मंगलवार, 26 मई 2020

27 मई पुण्यतिथि पर विशेष - माँ भारती के सच्चे सपूत जवाहरलाल नेहरू

27 मई पुण्यतिथि पर विशेष

माँ भारती के सच्चे सपूत जवाहरलाल नेहरू

दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप
स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व रचनाकार

देश की आजादी के संघर्ष में अपना कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष करने वाले, आधुनिक भारत के शिल्पकार स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित जवाहरलाल नेहरू की आज पुण्यतिथि है, आज हम इस महान हस्ती के बारे में कुछ जानने का प्रयास करते हैं। हालांकि नेहरू के बारे में लिखना सूर्य को दीपक दिखाने के समान है, क्योंकि उनके संस्मरणों से देश की आजादी की गाथा के इतिहास में अनेक अध्याय भरे पड़े हैं। नेहरू एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के साथ-साथ अदभुत आकर्षक व्यक्तित्व के धनी, ओजस्वी वक्ता, उत्कृष्ट लेखक, इतिहासकार, आधुनिक भारत का सपना देखने वाले महान स्वपनदृष्टा थे, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि देश में आधुनिक भारत के शिल्पकार के ख़िताब से नवाज़े जाने का श्रेय अगर किसी एक व्यक्ति को जाता है तो वो नि:संदेह सबसे पहले भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को ही जाता हैं। उन्होंने न केवल देश की आज़ादी की लड़ाई में अग्रणी भूमिका निभाकर अन्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के साथ मिलकर देश को अंग्रेजों की गुलामी के चंगुल से आजाद करवाने में अहम भूमिका निभाई थी, वहीं देश की आजादी के बाद देश के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में सशक्त आत्मनिर्भर भारत के निर्माण की पहल करके जिस देश भारत में उस समय सूई तक भी विदेशों से आती हो वहां पर बड़े-बड़े कल-कारखाने लगाकर देश को वास्तव में धरातल पर आत्मनिर्भर बनाने का कार्य किया था। नेहरू ने देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था की बेहद मजबूती के साथ नींव स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाकर देश में आम लोगों की आवाज बनने वाली बेहद सशक्त लोकतांत्रिक व्यवस्था को दिया था। आज देश में राजनीति के चलते उनके नाम पर चाहे कितने भी अनर्गल आरोप-प्रत्यारोप की बाते होती रहे, लेकिन यह तय है कि जिसने भी नेहरू के बारे में राजनीति से ऊपर उठकर बिना किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर निष्पक्ष होकर जानने का प्रयास किया है, वह देश निर्माण में उनके अनमोल अतुलनीय योगदान को कभी भी भुला नहीं सकता है। उनके किये गये देशहित के कार्यो के लिए हिन्दुस्तान हमेशा उनका ऋणी रहेगा। चंद लोग चाहे कितना भी उनकी छवि को खराब करने का प्रयास कर ले, लेकिन जब भी आजाद भारत के इतिहास की बात शुरू होगी तो नेहरू के देश निर्माण के योगदान की अनदेखी करना असंभव होगा।

नेहरू अपने जीवनकाल में देश में एक बहुत बड़े जननेता के रूप में भारत के आम लोगों के बीच बहुत ही ज्यादा लोकप्रिय रहे हैं। नेहरू की देश की जनता के बीच में इतनी जबरदस्त लोकप्रियता थी कि आज हम और आप शायद उसकी कल्पना भी न कर सकें, नेहरू को सुनने के लिए उस साधन-विहीन दौर में भी लाखों लोगों की भारी भीड़ इकट्ठा हो जाती थी। नेहरू की लोकप्रियता इतनी अधिक थी कि वो भारत के साथ-साथ विदेशों में भी बहुत लोकप्रिय थे, जब वो विदेशी दौरे पर जाते थे तो उस समय विदेशी धरती पर भी उनके स्वागत के लिए भारी जनसैलाब उमड़ पड़ता था, विदेशों के लोगों में उनकी निराली धाक थी। भारत के बट़वारे के बाद जिस समय भारत को अंग्रेजों से आजादी मिली थी तो उस समय देश के हालात आर्थिक रूप से बहुत खस्ताहाल व दंगा-फसाद के चलते बेहद तनावपूर्ण थे, इन हालातों को देखकर बहुत सारे ताकतवर देशों को लगता था कि भारत आजाद होने के बाद इस स्थिति को नियंत्रित करके अपने दम पर कैसे खड़ा हो पायेगा। लेकिन उन देशों की इस सोच को नेहरू ने अपने कुशल नेतृत्व से जल्द ही झुठलाने का काम किया, उन्होंने सफलता पूर्वक भारत का नेतृत्व सम्हालकर देश को विकास की नयी गति देने का कार्य किया। उसके बाद से ही विदेशों में अब तक भी नेहरू की बहुत ज्यादा इज्जत होती है। लेकिन अफसोस आज नेहरू के अपने देश भारत में उनके नाम पर आरोप-प्रत्यारोप की ओछी राजनीति जमकर होती है, हालात यह तक हो गये हैं कि नेहरू की विचारधारा व नीतियों को खुद कांग्रेस पार्टी के चंद शीर्ष नेता तक भूल रहे हैं, वो कांग्रेस के कार्यकर्ताओं से दूसरे दल के नेताओं से सिखाने तक के लिए बोल देते हैं। हाल के वर्षों में कांग्रेस पार्टी के देश में बेहद कमजोर होने के चलते अन्य राजनीतिक दलों के द्वारा हर विफलता के लिए नेहरू को दोष देकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ने का चलन बहुत चल रहा है। कोई भी यह सोचने के लिए तैयार नहीं है कि देश समय काल परिस्थिति बहुत बड़ी होती है अगर वर्षों बाद किसी निर्णय को कसौटी के मापदंडों पर तोला जायेगा तो एक सही निर्णय भी उस समय गलत प्रतीत हो सकता हैं। खैर जो भी हो आज देश में नेहरू के प्रति इतिहास बदलने के चलते काफी स्थितियां बदल गई हैं। अब नेहरू को लेकर राजनीतिक लोगों के द्वारा तरह-तरह के विवादों को जन्म दे दिया गया है। आज देश में बहुत लोग जानते ही नहीं है कि नेहरू ने हमारे देश के लिए क्या किया या वास्तव नेहरू कौन थे। कुछ लोग तो आज की कांग्रेस और उसके चंद नेताओं को देखकर महामानव नेहरू की छवि के बारे में तुलना करके आकलन करने लग जाते हैं। इसके पीछे दशकों तक कुछ राजनीतिक दलों व कुछ लोगों के द्वारा नेहरू के खिलाफ फैलाए गए झूठे तथ्यों के आधार पर किये गये दुष्प्रचार का बहुत बड़ा हाथ है। इसीलिए आज पुण्यतिथि के दिन हम देश व विदेश की धरती पर बेहद लोकप्रिय रहे जवाहरलाल नेहरू के बारे में कुछ बातें अवश्य जानें।

वैसे तो देश के आजाद होने से पहले ही राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने पंडित जवाहर लाल नेहरू को ही अपनी राजनीतिक विरासत का उत्तराधिकारी मान लिया था। लेकिन गांधी जी ने 15 जनवरी, 1942 को वर्धा में हुई अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी की बैठक में नेहरू को अपना वारिस सार्वजनिक रूप से घोषित कर दिया था, जबकि उस समय देश में गांधी नेहरू के मनमुटाव की खबर चल रही थी, गांधी जी ने इस अधिवेशन में कहा था कि ‘मुझसे किसी ने कहा कि जवाहरलाल और मेरे बीच अनबन हो गई है। यह बिल्कुल गलत है। जब से जवाहरलाल मेरे पंजे में आकर फंसा है, तब से वह मुझसे झगड़ता ही रहा है। परंतु जैसे पानी में चाहे कोई कितनी ही लकड़ी क्यों न पीटे, वह पानी को अलग-अलग नहीं कर सकता, वैसे ही हमें भी कोई अलग नहीं कर सकता। मैं हमेशा से कहता आया हूँ कि अगर मेरा वारिस कोई है, तो वह राजाजी नहीं, सरदार वल्लभभाई नहीं, जवाहरलाल है। उपरोक्त संस्मरण गांधी जी नेहरू का आपसी विश्वास व प्रेम को प्रदर्शित करता है।

नेहरू आजादी से पहले देश में गठित अंतरिम सरकार और आजाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने थे। देश की स्वतन्त्रता के पूर्व और स्वतंत्रता के पश्चात् की भारतीय राजनीति में नेहरू हमेशा केन्द्रीय व्यक्तित्व के रूप में काम करते रहे थे। वो महात्मा गांधी के संरक्षण में भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के सर्वोच्च स्वीकार्य नेता के रूप में देश में उभरे और वो सन् 1947 में भारत के एक स्वतन्त्र राष्ट्र के रूप में स्थापना से लेकर सन् 1964 तक अपने निधन के समय तक, भारत के प्रधानमंत्री के साथ-साथ देश की आम जनता के बीच बेहद लोकप्रिय जननेता के रूप में स्थापित रहे। नेहरू आधुनिक भारतीय राष्ट्र एक सम्प्रभु राज्य, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, और लोकतान्त्रिक गणतन्त्र के शिल्पकार मानें जाते हैं। वह छोटे बच्चों से बहुत प्यार करते थे और बच्चों के बीच बेहद लोकप्रिय होने के चलते बच्चे उन्हें प्यार से चाचा नेहरू कहते थे। इसलिए उनकी जयंती को देश में बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है।

जवाहरलाल नेहरू का जन्म 14 नवम्बर 1889 को ब्रिटिश सरकार के आधीन भारत के उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर में हुआ था। उनके पिता मोतीलाल नेहरू देश के प्रतिष्ठित बैरिस्टर थे, वो बेहद धनी भी थे, जो कि कश्मीरी पंडित समुदाय से आते थे और वो देश के स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दो बार अध्यक्ष चुने गए थे। उनकी माता स्वरूपरानी जो लाहौर में बसे एक सुपरिचित कश्मीरी ब्राह्मण परिवार से थी, वो मोतीलाल नेहरू की पहली पत्नी की प्रसव के दौरान मौत होने के बाद दूसरी पत्नी थी, जवाहरलाल तीन बच्चों में से सबसे बड़े थे, जिनमें बाकी दो लड़कियाँ थी। बड़ी बहन, विजया लक्ष्मी, बाद में संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष बनी और सबसे छोटी बहन, कृष्णा हठीसिंग, एक सुप्रसिद्ध लेखिका बनी। मोतीलाल नेहरू ने जवाहरलाल नेहरू को दुनिया के बेहतरीन स्कूलों और विश्वविद्यालयों में शिक्षा प्राप्त करने का मौका दिया था। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा हैरो और वह केंब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज से प्राप्त की, उन्होंने तीन वर्ष तक अध्ययन करके प्रकृति विज्ञान में स्नातक उपाधि प्राप्त की। उनके विषय रसायनशास्त्र, भूगर्भ विद्या और वनस्पति शास्त्र थे। केंब्रिज छोड़ने के बाद लंदन के इनर टेंपल में दो वर्ष बिताकर उन्होंने अपनी लॉ की पढ़ाई पूरी की। इंग्लैंड में उन्होंने सात साल व्यतीत किए, जिसमें उन्होंने वहां के फैबियन समाजवाद और आयरिश राष्ट्रवाद के लिए एक तर्कसंगत दृष्टिकोण विकसित किया था।

जवाहरलाल नेहरू 1912 में भारत लौटे और वकालत करना शुरू कर दिया। 1916 में उनकी शादी कमला नेहरू से हुई  सन् 1917 में जवाहरलाल व कमला नेहरू को इंदिरा के रूप में एक पुत्री की प्राप्ति हुई। 1917 में जवाहर लाल नेहरू होम रुल लीग‎ में शामिल हो गए। राजनीति में उनकी असली दीक्षा दो साल बाद 1919 में शुरू हुई जब वे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के संपर्क में आए। उस समय महात्मा गांधी ने रॉलेट एक्ट के खिलाफ एक बड़ा अभियान शुरू किया था। नेहरू, महात्मा गांधी के साथ लगातार देश की आजादी के लिए चलाए जाने वाले आंदोलन में सक्रिय रहे, लेकिन वो शांतिपूर्ण सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रति खासे आकर्षित हुए।

पंडित जवाहरलाल नेहरू देश को प्रगति के पथ पर ले जाने वाले खास पथ-प्रदर्शक थे। वो शुरू से ही गांधी जी से बहुत प्रभावित रहे और नेहरू ने महात्मा गांधी के उपदेशों के अनुसार खुद को व अपने समस्त परिवार को भी ढाल लिया था। गांधी जी के विचारों से ही प्रभावित होकर जवाहरलाल नेहरू और मोतीलाल नेहरू ने पश्चिमी कपडों और महंगी संपत्ति का त्याग कर दिया था। वे अब एक खादी का कुर्ता और गाँधी टोपी पहनने लगे। जवाहरलाल नेहरू ने 1920-1922 में असहयोग आंदोलन में सक्रिय हिस्सा लिया और इस दौरान वह पहली बार गिरफ्तार किए गए। हालांकि कुछ महीनों के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। जवाहरलाल नेहरू 1924 में इलाहाबाद नगर निगम के अध्यक्ष चुने गए और उन्होंने शहर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में दो वर्ष तक सेवा कार्य किया, लेकिन 1926 में उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों से सहयोग की कमी का हवाला देकर इस पद से इस्तीफा दे दिया था। वर्ष 1920 के प्रतापगढ़ के पहले किसान मोर्चे को संगठित करने का श्रेय भी जवाहरलाल नेहरू को ही जाता है। 1928 में लखनऊ में साइमन कमीशन के विरोध में नेहरू घायल हुए और 1930 के नमक आंदोलन में गिरफ्तार हुए। उन्होंने 6 माह जेल काटी। 1935 में अलमोड़ा जेल में नेहरू ने 'आत्मकथा' लिखी। नेहरू अपने जीवनकाल में कुल 9 बार जेल गये और लगभग 9 वर्ष तक 3259 दिन के बेहद लंबे समय तक वह अंग्रेजों की जेल में बंद रहे।

नेहरू ने विश्व भ्रमण किया और एक अंतरराष्ट्रीय महानायक के रूप में अपनी पहचान छोड़ी, और इस भ्रमण से ही सीखकर देश का विकास भी विश्व स्तरीय ढंग से किया। जवाहरलाल नेहरू ने 40 साल की उम्र में साल 1929 में कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली थी। नेहरू 8 बार कांग्रेस के अध्यक्ष बने। वो 1929-30 (लाहौर अधिवेशन), 1936 (लखनऊ), 1937 (फैज़पुर), 1951 (नासिक), 1952 (दिल्ली), 1953 (हैदराबाद), 1954 (कलकत्ता) अधिवेशन में अध्यक्ष बने और उन्होंने सफलतापूर्वक कांग्रेस के अध्यक्ष पद को सुशोभित किया। नेहरू ने सन् 1929 में जब कांग्रेस अध्यक्ष का पद ग्रहण किया था, तो रावी के तट पर पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित किया उन्होंने कहा कि ‘हम भारत के प्रजाजन अन्य राष्ट्रों की भांति अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं कि हम स्वतंत्र होकर ही रहें, अपने परिश्रम का फल स्वयं भोगें, हमें जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक सुविधाएं प्राप्त हों, जिसमें हमें भी विकास का पूरा अवसर मिले।’  इसी अधिवेशन में भारत के पूर्ण स्वराज्य के लक्ष्य का समुचित समारोह पूर्वक और बड़े उत्साह पूर्ण ढंग से स्वागत किया गया जैसे ही 31 दिसंबर 1929 को मध्य रात्रि का घंटा बजा और कांग्रेस द्वारा कलकत्ता में 1928 में 1 वर्ष पूर्व दिए गए अल्टीमेटम की तारीख समाप्त हुई वैसे ही कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में जवाहरलाल नेहरू ने लाहौर में रावी नदी के तट पर भारतीय स्वतंत्रता का झंडा फहराया। सन् 1942 के 'भारत छोड़ो' आंदोलन में नेहरू जी 9 अगस्त 1942 को बंबई में गिरफ्तार हुए और अहमदनगर जेल में रहे, जहां वो 15 जून 1945 को रिहा किए गए। 15 अगस्त सन् 1947 में भारत को आजादी मिलने पर जवाहर लाल नेहरू को देश का प्रधानमंत्री बनाया गया। उसके बाद वो लगातार चार बार अपने जीवनकाल तक प्रधानमंत्री रहे, वह 27 मई 1964 तक 16 साल 286 दिन यानी 6130 दिनों तक प्रधानमंत्री पद पर बने रहे। वह भारत को उस मुकाम पर खड़ा देखना चाहते थे जहां हर भारतवासी अमनचैन, प्यार मोहब्बत, सुख और समृद्धि से सराबोर हो। देश को आजादी मिलने के तुरंत बाद ही उन्होंने देश में पहली एशियाई कांफ्रेंस बुलाई और उसमें साफ-साफ कहा कि ‘हमारा मकसद है कि दुनिया में अमनचैन और तरक्की हो, लेकिन यह तभी हो सकता है जब सब मुल्क आजाद हों और इंसानों की सब जगह सुरक्षा हो और आगे बढ़ने का मौका मिले।’ नेहरू ने 'पंचशील' का सिद्धांत प्रतिपादित किया और 1954 में वह 'भारतरत्न' से अलंकृत हुए नेहरू जी ने तटस्थ राष्ट्रों को संगठित किया और उनका सफलतापूर्वक नेतृत्व किया।
उन्होंने अपने प्रधानमंत्री के कार्यकाल में देश में लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत करते हुए, राष्ट्र और संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को स्थायी भाव प्रदान किया। उनका विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से देश की जनता और देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करना हमेशा मुख्य उद्देश्य रहा।

हालांकि नेहरू पाकिस्तान और चीन के साथ भारत के संबंधों में सुधार नहीं कर पाए। उन्होंने चीन की तरफ मित्रता का हाथ भी बढ़ाया, लेकिन 1962 में चीन ने धोखे से आक्रमण कर दिया। चीन का आक्रमण जवाहरलाल नेहरू के लिए एक बड़ा झटका था और शायद इसी वजह से उनकी मौत भी हुई। जवाहरलाल नेहरू को 27 मई 1964 को दिल का दौरा पड़ा जिसमें उनकी मृत्यु हो गई, भारत को विश्व में पहचान दिलाने वाला यह सितारा हमेशा के लिए चिरनिद्रा में सो गया।

लेकिन नेहरू का पूंजीवाद, साम्राज्यवाद, जातिवाद, एवं उपनिवेश के खिलाफ संघर्ष हमेशा अनुकरणीय रहेगा। वो देश में धर्मनिरपेक्षता और भारत की जातीय एवं धार्मिक विभिन्नताओं के बावजूद भी वे देश की मौलिक एकता को लेकर सजग रहे और सभी देशवासियों को एक सूत्र में पिरोने के लिए हमेशा कार्य करते रहे। कभी ऐसा निर्णय नहीं लिया जिससे कि उन पर धार्मिक या सांप्रदायिक पक्षपात का आरोप लगे। उनका हमेशा स्पष्ट मानना था कि भारत के विकास लिए सभी लोगों को प्यार मोहब्बत से मिलजुलकर एक साथ रहना होगा। नेहरू वैज्ञानिक खोजों एवं तकनीकी विकास में गहरी अभिरुचि रखते थे उन्होंने देश के विकास में इसका खूब उपयोग किया। उन्होंने देश को आर्थिक रूप से मजबूत करने के लिए पंचवर्षीय योजनाएं बनाईं। वे हमेशा से मानते थे कि देश के किसानों और कृषि क्षेत्र को मजबूती प्रदान किए बिना देश को तरक्की की राह पर कभी आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। इसलिए उन्होंने कृषि भूमि की सिंचाई के उचित प्रबंध के लिए देश में बहुउद्देश्यीय डैम परियोजनाओं का शुभारंभ किया। इन योजनाओं को उन्होंने आधुनिक भारत का तीर्थ कहा। साथ ही देश में रोजगार सृजन और तरक्की की राह को और आसान करने के लिए उन्होंने बड़े-बड़े विशाल शहर रूपी कल-कारखानों की स्थापना की। जो कि अधिकांश आज देश की बड़ी-बड़ी नवरत्ना कंपनी हैं। उन्होंने ही देश स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाओं का निर्माण किया।

पंडित नेहरू एक महान राजनीतिज्ञ और प्रभावशाली वक्ता ही नहीं, बल्कि महान लेखक भी थे। उनकी रचनाओं में भारत और विश्व, सोवियत रूस, विश्व इतिहास की एक झलक, भारत की एकता और स्वतंत्रता प्रचलित है लेकिन उनकी सबसे लोकप्रिय किताबों में 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' रही, जिसकी रचना 1944 में अप्रैल-सितंबर के बीच अहमदनगर की जेल में हुई। इस पुस्‍तक को नेहरू ने अंग्रज़ी में लिखा और बाद में इसे हिंदी और अन्‍य बहुत सारे भाषाओं में अनुवाद किया गया है। भारत की खोज पुस्‍तक को क्‍लासिक का दर्जा हासिल है। नेहरू जी ने इसे स्‍वतंत्रता आंदोलन के दौर में 1944 में अहमदनगर के किले में अपने 5 महीने के कारावास के दिनों में लिखा था। यह 1946 में पुस्‍तक के रूप में प्रकाशित हुई। इस पुस्‍तक में नेहरू जी ने सिंधु घाटी सभ्‍यता से लेकर भारत की आज़ादी तक विकसित हुई भारत की संस्‍कृति, धर्म और जटिल अतीत को वैज्ञानिक द्रष्टि से अपनी विलक्षण भाषा शैली में बयान किया है।

नेहरू जी ने अपने जीवनकाल में जो काम किये थे आज उसी की नींव पर बुलंद व सशक्त भारत की नई तस्वीर रची जा रही है। नेहरू का मानवीय पक्ष भी अत्यंत उदार और समावेशी था। उन्होंने देशवासियों में निर्धनों और अछूतों के प्रति सामाजिक चेतना पैदा की। हिंदू सिविल कोड में सुधार लाकर उत्तराधिकार और संपति के मामले में विधवाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार दिया। नेहरू के कुशल नेतृत्व में, कांग्रेस पार्टी ने राष्ट्रीय और राज्य-स्तरीय चुनावों में लगातार प्रभुत्व दिखाते हुए और 1951, 1957, और 1962 के लगातार चुनाव जीतते हुए, देश में एक सर्व-ग्रहण पार्टी के रूप में अपनी पकड़ मजबूत की थी। उनके अन्तिम वर्षों में राजनीतिक मुसीबतों और 1962 के चीनी-भारत युद्ध में उनके नेतृत्व की असफलता के बावजूद, वे भारत के लोगों के बीच हमेशा लोकप्रिय बने रहें। यह महामानव 27 मई 1964 को देशवासियों को छोड़कर हमेशा के लिए चला गया, नेहरू ने अपनी वसीयत में लिखा था कि,

 “जब मैं मर जाऊं, तब मैं चाहता हूं कि मेरी मुट्ठीभर राख प्रयाग के संगम में बहा दी जाए, जो हिन्दुस्तान के दामन को चूमते हुए समंदर में जा मिले, लेकिन मेरी राख का ज्यादा हिस्सा हवाई जहाज से ऊपर ले जाकर खेतों में बिखरा दिया जाए, वो खेत जहां हजारों मेहनतकश इंसान काम में लगे हैं, ताकि मेरे वजूद का हर जर्रा वतन की खाक में मिलकर एक हो जाए।” 

उनकी वसीयत उनके महामानव होने का बहुत बड़ा परिचायक है। आज पुण्यतिथि पर हम माँ भारती के सच्चे सपूत जवाहर लाल नेहरू जी को कोटि-कोटि नमन् करते हुए अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।

गुरुवार, 21 मई 2020

22 मई पुण्यतिथि पर विशेष - राजनीति को नया आयाम प्रदान करने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी महावीर त्यागी

 22 मई पुण्यतिथि पर विशेष -

राजनीति को नया आयाम प्रदान करने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी महावीर त्यागी


दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप
स्वतंत्रता पत्रकार, स्तंभकार व रचनाकार

आज भारतीय राजनीति व देश की संसदीय परंपराओं को नया आयाम प्रदान करने वाले महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, निडर राजनेता, स्वत्रंत भारत के सांसद, केन्द्रीय मंत्री व अपनी बेबाक शैली के लिए देश में प्रसिद्ध कांग्रेस के वरिष्ठ राजनेता महावीर त्यागी की पुण्यतिथि है, आज हम देश की इस अनमोल धरोहर व महान हस्ती के जीवन से जुड़े कुछ संस्मरणों को याद करते हुए इस महान विभूति को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। महात्मा गांधी, मोतीलाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, लाल बहादुर शास्त्री आदि के साथ बैठकर देश की हालात पर चर्चा करने वाले और देश के लिए भविष्य की नीतियों का निर्धारण करने वाले कुशल व मिलनसार व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति थे महावीर त्यागी। देश के महान स्वतंत्रता सेनानी महावीर त्यागी का देश को अंग्रेजों की गुलामी की जंजीरों से मुक्ति दिलाने में बहुत ही अहम योगदान रहा है। वो देश की आजादी के संघर्ष के दौरान कई बार लम्बे समय तक जेल में रहे हैं।

जीवन परिचय :-
बिजनौर जनपद के नूरपुर क्षेत्र के रतनगढ़ गांव निवासी महावीर त्यागी का जन्म 31 दिसंबर 1899 को मुरादाबाद जनपद के ढबारसी गांव में हुआ था। इनके पिता शिवनाथ सिंह जी गांव रतनगढ़ जिला बिजनौर के एक प्रसिद्ध ज़मीदार थे, इनकी माता जानकी देवी जी बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थी। वो एक अनूठे व्यक्तित्व के बेहतरीन इंसान थे। मेरठ में शिक्षा प्राप्त करने के दौरान प्रथम विश्व युद्ध के समय वो सेना की इमरजेंसी कमीशन में भर्ती हो गए और उनकी तैनाती पर्सिया यानी ईरान में कर दी गयी। आजादी के आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी जी के पद चिन्हों पर चलते हुए उनसे प्रभावित होकर, वो कांग्रेस के एक बहुत कर्मठ कार्यकर्ता के रूप में आजादी के आंदोलन में कई बार जेल गए। महावीर त्यागी का विवाह 26 जुलाई 1925 को बिजनौर जनपद के गांव राजपुर नवादा के ज़मीदार परिवार की बेटी शर्मदा त्यागी से हुआ था, इनकी तीन पुत्रियां है। इनकी पत्नी शर्मदा भी पहले से ही देश सेवा में लगी हुई थी और वो 1937 में देहरादून से संयुक्त प्रांतीय असेंबली के लिए चुनी गयी थी। हालाँकि असेंबली के लिए चुने जाने के एक वर्ष के बाद ही उनका निधन हो गया था। लेकिन पत्नी के निधन के बाद भी महावीर त्यागी जी का देश सेवा का जज्बा पूर्ण जोश के साथ कायम रहा और वो लगातार देश सेवा करते रहे।

महावीर त्यागी जब तक जिंदा रहे हमेशा अपने जीवन में अपने आदर्शों पर दृढतापूर्वक अडिग रहे। चाहें वो लम्बे समय तक अंग्रेजों की जेल में रहे, लेकिन फिर भी कभी उन्होंने अपने जीवन में विकट से विकट परिस्थितियों में भी सिद्धांतों से कोई समझौता नहीं किया था। वो देहरादून में बेहद लोकप्रिय थे, महावीर त्यागी को जनता के द्वारा "देहरादून का सुल्तान" की उपाधि से नवाजा गया था, देहरादून उनका अपना कार्यक्षेत्र था। देहरादून, बिजनौर (उत्तर-पश्चिम), सहारनपुर (पश्चिम) लोकसभा क्षेत्र से वर्ष 1952, 57 व 62 में सांसद रहे महावीर त्यागी, वर्ष 1951 से 53 तक वह केन्द्रीय राजस्व मंत्री रहे। वर्ष 1953 से 57 तक त्यागी जी मिनिस्टर फार डिफेंस ऑर्गेनाइजेशन (1956 तक पंडित नेहरू के पास रक्षा मंत्री का कार्यभार भी था) रहे। उनके कार्यकाल के दौरान ही देश में रक्षा सम्बंधी सामान बड़े पैमाने पर बनाने का कार्य शुरू हुआ था। वर्ष 1957 के बाद भी वह विभिन्न कमेटियों और पुनर्वास मंत्रालय आदि में रहकर देश सेवा करते रहे। 

जीवन के यादगार संस्मरण :-
वर्ष 1919 में जब देश में जलियांवाला बाग का जघन्य हत्याकांड घटित हुआ था, उस समय देश में हर तरफ अंग्रेजों के खिलाफ नफरत का ऐसा भयानक ज्वार उठा था, कि महावीर त्यागी भी अपनी फौज की नौकरी से इस्तीफा देकर चले आए थे। हालांकि बाद में अंग्रेजी सेना ने सजा के रूप में उनका कोर्ट मार्शल भी कर दिया था। लेकिन जलियांवाला बाग की घटना के बाद वो महात्मा गांधी जी के साथ देश की आजादी के आंदोलन में पूर्ण रूप से कूद गए थे। महावीर त्यागी को आजादी के आंदोलन के समय अंग्रेजों के द्वारा 11 बार गिरफ्तार करके जेल भेजा गया था। हालांकि वो देश पर सब कुछ कुर्बान करने की मंशा के साथ ही देश की आजादी की इस जंग में उतरे थे।

महावीर त्यागी जी की उस वक्त पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जनपदों में बहुत अच्छी पकड़ थी। महावीर त्यागी जी को एकबार किसान आंदोलन के दौरान बुलंदशहर में चार हजार लोगों की एक सभा को सम्बोधित करते वक्त गिरफ्तार कर लिया गया था, उनको गिरफ्तार करके अंग्रेजों के द्वारा भयानक यातनाएं दी गईं थी। तो अंग्रेजों के इस कृत्य की महात्मा गांधी जी ने यंग इंडिया में लेख लिखकर जबरदस्त आलोचना की थी। हालांकि उस वक्त उन पर इतनी यातनाओं की वजह बुलंदशहर के अंग्रेज मजिस्ट्रेट की उनसे व्यक्तिगत नाराजगी थी, जिसने उन पर देशद्रोह का मामला लगा दिया था और पूरी कोशिश थी कि महावीर त्यागी जी की चौधराहट वाली अकड़ को हमेशा के लिए खत्म कर सके, लेकिन बुलंद हौसले वाले व अपने जीवनकाल में एक सैन्य अधिकारी रहने वाले निड़र महावीर त्यागी जी को ना तो अंग्रेजों के आगे झुकना कुबूल था और ना ही अंग्रेजों से माफी मांगना कुबूल था। अंग्रेज मजिस्ट्रेट के साथ उनकी तनातनी और उन पर होने वाले अत्याचारों के चलते ना केवल देश की जनता की सुहानुभूति उनके साथ हुई बल्कि कांग्रेस के बड़े दिग्गज नेताओं की नजर में अब वो सीधे आ गए थे। वो जेल में मोतीलाल नेहरू के साथ भी बंद रहे थे और उनसे उनके अच्छे संबंध थे।

कांग्रेस में होने के बाद भी महावीर त्यागी के रिश्ते उस समय कांग्रेस के विरोधी रहे क्रांतिकारियों के साथ भी बहुत अच्छे थे, उनके सबसे करीबी थे सचिन्द्र नाथ सान्याल, जिनके संगठन हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन में ही चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त और सुखदेव जैसे क्रांतिकारियों को आगे बढ़ाया था।

लेकिन मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में देखें तो आज देश के संसदीय इतिहास में महावीर त्यागी सरीखे व्यक्तित्व वाले नेताओं का पूर्ण रूप से अभाव है, अब तो देश की राजनीति में चाटूकारों का जलवा है, आज के समय में हम देशवासियों को देश की राजनीति में कही भी महावीर त्यागी की तरह के ओजस्वी व्यक्तित्व के धनी स्पष्टवादी बेबाक शैली वाले तथ्यों के आधार पर अपने ही दल का विरोध करने वाले सच्चे राजनेता नजर नहीं आते हैं। महावीर त्यागी जी को अपने जीवनकाल में सरकार व सामाजिक जो भी दायित्व मिला उन्होंने हमेशा उसका पूर्ण निष्ठा व ईमानदारी के साथ निर्वाह किया। वो सविधान सभा, लोकसभा, राज्य सभा व मंत्री व अन्य सभी पदों पर रहते हुए भी हमेशा अपने आदर्शों पर दृढसंकल्प के साथ अडिग रहे। देश के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में त्यागी जी का व्यक्तित्व बड़ा ही आकर्षक था, वो बेहद बेबाक शैली के हाजिरजवाब, सत्य के प्रहरी, ईमानदार, भावुक और निडर व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति थे। उन्होंने जिस तरह से देश की स्वतंत्रता से पूर्व के बहुत सारे जन आंदोलनों में देश सेवा के लिए अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और देश की आजादी के लिए बहुत लम्बा कारावास भी भुगता उसके लिए देश हमेशा उनका ऋणी रहेगा।

वो देश की पहली नेहरू सरकार में केंद्रीय राजस्व मंत्री रहे थे, महावीर त्यागी जी का उस समय उत्तर प्रदेश के देहरादून इलाके में कोई सानी नहीं था, सारा जिला त्यागी जी का अपना एक घर के समान था, वो आम जनमानस के बीच बहुत ही ज्यादा लोकप्रिय थे, उन्हें जो अनुचित लगता था उसका वो तर्कसंगत ढंग से जबरदस्त रूप से विरोध भी करते थे, मगर वो कभी भी अपने मन में किसी के प्रति कोई द्वेष भाव ईर्ष्या और दुराग्रह नहीं रखते।

इसी तरह जब संसद में बहस होती थी महावीर त्यागी जी हमेशा अपनी तार्किक बातों से सभी का ध्यान आकर्षित कर लेते थे, सभी उनको बेबाकी से पूर्ण वक्तव्यों को सुनने के लिए आतुर रहते थे। उनकी बेबाकी के बारे में एक वाकया बहुत प्रसिद्ध है कि वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध को लेकर जब संसद में बहस चल रही थी। उन दिनों "अक्साई चिन" के चीन के कब्जे में चले जाने को लेकर विपक्ष ने जबरदस्त हंगामा काट रखा था। लेकिन जवाहरलाल नेहरू जी ने कभी नहीं सोचा होगा कि इस मसले पर विरोध में सबसे बड़ा चेहरा उनके अपने ही मंत्रिमंडल के वरिष्ठ सदस्य महावीर त्यागी के रूप में होगा। इस मसले पर जवाहर लाल नेहरू ने जब संसद में ये बयान दिया था कि "अक्साई चिन में तिनके के बराबर भी घास तक नहीं उगती, वो बंजर इलाका है इसलिए हमने छोड़ दिया है," तो उस समय संसद में महावीर त्यागी जी ने अपनी टोपी उतारकर गंजा सिर नेहरू जी को दिखाया और कहा- यहां भी कुछ नहीं उगता तो क्या मैं इसे कटवा दूं या फिर किसी और को दे दूं। सोचिए इस तार्किक जवाब को सुनकर पूरी संसद व नेहरू जी का क्या हाल हुआ होगा? 
क्या आज के समय में कोई राजनेता अपनी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से ऐसा कह सकता है।

लेकिन यह भी सही है कि आज अगर ऐसे लोग सरकार में मंत्री हों तो विपक्ष की किसी को भी जरूरत नहीं पड़े। महावीर त्यागी जी ने हमेशा यह साबित किया कि उनके लिये व्यक्ति पूजा के बजाय देश की पूजा महत्वपूर्ण है। उनको देश की एक इंच जमीन भी किसी को देना गवारा नहीं था, चाहे वो बंजर ही क्यों ना हो। उनके लिए हमेशा देशहित सर्वोपरि था।

महावीर त्यागी जी व्यक्ति पूजा के बहुत खिलाफ रहते थे और वो व्यक्ति पूजा के खिलाफ कांग्रेस पार्टी में बोलने वालों में सबसे आगे थे। उन्होंने ही इंदिरा गांधी जी को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाये जाने का बकायदा पत्र लिखकर विरोध किया था और उस समय की राजनीति के सिद्धांत देखों बाद में उन्हें उसी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ही साल 1968 में महावीर त्यागी को पांचवें वित्त आयोग का अध्यक्ष बनाया और सन,1970 में राज्यसभा सदस्य बनाकर संसद भेजा। साल 1976 में महावीर त्यागी ने सक्रिय राजनीति से हमेशा के लिए संन्यास ले लिया था। 

लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर संसद में सत्ता पक्ष के नेताओं का किसी भी मुद्दे को लेकर एक हो जाना आम है, अब कोई भी व्यक्ति अपनी सरकार का मुद्दों पर आधारित विरोध करने की भी हिम्मत नहीं रखता है। वही देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू सरकार में शामिल रहे स्वतंत्रता सेनानी महावीर त्यागी ऐसे व्यक्ति थे, जो कई मुद्दों पर देश व समाज हित में अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा करने में पीछे नहीं रहते थे। उनका भारतीय संसद की गरिमा को एक नया आयाम देकर ऊंचाईयों पर पहुंचाने में बहुत अहम अनमोल योगदान रहा है।

देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू जी की सरकार में वित्त, राजस्व और रक्षा जैसे अहम मंत्रालय संभालने वाले महावीर त्यागी जी 1967 का लोकसभा चुनाव एकदम अंजान नए चेहरे और निर्दलीय प्रत्याशी यशपाल सिंह से हार गए थे। उस समय कांग्रेस के इस दिग्गज नेता महावीर त्यागी के लिए यह चुनाव आखिरी चुनाव साबित हुआ था। उसके बाद वो फिर कभी चुनाव नहीं लड़े थे।

महावीर त्यागी जी वर्ष 1962 से 64 तक संसद की लोक लेखा समिति के चेयरमैन रहे। जनवरी 1966 में ताशकंद समझौते में हाजी पीर दर्रा जैसे कुछ सामरिक रूप से बेहद  महत्वपूर्ण स्थानों को पाकिस्तान को लौटाने की अनुमति देने पर महावीर त्यागी ने कार्यवाहक प्रधानमंत्री गुलजारी लाल नंदा के मंत्रीमंडल में पुनर्वास मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था, नंदा ताशकंद समझौते के बाद लाल बहादुर शास्त्री जी के निधन के बाद कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने थे। महात्मा गांधी जी का सानिध्य पाने वाले महावीर त्यागी,  सरदार पटेल, पंडित जवाहर लाल नेहरू, रफी अहमद किदवई और मदनमोहन मालवीय जी के भी बेहद करीबी रहे। उन्होंने देश में भाषाई आधार पर राज्यों के गठन का जबरदस्त विरोध किया था।

जब वो देश की आजादी के बाद लोकसभा के लिए चुने गए और उन्हें जवाहर लाल नेहरू की केबिनेट में "मिनिस्टर ऑफ रेवेन्यू एंड एक्सपेंडीचर" बनाया गया था। तो उस समय की उनके नाम पर एक दिलचस्प उपलब्धि आज भी इतिहास में दर्ज है, इस पद पर रहते उनकी यह बेहद खास उपलब्धि थी। आज देश की हर सरकार काला धन वापस लाने के लिए समय-समय पर तरह-तरह की "वोलंटरी डिसक्लोजर स्कीम" लेकर आती है, आपको जानकर यह हैरानी होगी कि वो स्कीम पहली बार देश में महावीर त्यागी जी ही लेकर आए थे। त्यागी जी ही वो पहले व्यक्ति थे, जिसने केरल की ईएस नम्बूरापाद की सरकार को धारा 356 लगा कर गिराने का विरोध किया था। बेबाक राय रखने वाले महावीर त्यागी जी को वो बयान भी काफी चर्चित रहा था, जिसमें उन्होंने कहा था कि "अगर कांग्रेस जाति या संम्प्रदाय की राजनीति में पड़ती है, तो वो अपनी कब्र खुद ही खोद लेगी।" उन्होंने पांचवे फाइनेंस कमीशन के अध्यक्ष के रूप में कार्य करते हुए, देश की वित्त और अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में काफी महत्वपूर्ण कई सुधार किए थे। अपनी जिंदगी के आखिरी समय तक वो राजनीतिक व्यवस्थाओं में लगातार सुधार के लिए काम करते रहे थे, उन्होंने एक कांग्रेसी होने के नाते न केवल जयप्रकाश नारायण जी के आंदोलन पर सवाल उठाए थे, बल्कि इंदिरा गांधी जी द्वारा देश में लगायी गई इमरजेंसी पर भी उन्होंने जमकर निशान साधा। 

वैसे उनके देशप्रेम से ओतप्रोत बहुत सारे किस्से बहुत मशहूर है। लेकिन अफसोस यह है कि ऐसी महान शख्सियत के साथ देश के इतिहासकारों व सरकार ने बहुत ज्यादा अन्याय किया है जो व्यक्ति सही मायनों में भारत माता का सच्चा सपूत था और देश के सर्वोच्च सम्मान "भारत रत्न" का हकदार था, लेकिन उनको न तो आज तक किसी सरकार ने और न ही भारत के आजादी के इतिहास में उनका तय सम्मान मिला है। 

ऐसे महान व्यक्तित्व के धनी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी महावीर त्यागी जी का स्वर्गवास 22 मई 1980 को नई दिल्ली में हो गया था, इस दिन यह महापुरुष हमेशा के लिए चिरनिद्रा में सो गया था, आज पुण्यतिथि पर हम उनको कोटि-कोटि नमन करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

।।  जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान।।

पुण्यतिथि पर विशेष - आधुनिक भारत के शिल्पी राजीव गांधीहस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागीस्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व रचनाकार

पुण्यतिथि पर विशेष - आधुनिक भारत के शिल्पी राजीव गांधी

हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व रचनाकार


आधुनिक भारत के शिल्पकार के रूप में विश्व में विख्यात राजीव गांधी हमारे देश के एक ऐसे दूरदर्शी नेता थे, जिन्होंने हम सभी देशवासियों को 21वीं सदी के आधुनिक भारत के निर्माण का बहुत ही बेहतरीन शानदार सपना दिखाया और उसको पूरा भी किया। राजीव गांधी जी ने अपने सपने को देश के धरातल पर मूर्तरूप देकर उतारने के लिए अपने प्रधानमंत्री के बहुत छोटे कार्यकाल में ही बहुत तेजी से युद्धस्तर पर कार्य करना शुरू कर दिया था। लेकिन ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था जिसके चलते उन्होंने हम से राजीव गांधी जी को असमय बहुत ही जल्दी छीन लिया, उनका असमय यूं दुनिया से चले जाना कही ना कही देश के विकास में गतिरोधक भी बना। भारतीय इतिहास में वो काला
दिन था 21 मई 1991 को जिस दिन अचानक सभी देशवासियों को अंदर तक झकझोर देने वाली खबर प्रसारित हुई की भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या तमिलनाडु के श्रीपेराम्बदूर में एक आत्मघाती विस्फोट हमले में कर दी गयी है। देश के आम व खास सभी लोगों को झकझोर देने वाली इस दुखद खबर से अचानक ही देश में हर तरफ शोक की लहर दौड़ पड़ी थी, प्रत्येक भारतवासी अवाक रह गया, करोड़ों लोग स्तब्ध रह गये कि ये देश पर अचनाक कैसा वज्रपात कैसे हो गया। उस समय देश के अधिकतर लोगों की आँखों में आंसू थे, लोगों की आँखों के ये आंसू भारत के महान सपूत अपने लाड़ले जनप्रिय नेता के लिए थे ना कि ये आंसू किसी राजनैतिक दल के नेता के लिए थे। ये उस आंसू व्यक्ति के लिए थे जिसे ये भारतवासी दिलोजान से चाहते थे, जो आतंकियों के हमले के चलते असमय काल का ग्रास बन गये थे। लोगों की ये पीढ़ा भारतीय राजनीति के उज्जवल भविष्य के उस चेहरे राजीव गांधी के लिए थी। उस दिन देश में हर तरफ शोक का गमगीन माहौल लोगों को बार-बार यह एहसास जरूर करवा रहा था कि आज देश में कोई बहुत ही बड़ी त्रासदी हुई है। राजीव गांधी के बाद कई नेताओं का दुनिया व हमारे देश में देहांत हुआ है लेकिन फिर कभी देश को वैसी पीड़ा और कष्ट शायद ही कभी हो। इस सबके लिए जिम्मेदार था राजीव गांधी जी का कुशल व्यवहार व देश के आमजनमानस के उज्जवल भविष्य के लिए दिल से सोच कर नीतियों को बनाने वाली उनकी कार्यशैली। इसलिए राजीव गांधी जी के बारे में यह कहना उचित होगा कि कु्छ लोग ताउम्र लोगों के दिलोदिमाग पर छा जाते है। राजीव गांधी भी एक ऐसी ही महान शख़्सियत थे, जिन्होंने प्रधानमंत्री के रूप में केवल भारत की ज़मीन पर राज ना करके बल्कि देशवासियों की सेवा करके उनके दिलों पर हुकूमत की थी। भले ही आज राजीव गांधी जी इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन फिर भी वो करोड़ों लोगों के दिलों में हमेशा ज़िंदा हैं और रहेंगे। चाहें कोई भी व्यक्ति या राजनीतिक दल उनकी छवि को खराब करने के लिए कितने भी प्रयास कर ले, लेकिन देश के विकास में उनके अनमोल योगदान को कभी भुला नहीं सकता है। आज हमारे देश में  ओछी राजनीति के चक्कर में अपने ही पूर्वजों व महापुरुषों का चरित्र हनन करने का जो फैशन चल पड़ा है वह ठीक नहीं है, हमको समझना होगा कि महापुरुष देश की अनमोल धरोहर होते है, वो किसी एक राजनीतिक दल का बपोती नहीं होते है, इतिहास को कुरेद-कुरेद कर उनकी छवि को खराब करना कहीं से भी सही नहीं है।

अपने स्वभाव से बेहद धीर गंभीर राजीव गांधी जी आधुनिक सोच और निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता वाले असाधारण व्यक्तित्व के व्यक्ति थे, वो भारत को विश्व की अत्याधुनिक तकनीकों से लैस करके भारत को ताकतवर विकसित देशों की श्रेणी में जल्द से जल्द लाना चाहते थे। राजीव अक्सर कहा करते थे कि भारत की एकता और अखंडता को बनाए रखते हुए उनका सबसे बड़ा सपना इक्कीसवीं सदी के आधुनिक विकसित भारत का निर्माण करने का है।

राजीव गांधी का जीवन परिचय :-
राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त, 1944 को मुंबई में हुआ था। वे सिर्फ़ तीन साल के थे, जब देश आज़ाद हुआ और उनके नाना पंडित जवाहर लाल नेहरू आज़ाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने। राजीव गांधी ने अपना बचपन अपने नाना के साथ तीन मूर्ति हाउस में बिताया था, जहां इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री नेहरू की परिचारिका के रूप में काम करती थी। वे कुछ वक़्त के लिए देहरादून के वेल्हम स्कूल में शिक्षा प्राप्त करने के लिए भी गए, लेकिन जल्द ही उन्हें हिमालय की तलहटी में स्थित आवासीय दून स्कूल में भेज दिया गया। बाद में उनके छोटे भाई संजय गांधी को भी इसी स्कूल में भेजा गया, जहां दोनों साथ रहे। स्कूल से निकलने के बाद राजीव गांधी कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज गए, लेकिन जल्द ही वे वहां से हटकर लंदन के इम्पीरियल कॉलेज चले गए वहां उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। उनके सहपाठियों के मुताबिक़ उनके पास दर्शन, राजनीति या इतिहास से संबंधित पुस्तकें न होकर विज्ञान एवं इंजीनियरिंग की बहुत सारी पुस्तकें हुआ करती थीं। हालांकि उनकी संगीत में बहुत दिलचस्पी थी उन्हें पश्चिमी और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय और आधुनिक संगीत पसंद था। उन्हें फ़ोटोग्राफ़ी और रेडियो सुनने का भी ख़ासा शौक़ था, हवाई जहाज उड़ाना उनके जीवन का सबसे बड़ा जुनून था। इंग्लैंड से घर लौटने के बाद उन्होंने दिल्ली फ़्लाइंग क्लब की प्रवेश परीक्षा पास की और व्यावसायिक पायलट का लाइसेंस हासिल किया। इसके बाद वे 1968 में घरेलू राष्ट्रीय जहाज़ कंपनी इंडियन एयरलाइंस के सफल पायलट बन गए। बाद में उन्होंने कैम्ब्रिज में पढ़ रही इटली की एंटोनियो माइनो ( सोनिया गांधी) जो उस वक़्त वहां अंग्रेज़ी भाषा की पढ़ाई कर रही थीं से वर्ष 1968 में नई दिल्ली में शादी कर ली। वे अपने दोनों बच्चों राहुल और प्रियंका के साथ नई दिल्ली में इंदिरा गांधी के निवास पर रहकर ख़ुशी-ख़ुशी अपनी ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे। तब ही 23 जून 1980 को एक विमान दुर्घटना में उनके भाई संजय गांधी की मौत ने उनके जीवन के हालात एकाएक बदल कर रख दिए। उन पर राजनीति में आकर अपनी माँ इंदिरा की मदद करने का जबरदस्त दबाव बनने लगा। फिर कई अंदरूनी और बाहरी चुनौतियां भी राजीव जी के सामने आईं। पहले उन्होंने इन सबका काफ़ी विरोध किया, लेकिन बाद में उन्हें अपनी माँ इंदिरा गांधी की बात माननी पड़ी और वो इस तरह न चाहते हुए भी देश की सियासत में आ ही गए। राजीव जून 1981 में अपने भाई संजय की मौत की वजह से ख़ाली हुई उत्तर प्रदेश के अमेठी लोकसभा क्षेत्र से उपचुनाव लड़कर विजयी बने। फिर उन्हें नवंबर 1982 में भारत में हुए एशियाई खेलों से संबंधित महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी दी गई, जिसे उन्होंने बख़ूबी अंजाम दिया। साथ ही कांग्रेस के महासचिव के तौर पर उन्होंने उसी लगन से काम करते हुए पार्टी के संगठन को अच्छे से व्यवस्थित और सक्रिय किया था।

31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद मात्र चालीस वर्ष की उम्र में प्रधानमंत्री बनने वाले युवा राजीव गांधी देश के सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री थे। जब 31 अक्टूबर 1984 को वे कांग्रेस अध्यक्ष और देश के प्रधानमंत्री बने थे तो उस समय देश के सामने बहुत सारी ज्वलंत विकराल समस्याएं खड़ी थी, जैसे कि पंजाब, असम और मिजोरम अंदरूनी हिंसा में जल रहे थे।
ऑपरेशन ब्लू स्टार और इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पंजाब और दिल्ली में सिख विरोधी दंगे चल रहे थे। अवैध प्रवासियों के खिलाफ नस्लीय हिंसा से असम भी जबरदस्त ढंग से झुलस रहा था। मिजोरम में भी विद्रोह के बिगुल बज रहे थे। लेकिन उन्होंने देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री और बेहद कम अनुभवी होते हुए कभी  भी इन सभी बेहद ज्वंलत समस्याओं से मुंह नहीं चुराया, उन्होंने अपनी व्यवहार कुशलता, सादगी और बिना अहंकार की भावना के गलतियां सुधारने की कोशिश से उन्होंने समस्याओं का धीरे-धीरे समाधान करना शुरू किया। हालांकि इस बीच उन्होंने देश में लोकसभा के चुनाव कराने का आदेश दिया और बेहद दुखी होने के बावजूद भी उन्होंने अपनी हर ज़िम्मेदारी को बख़ूबी निभाया। महीने भर की लंबी चुनावी मुहिम के दौरान उन्होंने पृथ्वी की परिधि के लगभग डेढ़ गुना के बराबर दूरी की यात्रा करते हुए देश के तक़रीबन सभी हिस्सों में जाकर 250 से अधिक जनसभाएं कीं और वह खुद देश के लाखों लोगों से रूबरू हुए। उस लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी को रिकॉर्ड 401 सीटें हासिल हुई थी। जिसके बाद उन्होंने अपने इक्कीसवीं सदी के भारत के सपने को साकार करने के लिए देश के कई क्षेत्रों में बहुत तेजी से नई पहल करने की शुरुआत की, जिसमें संचार क्रांति, कंप्यूटर क्रांति, शिक्षा का प्रसार, 18 साल के युवाओं को मताधिकार, पंचायती राज आदि मुख्य रूप से शामिल हैं। राजीव गांधी जी देश की कंप्यूटर क्रांति के जनक के रूप में भी जाने जाते हैं। वे युवाओं के साथ-साथ देश के हर वर्ग की उम्र के लोगों व समाज के लोकप्रिय नेता थे। लोग उनका भाषण सुनने के लिए घंटों-घंटों तक इंतज़ार किया करते थे। राजीव गांधी के कुशल व्यवहार के उस समय के विपक्षी दलों के नेता भी भी कायल थे, वह अपने विरोधियों की मदद के लिए भी हमेशा तैयार रहते थे।
उन्होंने अपने प्रधानमंत्री कार्यकाल में कई ऐसे महत्वपूर्ण फ़ैसले लिए, जिसका असर आज देश के विकास में स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है। आज हर हाथ में दिखने वाला मोबाइल व हर घर में कम्प्यूटर राजीव गांधी के उन्हीं शानदार फ़ैसलों का शानदार नतीजा है। राजीव गांधी को अपनी सुरक्षा में तैनात बहुत सारे सुरक्षाकर्मियों का घेरा बिलकुल पसंद नहीं था। वे अक्सर अपनी जीप खुद ड्राइव करना पसंद करते थे। राजीव गांधी जी ने जी ने भारतीय राजनीति के पन्नों पर जब अपनी सोच, अपने सपनों को उकेरना शुरू किया, तो सबको स्पष्ट नज़र आने लगा कि उनकी सोचा देश में चल रही पुराने ढर्रे की राजनीति से बिल्कुल अलग है और वह देश को एक नया मुकाम प्रदान करेंगे।

राजीव गांधी जी ने अपने कार्यकाल में देश के निर्माण के लिए काफी महत्वपूर्ण कार्य थे। उन्हें जब वर्ष 1982 में एशियाई खेलों की आयोजन समिति में शामिल किया गया तो उन्होंने सफलतापूर्वक इन खेलों का आयोजन करा कर ज़िम्मेदारी को बख़ूबी अंजाम दिया था । राजीव गांधी जी को ही भारत में सूचना क्रांति के जनक माना जाता है, देश में कंप्यूटराइजेशन और टेलीकम्युनिकेशन क्रांति का श्रेय उन्हें जाता है। राजीव गांधी ने वर्ष 1986 में अपने प्रधानमंत्री कार्यकाल में देश में आईटी और टेलीकॉम क्षेत्र में जबरदस्त क्रांति लाने का काम किया, वो सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत की भूमिका को बहुत अहम मानते थे। उन्होंने ही देश में सबसे खास तकनीक कंप्यूटर के इस्तेमाल को आम आदमी के लिए करवाने की शुरुआत की थी। साइंस और टेक्नॉलोजी को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने सरकारी बजट बढ़ाए। जिसके चलते आज भी देश में रोजगार के भरपूर अवसर हम सभी भारतवासियों को सम्पूर्ण विश्व में मिल रहे है, उसी के चलते आज भारत की  अर्थव्यवस्था बहुत मजबूत हुई हैं।

राजीव गांधी ने ही वर्ष 1986 में शिक्षा का स्तर सुधारने के उद्देश्य से राष्ट्रीय शिक्षा नीति का एलान किया। जिसके चलते ही देश में जवाहर नवोदय विद्यालयों का निर्माण किया गया, जिस में आज लाखों ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों को अच्छी उच्च गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा मिल रही है।

राजीव गांधी ने वर्ष 1986 में महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड (एमटीएनएल) की स्थापना की थी। जिसकी पब्लिक कॉल ऑफिस (PCO) के जरिए एक तरफ जहां देश के शहरी व ग्रामीण इलाकों में संचार सेवा का बहुत तेजी से विस्तार हुआ था वहीं दूसरी तरफ लोगों के लिए रोजगार के नये अवसर मिले थे। राजीव जी ने गांव-गांव को टेलीफोन से जोड़ने और कंप्यूटर के जरिए महीनों का काम मिनटों में करने की बात की थी राजीव गांधी का सपना था कि हमारे देश के गांव-गांव में टेलीफोन पहुंचे और कंप्‍यूटर शिक्षा का देश में जमकर प्रचार-प्रसार हो।

अपने प्रधानमंत्री कार्यकाल में राजीव गांधी ने देश की युवाशक्ति को अत्याधिक बढ़ावा दिया था, क्योंकि उनका मानना था कि देश का विकास युवाओं के द्वारा ही हो सकता है। देश के युवाओं को रोजगार मिले, इसके लिए वो हमेशा प्रयासरत रहे और उन्होंने इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए जवाहर रोजगार योजना शुरू की थी, जिसने देश के युवाओं की तकदीर ही बदल दी थी।

राजीव गांधी ने स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं में महिलाओं को 33% रिजर्वेशन दिलवाने का काम किया, उन्होंने मतदाता की उम्र 21 वर्ष से कम करके 18 वर्ष तक के युवाओं को चुनाव में वोट देने का अधिकार दिलवाया।

राजीव गांधी ने अपने "पावर टू द पीपल" आइडिया के चलते ही देश में पंचायती राज व्यवस्था लागू करवाने की दिशा में कदम उठाये थे और उनकी इसी सोच के चलते अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (एआईसीसी) सत्रों ने हमेशा देश के लिये नीतियां बनाने की बुनियाद रखी है और फरवरी 1989 का सत्र भी इस दृष्टि से ऐतिहासिक माना जाता है, क्योंकि उस समय कांग्रेस ने संकल्प पारित किया था कि ‘‘स्वतंत्र भारत में दसवां मील का पत्थर पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा देना है।’’ एक ही झटके में राजीव गांधी और कांग्रेस पार्टी ने ग्रामीण बेरोजगार, अनुसूचित जनजाति एवं अनुसूचित जाति, महिलाओं और ग्रामीण भारत के अन्य अल्पसंख्यक समूहों को संवैधानिक शासन के दायरे में ला दिया। ये सारे वर्ग ऐसे हैं जो पहले लोकतंत्र के फायदों और भारत की विकास प्रक्रिया से से लगभग अछूते रहते थे। राजीव गांधी जी के प्रयासों से देश में लोकतांत्रिक भारत की बुनियाद तैयार हो चुकी थी। यह कदम ही राजीव जी के सपनों के भारत की बुनियाद था, क्योंकि उन्होंने पंचायती राज के जरिए देश में एक साथ दो काम करके गांवों को अपने विकास का अधिकार और उसमें महिलाओं को एक तिहाई हिस्सेदारी दे दी थी।

उन्होंने देश की नौकरशाही में सुधार लाने और देश की अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के लिए काफी कारगर क़दम उठाए। सत्ता के विकेंद्रीकरण के अलावा राजीव गांधी ने सरकारी कर्मचारियों के लिए 1989 में 5 दिन काम का प्रावधान भी देश में लागू किया था।

राजीव गांधी ने कुछ सेक्टर्स में सरकारी नियंत्रण को खत्म करने की कोशिश भी की थी। यह सब देश से बड़े पैमाने पर नियंत्रण और लाइसेंस राज के खात्मे की एक जबरदस्त शुरुआत थी।

राजीव गांधी जी ने इनकम टैक्स और कॉर्पोरेट टैक्स घटाया, देश के जटिल लाइसेंस सिस्टम को बेहद सरल किया और कंप्यूटर, ड्रग और टेक्सटाइल जैसे क्षेत्रों से सरकारी नियंत्रण को खत्म किया। साथ ही कस्टम ड्यूटी भी घटाई और निवेशकों को बढ़ावा दिया। देश की बंद अर्थव्यवस्था को बाहरी दुनिया की खुली हवा महसूस करवाने का पहला मौका दिया, इसलिए देश में आर्थिक उदारवाद की शुरुआत करने का कुछ श्रेय राजीव गांधी जी को भी अवश्य मिलना चाहिए।

राजीव गांधी जी देश की सियासत व सिस्टम को भ्रष्टाचार से मुक्त करना चाहते थे, लेकिन यह विडंबना है कि बाद में उन्हें खुद  भ्रष्टाचार की वजह से ही अपने देश में सबसे ज़्यादा आलोचना का सामना करना पड़ा। जो देश के कुछ राजनेताओं की महरबानी से आजतक भी जारी है।

राजीव गांधी के सपनों का भारत एक सशक्त सैन्य शक्ति वाला देश था, वो विश्व में अमनचैन के पैरोकार थे, लेकिन जानते थे कि शांति और अहिंसा की बातें किसी कमजोर देश को नहीं बल्कि मजबूत देश को ही शोभा देती हैं। यही वजह है कि उन्होंने मजबूत सैन्य शक्ति वाले भारत के अपने सपने को पूरा करने के लिए देश के मिसाइल और परमाणु कार्यक्रमों की रफ्तार बढ़ाने का फैसला किया था। जिसका सकारात्मक परिणाम बाद में देशवासियों के सामने आया था।

राजीव गांधी ने अपने कार्यकाल में कई साहसिक क़दम उठाए, जिनमें श्रीलंका में आईपीकेएफ (शांति सेना) का भेजा जाना, असम समझौता, पंजाब समझौता, मिज़ोरम समझौता आदि शामिल हैं। इसकी वजह से ही कुछ चरमपंथी ताकतें उनकी जान की दुश्मन बन गयी थी। नतीजतन, श्रीलंका में सलामी गारद के निरीक्षण के वक़्त उन पर जानलेवा हमला किया गया, जिसमें वो बाल-बाल बच गए थे।

साल 1989 में उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया था, भारत का दिल कहलाने वाले गांवों की याद आज सभी राजनीतिक पार्टियों को आने लगती है, अपनी राजनीतिक साख को बचाने के लिए जिस तरह से नेता शहर से निकलकर गांवों के चक्कर लगाने लगे हैं, उसकी शुरूआत भी राजीव गांधी जी ने बहुत पहले ही कर दी थी। 31 अक्टूबर 1984 से 2 दिसम्बर 1989 तक भारत के प्रधानमंत्री की गद्दी संभालने वाले राजीव ने 1989 में अपनी हार के बाद दिल्ली दरबार से बाहर निकलने का फैसला किया था ।

राजीव गांधी ने भ्रष्टाचार को देश के विकास का सबसे बड़ा दुश्मन बताया था. उनका सबसे चर्चित बयान था कि "सरकार के आवंटित एक रुपये में से सिर्फ 15 पैसे ही गाँव तक पहुंचते हैं" वो पहले ऐसे नेता थे जिन्होंने सरकारी तंत्र के इस भ्रष्टाचार को इतना करीब से पहचाना और खुलकर सार्वजनिक रूप से इसे स्वीकार किया। भ्रष्टाचार से निपटने के लिए राजीव गांधी ने कठोर कानूनों को सख्ती से लागू कराया, जो उस समय देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को रोकने में ताकतवर भी साबित हुए। यही नहीं उन्होंने दल-बदल विरोधी कानून भी लागू कराया जिससे राजनीति में भ्रष्टाचार पर रोक लग सके। हालांकि बाद में राजीव गांधी पर खुद भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे। उन पर बोफोर्स तोप की खरीद में घूस लेने के आरोप लगे, लेकिन ये आरोप देश की सर्वोच्च अदालत में कभी साबित नहीं हो पाए और आखिरकार उनकी मौत के कई वर्ष बाद देश की सर्वोच्च अदालत ने उन्हें अपने फैसले में बेगुनाह बताया था, लेकिन आज भी कुछ राजनेता उन पर आरोप लगाते रहते है।

राजीव गांधी जब देश में आगामी आम चुनाव के प्रचार के लिए  21 मई, 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेराम्बदूर गए, जहां एक आत्मघाती हमले में उनकी मौत हो गई और भारत के लिए नई सदी की सोच का सपना लिए कांग्रेस के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी हमेशा-हमेशा के लिए खामोश हो गए। लेकिन तब तक नई सोच के इस नौजवान नेता ने भारत को प्रगति की एक नयी राह पर बाखूबी चलना सिखा दिया था। जिसे आज के भारत में हम बखूबी महसूस कर सकते हैं। राजीव गांधी की देश सेवा को राष्ट्र ने उनके दुनिया से विदा होने के बाद स्वीकार करते हुए उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया, जिसे श्रीमती सोनिया गांधी ने 6 जुलाई, 1991 को अपने पति की ओर से ग्रहण किया था।

राजीव गांधी कहते थे कि -
"भारत एक प्राचीन देश, लेकिन एक युवा राष्ट्र है,
मैं जवान हूँ और मेरा भी एक सपना है,
मेरा सपना है भारत को मजबूत, स्वतंत्र,
आत्मनिर्भर
और दुनिया के सभी देशों में से प्रथम रैंक
में लाना और मानव जाति की सेवा करना।"

वो किसानों के बारे में कहते थे कि -
यदि किसान कमजोर हो जाते हैं तो देश
आत्मनिर्भरता खो देता है, लेकिन अगर
वे मजबूत हैं तो देश की स्वतंत्रता भी मजबूत हो जाती है। अगर हम कृषि की प्रगति को बरकरार नहीं रख पाए तो देश से हम गरीबी नहीं मिटा पाएंगे। लेकिन हमारा सबसे बड़ा कार्यक्रम गरीबी
उन्मूलन हमारे किसानों के जीवन स्तर में
सुधार लायेगा। गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम का मकसद किसानों का उत्थान करना है।

आज राजीव गांधी जी की हत्या को वर्षों हो गए हैं। इन वर्षों में भारत राजीव के सपनों का देश बना है या नहीं, यह कहना बहुत मुश्किल होगा। राजीव ने ही कभी भारत को मजबूत, महफूज़ और तरक्की की राह पर रफ्तार से दौड़ता मुल्क बनाने का सपना देखा था। देश की तरक्की पसंद राजीव ने ही कभी भारत को विश्व समुदाय व वक्त के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना सिखाया था। वो अपनी आधुनिक सोच के बलबूते भारत की तकदीर बदलने वाले कुशल शिल्पी थे, राजीव गांधी देश को अत्याधुनिक नवीनतम तकनीक से लैस करके इक्कीसवीं सदी का आधुनिक भारत बनाने का सपने देखते थे और हमेशा उसी रास्ते पर आगे भी बढ़े। यह कहना गलत नहीं होगा कि आज जिस भारत में हम सांस ले रहे हैं। जिस आधुनिक भारत का लोहा आज पूरी दुनिया मान रही है, जिस भारत पर आज पूरी दुनिया की नजरें इनायत हैं। जिस भारत को आने वाले कल की विश्वशक्ति माना जा रहा है और कहा जा रहा है कि भविष्य में एक बार फिर भारत पूरे विश्व को एक नई राह दिखाएगा, इस स्थिति की ठोस नींव रखने का श्रेय भारत माता के महान सपूत राजीव गांधी को ही जाता है।
आज पुण्यतिथि पर उनको चंद पंक्तियों के माध्यम से श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ-

"वो आधुनिक भारत के थे शिल्पकार
उनके थे देशहित में उच्च विचार
करते थे वो अपनी जन्मभूमि से प्यार
लाते थे देश के विकास के लिए नयी
आधुनिक तकनीक व उच्च विचार
ऐसे थे राजीव गांधी भारत के शिल्पकार।"


।।जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।

बुधवार, 20 मई 2020

पुण्यतिथि पर विशेष - स्वदेशी आंदोलन के अग्रणी महानायक राष्ट्रवादी दिव्यद्रष्टा बिपिन चन्द्र पाल

पुण्यतिथि पर विशेष - 

स्वदेशी आंदोलन के अग्रणी महानायक राष्ट्रवादी दिव्यद्रष्टा बिपिन चन्द्र पाल

दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप
स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व रचनाकार

हमारे देश की आजादी में 'गरम दल' के 'लाल-बाल-पाल' की मशहूर तिकड़ी की बहुत ही अहम भूमिका मानी जाती है, इस महान तिकड़ी में 'लाल' थे लाला लाजपत राय, 'बाल' थे बालगंगाधर तिलक और 'पाल' थे बिपिन चन्द्र पाल, इन सभी महान क्रांतिकारियों के नाम भारतीय स्वाधीनता संग्राम आंदोलन के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखे गए हैं। इस तिकड़ी के बिपिन चन्द्र पाल को एक राष्ट्रवादी दिव्यद्रष्टा नेता होने के साथ-साथ, क्रांतिकारी, समाज-सुधारक, शिक्षक, निर्भीक पत्रकार, उच्च कोटि का लेखक व  कुशल वक्ता माना जाता था। बिपिन चन्द्र पाल ने अपना सम्पूर्ण जीवन माँ भारती की सेवा में समर्पित कर दिया था, वो देश की आजादी के लिए समर्पित एक महान क्रांतिकारी योद्धा थे। उन्होंने अपने सशक्त प्रयासों से देश में अंग्रेजी हुकुमत की चूलें हिला देने का कार्य किया था, उनको देश में क्रांतिकारी विचारों का जनक माना जाता था, वो देश में स्वदेशी आंदोलन के सूत्राधार व उसके अग्रणी महानायकों में से एक थे। क्रांतिकारी बिपिन चन्द्र पाल देश की उन महान विभूतियों में शामिल हैं जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन की मजबूत बुनियाद रखने में अपनी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

जीवन परिचय :- 
बिपिन चन्द्र पाल जी का जन्म 7 नवंबर 1858 में बंगाल के एक धनवान जमींदार कायस्थ हिन्दू परिवार में हुआ था। इनका जन्म स्थान अविभाजित भारत के हबीबगंज जनपद के सिलहट के पोइल गाँव में हुआ था, वर्तमान में इस जनपद का कुछ भाग बांग्लादेश एवं कुछ भाग असम में आता हैं। इनके पिता रामचन्द्र पाल फारसी के विद्वान थे और इनकी माता नारायणी देवी थी।

बिपिन चन्द्र पाल की प्रारम्भिक शिक्षा एक मौलवी के सानिध्य में हुई थी, बाद में उन्होंने सेंट पॉल कैथेड्रल मिशन कॉलेज कलकत्ता में अध्यन किया था, लेकिन कुछ कारणों की वजह से उनको पढ़ाई बीच में ही छोड़ देनी पड़ी थी, वह वर्ष 1879 में एक विद्यालय मे पढ़ाने का कार्य करने लगे, उन्होंने कोलकाता में पुस्तकालय में भी काम किया था। वह एक बहुत ही विद्वान व्यक्ति थे उन्हें पढ़ने व लिखने का बहुत शौक था, उन्होंने गीता, उपनिषद आदि ग्रन्थों का अध्ययन किया था। 

उन्होंने अपने जीवनकाल में कलमकार के रूप में लेखन व संपादन का बहुत कार्य किया था। उनकी कुछ प्रमुख रचनाएं इस प्रकार हैं - इंडियन नेस्नलिज्म, नैस्नल्टी एंड एम्पायर, स्वराज एंड द प्रेजेंट सिचुएशन, द बेसिस ऑफ़ रिफार्म, द सोल ऑफ़ इंडिया, द न्यू स्पिरिट, स्टडीज इन हिन्दुइस्म, क्वीन विक्टोरिया आदि का लेखन किया था।

उन्होंने अपने जीवन में एक पत्रकार व संपादक के रूप में बहुत कार्य किया था। उन्होंने सिलहट से निकलने वाले 'परिदर्शक' नामक साप्ताहिक में कार्य आरम्भ किया। उनके द्वारा संपादित कुछ प्रमुख पत्रिकाएं इस प्रकार हैं - परिदर्शक, बंगाल पब्लिक ओपिनियन, लाहौर ट्रिब्यून, द न्यू इंडिया, द इंडिपेंडेंट इंडिया, बन्देमातरम, स्वराज, द हिन्दू रिव्यु , द डैमोक्रैट, बंगाली आदि थी।

बिपिन चन्द्र पाल बहुत ही छोटी आयु में ही ब्रह्म समाज में शामिल हो गए थे और समाज के अन्य सदस्यों की भांति वो भी उस समय देश में व्याप्त सामाजिक बुराइयों, जातिवाद और रुढ़िवादी परंपराओं का खुलकर विरोध करने लगे। उनका विरोध केवल शब्दों तक ही सीमित नहीं था, अपितु उनके आचरण में भी यह स्पष्ट रूप से साफ दिखाई देता था। उन्होंने बहुत ही छोटी उम्र में देश में जाति के आधार पर होने वाले भेदभाव के खिलाफ दमदार ढंग से आवाज उठायी और अपने से ऊंची जाति वाली एक विधवा महिला से विवाह किया था, हालांकि उनके परिवार ने इस विवाह का बहुत अधिक विरोध किया था, लेकिन उन्होंने अपनी पत्नी को मान-सम्मान दिलाने और अपने विचारों को मान देने की खातिर अपने परिवार तक को भी त्याग दिया था। बिपिन चन्द्र पाल अपनी धुन के बहुत पक्के थे, इसलिए उन्होंने बहुत अधिक पारिवारिक और सामाजिक दबाओं के बावजूद भी कोई समझौता नहीं किया था।

महान क्रांतिकारी बिपिन चन्द्र पाल ने 1905 के बंगाल विभाजन के विरोध में अंग्रेजी हूकूमत के खिलाफ चलने वाले आंदोलन में बहुत बड़ा योगदान दिया था, उन्होंने अंग्रेजों की सत्ता को हिला दिया था, इस आंदोलन को उस समय जन समुदाय का बहुत बड़े पैमाने पर व्यापक समर्थन मिला था। बिपिन चंद्र पाल 1886 में कांग्रेस में शामिल हुए। उन्होंने देश में स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की नीति को अपनाकर आजादी की लड़ाई के नयी धार देने का काम किया था।

अंग्रेजों की औपनिवेशिकवाद नीति के खिलाफ पहले लोकप्रिय जनांदोलन को शुरू करने का श्रेय इन्हीं तीनों की महान तिकड़ी को ही जाता है। इन लोगों ने ब्रिटिश शासकों तक भारत की जनता व अपना सन्देश पहुंचाने के लिए विरोध के बेहद कठोर उपायों को अपनाकर अंग्रेजी शासकों को सबक सिखाने का काम किया था, उस समय लाल-बाल-पाल की महान तिकड़ी ने महसूस किया था कि भारत में बिकने वाले विदेशी उत्पादों से देश की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है और भारत के लोगों का काम भी छिन रहा है। अपने 'गरम' विचारों के लिए मशहूर बिपिन चन्द्र पाल ने लाला लाजपतराय व बाल गंगाधर तिलक के साथ मिलकर, देश में स्वदेशी आन्दोलन को भरपूर बढ़ावा दिया और ब्रिटेन में तैयार सभी वस्तुओं का बहिष्कार भारतीयों से करवाया, उन्होंने मैनचेस्टर की मिलों में बने कपड़ों से परहेज करने के लिए देश के लोगों को प्रेरित किया, विदेशी कपडों की सार्वजनिक रूप से होली जलवायी और औद्योगिक तथा व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में हड़ताल, तालाबंदी आदि के अपने सशक्त हथियारों से ब्रिटिश हुकुमत की नीद उड़ाकर भारत में उनकी सत्ता को हिलाकर अंग्रेजों को जबरदस्त चुनौती दी थी। 

देश की आजादी के लिए राष्ट्रीय आंदोलन के शुरूआती सालों में ‘गरम दल’ की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही थी, क्योंकि इनकी भूमिका से देश में आजादी के आंदोलन को एक नई दिशा मिली थी और उनके प्रयासों से देश के लोगों के बीच आजादी प्राप्त करने के लिए जागरुकता बढ़ी। बिपिन चन्द्र पाल ने राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान देश की आम जनता में जागरुकता पैदा करने में बहुत अहम भूमिका निभाई थी। उनका मानना था कि ‘नरम दल’ के हथियार ‘प्रेयर-पीटिशन’ से देश को स्वराज नहीं मिलने वाला है, बल्कि स्वराज के लिए हमकों विदेशी हुकुमत पर करारा प्रहार करना पड़ेगा। इसी कारण उन्हें देश की आजादी के इतिहास में क्रांतिकारी विचारों का जनक कहा जाता है। उनका भारत पर राज करने वाली अंग्रेजी हुकुमत में बिलकुल भी विश्वास नहीं था और उनका हमेशा मानना था कि विनती और असहयोग जैसे हथियारों से अंग्रेजों जैसी विदेशी ताकत को पराजित नहीं किया जा सकता। इसी कारण उनका महात्मा गाँधी जी के साथ वैचारिक मतभेद था। वो किसी के विचारों से असहमत होने पर वह उस से अपने विचार व्यक्त करने में पीछे नहीं रहते। यहाँ तक कि विचारों से सहमत नहीं होने पर उन्होंने महात्मा गाँधी जी के कुछ विचारों का विरोध भी किया था।

उन्होंने क्रांतिकारी पत्रिका ‘बन्दे मातरम’ की स्थापना भी की थी। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की गरफ्तारी और स्वदेशी आन्दोलन के बाद, अंग्रेजों की दमनकारी निति के बाद वे इंग्लैंड चले गए। वहाँ जाकर वह क्रान्तिकारी विचार धारा वाले ‘इंडिया हाउस’ से जुड़ गए, जिसकी स्थापना श्यामजी कृष्ण वर्मा ने की थी और उन्होंने वहां ‘स्वराज’ पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया। जब क्रांतिकारी मदन लाल ढींगरा ने सन 1909 में अंग्रेज अधिकारी कर्ज़न वाइली की हत्या कर दी तब ‘स्वराज’ का प्रकाशन बंद कर दिया गया और लंदन में बिपिन को बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ा था। 

वो केशवचंद्र सेन, शिवनाथ शास्त्री, एस.एन.बनर्जी और बी.के.गोस्वामी, महर्षि अरविंद, लाला लाजपतराय व बाल गंगाधर तिलक आदि जैसे नेताओं से बहुत अधिक प्रभावित थे, उन्होंने 1904 के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बम्बई सत्र, 1905  के बंगाल विभाजन आंदोलन, देश के महत्वपूर्ण स्वदेशी आंदोलन, असहयोग आंदोलन और 1923 की बंगाल की संधि में पूर्ण उत्साह के साथ भाग लिया था। उनको वंदे मातरम् राजद्रोह के मामले में अरविन्द घोष के खिलाफ गवाही देने से इंकार करने पर छह महीने की सजा हुई थी। लेकिन इसके बाद भी उन्होंने गवाही देने से इंकार कर दिया था। अपने जीवन के अंतिम समय में वो कुछ सालों के लिए कांग्रेस से अलग हो गए थे। जीवन भर भारत की आजादी के लिए संघर्ष करने वाला यह स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, देश की आजादी की जंग का महानायक का स्वतन्त्र भारत के स्वप्न को अपने मन में लिए 20 मई 1932 को कलकत्ता में स्वर्ग सिधार कर हमेशा के लिए चिरनिद्रा में सोकर अमर हो गया, और इस प्रकार भारत ने अपना एक महान और जुझारू राष्ट्रवादी स्वतंत्रता सेनानी खो दिया। जिसको तत्कालीन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के युद्ध में एक अपूरणीय क्षति के रूप में माना जाता है। आज हम पुण्यतिथि पर देश की आजादी के महानायक बिपिन चन्द्र पाल को कोटि-कोटि नमन करते हुए उनको विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।

मंगलवार, 19 मई 2020

स्वदेशी वस्तुओं को बढ़ावा देने के लिए देश के कर्ताधर्ताओं को खुद पेश करनी होगी नजीर



स्वदेशी वस्तुओं को बढ़ावा देने के लिए देश के कर्ताधर्ताओं को खुद पेश करनी होगी नजीर

हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व रचनाकार


कोरोना वायरस (कोविड़-19) महामारी के संक्रमण से लोगों की जिंदगियों को बचने के लिए लगाए गये बेहद आवश्यक सम्पूर्ण लॉकडाउन ने विश्व के अधिकांश देशों की वित्तीय स्थिति खराब कर दी है। एक अदृश्य मानव सभ्यता के दुश्मन घातक कोरोना वायरस ने आज दुनिया के सभी देशों की अर्थव्यवस्थाओं को बहुत ही बुरी तरह से अस्त-व्यस्त करके ध्वस्त कर दिया है। हमारे देश की अर्थव्यवस्था भी उसके प्रभाव से अछूती नहीं है, आज हमारे देश की अर्थव्यवस्था को भी बहुत ही ज्यादा मुश्किल हालात के दौर से गुजरना पड़ रहा है। हमारे देश के दिग्गज नीतिनिर्माता लगातार अर्थव्यवस्था को बेहतर करने के लिए धरातल पर तरह-तरह के प्रयास कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस समय को भारत के लिए एक बहुत ही अच्छे व्यापारिक मौके के रूप में देख रहे हैं। 12 मई को प्रधानमंत्री मोदी ने अपने राष्‍ट्र के नाम संबोधन में देश की आम जनता से कहा था कि संकट के इस दौर में "लोकल" ने ही हमें बचाया है, स्थानीय स्तर पर निर्मित उत्पादों ने ही हमें आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया है, हमें इसे ही अपने आत्मनिर्भर बनने का मंत्र बनाना चाहिये, अपने संबोधन में उन्होंने पहली बार "लोकल पर वोकल" का एक नया नारा भी देश की सम्मानित जनता को दिया है। वैसे आज के हालात में देखा जाये तो यह देश के सभी वर्गों के लोगों के बहुत ज्यादा हित में है, स्वदेशी वस्तु अपनाने से भारत की अपनी कंपनियों को बहुत अधिक लाभ होगा, इस से विदेशी कंपनियों के माध्यम से देश का विदेशों में जाने वाले पैसे पर रोक लगेगी, स्वदेशी अपनाने से यह पैसा भारतीय कंपनियों के माध्यम से भारत में ही रहेगा, सरकार को भी विभिन्न मद्दों में भारी राजस्व प्राप्त होगा और इन भारतीय कंपनियों में काम करने वाले भारतीय कामगारों की जेब में भी खूब पैसा आयेगा। जिससे देश में भयंकर आपदा के समय बेहद कमजोर होती भारतीय अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए एक बहुत बड़ा सहारा मिलेगा, देश प्रधानमंत्री मोदी के दिये गये आत्मनिर्भरता के मंत्र की तरफ बढेगा। भारत में स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा देखा गया यह सपना अगर किसी तरह से धरातल पर मूर्त रूप लेने में कामयाब हो जाये, तो यह 135 करोड़ की भारी-भरकम जनसंख्या वाले बहुत ही विशाल भारतीय बाजार के साथ-साथ हम सभी देशवासियों की भी तकदीर बदल सकता है।

लेकिन इस में सबसे बड़ी अड़चन अगर कोई है तो वह स्वयं देश के सिस्टम में बड़े पदों पर आसीन वो चंद ताकतवर लोगों खुद ही है, जिनका विदेशी वस्तुओं से प्रेम देश में किसी से छिपा नहीं है। जिन्होंने विदेशी महंगी वस्तुओं को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल कर रखा है, जिनके हिसाब से भारतीय कंपनियों के प्रोडक्ट्स उनके स्टेट्स सिंबल को डाउन करते है, जो खुद व उनका परिवार भारतीय कंपनियों के सामान खरीदने में अपनी तोहीन समझते है और विदेशी वस्तुओं को खरीदने में अपनी बहुत शान समझते है, आज देश में इन लोगों की स्थित यह है की ये कपड़े, जूते, पर्स, बेल्ट, टाई, पर्फ्यूम, साबुन, चाकलेट, कोल्डड्रिंक, चाय, कॉफी, शराब, दवाई, मोबाइल, पेन, कम्प्यूटर, लेपटॉप,  अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, चश्मा, घड़ी, गाड़ी आदि तो विदेशी खरीदते ही है इनको ड्राइफ्रूट्स, फल-फूल व सब्जी भी विदेशी चाहिए। सरकार को देश में स्वदेशी वस्तुओं को प्रोत्साहित करने के लिए इस सबसे बड़ी बाधा का स्थाई निदान तत्काल करना होगा। सरकार के सिस्टम को भी भाषण से बाहर निकाल कर स्वदेशी वस्तुओं के प्रोत्साहन के लिए धरातल पर अमलीजामा पहनाने की पहल खुद से करनी होगी, उनको खुद के इस्तेमाल में सबसे पहले स्वदेशी वस्तुओं को अपनाना होगा, देश के शीर्षस्थ राजनेताओं, नौकरशाहों व सरकारी कार्यालयों के द्वारा स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग को बढ़ावा देकर देशवासियों के सामने नजीर पेश करनी होगी, तब ही अन्य सरकारी स्टाफ व देश की आम जनता उनका अनुसरण करेगी और तभी स्वदेशी वस्तुओं के हित में धरातल पर कुछ ठोस बदलाव भी संभव है। वैसे भी हमारे यहां एक बहुत प्राचीन कहावत है कि "यथा राजा तथा प्रजा"  जैसा राजा होता है वैसी ही प्रजा होती है, इसलिए यदि राजा स्वयं अपनी रोजमर्रा की दिनचर्या में स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग करने लगेगा, तो जनता भी उसी का अनुसरण करेगी। वैसे स्वदेशी वस्तुओं के इस्तेमाल के पक्ष में देश के केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने तुरंत ही धरातल पर बहुत ही अच्छी पहल शुरू कर दी है, उन्होंने 1 जून से केन्द्रीय सुरक्षाबलों की केंटीन में केवल स्वदेशी वस्तुओं को बेचने का आदेश जारी करके अन्य विभागों के सामने एक बहुत ही अच्छी नजीर पेश की है। अब दूसरे सरकारी विभागों को भी उनका अनुसरण करना चाहिए।

जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को संबोधित करते हुए सभी देशवासियों से स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने के लिए कहा था, आपदाकाल के बाद देश को पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने की यह पहल भविष्य में हम सभी भारतवासियों के लिए बहुत ही सकारात्मक अच्छे परिणाम ला सकती है। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि आखिर देश में स्वदेशी वस्तुओं के इस्तेमाल को बढ़ावा वास्तव में धरातल पर कैसे मिलेगा, उसके प्रोत्साहन के लिए केंद्र सरकार व राज्य सरकारें मिलकर क्या रूपरेखा तैयार करती हैं और उनको किस तरह से धरातल पर अमलीजामा पहनाती है। क्योंकि आज देश में बहुत ही लम्बे समय से सरकारों की नीतियों के चलते ही विदेशी कंपनियों ने भारतीय बाजार के बहुत बड़े हिस्से पर कब्जा कर रखा हैं। सरकार को भी अपनी नीतियों में स्वदेशी कंपनियों को बढ़ावा देने के लिए विशेष प्रावधान धरातल पर करना होगा। क्योंकि आज जो हालात है कि  एक तरफ तो सरकार कह रही है कि स्वदेशी वस्तुओं को अपनाओं, वहीं दूसरी तरफ धड़ल्ले से विदेशी उत्पाद भारत के बाजारों में आ रहे हैं, आज उनसे देश के बाजार भरे पड़े है, जिसके बारे में सरकार को जल्द ही सोचकर स्पष्ट नीति बनानी होगी। वैसे भी आज देश में विदेशी वस्तुओं के पक्ष में जो माहौल बना हुआ है, वह भारतीय वस्तुओं के लिए ठीक नहीं है, सरकार को लोगों की उस सोच को बदलना होगा। लेकिन यह जब तक संभव नहीं है जब तक हमारे देश के कुछ बहुत बड़े राजनेताओं, बहुत ताकतवर नौकरशाहों, देश के कर्ताधर्ता नीतिनिर्माता, खुद उधोगपतियों, अभिनेताओं व अन्य अधिकांश सभी वर्ग के ताकतवर लोगों को अपने देश की स्वदेशी वस्तुओं का इस्तेमाल करने में तोहीन नजर आती रहेगी, तब तक स्वदेशी वस्तुओं का प्रचार-प्रसार व उपयोग धरातल पर कैसे संभव है, हमारे सिस्टम को इन सभी लोगों की यह मानसिकता बदलनी होगी। क्योंकि आज यह सभी ताकतवर लोग ही देश के आम आदमी को स्वदेशी वस्तुओं के इस्तेमाल की बात बनाने रहे है, जबकि वह खुद सिर से लेकर पांव तक करोड़ों रुपये की विदेशी वस्तुओं से हर समय ढ़के रहते हैं। फिर वो आम-आदमी से किस अधिकार के साथ उम्मीद कैसे कर सकते है कि वो 50 रुपये की चीन की झालर ना खरीदकर विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करें। देश के सक्षम लोगों को स्वदेशी वस्तुओं को बढ़ावा देने के लिए खुद देशभक्ति का नमूना धरातल पर दिखाना होगा, तभी देश में स्वदेशी वस्तुओं के इस्तेमाल को प्रोत्साहन मिलेगा और देश आत्मनिर्भर बनेगा। देश में ऐसा नहीं होना चाहिए कि अरबों रुपये की प्रतिमा से लेकर लडा़कू विमान तक के बड़े-बड़े मोटे पैसे वाले काम तो चीन या अन्य विदेशी कंपनियां करें, हजारों करोड़ रुपये के मूल्य का एयरपोर्ट विदेशी कंपनी बनाये, बड़े-बड़े अरबों-खरबों रुपये के टेंडर तो विदेशी कंपनियों को मिलेंगे, देश में डिजिटल पैमेंट करने के लिए विदेशी कंपनियों को प्रोत्साहित करेंगे, एफडीआई को जबरदस्त रूप से बढ़ावा देंगे। तो ऐसे नकारात्मक माहौल में भारतीय कंपनियों को प्रोत्साहन किस तरह मिल पायेगा, वो इतने नकारात्मक माहौल में विदेशी कंपनियों को किस तरह धरातल पर टक्कर दे पायेंगे यह सोचने व समझने वाली बात है। खैर जो भी है लेकिन यह भी कड़वा सच है कि अगर 135 करोड़ लोगों की आबादी बिना सरकार के दिशा निर्देशों के भी स्वदेशी वस्तुओं के इस्तेमाल की ठान ले तो विदेशी कंपनियों की दुकान खुद चलनी बंद हो जायेगी और स्वदेशी वस्तुएं बाजार में स्थापित हो जायेगी। सरकार का "लोकल पर वोकल" व देश को आत्मनिर्भर बनाने का उद्देश्य भी पूरा हो जायेगा। इसलिए अब भविष्य में जो भी सामना खरीदकर लाओं तो एक बार प्रयास अवश्य करों कि वो स्वदेशी हो। अब देश की आर्थिक स्थिति को सही करने के लिए हम सभी देशवासियों को देशहित में "स्वदेशी अपनाओं और देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाओं" नीति पर अपने मन व दृढ़संकल्प से अमल करके भारत को आत्मनिर्भर बनाना होगा।

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।

बुधवार, 13 मई 2020

नाकाम व्यवस्था व लचर सिस्टम की भेंट चढ़ते देश के शिल्पकार मजदूर हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व रचनाकार





 
कोरोना के चलते देश में लॉकडाउन 3 का समय चल रहा है, देश में हर तरफ जान बचाने के लिए अजीब खामोशी व्याप्त है। लेकिन यही खामोशी लगातार देश के मजदूर वर्ग की अनमोल जिंदगियों पर भारी पड़ रही है। लॉकडाउन के चलते अपनी रोजीरोटी व जमा पूंजी गंवा चुके देश के शिल्पकार मजदूरों पर नाकाम व्यवस्था व लचर सिस्टम की जानलेवा मार पड़ रही है, देश के सिस्टम में व्याप्त अव्यवस्था के चलते उन बेचारों की अनमोल जानें जा रही है। लेकिन अफसोस बेचारे गरीब लाचार जिंदा मजदूर की जिंदगी का देश के सिस्टम में कोई मोल नहीं है, लेकिन दुर्भाग्य से मरने के पश्चात सरकार के द्वारा उनको दी जाने वाली मुआवजे की धनराशि सरकार के सरकारी खजानों में मौजूद है। लॉकडाउन की वजह से रोजगार खत्म होने के चलते बेहद परेशान मजदूर भूखे-प्यासे तिल-तिल कर मरने के लिए मजबूर है, सिस्टम धृतराष्ट्र की तरह चुपचाप महलों में बैठकर मजदूरों पर अत्याचार होता देख रहा है। सिस्टम के द्वारा मजदूरों के लिए लॉकडाउन के लगभग 45 दिन बीतने के बाद भी कोई अच्छी व्यवस्था नहीं बन पा रही हैं। किंतु उनके मृत शरीर को लाने की व्यवस्था सरकार के द्वारा की जा रही है, मरने के बाद उनकी जान का मोल लगाया जा रहा है। जिस तरह से महाराष्ट्र के औरंगाबाद में 8 मई के तड़के दुर्घटना में मजदूर मारे गये थे, उसके बाद भयंकर आपदा के समय में भी देश में राजनीति चरम पर है, जिस तरह से कुछ मजदूरों का एक दल अपने घर मध्यप्रदेश जाने के लिए महाराष्ट्र के जालना से 60 किलोमीटर दूर भुसावल रेलवे स्टेशन पर श्रमिक स्पेशल ट्रेन पकड़ कर अपने घर जाने के लिए निकला था, तो उन बेचारे लाचार मजबूर 16 मजदूरों की यह यात्रा मालगाड़ी की चपेट में आने के कारण जीवन की अंतिम यात्रा बन जायेगी, शायद किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा। इस बेहद दर्दनाक घटना के घटित होने बाद देश में मजदूरों के हितों के नाम पर मजदूरों का हितेषी बनने के लिए राजनीतिक दलों में राजनीति बहुत तेज हो गयी है। लेकिन इन बेचारे लाचार जिंदा मजदूरों के लिए शायद हमारे देश के कर्ताधर्ताओं, सत्ता के शीर्ष पर उनकी वोटों के बदोलत बैठे राजनेताओं व सिस्टम के पास उनका दुख दर्द व जीवन यापन में आ रही दुश्वारियों को समझने का वक्त नहीं था, आज वही सारा सिस्टम उनके लिए घड़ियाली आँसू बहा रहा है, वह उनकों श्रद्धांजलि अर्पित करके अपने कदम की बखूबी इतिश्री कर रहा है। इस दर्दनाक घटना के बाद मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दुख जताते हुए मृतक मजदूरों के परिवार को 5-5 लाख रुपए देने की घोषणा कर दी, साथ ही मध्य प्रदेश सरकार ने एक विशेष विमान से एक टीम औरंगाबाद भी भेजी थी। इस टीम ने जिंदा बचे घायल मजदूरों के उपचार सहित मृतक मजदूरों के शवों को लाने व उनके अंतिम संस्कार करने की समुचित व्यवस्था की थी। मध्य प्रदेश के बाद महाराष्ट्र सरकार ने भी मृतकों के परिवारों को 5-5 लाख रुपये के मुआवजे की घोषणा कर दी। सिस्टम के मारे इन गरीब लाचार मजदूरों पर 45 किलोमीटर पैदल चलने के बाद थकान इतनी हावी हो गयी थी कि इन्हें मालगाड़ी के आने का पता ही नहीं चल पाया और ये बेचारे गहरी नींद में सोते रहे और उनके ऊपर से मालगाड़ी गुजर गई। हादसे के बाद जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने के लिए सरकार ने उच्च स्तरीय जाचं के आदेश दे दिये हैं, जाचं में किसी छोटे से निर्दोष मुलाजिम को बली का बकरा बनाकर खानापूर्ति कर ली जायेगी। लेकिन सबसे दुखद व अफसोस की बात यह है कि जिन लोगों को सरकार जिंदा रहते घर वापसी के लिए कोई साधन उपलब्ध नहीं करवा रही थी, आज वही सरकार उनकी मृत देह को घर पहुंचाने के लिए स्पेशल ट्रेन चलवाती है। हालात देखकर लगता है कि देश में जिंदा मजदूर की अनमोल जिंदगी का हमारे सिस्टम के कर्ताधर्ताओं की नजरों में शायद ही कोई मोल हो।

मैं महामारी के समय में दर-दर की ठोकर खाने पर मजबूर हो गये लाचार गरीब मजदूरों की इस बेबसी की हालात पर अपनी चंद पक्तियों के माध्यम से देश के नीतिनिर्माताओं से कहना चाहता हूँ कि-

"मैं देश का निर्माण करने वाला
मेहनतकश हिम्मती शिल्पकार हूँ 
मैं बुलंद हौसले वाला एक मजदूर हूँ
घर वापसी के लिए पैदल चलते-चलते
पड़ गये मेरे पांव में छाले पड़ गये मेरी रोटी के लाले
हे देश के भाग्यविधाता सरकार व सिस्टम
आपदाकाल में मेरे दुख दर्द से यूं ना खेलों
मेरी हिम्मत को सिस्टम तुम यूं ना इरादतन तोड़ों
हे भाग्यविधाता मूझे यूं मजबूर व लाचार ना बनाओं
मुझे अपने ही देश में यूं पराया इंसान ना बनाओं ।।

कोरोना जैसी भयावह महामारी के समय में आज सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि देश के सिस्टम को जब कोई मजदूर जिंदा शहरों से वापस घर जाने के लिए निकलता तब उसका कष्ट नजर क्यों नहीं आता है। मजदूर सड़क मार्ग पर नजर आता है तो उसको पुलिस मारती है, रेलवे लाईन या अन्य वैकल्पिक मार्गों पर जाता है तो उसको उस बेहद कठिन मार्ग की दुश्वारियां और मजदूर लाचारी मारती है। जिस तरह से आपदाकाल में मजदूरों की जिंदगी पर उनकी मजबूरी लाचारी गरीबी भारी पड़ने की खबरें देश के अलग-अलग भागों से आ रही है, वह देशहित में व समाजहित में बिल्कुल भी उचित नहीं है, आने वाले समय में उसके दूरगामी परिणाम नजर आयेंगे, हम महानगरों में काम करवाने के लिए मजदूरों के लिए तरस जायेंगे। जिस तरह से कोई मजदूर साईकिल पर जाते हुए दम तोड़ रहा है, कोई पैदल जाते हुए दम तोड़ रहा है, वह उनकी बेबसी व हमारे देश के सिस्टम की खामी को उजागर कर रहा है। अपना घरबार छोड़कर रोजीरोटी की तलाश में अपने घरों से दूर आकर देश के विकास में बहूमूल्य भागीदारी निभाने वालें मेहनतकश मजदूर अब व्यवस्था व सिस्टम की लापरवाही और जीवन बचाने की लाचारी के चलते दिन-प्रतिदिन मजबूर होते जा रहे है। हमारे देश में लगभग 50 करोड़ मजदूर हैं, जिनके कंधों पर देश का उज्जवल भविष्य टिका हुआ है, जिनके दुख दर्द को समय रहते हमारे देश के कर्ताधर्ता, नीतिनिर्माता व सिस्टम को अच्छे ढंग से समझना होगा। 
 
देश में लॉकडाउन चलते अब धीरे-धीरे लगभग 45 दिन हो गये है और हमारा सिस्टम अभी तक भी मजदूरों को यह विश्वास दिलाने में नाकाम रहा है कि आप जहां हो वहां आराम से रहो, आपकी रोजीरोटी सुरक्षित है, सरकार उसका पूर्ण रूप से ध्यान रखेगी, हमारे सिस्टम की हनक व राजशाही कार्यशैली अधिकांश जगह गरीब मजदूरों का विश्वास जीतने में नाकाम रही है, क्योंकि वह उनके जीवन के लिए आवश्यक जरूरतों को समय से पूरा करने में नाकाम रहा है। इसलिए मजदूर तेजी से शहरों को छोड़कर अपने घर गांवों की ओर पलायन कर रहे हैं। रही-सही कसर लॉकडाउन के दौरान कुछ ज्यादा बुद्धिमान लोगों की जमात ने देश की रीढ़ मजदूरों को अपने ही देश में प्रवासी मजदूरों का दर्जा देखकर बेगाना बनाकर पूरी कर दी है, उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों को कम करने के लिए स्थानीय मजदूर व अन्य राज्यों के मजदूरों के बीच दिवार खड़ी करने का कार्य किया है, जिसके चलते कही ना कही सिस्टम का प्रवासी मजदूरों के साथ सौतेलापन का रवैया रहा। जिससे उनका सिस्टम पर विश्वास कम हुआ। 

लॉकडाउन शुरू होती ही सभी सरकारों को स्पष्ट नजर आ रहा था कि अगर उन्होंने मजदूरों को वापस जाने दिया तो आने वाले समय में दोबारा कल-कारखानों को चालू करना व अन्य कार्यों के लिए मजदूरों को वापस लाना आसानी से संभव नहीं है। उसके चलते सभी राज्यों के द्वारा प्रवासी मजदूरों को लेकर जो आधाअधूरे मन से मदद करने का रवैया अपनाया गया है, वह कही से भी बिल्कुल ठीक नहीं है। अधिकांश राज्यों ने पहले तो मजदूरों को समझाबुझाकर नियम कायदे कानून का हवाला देकर रोककर रखा और फिर जब लगातार लॉकडाउन बढ़ता देखा तो उसने बहुत ही गैरजिम्मेदाराना तरीके से व चतुराई से मजदूरों की जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ने का प्रयास किया, जो आपदा के समय में कही से भी उचित नहीं है। अब स्थिति यह हो रही है बड़ी संख्या में मजदूर अपने घर वापस जाने के लिए उतावले है, जिसके मद्देनजर केंद्र सरकार के द्वारा ट्रेन चलवाई गयी है, तो वहां पर भी खाली जेब वाले लाचार गरीब मजदूरों से टिकट के दाम वसूले जा रहे है, मजदूरों के टिकट के मसले को लेकर देश में  राजनीतिक दलों में जमकर झूठ-प्रपंच की ओछी राजनीति भी हो रही है। वहीं हमारी बेहद दयावान सरकार का कमाल देखों वह विदेशों से तो लोगों को तो बिना पैसा लिये ला रही है और देश में फंसे मजबूर लाचार खाली जेब वाले गरीब मजदूरों से घर वापसी के पैसे ले रही है। मतलब विदेश में फंसे पैसे वाले लोगों को वापस घर लाने के लिए एक बहुत ही अच्छा "वंदे भारत मिशन" चलाया जा रहा है और वहीं दूसरी तरफ देश में फंसे लाचार गरीब मजदूरों की घर वापसी के लिए अघोषित "ड़डे मारों मिशन" चलाकर मजदूर को जबरन रोका जा रहा है। देश में मजदूरों की मौजूदा हालात को देखकर यह स्पष्ट है कि कोई भावी इतिहासकार जब इस समय का इतिहास लिखेगा तो वह इसे मजदूरों को बंधक बनाये रखने के रुप में इतिहास में दर्ज करेगा। देश की तरक्की को नयी दिशा देने वाले मजदूरों के साथ बंधकों की तरह का व्यवहार कही से भी न्यायोचित नहीं है।

वैसे अगर हमारे देश के नीतिनिर्माता चाहें तो हमारी रेलवे की क्षमता इतनी है कि वो कुछ दिनों में ही सारे मजदूरों को वापस उनके घर पहुंचाने की क्षमता रखती है। बस दिक्कत है तो केवल सरकार के स्तर पर दृढ इच्छा शक्ति की है और देश के नीतिनिर्माताओं के स्तर पर समय से निर्णय लेने की क्षमता की है। अगर सरकार के स्तर पर समय से यह फैसला हो जाता तो केवल कुछ ही दिनों में रेलवे के द्वारा सारे मजदूरों को घरों तक पहुंचाए जा सकता था और देश में मजदूरों की घबराहट के चलते बने आपाधापी के माहौल से बचा जा सकता था। वैसे भी आज के समय में सारी ट्रेन खाली खड़ी है और सरकार चाहे तो जो सिस्टम रोज भारी संख्या में लोगों को ढोता था उसी रेलवे के द्वारा मजदूरों को सोशल डिस्टेंसिंग बनाते हुए उनके गंतव्य स्थल तक बेहद आसानी से पहुंचाया जा सकता है। वैसे भी कोरोना काल में ट्रेन के अलावा देश में परिवहन के बाकी सभी साधन फिर भी बहुत ज्यादा खतरों से भरे हैं। इसलिए अभी भी सरकार को उहापोह की स्थिति से बाहर निकलकर मजदूरों के बारे में समय रहते स्पष्ट रणनीति बनानी चाहिए। सरकार को इस कन्फ्यूजन से बाहर निकलना होगा कि मजदूर को रोकना है या घर वापस भेजना है, रोकना है तो उनकी रोजीरोटी का इंतजाम अच्छे से करना होगा और घर वापस भेजना है तो निशुल्क रेल सेवा को तैयार करना होगा। तब ही पैदल, साईकिल, रिक्शा, थ्रीव्हीलर, ढेली व मालवाहक वाहनों में छिपकर जान की बाजी लगाकर श्रमिको का जाना रुकेगा। नहीं तो कोरोना के चलते उत्पन्न आपदाकाल में अपनी लाचारी मजबूरी व गरीबी से परेशान देश के शिल्पकार मजदूरों के साथ आयेदिन तरह-तरह के दर्दनाक हादसे घटित होते रहेंगे और सरकार बाद में मृतकों के परिजनों को मुआवजा धनराशि बाट़कर अपनी सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी का निर्वहन बहुत अच्छे से करके अपने दायित्वों को निभाती रहेगी।

।।जय हिन्द जय भारत।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान।।

शुक्रवार, 8 मई 2020

कोरोना काल में लॉकडाउन की कवायद पर पानी न फेर दे शराब के ठेके खोलने की जल्दबाजी

कोरोना काल में लॉकडाउन की कवायद पर पानी न फेर दे शराब के ठेके खोलने की जल्दबाजी


हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व रचनाकार

सम्पूर्ण विश्व में आजकल मानव सभ्यता का सबसे बड़ा दुश्मन बन गए कोरोना वायरस संक्रमण की गंभीर बीमारी का आपदाकाल का बेहद संवेदनशील दौर चल रहा है। देश में भी आकड़ों के अनुसार 5 मई की प्रातः 8 बजे तक कोरोना के एक्टिव पॉजिटिव मरीजों की संख्या फिलहाल 32138 है, जबकि 12726 मरीज वो अलग है जो ठीक हो गए हैं और जिनको अस्पताल से छुट्टी देकर घर भेज दिया गया है, साथ ही देश में 1568 मरीजों की मृत्यु कोरोना संक्रमण के चलते हो चुकी है। देश में कोरोना संक्रमण सरकार की लॉकडाउन की कवायद चलने के बाद भी अभी तक रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है, वह अभी तक तो दिनप्रतिदिन बढ़ता जा रहा है, लेकिन अच्छी बात यह है कि देश में स्थिति अभीतक पूर्ण रूप से नियंत्रण में है। भयावह आपदा के मद्देनजर बचाव के लिए देश में कोरोना वायरस के लगातार बढ़ते संक्रमण को देखते हुए, गृहमंत्रालय के द्वारा 17 मई तक लॉकडाउन बढ़ाने का आदेश जारी कर दिया गया था। लोगों को चरणबद्ध तरीके से कुछ मिलने वाली छूट के साथ लॉकडाउन-3 का काल 4 मई से शुरू हो गया है। लोगों को मिलने वाली इस छूट में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि देश में ग्रीन-ऑरेंज-रेड सभी जोन में कुछ शर्तों के साथ शराब के ठेकों को खोलने की अनुमति प्रदान कर दी गई है। इस अनुमति के आधार पर जब 4 मई को शराब के ठेके खुले तो वहाँ पर शराब खरीदने के लिए इकट्ठा भारी भीड़ का जमघट सोशल डिस्टेंसिंग के बनाए नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए नजर आया। देश के अलग-अलग जनपदों से आई तस्वीरों के अनुसार अधिकांश ठेकों पर कई-कई किलोमीटर लम्बी लाईन लगी हुई थी, कुछ जगह लोगों की भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को हल्के बलप्रयोग का उपयोग तक करना पड़ा। अनियंत्रित भारी भीड़ के रूप में देश में लॉकडाउन के बाद खुले शराब के ठेकों पर लोगों की शराब के प्रति दीवानगी स्पष्ट नजर आ रही है। जिस तरह से लॉकडाउन में 45 दिन के लम्बे अंतराल तक बंद रहने के बाद भी लोगों की शराब पीने की लत नहीं गई, वह डॉक्टरों के साथ-साथ एक आम-आदमी को भी आश्चर्यचकित करती है।

लेकिन कोरोना काल में शराब के ठेकों को खोलने के चलते जिस तरह से सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ाई गयी है, वह स्थिति देश व समाज के लिए बहुत ही चिंतनीय है, यह एक गलती आने वाले समय में देश के लोगों के जीवन पर बहुत भारी पड़ सकती है। वैसे भी हम लोगों के सामने व सरकार के सामने कोरोना काल में लापरवाही के चलते जबरदस्त खामियाजा उठाने के उदाहरण विश्व के अलग-अलग देशों में भरे पड़े हैं। लेकिन शराब के ठेकों पर उमड़ी भीड़ के हालात देखकर लगता है, कि देश की जनता ने उन हालातों से कोई सबक लिया है। जिस तरह से अमेरिका, यूरोप, इटली, जर्मनी और रूस आदि देशों में कोरोना का भयावह प्रहार जारी है। उस वक्त देश में राजस्व बढ़ाने के लिए शराब के ठेकों को खोलने का निर्णय बिल्कुल भी उचित नजर नहीं आता हैं। बहुत सारे लोगों पर राशन तक के लिए पैसे नहीं है, उनका परिवार पेट भरने के लिए सरकार या दानवीर भामाशाहों पर निर्भर है और वो शराब के ठेके खुलने की खबर सुनते ही तड़के सबेरे जाकर ही शराब खरीदने के लिए लाईन में लग गये, यह स्थिति किसी भी परिवार के लिए ठीक नहीं है। इसके चलते देश में पारिवारिक हिंसा, दुर्घटनाओं व अपराधों में जबरदस्त बढोत्तरी होगी। देश के नीतिनिर्माताओं को यह सोचना चाहिए की शराब के ठेके खोलकर राजस्व बढ़ाने की यह कवायद, आपदाकाल में लोगों को संक्रमित करके देश के राजस्व पर उल्टा भारी बोझ न डाल दे।  कोरोना के इस बेहद खतरनाक वक्त में सरकार का यह निर्णय लोगों की भयंकर लापरवाही के चलते भयानक भूल साबित हो सकता है। सरकार को समय रहते सोचना होगा कि शराब के ठेकों को खोलने की जल्दबाजी घातक कोरोना वायरस संक्रमण के काल में देश में बहुत अच्छे ढंग से चल रही लॉकडाउन की सारी कवायद पर पानी न फेर दे। आपदा के समय में सरकार की यह एक भूल हिन्दुस्तान की जनता को कभी ना भूल पाने वाले ऐसे गहरे जख्म ना दे जाये जिनकी भरपाई करना बेहद मुश्किल हो जाये। सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ाकर  शराब पीने के लिए उतावले लोगों को भी सोचना चाहिए कि वो जब 45 दिन तक बिना शराब के जिंदा रहे तो थोडा धर्य रखकर सरकार का सहयोग करने में उनका कुछ नुकसान नहीं हो जाता। सरकार   आखिर क्या-क्या करें वो लोगों की रोटी का जुगाड़ करे या शराबियों के लिए लाईन भी पुलिस की देखरेख में लाठी के दम पर लगवाए, देश में रहने वाले लोगों की क्या कोई जिम्मेदारी नहीं है?

हम सभी को ठंडे दिमाग से विचार करना चाहिए कि जिन देशों से यह घातक कोरोना वायरस का संक्रमण आया है, वहां पर लाशों को लेने की लिए उनके परिजन तक तैयार नहीं है, लाशों पर फूल चढ़ाने वाले अपने लोग भी नहीं मिल रहे हैं। वहां लाशों के अंतिम संस्कार करने के लिए मुर्दाघरों में लाशों की लम्बी वेटिंग चल रही है। लेकिन हम लोग है कि सरकार हमारी भलाई के लिए जरा सी ढील दे तो हम नियम, कायदे व कानून की धज्जियां उड़ाकर बेहद उद्दंड बन जाते है। दोस्तों मेरा आप सभी से अनुरोध है कि देशहित में स्वयं व अपने परिवार को सुरक्षित रखने के लिए कोरोना के इस आपदा काल में सरकार के द्वारा जारी दिशा निर्देशों का अक्षरसः पालन करके जीवन को सुरक्षित करें। इस भयावह आपदा के समय में अन्य देशों में की गयी गलती को मत दोहराओं, समय रहते सजग होकर जिम्मेदार नागरिक बनकर अन्य देशों के कोरोना काल के क्रूर इतिहास से सबक लेकर सुधार जाओं। वरना एक भयंकर भूल के चलते वह क्रूर दिन दूर नहीं है जब एक ही पल में लाशों को गिनना असंभव हो सकता है।
सरकार ने व हम सभी लोगों ने अभी तक देश में मेहनत करके पूर्ण धर्य का परिचय देते हुए घातक कोरोना वायरस के संक्रमण पर बहुत ही अच्छे ढंग से नियंत्रण बनाकर रखा है, उस मेहनत पर शराब पीने के उतावलेपन या अन्य किसी हरकत से अपने ही हाथों से पानी फेरने का कार्य न करें। बेवजह घर से बाहर न जाये अधिक से अधिक समय घर में रहें खुद सुरक्षित रहें व अपनों को सुरक्षित रखें ।।

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।

शनिवार, 2 मई 2020

*3 मई अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर विशेष* लोकतंत्र की रक्षा के लिए प्रेस की स्वतंत्रता व निष्पक्षता बेहद जरूरी

*3 मई अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर विशेष*

लोकतंत्र की रक्षा के लिए प्रेस की स्वतंत्रता व निष्पक्षता बेहद जरूरी

हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व रचनाकार


देश के मशहूर शायर "अकबर इलाहाबादी" जी ने प्रेस की ताकत के बारे में एक शेर के माध्यम से कहा था कि-

"खींचो न कमानों को न तलवार निकालो, 
जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो।" 

उन्होंने शायर के रूप में लगभग सौ वर्ष पहले ही प्रेस की ताकत का अंदाजा लगा लिया था, वास्तव में यह बात एकदम कटु सत्य है, आज के दौर में भी निष्पक्ष व निर्भीक कलम की ताकत के आगे तलवार और तोप की ताकत कोई मायने नहीं रखती है। किसी देश में जो अहिंसक तरीकें से शांतिपूर्ण ढंग से बड़ा बदलाव प्रेस ला सकती वो और किसी भी और माध्यम से लाना संभव नहीं है। वैसे भी भारत जैसे 135 करोड़ लोगों की भारी-भरकम जनसंख्या वाले देश में हमेशा लोकतांत्रिक व्यवस्था की सुरक्षा के लिए प्रेस के सभी संस्थानों व कलमकार की स्वतंत्रता व निष्पक्षता बेहद जरूरी है। उनका देश व समाज के प्रति सकारात्मक व्यवहार बहुत ज्यादा जरूरी है।
हालांकि आज के व्यवसायिक दौर में हावी होते बाजारवाद के मूल्यों से प्रेस भी बहुत अधिक प्रभावित हुई है, प्रेस के संस्थानों की जबरदस्त आपसी व्यवसायिक आपाधापी वाली प्रतिस्पर्धा के चलते, भारत में प्रेस की स्वतंत्रता पर तो कम लेकिन कुछ संस्थानों की निष्पक्षता पर बार-बार देशवासियों के द्वारा प्रश्नचिन्ह जरूर लगाया जा रहा है।

भारत के साथ सम्पूर्ण विश्व में 3 मई के दिन को "अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस" के रूप में मनाने का मकसद था कि लोग विश्व में स्वतंत्र व निष्पक्ष पत्रकारिता का समर्थन करके, वो प्रेस के हितों की रक्षा करें। आज के आधुनिक समय में भी प्रेस को किसी भी राष्ट्र या समाज के बारे में जानने का सबसे विश्वसनीय सशक्त माध्यम या आईना माना जाता है, जो किसी भी राष्ट्र या समाज के हालातों की और हर प्रकार की सम-सामयिक परिस्थितियों का निष्पक्ष रूप से अध्ययन करके सटीक विश्लेषण करता है। प्रेस की स्वतंत्र स्थिति के बारे में बेहद आसान शब्दों में समझें, तो किसी भी देश में प्रेस की आजादी इस बात से ही साबित हो जाती है कि उस देश में लोगों को बोलने की कितनी आजादी है, उन्हें सिस्टम में बैठे ताकतवर लोगों के सामने अपनी बात उठाने के लिए अभिव्यक्ति की कितनी स्वतंत्रता है। हमारे भारत जैसे लोकतांत्रिक व्यवस्था को मानने वाले विशाल देश में, प्रेस की स्वतंत्रता व निष्पक्षता एक मौलिक जरूरत है।

"अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस" के इतिहास की बात करें तो सन् 1991 में यूनेस्को और संयुक्त राष्ट्र के "जन सूचना विभाग" ने मिलकर इसे मनाने का निर्णय किया था। जिसके बाद "संयुक्त राष्ट्र महासभा" ने भी 3 मई को हर वर्ष "अंतर्राष्ट्रीय प्रेस स्‍वतंत्रता दिवस" मनाने की घोषणा की थी। यूनेस्को महासम्मेलन के 26वें सत्र में सन् 1993 में इससे संबंधित प्रस्ताव को स्वीकार किया गया था। इस दिन को मनाने का उद्देश्य प्रेस की स्वतंत्रता के विभिन्न प्रकार के उल्लघंनों की गंभीरता के बारे में जानकारी देना है। इसके उद्देश्यों में प्रकाशनों की कांट-छांट, उन पर जुर्माना लगाना, प्रकाशन को निलंबित कर‍ देना और बंद कर‍ देना आदि भी शामिल है।

विश्व में प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर हाल ही में जारी "विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2020" में 180 देशों के "विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक" 2020 में भारत 142वें स्थान पर पहुँच गया है, जबकि बीते वर्ष 2019 में भारत इस सूचकांक में 140वें स्थान पर था। यह सूचकांक "रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स" नामक गैर-सरकारी संगठन के द्वारा हर वर्ष जारी किया जाता है। जो कि विश्व के 180 देशों और क्षेत्रों में मीडिया और प्रेस की स्वतंत्रता को दर्शाता है। इस सूचकांक पर देश में पत्रकारिता के धुरंधरों के तरह-तरह के मत है कोई इसके पक्ष में है कोई इसके विपक्ष में खड़ा है, लेकिन यह भी सच्चाई है कि जिस तरह से भारत में अभिव्यक्ति की पूर्ण आजादी है, उसी तरह से प्रेस को भी पूर्ण आजादी प्रदान है। कही ना कही यह सूचकांक हमारे देश व देश की प्रेस के प्रति किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित नजर आता है। 

भारत में प्रेस की आजादी एक बहुत गहन विचारणीय बहस का मुद्दा है, कुछ लोगों का मानना है प्रेस पूर्ण स्वतंत्र रूप से कार्य कर रही है, वहीं कुछ लोगों का मत है कि समय-समय पर प्रेस पर अनावश्यक बेवजह का दबाव हमेशा से डाला जाता रहा है, जो प्रेस के लिए ठीक नहीं है। वहीं इस स्थिति को हम संवैधानिक नजरिए से देखें, तो कहीं से भी यह स्थिति नहीं है कि हमारे देश के मीडिया संस्थानों पर किसी तरह का कोई बेवजह का नियंत्रण या दबाव है। देश में यह कहना कि प्रेस पूर्ण रूप से स्वतंत्र नहीं है कही से भी न्यायोचित नहीं होगा।

वैसे प्रेस की स्वतंत्रता के नजरिए से देखा जाये तो देश में उसकी स्वतंत्रता को खतरा पैदा करनी वाली छुटपुट व कभी-कभी बड़ी घटनाएं होती रहती है। लेकिन उन सभी घटनाओं के पीछे बहुत सारे कारक छिपे होते हैं, जिनका विस्तार से अध्ययन करके ही किसी तरह का निष्कर्ष निकाला जा सकता है। देश में समय-समय पर पत्रकारों के विरुद्ध पुलिस हिंसा और आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों या समूहों और भ्रष्ट स्थानीय ताकतवर लोगों व अधिकारियों द्वारा प्रायोजित हिंसा की घटनाएं व उनके द्वारा उकसाए गए विद्रोह की घटनाएं होती रही हैं। देश में पत्रकारों के खिलाफ कुछ घटनाओं में तो अधिकारियों की आचोलना करने मात्र व कुछ अन्य गंभीर मामलों को उठाने के चलते, गंभीर आपराधिक धाराओं का बलपूर्वक प्रयोग, पत्रकारों की कलम को रोकने के लिए किया गया। बीते वर्षों में देश में पत्रकारों पर "भारतीय दंड संहिता" की गंभीर धारा 124A (राजद्रोह) के प्रयोग के कई मामले सामने आए हैं। जिनमें से अधिकांश को कानूनन, देशहित व पत्रकारिता के हित से कही से भी उचित नहीं ठहराया जा सकता हैं।

आज के परिदृश्य में देखे तो देश में पक्ष, विपक्ष व निष्पक्ष तीन श्रेणी के प्रेस संस्थान हो गये है। जिसमें सत्ता का आनंद लेने की ख्वाहिश रखने के चलते पक्ष वालों की संख्या कुछ अधिक हो गयी है, दूसरे नम्बर पर विपक्ष वाले संस्थान हो गये है, तीसरे नम्बर पर निष्पक्ष वालें संस्थानों की श्रेणी है जो दिन-प्रतिदिन बहुत तेजी से कम होते जा रहे हैं और देश में जिस तरह की स्थिति बनती जा रही हैं तो वह दिन दूर नहीं है जब निष्पक्ष प्रेस संस्थानों की श्रेणी को जल्द ही संरक्षित करने के लिए प्रभावी कदम उठाने होंगे। वरना जिस तरह का आज का व्यवसायिक दौर चल रहा है एक दिन उनके दर्शन दुर्लभ हो जायेंगे। यह भी कटु सत्य है कि कुछ लोगों व लोगों के समूह के द्वारा देश में उन सभी पत्रकारों के विरुद्ध लगातार राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया जा रहा है, जो कि सरकार से सवाल पूछने की हिम्मत करते है, साथ ही सरकार और राष्ट्र के बीच के अंतर को समझते हुए निष्पक्ष रूप से ईमानदारी से अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन कर रहे हैं। जो कि लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश के लिए उचित नहीं है। वैसे देश में कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाये तो भारत में प्रेस बहुत हद तक पूर्ण रूप से स्वतंत्र है, ऐसी स्वतंत्रता शायद ही किसी और देश में देखने को मिलेगी, हमारे यहां प्रेस के लोग सरकार के खिलाफ बिना किसी भय के क्या-क्या नहीं बोल जाते हैं और सरकार उन कलमकारों की चुपचाप सुनती रहती है, यह स्थिति भारत में प्रेस की असली ताकत निष्पक्षता का नतीजा दर्शाती है। हमारे देश मेंं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हो या प्रिंट मीडिया या फिर देश की सोशल मीडिया किसी पर भी कोई ऐसी बेवजह की पाबंदी नहीं है कि किसी को भी सरकार के खिलाफ कुछ भी कहने के लिए पहले किसी तरह की कोई अनुमति लेनी पड़े। 

लेकिन यह भी सच है कि आज के व्यवसायिक दौर में देश में जिस तरह से पत्रकारों को तरह-तरह के अनावश्यक दबाव झेलने पड़ते हैं, वह बिल्कुल भी पत्रकारिता व देशहित में उचित नहीं है। इस प्रकार दबाव की स्थिति देश में केवल प्रेस की स्वतंत्रता पर ही हमला नहीं है, बल्कि एक कलमकार की कलम की निष्पक्षता व ईमानदारी पर हमला है। प्रेस के क्षेत्र में बेहद कठिन व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा के चलते व कुछ संस्थानों के मालिकों के द्वारा अधिक धन कमाने की लालसा व उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं ने देश में कुछ मीडिया संस्थानों के मालिकों को प्रेस की आजादी व निष्पक्षता का सबसे बड़ा दुश्मन बना दिया है। प्रेस को हमारे देश के संविधान ने व सरकार ने तो पूर्ण स्वतंत्रता दी हूई है, लेकिन कही ना कही मालिकों के हितों को साधने के लिए प्रबंधन के भारी दबाव के चलते हमारे कुछ पत्रकार बंधु निष्पक्ष निड़र होकर कलमकार के धर्म को जनहित के कुछ ज्वंलत मसलों में सही ढंग से नहीं निभा पाते हैं। 

आज देश में कुछ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के संस्थानों की तो गजब की स्थिति हो गयी है वो मालिक के हितों को पूरा करने के खेल में समाज में एक-दूसरे के प्रति जहर भरने पर तुले हुए है। इन चैनलों के एंकर टीआरपी के खेल में पहले नम्बर पर आने की अंधी दौड़ के चक्कर में आयेदिन बिना सिर-पैर के मुद्दों पर स्टूडियो में बैठकर नेताओं व अन्य लोगों को डिवेट में बुलाकर लड़वाते रहते है, पता नहीं इन कुछ लोगों के द्वारा देश में यह किस प्रकार की पत्रकारिता का दौर शुरू किया गया है, जिसका उद्देश्य केवल समाज को तोड़ने का होता है नाकि लोगों को जोड़ने का। उन चंद एंकरों को ना तो 135 करोड़ भारतवासियों की कोई जन समस्या का मुद्दा नजर आता है, ना ही वो समाज की जन समस्याओं को लेकर किसी सार्थक मसलें को लेकर उस पर डिवेट कराने के लिए कभी तैयार हैं। सबसे बड़ी दुख की बात यह है कि वो एक पत्रकार की तरह बेबाक होकर निष्पक्ष होकर सवाल पूछने के लिए भी तैयार नहीं हैं। आज के दौर की शाम के समय होने वाली कुछ न्यूज चैनलों की डिवेटों में बहस के लिए सबसे जरूरी आमजनमानस के सरोकार से जुड़े मुद्दे पूर्ण रूप से गायब रहते हैं, जबकि मालिकों के व्यवसायिक हितों को साधने के लिए व कुछ लोगों को खुश करने के लिए चाटुकारिता वाले मुद्दे जबरदस्त रूप से हावी हैं, 24 घंटे न्यूज चैनल चलाने के लिए एकंर टीवी स्टूडियो में बैठकर सत्तापक्षा और प्रतिपक्ष के नुमाइंदों की तूतू-मैंमैं करवाकर आपस में छीछालेदर करवाने में व्यस्त हैं। कुछ चैनलों की स्थिति तो यह हो गयी है कि अगर गलती से किसी दिन किसी अहम जनसरोकार के मुद्दे पर बहस होती भी है, तो एंकर को ऐसी आदत पड़ चुकी है कि वो उसकी दिशा को बरगला देता है और पूरी बहस को बेमतलब की बनाकर औचित्यहीन बना देता है।

आज देश में कुछ टीवी न्यूज चैनलों पर ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि उनके पत्रकारों पर मालिकों के अलावा स्वयं की बढ़ती आर्थिक व राजनीतिक महत्वाकांक्षा, अलग-अलग तरह के शासन-प्रशासन, राजनीतिक, सांस्थानिक और चैनल को 24 घंटे चलाने के लिए धन के बंदोबस्त करने का भारी-भरकम आर्थिक दबाव है। देश में उत्पन्न इस तरह की हालात के लिए जिम्मेवार स्वयं खुद अधिकतर प्रेस संस्थानों के मालिक हैं।
लेकिन सबसे अच्छी बात यह है कि प्रिंट मीडिया में अब भी कुछ अपवादों को छोड़ दे तो वहां पर अभी भी पत्रकार व पत्रकारिता के लिए भरपूर अवसर उपलब्ध हैं, देश में बहुत सारे निष्पक्ष व निर्भीक संस्थान आज भी जिंदा हैं। प्रिंट मीडिया में पत्रकारिता के मुल्य आज भी कस्बे, जिला, प्रदेश व राष्ट्रीय स्तर पर जिंदा हैं। वहीं बाकी मीडिया क्षेत्र में ईमानदार पत्रकारों को जबरदस्त दबाव के चलते संघर्ष करना पड़ रहा हैं।

आज देश में कुछ मीडिया संस्थानों के मालिक तो यह बिल्कुल भी नहीं चाहते कि प्रेस स्वतंत्र रहकर निष्पक्ष रूप से कार्य करें। कुछ मीडिया संस्थानों के मालिकों की धन कमाने की लालसा व राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के चलते देश में यह स्थिति हो गयी है की प्रेस की स्वंतत्रता व निष्पक्षता के सवाल पर चलने वाली किसी भी प्रकार की बहस खुद मीडिया संस्थानों के मालिकों को भी पसंद नहीं आयेंगी। इस मुद्दे पर किसी भी निष्पक्ष पत्रकार के तीखे सवाल उनको नश्तर की तरह चुभने का काम करेंगे। वो एक सच्चे पत्रकार के उन सवालों का जवाब देने में आज पूर्ण रूप से अक्षम हैं।
आज के व्यवसायिक दौर में कुछ शीर्ष पर बैठे लोगों की पत्रकारिता का आलम यह हो गया है कि आप जब भी टीवी को डिवेट देखने के लिए चलाते है तो पाते आपके सामने जो कार्यक्रम चल रहा उसमें निष्पक्ष रिपोर्टिंग की बात तो बहुत दूर की कोड़ी है, रिपोर्टिंग भी नहीं चल रही है बल्कि उस कार्यक्रम में बहुत अच्छे ढंग का महिमामंडन स्तुतिगान करने वाली जबरदस्त पैकेजिंग चल रही होती है। यह सही है कि पत्रकार भी एक आम व्यक्ति ही है और व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी है उसके बहुत सारे लोगों से संबंध होते हैं, लेकिन यह एक निष्पक्ष ईमानदार पत्रकार को तय करना है कि वो संबधों को अपनी कलम पर हावी ना होने दे, संबंधों के चक्कर में देश की जनता के सामने वो झूठ की चासनी से लबरेज मसाला ना परोसें। आज के व्यवसायिक दौर में देश के प्रेस मालिकों को सामजंस्य बनाने की आवश्यकता है कि वो संस्थान चलाने के लिए आवश्यक धन की पूर्ति करते हुए, देश में निड़र, निष्पक्ष व निर्भीक पत्रकार के हितों की रक्षा करके, असली पत्रकारिता के दीपक की लो को गर्व से प्रज्वलित रखें। आज देश में जो हालात है उसमें सही मायनों में लोकतंत्र की रक्षा के लिए प्रेस के ऐसे वर्ग की जरूरत है जो ना तो पक्ष वाला हो ना विपक्ष वाला हो बल्कि निष्पक्ष, निड़र, ईमानदार व निर्भीक श्रेणी वाला सच्चा पत्रकार कलमकार हो।।

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।

शुक्रवार, 1 मई 2020

*1 मई "अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस" पर विशेष* मजदूर खुश तो देश खुशहाल

*1 मई "अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस" पर विशेष*

मजदूर खुश तो देश खुशहाल

हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व रचनाकार

1 मई के दिन को विश्व के अधिकांश देशों ने मेहनतकश श्रमिकों के नाम पर समर्पित कर रखा है। इसे मई दिवस, मे डे, मजदूर दिवस, अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस आदि तमाम तरह के अलग-अलग नामों से जाना जाता है। भारत में श्रमिक दिवस पहली बार 1 मई सन् 1923 को मनाया गया था। तब भारतीय मजदूर किसान पार्टी ने मद्रास में इसे जोरशोर से मनाया था।
आज विश्व के 80 से अधिक देश में "अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस" के दिन राष्ट्रीय अवकाश रखकर उस दिन को मजदूरों के नाम समर्पित किया जाता है। विश्व के कुछ देशों में इसे अलग-अलग तारीखों में भी मनाये जाने का चलन है।

मजदूर कौन है :-
बेहद सरल शब्दों में व्याख्या करें तो देश में कोई भी ऐसा व्यक्ति जो अपनी श्रम शक्ति को बेचकर रोजगार प्राप्त करके अपना जीवन यापन करता है तो वह एक मजदूर है। वैसे हमारे देश में औद्योगिक विवाद अधिनियम (1947) की परिभाषा के अनुसार यह फैसला किया जाता है कि कौन मजदूर है। औद्योगिक विवाद अधिनियम के दफा 2 (एस) में मजदूर की परिभाषा इस प्रकार दी गयी है-

 “मजदूर (प्रशिक्षु समेत) कोई भी ऐसा व्यक्ति है जो मजदूरी या वेतन के बदले, किसी उद्योग में शारीरिक, अकुशल, कुशल, तकनीकी, कार्यकारी, क्लर्क या सुपरवाइज़र का काम करता हो, चाहे काम की शर्तें स्पष्ट या अन्तर्निहित हों वह मजदूर है।"

श्रमिक दिवस को क्यों मनाया जाता है :-

आज अधिकांश देश 1 मई को मजदूर दिवस के रूप में मनाते हैं, लेकिन हकीकत में यह अमेरिका में मजदूर के विद्रोह और शहादत का दिवस है। 1 मई के इतिहास पर जब हम नजर डालते हैं तो पता चलता है कि 1 मई 1886 के दिन‌ विश्व के कुछ ताकतवर देशों के मजदूरों ने अपने-अपने कारखानों के मालिकों के खिलाफ सड़कों पर उतर कर विद्रोह का बिगुल बजा दिया था, वो काम-धंधा छोड़कर जगह-जगह सड़कों पर हड़तालों पर बैठ गए थे।

उस दौरान अमेरिका के कल-कारखानों में काम करने वाले मजदूरों ने भी काम के घंटे कम करके आठ घंटे करने व अपनी अन्य लंबे समय से लम्बित मांग को लेकर काम बंद करके हड़ताल शुरुआत कर दी थी। अभी हड़ताल शुरू हुए चार दिन भी पूरे नहीं हुए थे, कि 4 मई 1886 को अमेरिका के शिकागो के हे-मार्केट में एक बम धमाका हो गया। अपनी मांगों को लेकर देश में मजदूर पहले से ही सड़कों पर उतरे हुए थे। उसके चलते पूरे देश में हड़ताल से जबरदस्त हड़कंप मचा हुआ था। इस धमाके ने अमेरिकी प्रशासन का धैर्य पूर्ण रूप से समाप्त कर दिया था और वह मजदूर के प्रति उग्र हो गया।

हे-मार्केट धमाके का यह मामला शिकागो, इलिनोइस, संयुक्त राज्य अमेरिका में आम हड़ताल के दौरान हुआ था, जिसमें आम मज़दूर, कारीगर, व्यापारी और अप्रवासी लोग तक भारी संख्या में शामिल हुए थे। पुलिस द्वारा गोली चलाए जाने और मेकॉर्मिक हार्वेस्टिंग मशीन कंपनी संयंत्र में चार हड़तालियों मजदूरों को मार डालने की एक घटना के बाद, अगले दिन जब हे-मार्केट स्क्वायर में एक विशाल रैली का आयोजन किया गया। यह रैली शांतिपूर्ण रही, लेकिन रैली के अंत में, जैसे ही पुलिस कार्यक्रम को तितर-बितर करने के लिए आगे बढ़ी, तभी एक अज्ञात हमलावर ने पुलिस की भीड़ पर एक बम फेंक दिया। इस बम धमाके के परिणामस्वरूप बाद में पुलिस कार्यवाही में पुलिस ने प्रदर्शनकारी मजदूरों पर अंधाधुंध गोलियां बरसाईं। बताया जाता है‌ कि इस गोलीबारी में दर्जनभर से ज्यादा मजदूरों की मौत हो गई थी। इसके बाद दहशत का माहौल पूरे देश में फैल गया था। कई दिनों तक मजदूरों की नाराजगी के चलते देश के अधिकांश कल-कारखाने बंद रहे थे।

इन दंगों ने सात पुलिसकर्मियों की भी जान ले ली थी। जिस मामले में बाद में अमेरिका में एक बेहद सनसनीखेज़ ट्रायल चला, जिसमें आठ प्रतिवादियों की खुलेआम सुनवाई, जो कि उनकी राजनैतिक मान्यताओं को लेकर हुई, ना कि किसी बम विस्फोट में शामिल होने के लिए सुनवाई की गई। जांच के अंत में उनमें से चार लोगों को सरेआम फांसी दे दी गई थी। बाद में हे-मार्केट स्कवायर की यह घटना, दुनिया भर के मजदूर वर्ग के लोगों को जबरदस्त ढंग से आक्रोशित करने का बहुत बड़ा कारण बनी थी। लेकिन कुछ दिनों में धीरे-धीरे समय ने लोगों के जख्म भर दिये और सबकुछ पहले की तरह सामान्य हो गया। हालांकि इस घटना के बाद कल-कारखानों के प्रबंधकों ने मजदूरों की बहुत सारी मांगों को मान लिया था। कम्पनियों में आठ घंटे की शिफ्ट की शुरुआत यही से हुई थी। उसके बाद पेरिस में सन् 1889 में फिर से एक बार मजदूर इकट्ठा हुए थे। जिस कार्यक्रम को "अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन" का नाम दिया गया था। इसमें पहली बार 1886 के मई महीने में जान गवाने वाले मजदूरों को याद करते हुए 1 मई को मजदूर दिवस मनाने का फैसला किया गया था। उसके बाद के वर्षों में, "हे-मार्केट शहीदों" की स्मृति को विभिन्न देशों में भी "मई दिवस" के रूप में याद किया जाने लगा। बाद में धीरे-धीरे मजदूरों ने 1 मई को खुद-ब-खुद छुट्टी मनानी शुरू कर दी। इसके बाद मजदूरों संगठनों के दबाव में धीरे-धीरे विश्व के सभी प्रमुख देशों को 1 मई को राष्ट्रीय अवकाश घोषित करना पड़ा। हालांकि असल में वह कौन शख्स था जिसने 1 मई को मजदूर दिवस मनाने की पेशकश की थी, इसका आज तक पता नहीं चल पाया है, वैसे माना जाता है कि यह एक सर्वसम्मति से लिया गया फैसला था। इसके बाद खुद-ब-खुद पूरी दुनिया के मजदूर इससे जुड़ते चले गए थे।

भारत में श्रमिक दिवस का इतिहास :- 

भारत में 1 मई के दिवस को सब से पहले चेन्नई में 1 मई 1923 को मनाया गया था। उस समय इस को मद्रास दिवस के तौर पर प्रामाणित कर लिया गया था। इस की शुरूआत भारती मजदूर किसान पार्टी के नेता कामरेड सिंगरावेलू चेट्यार ने शुरू की थी। जिन्होंने भारत में मद्रास के हाईकोर्ट सामने एक बहुत बड़ा प्रदर्शन किया और एक संकल्प पास करके यह सहमति बनाई थी कि इस दिवस को भारत में भी कामगार दिवस के तौर पर मनाया जाये और इस दिन छुट्टी का ऐलान किया जाये। आज भारत समेत लगभग 80 देशों में यह दिवस 1 मई को मनाया जाता है। इसके पीछे सभी का तर्क है कि यह दिन "अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस" के तौर पर अब सम्पूर्ण विश्व में प्रामाणित हो चुका है।

देश में मजदूरों की स्थिति :-
भारत में अभी भी मजदूरों के लिए सरकार व औधोगिक घरानों को बहुत काम करने की आवश्यकता है। हमारी सरकारों को अभी भी विचार करना होगा कि किसी भी लोक कल्याणकारी सरकार एवं राष्ट्र का, लोगों की सामाजिक सुरक्षा, न्याय एवं जीने का अधिकार प्रथम कानूनी उद्देश्य होना ही चाहिए। बाकी बातें उसके बाद शुरू होती है लेकिन हम अपने देश की बात करें तो यह सवाल अभी तक पूर्ण रूप से देश में लागू नहीं है, बल्कि बहुत लम्बे समय से विचारणीय है, विशेषकर मजदूरों के नजरिये से बात करें तो स्थिति अभी तक उनके हित में ठीक नहीं है। हमारे देश में भी मजदूर खुश तो देश खुश के सिद्धांत पर जल्द से जल्द अमल करना होगा, तब ही देश विकास के नित नए आयाम स्थापित करके विश्व गुरु बन सकेगा।

अभी हाल के दिनों में देश में मजदूरों की स्थिति की बात करें तो स्थिति बहुत चिंताजनक है, लॉकडाउन के चलते दुविधा में फंसा मजदूर बहुत ज्यादा परेशान है। देश में जबसे कोरोना वायरस संक्रमण से बचने के चलते लॉकडाउन लगा है, तब से संगठित व असंगठित हर तरह के क्षेत्र के मजदूरों के सामने विकट परिस्थिति उत्पन्न हो गयी है। मजदूरों की रोजीरोटी दोनों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। पैसे के अभाव में अलग-अलग शहरों में बड़ी संख्या में फंसे दिहाड़ी मजदूर तो बेचारे भूखे मरने के कगार पर हैं, रोटी व राशन के लिए वो बेचारे देश के भामाशाहों, सरकार व स्वयंसेवी संस्थाओं के ऊपर पूर्ण रूप से निर्भर हो गये हैं। 

लॉकडाउन में जिस तरह से अपने ही देश में कामगारों की जन शक्ति वाले अथाह जन समूह को राज्यों की सरकारों व कुछ ताकतवर जिम्मेदार पदों पर आसीन लोगों के द्वारा उपेक्षा का शिकार होकर, उनके द्वारा अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने के  चलते, आपदा के समय में उनको अपने राज्य के मजदूर व प्रवासी मजदूर का दर्जा देकर आपस में बांट दिया गया, यह स्थिति आने वाले समय में देश की अर्थव्यवस्था व खुशहाली के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं है। 

हमारे देश के नीतिनिर्माताओं को समझना होगा कि किसी भी संस्था, उद्योगों और देश के निर्माण में मज़दूरों, कामगारों और मेहनतकशों लोगों की बहुत ही अहम भूमिका होती है। वह लोग उसकी कामयाबी के लिए रात-दिन एक करके जुटे रहते हैं। किसी भी उधोग में कामयाबी के लिए मालिक, सरमाया, कामगार और सरकार एक बहुत अहम धड़े होते हैं। किसी भी देश में मजदूरों की शक्ति के बिना कोई भी औद्योगिक व अन्य प्रकार का ढांचा खड़ा नहीं रह सकता है।

हम लोगों को समय रहते यह समझना होगा कि मजदूर का मतलब केवल लाचार व गरीब से नहीं होता हैं, मजदूर हमारे समाज की वह महत्वपूर्ण ईकाई हैं, जिसका हमारी अधिकांश सफलता के पीछे अनमोल योगदान होता है। वह हमारे सिस्टम का एक बेहद महत्वपूर्ण अभिन्न अंग हैं, आज उसके बिना किसी भी तरह के कार्य को सम्पन्न करने की उम्मीद करना एकदम बेमानी है। हमको समझना होगा कि एक ईंटों का बोझ उठाने वाला इंसान, मिट्टी के गारे में या सीमेंट के मसाले में सना इंसान हो, हमारे ऑफिस की फाइलों के बोझ तले दबा एक कर्मचारी हो, टाई लगाकर कर ऑफिस में काम करने वाला क्लर्क हो, सूट पहनकर कारखाने आने वाला सिनियर सुपरवाइजर हो, या हर वो इन्सान जो किसी संस्था के लिए काम करता हैं और बदले में पैसे लेता हैं, वो असल में तो एक मजदूर ही है। तो फिर आपस में एकजुटता की जगह एकदूसरे की अनदेखी क्यों?

जिस तरह से लॉकडाउन में असुरक्षा के भाव के चलते मजदूर महानगरों से अपना बोरिया बिस्तर समेट कर वापस अपने घरों की तरफ निकल पड़े हैं, वह स्थिति कोरोना संक्रमण के मद्देनजर तो ठीक है ही नहीं, बल्कि आने वाले समय में इसके दूरगामी परिणाम देश की अर्थव्यवस्था पर नजर आ सकते है। देश में जिस तरह की आज हालात है उसको देखकर लगता है कि आने वाले समय में देश के अधिकांश महानगरों में मजदूर मिलने में बेहद कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। देश में मजदूरों का पलायन यह दर्शाता है कि कहीं ना कहीं देश के सिस्टम व सरकारी तंत्र पर मजदूरों को विश्वास नहीं था।

हमारे सिस्टम के ताकतवर लोगों को ध्यान रखना होगा कि दिल्ली में बैठकर बनी योजनाएं मजदूर तक पहुंचते-पहुंचते अपना कल्याणकारी मुख्य स्वरूप नहीं खो पाये। उन योजनाओं का लाभ देश के मजदूर वर्ग को वास्तव में धरातल पर मिलता नजर आना चाहिए। ना कि यह योजनाएं केवल सरकारी खजाने से मजदूरों के हितों के नाम पर पैसा निकाल कर उसकी बंदरबांट का जरिया बनकर रह जाये। देशहित व मजदूरों के हित में चलने वाली सभी योजनाओं के दूरगामी समृद्धि के प्रयास धरातल पर नजर आने चाहिए, ना कि यह योजनाएं सिर्फ हमारे सिस्टम की फाइलों की शोभा मात्र बन कर रह जाये। आज हमारे देश के नीतिनिर्माताओं को ध्यान रखना होगा कि सरकारी खजाने से जो पैसा मजदूर को मिला रहा है उसका वास्तव में सदुपयोग हो रहा है या नहीं। क्योंकि भ्रष्टाचार के चलते जिस तरह की स्थिति बन गयी है उस समय यह आज का सबसे ज्वलंत सवाल है। आज समय की मांग है कि हम अपने मजदूर भाईयों का अच्छे से ध्यान रखे उनको लाचार व मजबूर ना बनने दे, क्योंकि उनकी लाचारी और मजबूरी हम सभी पर बहुत भारी पड़ सकती है, इसलिए ध्यान रखें "मजदूर खुश तो देश खुशहाल" रहेगा।

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।