शनिवार, 13 जून 2020

विश्व रक्तदान दिवस 14 जून पर विशेष - जिंदगी में रखना ध्यान रक्त की कमी से न जाये किसी व्यक्ति की जान

विश्व रक्तदान दिवस 14 जून पर विशेष -

जिंदगी में रखना ध्यान रक्त की कमी से न जाये किसी व्यक्ति की जान  

दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप
स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व रचनाकार

14 जून के दिन को 'विश्व रक्तदान दिवस' के रूप में विश्व के बहुत सारे देशों में बड़े पैमाने पर स्वैच्छिक रक्तदान करके मनाया जाता है। इस दिन को मनाने का मुख्य उद्देश्य है कि किसी भी व्यक्ति के जीवन को बचाने के लिए अगर उसको कभी अचानक रक्त की ज़रूरत पड़े, तो उसके जीवन के लिए सुरक्षित रक्त उस समय उसके आसपास के लोगों की रक्तदान करने के प्रति जागरूकता की वजह से सुलभता से उपलब्ध हो सके और रक्त के लिए उसको या उसके परिजनों को पैसे देने की ज़रूरत न पड़े। किसी व्यक्ति की जिंदगी में रक्त बेहद आवश्यक जीवन रक्षक तत्व है, क्योंकि रक्त ही हमारे शरीर के सभी ऊतकों और अंगों के लिए महत्वपूर्ण जीवन रक्षक पोषण प्रदान करता है। इसलिए 'विश्व रक्तदान दिवस' समाज में लोगों को जागरूक करके स्वैच्छिक रूप से रक्तदान के लिए प्रेरित करने का एक महान परिवर्तन लाने के उद्देश्य से मनाया जाता हैं। वैसे भी रक्तदान एक ऐसा जीवन रक्षक कारगर उपाय है जिसका अनुसरण करने से अचानक हुई किसी भी प्रकार की प्राकृतिक आपदा, दुर्घटना, हिंसा और चोट के कारण घायल, गंभीर बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति, जीवन दायनी मातृ शक्ति को डिलिवरी के समय और नवजात बच्चों की देखभाल में रक्त की आवश्यकता, थैलीसीमिया जैसी गंभीर बिमारी से पीड़ित बच्चों को रक्त की आवश्यकता और किसी भी व्यक्ति के जीवन में समय-समय पर अन्य अनेक प्रकार की सुरक्षित रक्त की जरूरत वाली आकास्मिक परिस्थितियों से निकलने के लिए समाज के बहुत सारे इंसान व इंसानियत के मित्र अच्छे व जागरूक लोगों के द्वारा स्वैच्छिक रक्तदान को अपनाया जाता है।

विश्व रक्तदान दिवस का इतिहास -  
इस दिन को महान वैज्ञानिक कार्ल लैंडस्टीनर की जन्मदिवस के उपलक्ष्य में मनाया जाता है,  कार्ल लैंडस्टीनर का जन्म 14 जून 1868 को ऑस्ट्रिया के शहर वियाना में हुआ था। उन्होंने ही रक्त के विभिन्न ब्लड ग्रुप का पता लगाया था और यह जाना था कि एक व्यक्ति का खून बिना किसी जांच के दूसरे व्यक्ति को नहीं चढ़ाया जा सकता है, क्योंकि हर एक व्यक्ति का ब्लड ग्रुप अलग-अलग होता है। कार्ल लैंडस्टीनर का अपनी खोज के अनुसार तर्क था कि दो व्यक्तियों के अलग-अलग ब्लड ग्रुप संपर्क में आने के साथ रक्त के अणुओं पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। कार्ल लैंडस्टीनर ने वर्ष 1900-1901 के दौरान खून के एबीओ रक्त समूह और रक्त में मिलने वाले एक बेहद अहम तत्व आरएच फैक्टर की जीवन की रक्षा के लिए बेहद आवश्यक खोज को अंजाम देकर, लोगों के अनमोल जीवन को बचाने के लिए मील के पत्थर वाली खोज को सफलतापूर्वक पूर्ण किया था। शरीर विज्ञान के लिए किये गये अभूतपूर्व खोज के कार्य के लिए ही वर्ष 1930 में उन्हें नोबल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। अपनी जीवन रक्षक महान खोज के कारण उन्हें ट्रांसफ्यूजन मेडिसन का पितामह भी कहा जाता है। इसलिए इस महान ऑस्ट्रियाई जीवविज्ञानी और भौतिकीविद की याद में उनके जन्मदिन 14 जून को 'विश्व स्वास्थ्य संगठन' द्वारा हर साल 'विश्व रक्तदान दिवस' के रूप में वर्ष 2004 से मनाया जाता है। वर्ष 1997 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 100 फीसदी स्वैच्छिक रक्तदान की जीवन रक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण नीति की नींव डाली थी। वर्ष 1997 में संगठन ने यह लक्ष्य रखा था कि विश्व के प्रमुख 124 देश अपने यहाँ स्वैच्छिक रक्तदान को ही बढ़ावा दें, लेकिन लगभग 49 देशों ने ही इस नीति पर अभी तक अमल किया है। आज दुनिया में यह स्थिति है कि तंजानिया जैसे छोटे देश में भी 80 प्रतिशत रक्तदाता किसी को रक्त देने के एवज में पैसे नहीं लेते हैं, ब्राजील में तो यह क़ानून है कि आप रक्तदान करने के पश्चात् किसी भी प्रकार की सहायता नहीं ले सकते। ऑस्ट्रेलिया के साथ साथ कुछ अन्य देश भी हैं जहाँ पर रक्तदाता  रक्त के बदले पैसे बिलकुल भी नहीं लेते। लेकिन अभी भी कई देश ऐसे हैं जिनमें अपना देश भारत भी शामिल है, जहां बहुत सारे  रक्तदाता अभी भी रक्त देने के बदले चोरीछिपे या खुलेआम पैसे ले लेते हैं।

भारत में रक्तदान की स्थिति पर 'विश्व स्वास्थ्य संगठन' के आंकड़ों  पर नजर डाले, तो उसके अनुसार  देश में सालाना एक करोड़ यूनिट रक्त की आवश्यकता होती है, लेकिन बहुत प्रयास के बाद भी करीब 75 फीसदी रक्त ही बमुश्किल उपलब्ध हो पाता है, जिसके चलते लगभग 25 लाख यूनिट रक्त के अभाव में हर साल लाखों मरीज़ असमय काल का ग्रास बन जाते हैं। अफसोस की बात यह है कि केंद्र व राज्य सरकार, देश की बहुत सारी स्वंयसेवी संस्थाओं और जागरूक युवाओं की टोली के धरातल से लेकर प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, सोशल मीडिया तक सामुहिक प्रयास के बाद भी 135 करोड़ की आबादी वाले देश में स्वैच्छिक रक्तदाताओं का आंकड़ा कुल आबादी का एक प्रतिशत भी नहीं पहुंच पाया है। जिसका एक बहुत बड़ा कारण यह है कि लोगों में रक्तदान से जुड़ी जागरुकता का ना होना और उनके बीच में रक्तदान करने के बारे में बिना वजह का भय होना जिम्मेदार है।

चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार भारत में कुल रक्तदान का केवल 59 फीसदी रक्तदान स्वैच्छिक होता है। जबकि हम देश की पढ़ीलिखी राजधानी दिल्ली की बात करें तो स्वैच्छिक रक्तदान मात्र केवल 32 फीसदी ही हो पाता है। दिल्ली में लगभग 53 ब्लड बैंक हैं लेकिन फिर भी लगभग एक लाख यूनिट रक्त की हर वर्ष कमी होती है। वहीं दुनिया के कई सारे ऐसे छोटे-छोटे देश हैं जो इस मामले में भारत को काफ़ी पीछा छोड़ देते हैं। जैसे कि नेपाल में कुल रक्त की ज़रूरत का 90 फीसदी स्वैच्छिक रक्तदान से पूरा होता है तो हमारे पड़ोसी देश श्रीलंका में 60 फीसदी, थाईलैंड में 95 फीसदी, इंडोनेशिया में 77 फीसदी और बर्मा में 60 फीसदी रक्त की जरूरत का हिस्सा लोगों के द्वारा किये गये स्वैच्छिक रक्तदान से पूरा हो जाता है।

आज अपने लोगों के अनमोल जीवन को बचाने की खातिर, देश में लगातार चल रहे उस 25 लाख यूनिट रक्त के अभाव को जल्द से जल्द खत्म करने के लिए हम सभी देशवासियों को संकल्प लेकर धरातल पर कारगर ठोस पहल करनी होगी। हमको बहुत जल्दी समझना होगा कि किसी व्यक्ति के द्वारा रक्तदान करना एक अन्य व्यक्ति को जीवन प्रदान करने वाली बेहद महत्वपूर्ण घटना होती है, इसलिए हम सभी लोग हमेशा कहते हैं कि रक्तदान महादान होता है, इसका दान करने से किसी का व्यक्ति का बेहद अनमोल जीवन समय रहते रक्त मिलने से बचाया जा सकता है। आपके रक्त की हर एक बूंद का कतरा-कतरा किसी व्यक्ति के नव जीवन का कारगर स्रोत बन सकता है। हम सभी को अपने जीवन में हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि रक्त की कमी से कभी किसी व्यक्ति की जान न जाए और हर जरूरतमंद व्यक्ति को निशुल्क सुरक्षित रक्त सुलभता से प्राप्त हो। हमको भविष्य में देश में यह लक्ष्य रखना होगा की रक्त के बदले रक्त मिलने झंझट से स्वैच्छिक रक्तदाताओं की बदोलत मुक्ति मिले। आज देश में रक्त की कमी को दूर करने के लिए समाज के लोगों द्वारा जागरूकता करने के ठोस सामुहिक प्रयास धरातल पर रोजमर्रा के व्यवहार में होने चाहिए। लेकिन एक अच्छी बात यह भी है कि आज लोगों की जान बचाने की बेहतरीन सोच के साथ देश में स्वैच्छिक रूप से रक्तदान करने वाले युवा वर्ग के बहुत सारे लोग रक्त के जरूरतमंद लोगों को सुरक्षित ढंग से रक्तदान करके जान बचाने की मुहिम में निस्वार्थ सेवा भाव से बड़ी संख्या में लगे हुए हैं। स्वयं मैंने भी वर्ष 1998 में प्रथम बार रक्तदान किया था जब से ही यह प्रक्रिया लगातार चल रही है, न जाने अभी तक मैंने मेरे दोस्तों व मेरे भाईयों ने हर तीन माह के बाद कितनी बार रक्तदान किया है इसका जीवन में कभी हिसाब नहीं रखा है, बस हम सभी को रक्तदान करके एक बहुत ज्यादा आत्म संतुष्टि का भाव मिलता और किसी के जीवन बचाने की खुशी जो मिलती है उसका शब्दों में बयां करना मुश्किल है। रक्तदान करने के अपने अनुभव के आधार  पर मैं रक्तदान करने में भय का सामना करने वाले उन सभी लोगों से कहना चाहता हूँ कि रक्तदान करने के बाद मुझको तो कभी भी कोई समस्या नहीं हुई है बल्कि हमेशा आत्मसंतुष्टि मिलती है।
आज भी रक्तदान करते समय एक तो रेयर ब्लड ग्रुप वाले कुछ लोगों की रक्तदान न करने की इच्छा देखकर बेहद आश्चर्य होता है और वहीं कुछ लोगों की ओछी सोच व बिना मतलब का भय देखकर बहुत अफसोस होता है। कभी-कभी तो स्थिति यह होती है कि व्यक्ति खुद व अपने बच्चों को तो अपने ही मरीज को रक्त देने के लिए तैयार नहीं कर पाते हैं और बाहर के लोगों को बुलाकर उनका रक्त अपने मरीज के लिए बहुत बड़े अधिकार से लेते हैं ऐसे लोगों को समय रहते अपनी सोच को जल्द से जल्द बदलना होगा। जबकि हमारे डॉक्टर व सरकार लगातार कहते है कि एक स्वस्थ व्यक्ति को तीन माह के अंतराल पर रक्तदान करने से शरीर को कोई हानि नहीं होती है, 21 दिन में पुनः रक्त का निर्माण हो जाता है, मेरा स्वयं का अनुभव है कि रक्तदान करने के बाद हमेशा मेरे शरीर को नये जोश व स्फूर्ति का अनुभव होता है। वैसे भी डॉक्टरों के अनुसार रक्तदान करने से आपके शरीर को किसी प्रकार का नुकसान नहीं होता है, बल्कि आपको बहुत सारे लाभ होते हैं। जैसे कि आपको किसी का जीवन बचाने पर आत्मसंतोष मिलता है। रक्तदान करने से आपके शरीर में रक्त में स्वच्छता बनी रहती है और नया रक्त बनने की प्रक्रिया तेज हो जाती है। डॉक्टरों के अनुसार शोध से पता चलता है कि रक्तदान करने से रक्तदाता के शरीर में जमा कोलेस्ट्रॉल की मात्रा नियंत्रित होती है और ह्रदय रोग की संभावना कम हो जाती है। भविष्य में कभी रक्त की आवश्यकता होने पर आपको स्वयं के लिए या आपके परिवार के किसी सदस्य के लिए ब्लड बैंक से रक्त लेने में आपको हमेशा प्राथमिकता मिल जाती है।


रक्तदान पर मैं अपनी चंद पंक्तियों के माध्यम से सभी से कहना चाहता हूं कि - 

"हम जिंदगी में रखेंगे हमेशा ध्यान,
देश में अब रक्त की कमी से न जायेगी,
किसी भी जरूरतमंद व्यक्ति की जान,
यह है हमारा कर्म सबसे बड़ा और महान,
वैसे भी दुनिया वालों रक्तदान होता है महादान,
इसलिए जागरूक बनकर करों हमेशा,
लोगों के जीवन की रक्षा के लिए रक्तदान ।।"

हमारे देश में रक्तदान करने को लेकर अभी तक नाममात्र की जागरूकता है, देश के युवा वर्ग में  रक्तदान करने को लेकर पूरी तरह से जागरूकता आनी अभी बाकी है। रक्तदान करने के संदर्भ में देश में अशिक्षित लोगों के साथ-साथ शिक्षित वर्ग के भी अधिकांश लोगों ने भी तरह-तरह की भ्रांतियां अपने मन में पाल रखी हैं, अधिंकाश लोगों में अब भी यह भ्रांति फैली हुई है कि एकबार या बारबार रक्तदान करने से शरीर में रक्त की भारी कमी हो जाती है, जो कि डॉक्टरों के अनुसार एकदम असत्य बात है, जबकि सत्य यह है कि रक्तदान करने से शरीर में रक्त की कोई कमी नहीं होती है, बल्कि रक्त बढ़ता है और शरीर में नये शुद्ध रक्त का नव संचार होता है। एक स्वस्थ मनुष्य में रक्तदान करने के बाद 21 दिनों के भीतर ही शरीर अपनी जरूरत के मुताबिक पुनः रक्त निर्माण कर लेता है। इसलिए किसी भी स्वस्थ व्यक्ति को रक्तदान करने से बिल्कुल भी नहीं बचना चाहिए।  
आज हम सभी देशवासियों को यह संकल्प लेना चाहिए कि भविष्य में किसी भी व्यक्ति की जान अपने देश में अब रक्त के अभाव में नहीं जायेगी और किसी भी व्यक्ति के अनमोल जीवन की रक्षा के लिए रक्तदान करना हम सभी लोगों की एक बेहद महत्वपूर्ण नैतिक व सामाजिक जिम्मेदारी होगी, जिसका हम सभी विशेषकर देश के युवा वर्ग के लोगों को बेहद जिम्मेदारी के साथ निर्वहन करना है। आज हम लोगों को हमेशा उन सभी लोगों की मदद करने के लिए तत्पर तैयार रहना चाहिए जिन्हें वक्त बेवक्त रक्त की आवश्यकता पड़ती है, यही सबसे बड़ी सेवा है। क्योंकि हमारे सनातन धर्म की गौरवशाली परंपरा के अनुसार "नर सेवा ही नारायण सेवा है।" 

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।

शनिवार, 6 जून 2020

बड़े-बड़े धनासेठों को मदद करना सीखना होगा अभिनेता सोनू सूद से

बड़े-बड़े धनासेठों को मदद करना सीखना होगा अभिनेता सोनू सूद से 

दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप
स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व रचनाकार

देश में कोरोना वायरस संक्रमण का भयावह आपदाकाल चल रहा है, हर वर्ग के लोगों का अपनी व अपने परिवार के लोगों की अनमोल जिंदगियों को बचाने के लिए लॉकडाउन में लगातार संघर्ष जारी है। इस घातक आपदा के समय में देश के अलग-अलग हिस्सों में फंसे हुए देश के शिल्पकार मजदूर बहुत परेशान हैं, वह रोजीरोटी की दिक्कत होने के चलते जल्द से जल्द अपने घर वापस जाना चाहते हैं, आपदा के समय में भारी संख्या में मजदूर सिस्टम से निराश व हताश होकर पैदल, साईकिल, रिक्शा, आटो रिक्शा व अन्य अवैध साधनों से अपनी जान जोखिम में डालकर घर वापस जा रहे थे। सरकार के स्तर पर मजदूरों को घर वापस भेजने के जो प्रयास किये जा रहे थे वो नाकाफी साबित हो रहे थे। उस समय मजदूरों को देश के बड़े-बड़े धनासेठों से मदद की बहुत ज्यादा उम्मीद थी, हालांकि बहुत सारे लोगों ने गरीब मजदूरों की अपनी क्षमता के अनुसार भोजन राशन आदि देकर मदद भी की, लेकिन वो इस भयंकर कोरोना वायरस संक्रमण के आपदाकाल में जब हर तरफ सब कुछ कामधंधा बंद था तो उस समय नाकाफी हो रही थी। 

इस बेहद मुश्किल समय में जब लोग बेहद परेशान होकर परदेश में अपने परिवार से दूर लाचार चिंतित होकर बैठे थे। तो ऐसे ही हजारों लाचार मजबूर लोगों की मदद के लिए देश में एक हाथ अभिनेता सोनू सूद के रूप में आगे बढ़ा जिसने देश के इन लाचार गरीब मजबूर मजदूरों को सहारा देकर उनके घर वापस भेजकर परिवार से मिलाने की ठानी। सोनू सूद अपने इस एक कदम से फिल्मों की रील के हीरो से एकाएक मजबूर लोगों की रियल लाइफ में जान बचाने वाले हीरो बनकर उभरे हैं। भयंकर आपदा के समय में जरूरतमंद मजबूर लोगों की मदद करके सोनू सूद आज लाखों लोगों के रियल हीरो बन गये हैं। आज देश में स्थिति यह हो गयी है कि अभिनेता सोनू सूद अपनी समाजसेवा के दम पर फिल्मी दुनिया के साथ-साथ सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बेहद चर्चित चेहरे बन गये हैं, आज देश में सोनू सूद के मदद के हजारों कारनामों पर ऐसी जबरदस्त स्क्रिप्ट लिखी गई है जो शायद आज से पहले कभी किसी फिल्मी दुनिया के व्यक्ति के बारे में शायद ही लिखी गई हो। जिस तरह से अपनी रोजीरोटी गंवा चुके लोगों के लिए अभिनेता सोनू सूद ने अपनी तिजोरी का ताला आपदा में लाचार मजबूर हो गये हजारों गरीब मजदूरों की मदद करने के लिए खोल दिया वह बहुत काबिलेतारीफ है। अभिनेता सोनू सूद ने लॉकडाउन के दौरान महाराष्ट्र ही नहीं बल्कि देश में जगह-जगह फंसे लाचार मजदूरों को उनके घर सकुशल वापस भेजने के लिए इंतजाम करके समाज के लिए एक समाजसेवी के रूप में इंसानियत की एक बहुत बड़ी नजीर पेश की है, आज कोरोना के आपदाकाल में सोनू सूद देश में बड़े समाजसेवी दानवीर भामाशाह के रूप में स्थापित हो गये हैं। आज देश में एक भरोसेमंद मददगार व्यक्ति के रूप में अभिनेता सोनू सूद की लोकप्रियता इतनी अधिक हो गयी है कि वो अब सरकार पर भी भारी पड़ रहे हैं। भूख-प्यास से तड़पते लोगों के लिए वो संकट के समय में दूसरा जीवन देने वाले 'देवदूत' बनकर सामने उभर कर आए हैं। जिस तरह से पिछले कई हफ्तों से लॉकडाउन की वजह से मुंबई में फंसे लाचार मजबूर मजदूरों को घर पहुंचाने के लिए 'घर भेजो' अभियान को खुद सोनू सूद ने सड़क पर उतरकर रोजाना घंटों-घंटों मेहनत से काम करके
धरातल पर चलाकर पूर्ण रूप से कामयाब बनाया है, उसकी जितनी प्रसंशा की जाये वो कम है। उन्होंने केवल मुंबई में फंसे मजदूरों की ही नहीं बल्कि और भी बहुत सारे जरूरतमंदों की मदद की हैं। हाल ही में सोनू सूद ने केरल के एर्नाकुलम में फंसी 177 लड़कियों को भी एयरलिफ्ट करवाकर उनके घर भेजा था। जिसके चलते उनकी सभी ने खूब तारीफ की थी। साथ ही वह लगातार हजारों जरूरतमंद लोगों के लिए रोजाना भोजन-पानी आदि की व्यवस्था करके भूखे-प्यासे लोगों का पेट भर रहे है। आज सोनू सूद के इस लोगों के मदद करने वाले अभियान की देश ही नहीं विदेशों में भी चर्चा है। देश के बॉलीवुड सेलेब्रिटी, मंत्री से लेकर संतरी तक अब अभिनेता सोनू सूद की तारीफ करने से खुद को नहीं रोक पा रहे हैं।

आज के आपदाकाल के दौर में फिल्मी सितारों व देश के सभी क्षेत्रों के बड़े-बड़े धनासेठों को भी अभिनेता सोनू सूद से सीखने की जरूरत है कि किस प्रकार विपदा के समय में लोगों की मदद करने के लिए अपनी तिजोरियों के ताले खोलकर हाथ बढ़ाकर मजबूर लोगों को सहारा देकर उनकी अनमोल जिंदगियों को बचाया जाता है। कभी रील के हीरो रहे अभिनेता सोनू सूद आज मजबूर लोगों की मदद करके देश की जनता के बीच में रीयल के हीरो बन गये हैं, आज अभिनेता सोनू सूद पर हमको गर्व है। 

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।

गुरुवार, 4 जून 2020

विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष -पर्यावरण संरक्षण स्वस्थ जीवन के लिए बेहद आवश्यक

विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष -

पर्यावरण संरक्षण स्वस्थ जीवन के लिए बेहद आवश्यक

दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप
स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व रचनाकार

5 जून के दिन को हर साल 'विश्व पर्यावरण दिवस' के रूप में पूरी दुनिया में व्याप्त तरह-तरह के प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए कारगर प्रयासों पर मंथन करके, भविष्य में पर्यावरण की सुरक्षा और संरक्षण करने के लिए बेहद आवश्यक कदमों पर अमल करने के उद्देश्य से उसकी रूपरेखा बनाने के लिए नीतिनिर्माताओं के साथ-साथ लोगों को जागरूक करने के लिए सम्पूर्ण विश्व में आम जनमानस के द्वारा हर वर्ष मनाया जाता है। वैसे भी जब इस दिवस को शुरुआत में मनाने की घोषणा संयुक्त राष्ट्र महासंघ ने पर्यावरण की सुरक्षा के प्रति वैश्विक स्तर पर सभी देशों के आम जनमानस में राजनीतिक और सामाजिक जागृति लाने के उद्देश्य से वर्ष 1972 में की थी। इसे 5 जून से 16 जून तक संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा आयोजित विश्व पर्यावरण सम्मेलन में चर्चा के बाद शुरू किया गया था। उसके बाद ही विश्व में 5 जून 1974 को पहला 'विश्व पर्यावरण दिवस' मनाया गया था। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि फिर भी आज विश्व के अधिकांश देशों में बढ़ता प्रदूषण वर्तमान समय की एक सबसे ज्यादा बेहद गंभीर ज्वंलत समस्या बन गया है। कही ना कही विश्व में हर तरफ छिड़ी विकास की अंधाधुंध अव्यवस्थित दौड़ ने जगह-जगह प्रदूषण फैलाने में अपना योगदान देकर हमारी भूमि, जल व वायु को प्रदूषित करके हर तरफ आवोहवा को खराब करने का काम किया है। आज हमारे देश भारत में भी हर तरह का प्रदूषण अपने चरम स्तर पर है, हालांकि देश में पिछले कुछ माह के लॉकडाउन के चलते हर तरफ सभी कुछ बंद होने के कारण पर्यावरण को पुनर्जीवित होने के लिए भरपूर अवसर मिल गया है, जिसके चलते देश में आजकल सभी प्रकार के प्रदूषण से लोगों को काफी राहत मिली है,  लेकिन महत्वपूर्ण विचारणीय प्रश्न यह है कि देश में पर्यावरण की यह स्थिति लगातार किस प्रकार बनी रहे, अब तो चलो कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव के लिए देश में हुए लॉकडाउन से पर्यावरण को संजीवनी मिल गयी, लेकिन लॉकडाउन खुलने के पश्चात भविष्य में यह स्थिति किस प्रकार बरकरार रखें यह चुनौती व जिम्मेदारी देश के हर व्यक्ति को समझनी होगी।

आज हम लोग जिस तरह से बहुत तेजी के साथ अव्यवस्थित ढंग से दुष्प्रभाव के बारे में बिना सोचे समझे आधुनिक तकनीकी का इस्तेमाल कर रहे है वह उचित नहीं है। हमारे देश में किसी भी प्रकार से प्रकृति व पर्यावरण के साथ सामंजस्य बनाकर प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन ना करना आज एक बहुत बड़ी चुनौती बन गया है। सभी पक्षों के द्वारा कानून पर्यावरण के सरंक्षण पर होने वाले खर्चों में चोरी छिपे कटौती करके, अत्याधिक लाभ कमाने के उद्देश्य से प्रदूषण नियंत्रण के नियम कानूनों की अनदेखी करने वाली सोच प्रदूषण कम करने में बहुत बड़ी बाधक है। आज हमारे देश के सारे सिस्टम की सोच देश में स्थापित उधोगों के लिए अपने देश के प्राकृतिक संसाधनों का बहुत ज्यादा दोहन करने की हो गयी है, जिसके चलते हम स्वयं भूमि, जल व वायु को प्रदूषित करके देश को जल्द से जल्द विकसित अर्थव्यवस्था वाले देशों की श्रेणी में ले जाने का प्रयास कर रहे हैं। आज और भविष्य में यह स्थिति हम सभी के स्वास्थ्य व पर्यावरण संरक्षण के लिए बेहद घातक है और इस समस्या से हमारे देश के नीतिनिर्माता ही नहीं बल्कि समस्त विश्व के पर्यावरण प्रेमी भी अवगत और चिंतित है। आज खुद मानव जनित घातक प्रदूषण के चलते मनुष्य व जीव जंतु जिस तरह के प्रदूषित वातावरण में रह रहे है, अगर स्थिति को यही पर समय रहते तत्काल नियंत्रित नहीं किया गया, तो आने वाले समय में अब तरह-तरह की समस्याओं के चलते स्थिति दिन-ब-दिन बहुत तेजी से खराब होती जायेगी। यह हालात बरकरार रहे तो देश में बहुत सारी जगहों पर पीने योग्य पानी, सांस लेने के लिए स्वच्छ वायु व केमिकल रहित मिट्टी बीते दिनों की बात हो सकती है। देश में हर तरफ प्रदूषण की भयावह हालात होने के बाद आज भी हमारे देश में बार-बार पर्यावरण संरक्षण को लेकर के नियम कायदा-कानूनों के सही ढंग से अनुपालन के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय से बेहद तल्ख टिप्पणी आती है, हमारे देश के सिस्टम को प्रदूषण व पर्यावरण से जुड़े बेहद  गंभीर मसलों पर एनजीटी जैसी महत्वपूर्ण शीर्ष संस्था आयेदिन फटकार लगाती रहती है, लेकिन उसके बाद भी पर्यावरण संरक्षण के लिए बेहद आवश्यक प्रभावी कदम कागजों की बंद फाईल से निकल कर धरातल पर न जाने क्यों व किसके दवाब में आसानी से कार्यान्वित नहीं हो पाते हैं। सरकार की बात करें तो देश में बेहद तेजी के साथ बढ़ते प्रदूषण के स्तर के बाद भी पर्यावरण संरक्षण के बेहद ज्वलंत मसले पर केन्द्र सरकार व राज्य सरकार की रोजमर्रा की कार्यप्रणाली में प्रदूषण नियंत्रण धरातल पर प्राथमिकता में बिल्कुल भी नजर नहीं आता है। आज हम सभी देशवासियों को समय रहते यह समझना होगा कि पर्यावरण संरक्षण सिर्फ 'विश्व पर्यावरण दिवस' पर भाषण देकर, फिल्म देखकर, किताब पढ़कर या लेख लिखकर नहीं हो सकता, बल्कि हर भारतवासियों को अपनी प्यारी धरती के प्रति अपनी जिम्मेदारी दिल व दिमाग दोनों से समझनी होगी, तभी भविष्य में धरातल पर प्रदूषण नियंत्रण के कुछ ठोस प्रभाव नजर आ सकेंगे। लेकिन बेहद अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि चंद लोगों को छोड़कर हमारे देश में पर्यावरण संरक्षण के मसले पर किसी भी पक्ष में कोई गंभीरता नजर नहीं आती है। लेकिन देश में इसकी आड़ में बहुत लम्बे समय से सरकारी फंड की जबरदस्त बंदरबांट जरूर जारी है। हर वर्ष करोड़ों वृक्ष लगा दिये जाते है जो सिवाय कागजों के कहीं नजर नहीं आते हैं। देश में पर्यावरण संरक्षण के बेहद ज्वंलत मसले पर सुप्रीम कोर्ट की तय गाइडलाइंस व एनजीटी के निर्णयों पर अमल की स्थिति को देखकर लगता है कि कही ना कही हमारे देश के सिस्टम की भयंकर इरादतन लापरवाही के चलते सर्वोच्च संस्थाएं अब पर्यावरण संरक्षण के अपने निर्णयों पर अमल कराने में अपने आपको असहाय लाचार महसूस कर रही है।

कोरोना संक्रमण से बचने के लिए देश में किये गये लॉकडाउन के बाद आया 'विश्व पर्यावरण दिवस' इस बार हम सभी लोगों को एक बेहद महत्वपूर्ण सबक देता है कि देश में हर तरफ फैले बेहिसाब घातक प्रदूषण के लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं, क्योंकि जिस तरह से देश में कल-कारखाने व अन्य सभी कुछ कार्य बंद होने के चलते  जल, वायु व भूमि प्रदूषण में चंद दिनों में ही भारी कमी आयी है, उसने सभी विशेषज्ञों को भी आश्चर्यचकित कर दिया है। आज जो नदियां करोड़ों रुपये सालाना स्वच्छता पर खर्च करने के बाद भी साफ नहीं हो पा रही थी,
वह सभी लॉकडाउन में सब कुछ बंद होने के चलते स्वतः साफ हो गयी हैं। लॉकडाउन की वजह से साफ हुए नदी, जल स्रोत, स्वच्छ वायु, साफ नीले तारे टिमटिमाता आसमान, स्वछंद घूमते जीव-जंतु आदि हम सभी को एक बहुत महत्वपूर्ण संदेश देते है कि यह सब घातक प्रदूषण मानव के द्वारा स्वयं पैदा किया गया है। इसलिए प्रकृति का हम सभी लोगों के लिए बिल्कुल स्पष्ट संदेश है कि देश में भूमि, जल, वायु व ध्वनि प्रदूषण कम करने की जिम्मेदारी हमारी खुद की है, आज से ही हम सभी लोगों को पर्यावरण संरक्षण के लिए जीवनदायिनी प्रकृति के साथ तालमेल बना कर चलना होगा, भविष्य में हमको प्राकृतिक संसाधनों का सोच-समझकर और बेहद सम्भलकर उपयोग करना होगा, तब ही आने वाले समय में देश में पर्यावरण का संरक्षण ठीक से होगा और हम सभी लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों को प्रकृति पूर्ण कर पाएगी। आज हमको ध्यान रखना होगा कि प्रदूषण का बढ़ते स्तर का ज्वंलत मुद्दा, आने वाले समय में देशों में सीमा, जाति और अमीर-गरीब की दीवारों को समाप्त करने वाला यह ऐसा मुद्दा होगा जिस पर पूरी दुनिया के लोगों को जीवन को सुरक्षित बचायें रखने के लिए हर हाल में एक होना होगा। आज हमको अपने सेवा भाव, दृढसंकल्प व दृढ इच्छाशक्ति के बलबूते देश में पर्यावरण संरक्षण को भाषणों, फिल्मों, किताबों और लेखों से बाहर लाकर, हर भारतवासी को प्रकृति व पर्यावरण के प्रति अपनी बेहद महत्वपूर्ण जिम्मेदारी को समय रहते दिल व दिमाग दोनों से समझना होगा, तभी भविष्य में प्रदूषण कम होगा और धरातल पर पर्यावरण संरक्षण के कुछ ठोस प्रभाव नजर आ सकेंगे।

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।