ राजनीतिक दलों के चंद बड़े राजनेताओं व चंद मीडिया घरानों विशेषकर के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने जातिवाद के बेहद घातक जहर को फैलाते हुए पूरे 'त्यागी समाज' को अपमानित करते हुए अपने निशाने पर ले लिया है, वह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। श्रीकांत त्यागी के प्रकरण के उस एक घटनाक्रम के बाद से बेहद सभ्य व देशभक्त 'त्यागी समाज' के सभी लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ करके कुछ लोगों के द्वारा जानबूझकर बहुत पीड़ा पहुंचाने का निंदनीय कार्य किया गया है। हालात देखकर लगता है कि देश के कुछ राजनेताओं व चंद मीडिया घरानों ने टीआरपी के लालच, क्षणिक स्वार्थ व ओछी राजनीति के लिए श्रीकांत त्यागी के आपसी विवाद की एक घटना के द्वारा पूरे सम्मानित 'त्यागी समाज' के मान सम्मान को ठेस पहुंचाने का दुस्साहस किया है, जिसके चलते धरातल पर 'त्यागी समाज' के लोगों के साथ-साथ अब देश के सर्वसमाज के लोगों में भी बेहद जबरदस्त ढंग से दिन प्रतिदिन आक्रोश बढ़ता जा रहा है, जिसके चलते सर्वसमाज के लोग अब इस प्रकरण पर बहुत तेजी से एकजुट होते जा रहे हैं। वहीं रही-सही कसर 'बकरी को हाथी' बना देने वाली पुलिस ने  श्रीकांत त्यागी की निर्दोष पत्नी, उसके छोटे-छोटे से बच्चों व मामा-मामी के साथ दुर्व्यवहार करके पूरी कर दी है। वैसे तो श्रीकांत त्यागी विवाद के इस प्रकरण पर अधिकांश लोगों का यह मानना है कि जिस विवाद को पुलिस का संबंधित चौकी इंचार्ज भी बहुत आसानी से तुरंत सुलझा सकता था, उस विवाद को उत्तर प्रदेश के पुलिस-प्रशासन के बेहद शीर्ष अधिकारियों ने गैर जरूरी हस्तक्षेप व राजनीतिक दबाव में आने के चलते बहुत ज्यादा ही उलझा कर 'राई का पहाड़ बना'  दिया है। आपसी विवाद के मामले का 'तिल का ताड़' बनता देखकर अब तो आम लोग श्रीकांत त्यागी के प्रकरण में पुलिस-प्रशासन की कार्यवाही देखकर व्यंग्य कर रहे हैं कि ऐसा लगता है कि जैसे कि श्रीकांत त्यागी नाम का कोई एक व्यक्ति देश-दुनिया का एक सबसे बड़ा और बेहद कुख्यात वांछित आतंकवादी है, जिसका एक पल भी खुलेआम घूमना हमारे देश व समाज के लिए बेहद घातक है। हालांकि सूत्रों के अनुसार कभी इस पुलिस-प्रशासन के चंद लोग, देश व उत्तर प्रदेश के चंद प्रमुख राजनेता जब श्रीकांत त्यागी की धन-दौलत, गाड़ी घोड़े व अन्य सभी सुख-सुविधाओं के भौकाल का आयेदिन आनंद ले रहे थे, तब उन लोगों को श्रीकांत त्यागी में कोई कमी नज़र नहीं आ रही थी। विचारणीय तथ्य यह है कि फिर अचानक से ही ऐसा क्या घटित हो गया की श्रीकांत त्यागी को चंद दिनों में ही पच्चीस हज़ारी इनाम वाला एक बहुत बड़ा अपराधी एक दम से बना दिया जाता है। देश के आम व खास सभी वर्ग के लोगों को श्रीकांत त्यागी के इस पूरे प्रकरण से एक बहुत ही बड़े षड्यंत्र की बू आती है। आम लोग  शासन-प्रशासन व राजनेताओं से अब यह जानना चाहते हैं कि एक महिला के सम्मान की रक्षा करने के नाम पर दूसरी महिला व बच्चों के अपमान करने का हक भारत का कौन सा कानून देता है।

*"इस प्रकरण में महिला व बच्चों से दुर्व्यवहार के चलते सर्वसमाज में तेजी से आक्रोश व्याप्त होता जा रहा है, धरातल के हालात अब धीरे-धीरे से ऐसे बनते जा रहे हैं कि अगर यूं ही भाजपा सरकार में बैठे लोगों ने तमाशबीन बनकर के चुप्पी साधने का कार्य किया, तो इस क्षेत्र में भविष्य में फिर से एक बहुत बड़े आंदोलन की मजबूत नींव अब धीरे-धीरे रखी जाने लगी है। जिस तरह से सरकार में बैठे हुए कुछ लोगों के द्वारा श्रीकांत त्यागी के मामले में देश के नियम-कायदे व कानून के अनुसार न्यायसंगत कार्यवाही करवाने की जगह, एक सनक पर आधारित और एक पक्षीय कार्रवाई की गयी है, उससे अब  लोगों के एक बहुत बड़े वर्ग में जबरदस्त नाराज़गी व्याप्त हो गयी है। जिसके चलते ही अब यह मुद्दा सर्वसमाज के बहुत सारे लोगों लिए श्रीकांत त्यागी की पत्नी-बच्चों व मामा-मामी के सम्मान और राजनीतिक दबाव में जेल भेजे गये लोगों के हक व मुकदमा निरस्त करवाने की लड़ाई का बन गया है।"*

देश के अधिकांश राजनीतिक दल व राजनेता यह जानते हैं कि 'त्यागी समाज' के अधिकांश लोग भाजपा के परंपरागत वोटर हैं। 'त्यागी समाज' के अधिकांश लोग भाजपा के प्रत्याशी के सामने किसी भी अन्य दल से अपनी 'त्यागी बिरादरी' के एक मात्र प्रत्याशी होने के बावजूद भी हमेशा भाजपा के प्रत्याशी को वोट देना पंसद करते हैं, यही एक सबसे बड़ा कारण है कि विभिन्न राजनीतिक दलों के राजनेताओं ने नोएडा के श्रीकांत त्यागी विवाद के प्रकरण में पूरी 'त्यागी बिरादरी' के मान सम्मान को ठेस पहुंचाने का दुस्साहस किया है, वहीं इस आग में भाजपा के ही कुछ बड़े राजनेताओं ने खुद घी डालकर विवाद को भड़काने का कार्य किया है। वैसे तो अन्य दलों के राजनेताओं को कहीं ना कहीं यह लगता है कि 'त्यागी समाज' के लोग उनको तो किसी भी हाल में फिर भी वोट देंगे नहीं तो वह उनके साथ खड़े क्यों हों। वहीं दूसरी तरफ कहीं ना कहीं भाजपा के राजनेताओं को भी यह लगता है कि 'त्यागी समाज' तो उनका कट्टर समर्थक है, वह हर हाल में और विकट से विकट परिस्थिति में भी भाजपा को ही वोट करेगा, जिसके चलते वह 'त्यागी समाज' के हक की धरातल पर बात करने के लिए अब तैयार नहीं हैं। वैसे भी आज़ाद भारत में स्वाभिमानी 'त्यागी समाज' के लोगों ने कभी भी राजनीतिक रूप से अपने समाज के नाम पर राजनीति में भागीदारी मांगने का कार्य नहीं किया है, उन्होंने हमेशा व्यक्तिगत हैसियत के स्तर पर हक मांगा है, जिसका अब सभी राजनीतिक दल नाजायज फायदा उठा रहे हैं।
लेकिन श्रीकांत त्यागी प्रकरण के बाद से अब धरातल पर जिस तरह की राजनीतिक स्थिति बन रही है, वह भविष्य में उन सभी चंद बड़बोले राजनेताओं के साथ साथ भाजपा को भी बहुत महंगी पड़ सकती है, क्योंकि आज जिस तरह से 'त्यागी बिरादरी' के मान सम्मान की रक्षा के लिए शहर दर शहर सर्वसमाज के लोग एकजुट हो रहे हैं, वह भाजपा और 'त्यागी समाज' के सम्मान से खिलवाड़ करने का दुस्साहस करने वाले अन्य दलों के लिए अच्छा संकेत नहीं है।

*"हालांकि सर्वसमाज के इन लोगों के निशाने पर विशेष रूप से भाजपा के वह सभी चंद दिग्गज राजनेता निरंतर बने हुए हैं, जिन्होंने श्रीकांत त्यागी के इस आपसी विवाद के छोटे से प्रकरण में आग में घी डालकर बड़ी चालाकी से बात का बतंगड़ बनाने में अपनी पूर्ण भूमिका निभाई थी, ना जाने क्यों इन लोगों ने जरा भी यह सोचना तक भी आवश्यक नहीं समझा कि उनकी यह एक क्षणिक स्वार्थ वाली ओछी राजनीतिक हरकत के चलते, भाजपा को दशकों से निस्वार्थ भाव से एक तरफा वोट देने वाला परंपरागत 'त्यागी समाज' का वोटबैंक भाजपा से छिटक कर हमेशा-हमेशा के लिए दूर हो सकता है।"*

वैसे भी भाजपा के कर्ताधर्ताओं को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उत्तर प्रदेश में दोबारा योगी आदित्यनाथ की सरकार का गठन  करवाने में 'त्यागी समाज' ने बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का कार्य किया है, जिस पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अपना सूपड़ा साफ मान रहा था, वहां पर 'त्यागी समाज' के वोटरों की एकजुटता ने एक बहुत बड़ा संदेश देकर के पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा का सूपड़ा साफ होने से तो बचाया ही, साथ ही भाजपा को इस क्षेत्र में भारी बहुमत से विजयी बनवाने का कार्य किया था। हालांकि बाद में उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्रीमंडल में किसी भी 'त्यागी बिरादरी' के सम्मानित व्यक्ति को शामिल नहीं किया गया था, जिसके चलते 'त्यागी समाज' के लोगों में भाजपा के खिलाफ एक गुस्सा व्याप्त था। लेकिन अब श्रीकांत त्यागी के प्रकरण के बाद जिस तरह से पुलिस-प्रशासन ने बात का बतंगड़ बनाकर के एक पक्षीय कार्रवाई करते हुए, महिला के सम्मान के नाम पर श्रीकांत त्यागी की पत्नी, बच्चों, मामा व मामी से ग़लत व्यवहार किया है, उससे 'त्यागी समाज' के लोगों में जबरदस्त आक्रोश व्याप्त हो गया है। इस पूरे प्रकरण पर आंख बंद करके बैठे भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को यह समझना चाहिए कि अगर उसने जल्द ही 'त्यागी समाज' के लोगों की नाराज़गी को दूर नहीं किया तो और जो हालात धरातल पर बन रहे हैं उससे अगर 'त्यागी समाज' भाजपा से खफा हो गया तो 2024 के आगामी लोकसभा के चुनावों में भाजपा को एक दर्जन से अधिक लोकसभा सीटों पर व भविष्य में तीन दर्जन से अधिक विधानसभा की सीटों पर भारी नुक़सान उठाना पड़ सकता है।

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।

*"परशुराम के वंशज हैं"* दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप। स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार, राजनीतिक विश्लेषक व रचनाकार

*"परशुराम के वंशज हैं"*

हम भगवान परशुराम के वंशज हैं,
जप तप पूजा पाठ करना जानते हैं,
सनतान धर्म व संस्कृति की रक्षा के लिए,
दुश्मनों को युद्ध में परास्त करना जानते हैं।

हिम्मत व हौसले के दम पर युद्ध में हम,
विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी,
मानव व मानवता की रक्षा की खातिर,
अद्वितीय वीरता से लड़ना जानते हैं।

अन्याय होता है जब किसी पर भी,
हम चुपचाप बैठकर तमाशबीन बनकर,
मजबूरी का तमाशा देखने की जगह,
उसके हक की लड़ाई को लड़ना जानते हैं।

देश में न्याय का राज स्थापित करने के लिए,
हम अपराधियों से लड़ना जानते हैं,
सत्य की रक्षा के लिए हम त्यागी,
दुनिया में किसी से भी भिड़ना जानते हैं।

मेहनत करके शान से खाते हैं दो रोटी हम,
देश का नव निर्माण व विकास के लिए,
बिना रात दिन देखें करते हैं हम त्यागी,
पूरी ईमानदारी से दिन-रात एक करके काम।

भगवान परशुराम के दिखाएं मार्ग पर चलकर,
शस्त्र व शास्त्रों की शिक्षा के साथ साथ,
देश का नाम कैसे दुनिया में रोशन हो,
उस पर अमल करना है हम त्यागियों का काम।

कोई लाख बुरा चाहे ए दुनिया वालों हमारा,
हम भगवान परशुराम के वंशज चिंता करते नहीं,
बिना शोर मचाएं व दिखावे के बिना,
हम सफलता पर लिखते हैं त्यागियों का नाम।

रग-रग में कूट-कूट कर भरी हुई है,
देशभक्ति हमारे लहू में ए दुनिया वालों,
देश व समाज हित करने की यह शक्ति देते हैं,
हमारे आराध्य सर्वशक्तिमान भगवान परशुराम।

देश के अलग-अलग प्रांतों में रहते हैं,
हम त्यागी लगाकर अलग-अलग उपनाम,
देश समाज धर्म संस्कृति के हित के मार्ग पर चलकर,
भगवान परशुराम के वंशज करते हैं दुनिया में नाम।


।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।


दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप 
स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार, राजनीतिक विश्लेषक व रचनाकार

ट्विटर हैंडल - @DeepakTyagiIND

बुधवार, 10 अगस्त 2022

ओछी राजनीति व क्षणिक राजनीतिक स्वार्थ के चलते 'त्यागी समाज' के सम्मान को ठेस पहुंचाना उचित नहीं दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार राजनीतिक विश्लेषक

ओछी राजनीति व क्षणिक राजनीतिक स्वार्थ के चलते 'त्यागी समाज' के सम्मान को ठेस पहुंचाना उचित नहीं


दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप
वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार राजनीतिक विश्लेषक 

जिस तरह से श्रीकांत त्यागी को गिरफ्तार करने वाली उत्तर प्रदेश पुलिस की टीम की पीठ शासन-प्रशासन में दिग्गज पदों को सुशोभित कर रहे चंद लोगों के द्वारा थपथपायी जा रही है, उसे देखकर लगता है कि उत्तर प्रदेश की जांबाज पुलिस ने भारत के एक सबसे बड़े कुख्यात आतंकवादी को गिरफ्तार करके सलाखों के पीछे पहुंचाने कार्य किया है, जिस तरह से मीडिया के ट्रायल व चंद अन्य लोगों ने श्रीकांत त्यागी प्रकरण को  हवा दी है, वह हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या आज देश में सबसे बड़ी समस्या श्रीकांत त्यागी है, बाकी सब तरह से देश में हालात बहुत अच्छे बने हुए हैं। वैसे आपको यहां बता दें कि देश की राजधानी दिल्ली से एकदम सटा हुआ व उत्तर प्रदेश की आर्थिक राजधानी माने जाने वाला नोएडा विभिन्न कारणों के चलते आयेदिन मीडिया की सुर्खियों में बना रहता है। नोएडा में देश का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का सबसे बड़ा हब होने के चलते ही कभी सकारात्मक व कभी कोई बेहद नकारात्मक छोटा या बड़ा कोई भी घटनाक्रम चंद मिनटों में ही देश-दुनिया की मीडिया कि हैडलाइन बन कर जबरदस्त सुर्खियों में छा जाता है। ऐसा ही एक गालीगलौच और अभद्रता के आपसी विवाद का प्रकरण नोएडा सेक्टर 93 की बेहद पॉश सोसाइटी ग्रैंड ओमैक्स सोसाइटी में 5 अगस्त को घटित हो गया था। इस विवाद के एक वायरल वीडियो में यह देखा जा सकता है कि सोसाइटी की एक महिला ने अपनी आवासीय सोसाइटी में नियमों के उल्लंघनों का हवाला देते हुए स्वयं को भाजपा नेता कहने वाले श्रीकांत त्यागी के द्वारा वहां पर लगाये जा रहे पेड़ों पर आपत्ति जताई थी, जिसको लेकर दोनों पक्षों में हुई गर्मागर्म बहस में श्रीकांत त्यागी ने उक्त महिला को अपशब्द बोलते हुए पीछे धकेल दिया था। लेकिन बाद में जब यह वीडियो सोशल मीडिया पर बहुत तेजी से वायरल हुआ, तो नोएडा पुलिस तेजी से हरकत में आई और उसने तत्काल इस मामले में केस दर्ज करने का कार्य किया, जिसके बाद से श्रीकांत त्यागी घटनास्थल से फरार हो गया था। फिलहाल मुख्य आरोपी श्रीकांत त्यागी पुलिस की गिरफ्त में आ चुका है और उसके खिलाफ पुलिस-प्रशासन की कार्यवाही चल रही है। हालांकि यह तो आने वाले समय में न्यायालय ही तय करेगा कि आखिरकार दोषी कौन है।

लेकिन इस मसले पर देश में ओछी राजनीति जारी है, जब देश के विभिन्न राजनीतिक दलों को यह पता चला कि श्रीकांत त्यागी का कुछ ना कुछ जुड़ाव चाहे वो एकतरफा हो सत्ता पक्ष भाजपा से है तो इस मसले को बहुत तेजी के साथ जबरदस्त ढंग से तूल दिया गया, देखते ही देखते आपसी विवाद का यह मसला अब देश के चंद राजनेताओं व मीडिया की कृपा से एक बहुत बड़ा मुद्दा बन गया है। आरोप प्रत्यारोप से बचने के लिए ही आननफानन में भाजपा ने भी तत्काल समझदारी दिखाते हुए श्रीकांत त्यागी का पार्टी से कभी कोई नाता नहीं रहा है यह कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया है। सूत्रों के अनुसार साथ ही वह सभी चंद राजनेता, खास व आम लोग भी अब सार्वजनिक रूप से श्रीकांत त्यागी का बचाव करने से बचने लगे जो कभी उसके धन दौलत व भौकाल का लंबे समय से आनंद भोग रहे थे। आपसी विवाद के एक बेहद छोटे से मसले का तुरंत समाधान करने की जगह आज चंद राजनेताओं की कृपा से धरातल पर ऐसे तनावपूर्ण हालात बना दिये गये, जिसके बाद से श्रीकांत त्यागी पुलिस-प्रशासन, मीडिया, सोशल एक्टिविस्ट, आम व खास लोगों व देश के विभिन्न राजनेताओं के निशाने पर एक बड़े अपराधी के रूप में आ गया, मीडिया की टीआरपी की भूख को पूरा करने खातिर यह मामला चंद घंटों में ही बेहद गंभीर होता चला गया। सूत्रों की मानें तो इस मसले पर कहीं ना कहीं भारी दबाव में कार्य कर रही पुलिस ने हद तो उस वक्त कर दी जब वह खुद एक महिला के सम्मान के नाम पर छोटे-छोटे बच्चों की मां व श्रीकांत त्यागी की पत्नी को लंबे समय तक थाने में बिठाकर रखने का अघोषित अपराध जाने अंजाने कर बैठती है। उसके बाद धरातल पर जिस तरह के हालात बनाये गये और हमारे शासन प्रशासन, राजनेताओं व मीडिया का रवैया देखकर यह लगता है कि श्रीकांत त्यागी देश-दुनिया का सबसे बड़ा कुख्यात आतंकवादी है। हालात पर नज़र दौड़ाएं तो यह स्पष्ट है कि कभी श्रीकांत त्यागी के इशारे पर नाचकर उसकी सेवा करके माल कमाने में व्यस्त रहने वाला तथाकथित सिस्टम और उसको खुली छूट देना वाला सिस्टम ही आज श्रीकांत त्यागी की दुनिया को बहुत लंबी चौड़ी अपराध की सल्तनत बताकर उसको तबाह करके स्वयं ही अपनी पीठ थपथपाने में लगा हुआ है। 

लेकिन देश में हद तो उस वक्त हो जाती है कि जब बेहद अहंकार में वशीभूत होकर के हमारे प्यारे देश के चंद सम्मानित दिग्गज राजनेता व मीडिया का एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसे बेहद सभ्य, देशभक्त व बेहद बुद्धिजीवी, समाजसेवी, त्यागी समाज को टीआरपी के अपने क्षणिक स्वार्थों को पूरा करने के लिए निशाने पर लेकर के उसकी छवि खराब करने पर आमादा हो जाते हैं। देश में अभद्रता का आलम यह हो गया है कि शीर्ष मीडिया घराने, देश के चंद दिग्गज राजनेता व चंद बेहद जिम्मेदार लोगों ने भी सार्वजनिक रूप से व देश दुनिया के सोशल मीडिया के विभिन्न ताकतवर प्लेटफॉर्मों पर त्यागी समाज की छवि को ठेस पहुंचाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। इन चंद लोगों की बेहद ग़लत करतूतों ने उस देशभक्त, नियम-कायदे-कानून पसंद, बेहद सभ्य, समाजसेवा के लिए हमेशा तत्पर रहने वाले व बेहद सम्मानित त्यागी समाज को गालीबाज़ त्यागी, लंगड़ा त्यागी, गुंडा त्यागी, भगोड़ा त्यागी, गोलीबाज़ त्यागी, दबंग त्यागी आदि ना जाने कितने ग़लत जातिसूचक संबोधनों से संबोधित करने का जघन्य अपराध किया है, जो स्थिति देश व समाज की एकता अखंडता के लिए बिल्कुल भी उचित नहीं है। जिस तरह से श्रीकांत त्यागी के मसले पर हमारे देश के चंद दिग्गज राजनेताओं ने एक व्यक्ति के कृत्य के लिए पूरी जाति विशेष को निशाना बनाया है वह सरासर ग़लत है। वहीं हर वक्त टीआरपी की अंधी दौड़ में उतावली रहने वाली भारतीय मीडिया ने अपनी एकतरफा रिपोर्टिंग में जिस तरह से त्यागी समाज को बेहद आपत्तिजनक जातिसूचक विश्लेषणों से नवाजा है वह देश के सभ्य समाज के लिए बिल्कुल भी उचित नहीं है। आज हम लोगों के साथ-साथ, देश के सभी बेहद जिम्मेदार राजनेताओं, मीडिया संस्थानों व शासन प्रशासन मैं बैठे लोगों को भी यह समझना होगा कि एक व्यक्ति के द्वारा किये गये कृत्य के लिए चंद लोग कैसे किसी भी पूरे समाज को जिम्मेदार ठहराते हुए उसके मान सम्मान व भावनाओं से खिलवाड़ कर सकते हैं।

देश के जिम्मेदार पदों पर आसीन लोगों व संस्थानों को समय रहते यह समझना चाहिए कि भारत में तो जाति धर्म के नाम पर वैसे ही दिन-प्रतिदिन लोगों के बीच चौड़ी खाई बनती जा रही है, फिर वह क्षणिक लाभ के लिए ऐसी ग़लती बार-बार क्यों कर रहे हैं। आज मेरा देश के नीतिनिर्माताओं से विनम्र अनुरोध है कि देश में फिर कभी किसी जाति या धर्म के साथ भविष्य में ऐसी स्थिति ना बने सके इसके लिए तत्काल कानून बनाकर रोक लगानी चाहिए। वहीं एक व्यक्ति के कृत्य के चलते पूरे समाज को कटघरे में खड़ा करके इस तरह बदनाम करने वाले लोगों व संस्थानों को तत्काल सख्त चेतावनी देने की कानूनी कार्यवाही करनी चाहिए, जिससे कि भविष्य में वह फिर कभी किसी के साथ इस तरह के शर्मनाक कृत्य की पुनरावृति ना कर सकें। वहीं श्रीकांत त्यागी के इस पूरे मसले के बाद धरातल पर लगातार जिस तरह से देश के बेहद सम्मानित, देशभक्त त्यागी समाज को निशाने पर लिया जा रहा है, उन हालातों पर भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को भी शांतचित्त से विचार अवश्य करना चाहिए कि कहीं यह किसी व्यक्ति या दल के द्वारा भाजपा के परंपरागत त्यागी वोटबैंक को उससे दूर करने का कोई बड़ा षड्यंत्र तो नहीं है। कहीं यह सब कुछ लोगों के द्वारा हिन्दू धर्म के बेहद मजबूत स्तंभ त्यागी समाज को बदनाम करने की कोई  सुनियोजित बहुत बड़ी साजिश तो नहीं है। क्योंकि जिस तरह से इस पूरे घटनाक्रम के बाद देश में चंद दिग्गज राजनेताओं व मीडिया घरानों ने त्यागी समाज के मान सम्मान व छवि को धूमिल करने का दुस्साहस किया है, वह स्थिति केवल त्यागी समाज के खिलाफ़ ही नही है, बल्कि देश की एकता अखंडता व पूरे हिन्दू धर्म के खिलाफ है। वैसे भी इन चंद लोगों को यह ध्यान रखना चाहिए कि देश की आज़ादी की जंग से लेकर के, आज के आधुनिक भारत के नव निर्माण में देशभक्त व मेहनतकश 'त्यागी समाज' का अपना एक बेहद अनमोल योगदान हमेशा रहा है, उस पर क्षणिक राजनीतिक स्वार्थ व ओछी राजनीति के लिए यूं बेवजह प्रश्नचिन्ह लगा कर सवाल खड़ा करना बिल्कुल भी उचित नहीं है।

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।

सोमवार, 8 अगस्त 2022

महात्मा गांधी का 'ग्राम स्वराज' का सपना आखिर कब होगा पूरा! दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक


महात्मा गांधी का 'ग्राम स्वराज' का सपना आखिर कब होगा पूरा!

दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप
वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक

भारत की आज़ादी को 15 अगस्त 2022 को 75 वर्ष पूरे हो जायेंगे,  भारतीय इतिहास के इस बेहद महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अवसर को यादगार बनाने के लिए केन्द्र की नरेंद्र मोदी सरकार आजादी की गौरवशाली 75वीं वर्षगांठ को पूरे देश में 'अमृत महोत्सव' के रूप में विभिन्न प्रकार के भव्य कार्यक्रमों का आयोजन करके धूमधाम से मना रहा है। इस महोत्सव की शुरुआत 12 मार्च 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के अहमदाबाद में स्थित स्वयं महात्मा गांधी के द्वारा स्थापित ऐतिहासिक 'साबरमती आश्रम' में 'दांडी मार्च’ को हरी झंडी दिखा कर की थी। इस पल को यादगार बनाने के लिए केन्द्र सरकार देश की आजादी के 75 वर्ष पूरे होने से 75 हफ्ते पहले यानी की 12 मार्च 2021 से ही देश में 'अमृत महोत्सव' के रूप में विभिन्न छोटे व बड़े कार्यक्रमों का आयोजन करके मना रहा है, जो कि एक वर्ष बाद 15 अगस्त 2023 तक निरंतर चलते रहेंगे। आज़ादी की 75वीं वर्षगांठ का यह अवसर सभी देशवासियों के लिए बेहद अहम है। हालांकि देशवासियों के मन में देश के सर्वांगीण विकास को लेकर आज भी बहुत सारे ज्वलंत सवाल उठ रहे हैं, वह देश के सिस्टम से उनका स्थाई निदान चाहते हैं, ऐसा ही एक सवाल देश के ग्रामीण अंचलों के विकास का है।

*" लेकिन 'अमृत महोत्सव' के इस बेहद गौरवशाली अवसर पर हम सभी देशवासियों को, देश के सभी नीतिनिर्माताओं व ताकतवर कर्ताधर्ताओं को हर हाल में यह आत्ममंथन अवश्य करना चाहिए कि क्या हम लोग देश की आज़ादी के लिए प्राण न्यौछावर व संघर्ष करने वाले मां भारती के वीर सपूतों के सपनों के वास्तविक भारत का 75 वर्ष बाद भी धरातल पर वास्तव में निर्माण कर पाये हैं क्या। आज़ादी के 75 वर्ष बाद भी क्या हमारा सिस्टम देश के गांवों में निवास करने वाली सत्तर फीसदी ग्रामीण आबादी का समुचित सर्वांगीण विकास कर पाया है क्या।"*

वैसे भी आजकल देश में जिस तरह का माहौल व्याप्त हो गया है, वह महात्मा गांधी के सपने को पूरा करने में व देश के सर्वांगीण विकास में खुद ही एक बहुत बड़ा बाधक है। आज सरकार व आम जनमानस को तत्काल ही इस तरह के तनाव पूर्ण माहौल को समाप्त करने के लिए धरातल पर बेहद सख्त ठोस पहल करनी चाहिए। हम लोगों को समय रहते यह समझना होगा कि सर्वांगीण विकास, एकता-अखंडता के लिए देश में शांति व आपसी भाईचारे को हर हाल में कायम रखना बेहद जरूरी है। आज जो स्थिति देश में बनी हुई है उस हाल में हम सभी देशवासियों, शासन व प्रशासन में बैठे हुए लोगों व नीतिनिर्माताओं के लिए विचारणीय तथ्य यह है कि क्या देश की आज़ादी की 75वीं वर्षगांठ तक भी देश में अमन चैन, शांति, अनुशासन व नियम-कायदे-कानून का राज स्थापित होकर के महात्मा गांधी के 'ग्राम स्वराज' का सपना पूरा हो पाया है क्या। आम जनमानस से यह प्रश्न पूछने पर देश में हर तरफ से केवल एक ही आवाज़ आयेगी की आज़ादी के 75 वर्षों के बाद भी हम महात्मा गांधी के सपनों का भारत व 'ग्राम स्वराज' की कल्पना को धरातल पर मूर्त रूप देने में पूर्णतः विफल रहे हैं।

*" हालांकि देश-दुनिया में यह सर्वविदित है कि गांधीवादी विकास की अवधारणा में 'ग्राम स्वराज' का विशेष महत्व है। महात्मा गांधी ही हमेशा मानते थे कि आज़ाद भारत के पुनर्निर्माण में देश के ग्रामीण अंचल के क्षेत्रों का सबसे अहम योगदान रहेगा। महात्मा गांधी अच्छे से जानते थे कि गांव के पुनर्निर्माण व विकास पर ही देश का सर्वांगीण विकास निर्भर करता है, इसलिए महात्मा गांधी ने 'ग्राम स्वराज' का सपना देखा था। वैसे भी महात्मा गांधी ने जिस स्वराज की परिकल्पना की थी, वह देश में दूर-दूर तक नज़र नहीं आता है। आज 'ग्राम स्वराज' के केंद्र में वर्ष 2022 के आंकड़ों के अनुसार देश के 6,28,221 गांव विशेष रूप से आते हैं। गांधी की इस 'ग्राम स्वराज' परिकल्पना में देश के सभी गावों को पूर्ण रूप से  आत्मनिर्भर बनाते हुए, गावों की स्वतंत्र, स्वावलंबी एवं  प्रबंधन सत्ता का लक्ष्य हासिल करना था, लेकिन अफसोस आज आज़ादी के 75 वर्ष बाद भी गांधी का यह सपना बहुत दूर की बात बना हुआ है "*

महात्मा गांधी अच्छे से जानते थे कि भारत को विश्वगुरु बनाने का रास्ता देश के गांवों से निकलता है, इसके लिए देश के ग्रामीण अंचल को हर हाल में अपने पैरों पर खड़ा करना होगा। इसलिए ही महात्मा गांधी ने 'ग्राम स्वराज' की परिकल्पना के रूप में एक बेहद विस्तृत खाका आत्मनिर्भर गांवों के एक महत्वपूर्ण विचार के साथ ताकतवर भारत की परिकल्पना को धरातल पर साकार करने के लिए भारत की आजादी से वर्षों पहले ही बना लिया था। महात्मा गांधी के इस प्रस्तावित 'ग्राम स्वराज' के सपने में देश की सत्तर फीसदी ग्रामीण आबादी के जीवन स्तर को सुधारने के लिए एक बृहद रणनीति थी। महात्मा गांधी ग्रामीण क्षेत्रों के पुनर्निर्माण के लिए देश में 'ग्राम स्वराज' की एक अनूठी अवधारणा पर कार्य करना चाहते थे। उनके इस दृष्टिकोण का मुख्य लक्ष्य देश के लाखों गांव का विकास करते हुए वहां की ग्रामीण आबादी को अपने पैरों पर खड़ा करने का था। महात्मा गांधी यह अच्छे से जानते थे कि भारत का पुनर्निर्माण देश के ग्रामीण क्षेत्रों के पुनर्निर्माण पर ही निर्भर करता है। लेकिन अफसोस आज हमारा सिस्टम आज़ादी के 75 वर्षों के बाद भी महात्मा गांधी व देश के अन्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के सपनों के भारत का निर्माण करने में विफल रहा है। देश में गांवों का विकास करने का प्रयास तो किया गया, लेकिन महात्मा गांधी के 'ग्राम स्वराज' की अवधारणा के अनुरूप देश के गांवों का पुनर्निर्माण करने के मामले में हमारा सिस्टम बहुत पिछड़ गया है। जिसके चलते ही आज धरातल पर स्थित बेहद भयावह होती जा रही है, ग्रामीण अंचलों से शिक्षा, चिकित्सा जैसी मूलभूत सुविधाओं व रोजीरोटी की तलाश में गांवों से बड़े पैमाने पर लोगों का शहरों की तरफ पलायन हो रहा है, जिसके चलते देश के विभिन्न शहरों का बहुत ही अव्यवस्थित ढंग से विस्तार होकर अंधाधुंध शहरीकरण होता जा रहा है, जिसकी वजह से शहरों में भी एक बहुत बड़ी आबादी नारकीय हालत में जीवनयापन करने के लिए मजबूर है। फिर भी निरंतर बड़ी संख्या में ग्रामीण आबादी गांवों से पलायन करके भारत के विभिन्न शहरी क्षेत्रों में काम धंधे की तलाश करने के लिए पहुंच रही है, क्योंकि गांव में मूलभूत सुविधाओं का पूर्ण रूप से अभाव है। उसके बावजूद भी हमारे देश का सिस्टम ग्रामीण आबादी के शहरी क्षेत्रों में पलायन करके आने के मुख्य कारणों का निदान करने में नाकाम है। वह आज़ादी के 75 वर्ष बाद भी ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों के दुष्कर जीवन स्तर को सरल बनाकर बेहतर बनाने में विफल रहा है। लेकिन अब वह समय आ गया है जब हमें देश व समाज के हित में महात्मा गांधी के सपने को पूरा करते हुए देश के ग्रामीण अंचल के पुनर्निर्माण के लिए 'ग्राम स्वराज' की परिकल्पना को धरातल पर अमलीजामा पहनाना होगा, अंधाधुंध शहरीकरण रोकने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूदा आय के विभिन्न स्रोतों जैसे कृषि, विभिन्न प्रकार के कुटिर उधोगों को बढ़ावा देकर लोगों की आय को बढ़ाकर गांव में ही बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा करके, ग्रामीण अंचल में कम आय व बेरोजगारी जैसे बेहद गंभीर मुद्दों का निदान करना होगा। सरकार को ग्रामीण अंचल में निवास करने वाले लोगों के जीवन स्तर को सरल बनाते हुए उसको ऊपर उठाने के लिए तेजी से कार्य करना होगा। आज समय की मांग है कि देश के लाखों गांव को भी आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित किया जाये, ग्रामीण अंचल में उच्च गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा व चिकित्सा सेवाओं को सुलभता से उपलब्ध करवाया जाये। हमारे सिस्टम को समझना होगा कि महात्मा गांधी ने अपने अनुभवों के आधार पर ही देश के ग्रामीण अंचल के पुनर्निर्माण के लिए आर्थिक विचारों का परिचय समय-समय पर दिया था, जिसमें वर्ष 1917 में चंपारण में ग्रामीण पुनर्निर्माण के प्रयोग, वर्ष 1920 में सेवाग्राम के प्रयोग, वर्ष 1938 में वर्धा का प्रयोग मुख्य हैं। गांधी ने हमेशा ग्रामीण पुनर्निर्माण के विचारों को पेश करते हुए अपने अनुयायियों और सहयोगियों से ग्रामीण क्षेत्रों के पुनर्निर्माण पर विशेष ध्यान केंद्रित करने का आग्रह किया था। महात्मा गांधी ने अपने 'ग्राम स्वराज' के सपने को पूरा करने के लिए समय-समय पर पंडित जवाहरलाल नेहरू से लिखित व मौखिक चर्चा की थी। उन्होंने नेहरू को लिखे अपने एक पत्र में प्रत्येक व्यक्ति के मानसिक, आर्थिक, राजनीतिक और नैतिक विकास के लिए समान अधिकार और अवसर देने का सुझाव दिया था। लेकिन ना जाने क्यों आज़ादी के बाद से ही देश में महात्मा गांधी के 'ग्राम स्वराज' के विचारों की उपेक्षा की जाने लगी, जिसका देश में परिणाम यह हुआ कि देश में गांवों से तेज़ी से पलायन हुआ और देश अंधाधुंध अव्यवस्थित  शहरीकरण की गंभीर बीमारी से ग्रस्त हो गया, जिसके चलते आज देश में गंभीर समस्याओं का अंबार लग गया है जो धन देश के विकास के लिए ख़र्च होना चाहिए था, वह धन देश में समस्याओं के निदान पर खर्च हो रहा है, जो कि भारत को विश्वगुरु बनाने की राह में बहुत बड़ा बाधक है।

।। जय हिन्द जय भारत ।।
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सोमवार, 25 जुलाई 2022

सोशल मीडिया को असभ्यता का अड्डा बनने से रोकना होगा! दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक

सोशल मीडिया को असभ्यता का अड्डा बनने से रोकना होगा!

दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप
वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक

भारतीय संविधान देश के प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की पूर्ण आज़ादी प्रदान करता है, लेकिन कानून के दृष्टिकोण से देखा जाए तो इसके बहुत सारे अपवाद भी मौजूद हैं। आप अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर किसी भी दूसरे व्यक्ति की अवमानना नहीं कर सकते हैं, किसी भी दूसरे व्यक्ति के मान-सम्मान को ठेस नहीं पहुंचा सकते हैं, समाज में  धार्मिक व जातिगत आधार पर किसी भी प्रकार की दुर्भावना व नफ़रत नहीं फैला सकते हैं। वैसे भी अभिव्यक्ति की आज़ादी का यह मतलब नहीं होता है कि आप देश में सर्वोच्च पदों पर आसीन लोगों के बारे में सोशल मीडिया के बेहद सशक्त प्लेटफार्म पर सार्वजनिक रूप से असंसदीय व असभ्य हैशटैग तक चलवाने का असभ्यता की पराकाष्ठा वाला कृत्य करो। यहां आपको मैं याद दिला दूं कि जिस तरह से सोशल मीडिया के सशक्त माध्यम के दुरुपयोग का नमूना 24 जुलाई 2022 को भारतीय राजनीति के संदर्भ में पूरी दुनिया ने देखा है, वह बेहद शर्मनाक था। उसके संदर्भ में कहा जा सकता है कि यह दिन भारतीय राजनीति के इतिहास में अंध भक्तों के भारी भीड़ के चलते एक ऐसे शर्मनाक दिन के रूप में दर्ज हो गया है, जब भारत के ही लोग अपने चुनें हुए संवैधानिक पदों पर आसीन जन प्रतिनिधियों के बारे गालियों का असभ्यता से परिपूर्ण हैशटैग बनाकर उसको खुद ही टॉप पर ट्रैंड करवाकर खुद अपनी पीठ थपथपा रहे थे। हालांकि सरकार को व आईटी कंपनियों को मिलकर यह तय करना चाहिए कि इस तरह के कृत्य की भविष्य में फिर कभी पुनरावृति ना होने पाये। इन असभ्य हैशटैग ने ना केवल व्यक्तिगत रूप से बल्कि मोदी व केजरीवाल सरनेम वाले सभी लोगों की भावनाओं को आहत करने का कार्य किया है। देश की केन्द्रीय जांच एजेंसियों को तत्काल इन असभ्य हैशटैगों की शुरुआत करने वाले लोगों की पहचान करनी चाहिए और उन सभी लोगों के खिलाफ मामला दर्ज करके इसके लिए जिम्मेदार सभी दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए, जिससे कि भविष्य फिर कोई व्यक्ति इस तरह की ओछी मानसिकता के द्वारा समाज में नफ़रत फ़ैलाने का व संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के बारे में ऐसे बेहूदगी भरे असभ्य शब्दों का उपयोग करने की जरूरत ना कर सकें। 

*" वैसे भी जिस तरह का दौर चल रहा है उसमें आज महात्मा गांधी के देश में लोकतांत्रिक मूल्यों की हर हाल में रक्षा व राजनीतिक सुचिता को बनाएं रखना बेहद अहम हो गया है। इसलिए अब आवश्यक हो गया है कि देश के प्रत्येक छोटे-बड़े राजनेताओं व उनके राजनीतिक समर्थकों के द्वारा जिस तरह से एक दूसरे के प्रति सार्वजनिक रूप से आयेदिन बेहद बेहूदगी पूर्ण व असभ्य असंसदीय भाषा का उपयोग किया जाने लगा है वह सब तत्काल बंद होना चाहिए। इन लोगों को समझना चाहिए कि क्षणिक राजनीतिक लाभ के लिए इस तरह की बेहद ओछी मानसिकता से परिपूर्ण विचार व राजनीतिक सोच पर अब लगाम लगनी चाहिए। क्योंकि इन चंद प्रभावशाली लोगों की एक-एक हरकतों को देश का आम जनमानस हूबहू कॉपी करके उपयोग करने का कार्य करता है, जिसके चलते सभ्य समाज में तेजी से असभ्यता बढ़ने का खतरा उत्पन्न हो गया है।"* 

वैसे तो भारतीय कानून सोशल मीडिया पर लोगों को केन्द्र की मोदी सरकार, केजरीवाल व अन्य किसी भी सरकार की नीतियों की आलोचना करने का पूरा हक भी प्रदान करता है। क्योंकि कोई भी सरकार जब जनता से किये गये अपने वादों को पूरे नहीं करेगी या जनता उसके कार्यों से संतुष्ट नहीं होगी, तो आम जनमानस के पास उस सरकार पर जमकर हमला बोलने का कार्य करने का सबसे सरल माध्यम सोशल मीडिया ही है। लेकिन सभ्य समाज में हमेशा शब्दों की गरिमा का ध्यान रखना हम सभी लोगों का नैतिक कर्तव्य व दायित्व है, सभ्य समाज में किसी भी व्यक्ति को असभ्यता करके उद्दंडता पूर्ण व्यवहार करने का अधिकार नहीं है, किसी की भावनाओं से खिलवाड़ करने का अधिकार नहीं है।

हम सभी लोगों को यह समझना होगा कि सोशल मीडिया अपने विचारों को दुनिया तक पहुंचाने का आज सबसे सशक्त व तेज प्लेटफॉर्म बन गया है। हम लोगों को इसका सकारात्मक उपयोग करते हुए देश, समाज, परिजनों व अपने हित में सदुपयोग करना चाहिए, ना कि सोशल मीडिया के द्वारा हम लोग समाज में असभ्य  व नफ़रती जहरीली सोच को फ़ैलाने के लिए प्रयोग करें। आज के व्यवसायिक दौर में यह हम सभी लोगों की व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म उपलब्ध करवाने वाली सभी कंपनियों की बेहद अहम जिम्मेदारी है कि सोशल मीडिया पर ऐसा तालमेल बनाएं कि लोगों की अभिव्यक्ति की आज़ादी के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक सदभाव की व्यवस्था भी पूर्णतः बरक़रार रहे। वैसे भी हम लोगों को सोशल मीडिया पर वायरल हो रही बातों को लेकर सचेत रहना होगा, उस पर आंख बंद करके विश्वास करने से बचना होगा, हमें यह समझना होगा कि सोशल मीडिया पर इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट मीडिया की तरह कोई एडिटर नाम की चीज़ नहीं होती है, जिससे कि गलत, भ्रामक, असभ्य व अश्लील तथ्यों को प्रकाशित होने से रोका जा सके या उसके लिए कंपनी के किसी व्यक्ति विशेष की जवाबदेही तय की जा सके। वैसे भी दुनिया में सोशल मीडिया का प्लेटफॉर्म उपलब्ध करवाने वाली आईटी कंपनियों को आईटी एक्ट के तहत बहुत सारी ज़िम्मेदारियों से छूट मिली हुई है, जिसके चलते वह केवल अपनी कंपनी का लाभ बढ़ाने में लगे रहते हैं और खर्च से बचने के लिए सोशल मीडिया के इस बड़े प्लेटफॉर्म को अभिव्यक्ति की आज़ादी की आड़ में फ्री छोड़ देते हैं। जिसके चलते ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का ग़लत कार्यों के लिए धड़ल्ले से उपयोग हो रहा है, षड्यंत्रकारी लोग विभिन्न फ़र्ज़ी नामों से आईडी बना कर सोशल मीडिया के माध्यम से अपना ग़लत अनैतिक मकसद पूरा करते हैं और बड़े पैमाने पर लोग पोस्ट को लाईक, कमेंट व शेयर करके अंजाने में उनका सहयोगी बन जाते हैं। आज सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म उपलब्ध करवाने वाली आईटी कंपनियों को यह समझना होगा कि अगर इस तरह से ही उनके प्लेटफॉर्म पर अश्लीलता, नफ़रती व जहरीली सोच और असभ्यता का प्रचार-प्रसार होता रहा तो वह दिन दूर नहीं है जब सभ्य समाज के अधिकांश सभ्य लोग सोशल मीडिया से पूरी तरह से किनारा करने लगेंगे।।

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।