मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

*28 अप्रैल जगतगुरु आद्य शंकराचार्य जी की जयंती पर विशेष* सनातन धर्म के रक्षक व देश को एक सूत्र में पिरोने वाले जगतगुरु आद्य शंकराचार्य

*28 अप्रैल जगतगुरु आद्य शंकराचार्य जी की जयंती पर विशेष*

सनातन धर्म के रक्षक व देश को एक सूत्र में पिरोने वाले जगतगुरु आद्य शंकराचार्य 

हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व रचनाकार


पूज्य जगतगुरु श्री आद्य शंकराचार्य जी के विषय में कुछ भी लिखना सूर्य को दीपक दिखाने के समान हैं। भारत में वैदिक सनातन परंपरा की रक्षा, विकास और धर्म के प्रचार-प्रसार में जगतगुरु आद्य शंकराचार्य जी का अनमोल योगदान है। आज अद्वैत वेदांत के प्रणेता, सनातन धर्म के प्राणधार, कश्मीर से कन्याकुमारी तक सम्पूर्ण भारत को एक सूत्र में पिरोने वाले, सनातन धर्म की रक्षा करने वाले महायोद्धा और भगवान शंकर के अवतार माने जाने वाले परम महाज्ञानी विद्वान, अद्भुत तेजस्वी एवं  प्रखर भविष्यदृष्टा महापुरुष जगतगुरु आद्य शंकराचार्य जी की जयंती है। जयंती पर हम उनको कोटि-कोटि नमन करते हैं।

जगतगुरु आद्य शंकराचार्य जी ने उस समय देश में जिस तरह से अनेकों पंथों एवं विचारों की चुनौतियां सनातन धर्म के लिए उत्पन्न हो रही थी। उनसे बेहद सफलतापूर्वक बखूबी निपटकर और समाज को सत्य का दर्शन कराने के लिए देश में अद्वैत वेदांत का मार्ग प्रशस्त किया था। उन्होंने सम्पूर्ण भारत का भ्रमण करके देश को कश्मीर से लेकर केरल तक एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया था।

जगतगुरु आद्य शंकराचार्य जी का जन्म 788 ई. में केरल के मालाबार क्षेत्र के छोटे से गाँव कालड़ी नामक स्थान पर नम्बूद्री ब्राह्मण शिवगुरु एवं आर्याम्बा के यहां हुआ था और वह मात्र 32 वर्ष तक ही जीवित रहे थे। शंकराचार्य जी के जन्म की एक छोटी सी कथा है जिसके अनुसार, शंकराचार्य के माता-पिता को बहुत समय तक कोई संतान प्राप्त नहीं हूई थी। तो उन दोनों ने कड़ी तपस्या की, कड़ी तपस्या के बाद भगवान शिव ने माता को सपने में दर्शन दिये और कहा कि, उनके पहले पुत्र के रूप मे वह स्वयं अवतारित होंगे परन्तु, उनकी आयु बहुत ही कम होगी और, शीघ्र ही वे देव लोक गमन कर लेंगे। शंकराचार्य जी जन्म से ही बिल्कुल अलग थे, वह स्वभाव में शांत और गंभीर थे। जो कुछ भी सुनते थे या पढ़ते थे, एक बार में ही समझ कर अपने मस्तिष्क मे बिठा लेते थे। शंकराचार्य जी ने सभी वेदों और लगभग छ: से अधिक वेदांतो में अल्पायु में ही महारथ हासिल कर ली थी। समय के साथ उनका यह ज्ञान अथाह सागर में तब्दील होता चला गया। उन्होंने अपने स्वयं इस ज्ञान को, बहुत तरह से जैसे- उपदेशो, रचनाओं के माध्यम से, देश में अलग-अलग मठों की स्थापना करके, धार्मिक ग्रन्थ लिख कर अलग-अलग तरह के सन्देशों के माध्यम से लोगों तक पहुचाया। वह संस्कृत भाषा के प्रकांड विद्वान थे।

शंकराचार्य ने देश के चारों कौनों पर चार मठों की स्थापना की थी। उत्तर दिशा में उन्होंने बद्रिकाश्रम में ज्योर्तिमठ की स्थापना की थी। इसके बाद पश्‍चिम दिशा में द्वारिका में शारदामठ की स्थापना की थी। इसके बाद उन्होंने दक्षिण में श्रंगेरी मठ की स्थापना की थी। इसके बाद उन्होंने पूर्व दिशा में जगन्नाथ पुरी में गोवर्धन मठ की स्थापना की थी। आप इन मठों में जाएंगे तो वहां इनकी स्थापना के बारे में लिखा हुआ समस्त विवरण जान सकते हैं।

आद्य शंकराचार्य जी ने ब्रह्मसूत्रों की बड़ी ही विशद और रोचक व्याख्या की है। उनके विचारोपदेश आत्मा और परमात्मा की एकरूपता पर आधारित हैं, जिसके अनुसार परमात्मा एक ही समय में सगुण और निर्गुण दोनों ही स्वरूपों में रहता है।  इन्होंने ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, मांडूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, बृहदारण्यक और छान्दोग्योपनिषद् पर भाष्य लिखा। वेदों में लिखे ज्ञान को एकमात्र ईश्वर को संबोधित समझा और उसका प्रचार-प्रसार तथा वार्ता पूरे भारतवर्ष में की। उस समय वेदों की समझ के बारे में मतभेद होने पर उत्पन्न चार्वाक, जैन और बौद्ध मतों को शास्त्रार्थों द्वारा खण्डित किया। और लोगों को सनातन धर्म के बारें में समझाया।


भारतीय परम्परा में जगतगुरु आद्य शंकराचार्य जी को भगवान शिव का अवतार माना जाता है। उनके जीवन के जब चमत्कारिक तथ्य सामने आते हैं, उससे प्रतीत होता है कि वास्तव में आद्य शंकराचार्य भगवान शिव के अवतार थे। जिस तरह से भगवान शिव की आराधना करने के बाद शिवगुरु ने पुत्र-रत्न पाया था, इसीलिए उन्होंने पुत्र का नाम शंकर रखा। जब ये तीन ही वर्ष के थे तब इनके पिता का देहांत हो गया। ये बड़े ही मेधावी तथा प्रतिभाशाली थे। छह वर्ष की अवस्था में ही ये प्रकांड विद्वान बन गए थे और आठ वर्ष की अवस्था में इन्होंने संन्यास ग्रहण किया था। इनके संन्यास ग्रहण करने के समय की कथा बड़ी विचित्र है। कहते हैं, माता एकमात्र पुत्र को संन्यासी बनने की आज्ञा नहीं देती थीं। तब एक दिन नदी किनारे एक मगरमच्छ ने शंकराचार्य जी का पैर पकड़ लिया, तब इस वक्त का फायदा उठाते शंकराचार्य जी ने अपनी माँ से कहा था कि- 

" माँ मुझे सन्यास लेने की आज्ञा दो नहीं तो यह मगरमच्छ मुझे खा जायेगा, इससे भयभीत होकर माता ने तुरंत इन्हें संन्यासी बनने की आज्ञा प्रदान कर दी और सबसे आश्चर्य की बात यह है की, जैसे ही माता ने आज्ञा दी वैसे तुरन्त मगरमच्छ ने शंकराचार्य जी का पैर छोड़ दिया।"

 इसके बाद आठ वर्ष की अवस्था में गुरु श्री गोविन्द नाथ के शिष्यत्व को ग्रहण कर वो संन्यासी हो गये, पुन: वाराणसी से होते हुए बद्रिकाश्रम तक की पैदल यात्रा करना, सोलह वर्ष की अवस्था में बद्रीकाश्रम पहुंच कर ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखना, सम्पूर्ण भारत वर्ष में भ्रमण कर अद्वैत वेदान्त का प्रचार करना, दरभंगा के विद्वान मण्डन मिश्र से शास्त्रार्थ कर वेदान्त की दीक्षा देना तथा मण्डन मिश्र को संन्यास धारण कराना, भारतवर्ष में समाज में प्रचलित तत्कालीन कुरीतियों को दूर कर समभावदर्शी धर्म की स्थापना करना। इत्यादि कार्य इनके महत्व को और बढ़ा देता है। चार धार्मिक मठों में दक्षिण के शृंगेरी शंकराचार्यपीठ, पूर्व (ओडिशा) जगन्नाथपुरी में गोवर्धनपीठ, पश्चिम द्वारिका में शारदामठ तथा बद्रिकाश्रम में ज्योतिर्पीठ भारत की एकात्मकता को आज के समय में भी दिग्दर्शित कर रहा है। देश में कुछ लोग शृंगेरी को शारदापीठ तथा गुजरात के द्वारिका में मठ को काली मठ कहते है। आज उन्हीं के दिखाये मार्ग के अनुसार हिन्दू धर्म में शंकराचार्य सर्वोच्च धर्म गुरु का पद है, इस पद की परम्परा आद्य जगतगुरु शंकराचार्य ने खुद ही शुरू की थी। शंकराचार्य ने सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार और प्रतिष्ठा के लिए भारत के 4 क्षेत्रों में जो चार मठ स्थापित किए थे। उन्होंने अपने नाम वाले इस शंकराचार्य पद पर अपने चार मुख्य शिष्यों को बैठाया था। जिसके बाद से इन चारों मठों में शंकराचार्य पद को निभाने की परंपरा लगातार चलती आ रही है।

आद्य शंकराचार्य ने ही दसनामी सम्प्रदाय की स्थापना की थी। यह दस संप्रदाय निम्न प्रकार हैं - 1.गिरि, 2.पर्वत और 3.सागर, इनके ऋषि हैं भ्रगु। 4.पुरी, 5.भारती और 6.सरस्वती, इनके शांडिल्य ऋषि हैं। 7.वन और 8.अरण्य, इनके ऋषि काश्यप हैं। 9.तीर्थ और 10. आश्रम, इनके ऋषि अवगत हैं। शंकराचार्य जी ने इनकी स्थापना करके, हिंदू धर्मगुरू के रूप में हिंदुओं के प्रचार प्रसार व रक्षा का कार्य इन सभी अखाड़ों को सौपा और उन्हें अपना आध्यात्मिक उत्तराधिकारी भी बताया था।

आद्य शंकराचार्य जी के बारे में एक बात और बहुत चर्चित है कि संन्यास लेने की बात सुनकर जब उनकी माँ दुखी हो जाती थी। तो माँ को समझाते हुए छोटा बालक शंकर बोला, “माँ, तुम दुखी क्यों होती हो। देखो मेरे सिर पर तो हमेशा ही तुम्हारा आशीर्वाद रहेगा। तुम चिन्ता मत करो। तुम्हारी ज़िंदगी के आखिरी पड़ाव पर मैं उपस्थित रहूंगा और तुम्हारे पार्थिव शरीर को अग्नि देने जरूर आऊंगा”। उन्होंने यह प्रतिज्ञा की थी और उसको निभाया भी।
कहते हैं कि वर्षों बाद शंकराचार्य जी अपनी माता की मृत्यु के समय वहां उपस्थित हुए और उनके शरीर को अग्नि देने के लिए आगे बढ़ना चाहा लेकिन कुछ परंपरागत सिद्धांतों के चलते ब्राह्मणों ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। ब्राह्मणों द्वारा शंकराचार्यजी को रोकने का एक ही तर्क था कि वह एक संन्यासी, जो कि दुनिया की सभी मोह-माया से मुक्त होता है, उसे अपनी खुद की माँ से भी स्नेह नहीं रखना चाहिए। यह उसके संन्यासी जीवन पर अभिशाप के समान है। लेकिन तब शंकराचार्यजी ने उन्हें यह ज्ञात कराया कि उनके द्वारा ली गई प्रतिज्ञा उनके संन्यासी जीवन का हिस्सा नहीं थी। वह अपनी माँ को दी गई प्रतिज्ञा का पालन करने के लिए अग्नि अर्पित करने आए हैं। तत्पश्चात सभी ब्राह्मणों ने उन्हें ऐसा करने की आज्ञा प्रदान की। बाद में शंकराचार्य जी ने अपने घर के सामने आगंन में ही अपनी माँ के शव को अग्नि अर्पित की थी। कहा जाता है कि शंकराचार्य जी द्वारा इस प्रकार घर के सामने अंतिम संस्कार करने के बाद ही  केरल के इस क्षेत्र में भविष्य में उनके कुल  के लोगों में घरों के सामने ही अंतिम संस्कार करने की रीति आरंभ हो गई। यह रीति आज भी इसी तरह से चल रही है।
शंकराचार्य जी ने लोगों को योग का महत्व बताया, ईश्वर से जुड़ने के तरीको का वर्णन और महत्व बताया। 

देश में उक्त सभी कार्य को सम्पादित करके सनातन धर्म के रक्षक जगतगुरु आद्य शंकराचार्य जी मात्र 32 वर्ष की अल्पायु में 820 ई. में केदारनाथ के समीप ब्रह्मलीन हो गये थे।

*28 अप्रैल बाजीराव पेशवा की पुण्यतिथि पर विशेष* जीवन में कभी युद्ध ना हारने वाले महायोद्धा बाजीराव पेशवा


28 अप्रैल बाजीराव पेशवा की पुण्यतिथि पर विशेष

जीवन में कभी युद्ध ना हारने वाले महायोद्धा बाजीराव पेशवा

हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व रचनाकार 

"हर-हर महादेव" के युद्धघोष के साथ देश में अटक से लेकर कटक तक केसरिया ध्वज लहरा कर "हिन्दू स्वराज" लाने का जो सपना वीर छत्रपति शिवाजी महाराज ने देखा था, उसको काफी हद तक मराठा साम्राज्य के चौथे पेशवा या प्रधानमंत्री वीर बाजीराव प्रथम ने पूरा किया था। जिस वीर महायोद्धा बाजीराव पेशवा प्रथम के नाम से अंग्रेज शासक थर-थर कांपते थे, मुगल शासक बाजीराव से इतना डरते थे कि उनसे मिलने तक से भी घबराते थे। हिंदुस्तान के इतिहास में पेशवा बाजीराव प्रथम ही अकेले ऐसे महावीर महायोद्धा थे, जिन्होंने अपने जीवन काल में 41 युद्ध लड़े और एक भी युद्ध नहीं हारा, साथ ही वीर महाराणा प्रताप और वीर छत्रपति शिवाजी के बाद बाजीराव पेशवा प्रथम का ही नाम आता है जिन्होंने मुगलों से बहुत लंबे समय तक लगातार लोहा लिया था। पेशवा बाजीराव बल्लाल भट्ट एक ऐसे महान योद्धा थे। जिन्होंने निजाम, मोहम्मद बंगश से लेकर मुगलों, अंग्रेजों और पुर्तगालियों तक को युद्ध के मैदान में कई-कई बार करारी शिकस्त दी थी, बाजीराव पेशवा के समय में महाराष्ट्र, गुजरात, मालवा, बुंदेलखंड सहित 70 से 80 प्रतिशत भारत पर उनका शासन था। ऐसा रिकॉर्ड वीर छत्रपति शिवाजी तक के नाम पर भी नहीं है। वह जब तक जीवित रहे हमेशा अजेय रहे, उनको कभी भी कोई हरा नहीं पाया। 

हालांकि इस महावीर अजेय योद्धा के साथ हमारे देश के इतिहासकारों ने कभी न्याय नहीं किया, उन्होंने एक महान योद्धा को हमेशा गुमनाम नायक बनकर ही रहने दिया, बाजीराव को इतिहास ने उनका तय सम्मान कभी नहीं दिया, देश में फिल्म "बाजीराव मस्तानी" आने तक तो उनके बारे में बहुत ही कम लोग जानते थे, अधिकांश लोगों ने उसके बाद ही इस महान योद्धा के बारे में जाना और समझा। उस समय जनता के बीच "अपराजित हिन्दू सेनानी सम्राट" के नाम से प्रसिद्ध इस महान सेनानायक पेशवा बाजीराव प्रथम की आज 28 अप्रैल को पुण्यतिथि है। 

बाजीराव पेशवा को लोग "बाजीराव बल्लाल भट्ट" और "थोरले बाजीराव" के नाम से भी जानते थे। छत्रपति शिवाजी के बाद वह गुरिल्ला युद्ध तकनीक के सबसे बड़े प्रतिपादक थे। उन्होंने अपने कुशल नेतृत्व, व्यूह रचना एवं कारगर रणकौशल के बलबूते पर मराठा साम्राज्य का देश में बहुत तेजी से सबसे अधिक विस्तार किया था। आइए आज जानते हैं इस वीर महायोद्धा के जीवन से जुड़ी कुछ प्रमुख बातें व उनकी वीर गाथाओं के बारे में।

●पेशवा बाजीराव बल्लाल भट्ट का पारिवारिक इतिहास :- 
पेशवा बाजीराव बल्लाल का जन्म 18 अगस्त सन् 1700 को 
चित्ताबन कुल के ब्राह्मण परिवार में पिता बालाजी विश्वनाथ और माता राधाबाई के घर में हुआ था। उनके पिताजी मराठा छत्रपति शाहूजी महाराज के प्रथम पेशवा  (प्रधानमंत्री) थे। बाजीराव का एक छोटा भाई भी था चिमाजी अप्पा। बाजीराव अल्पायु से ही अपने पिताजी के साथ हमेशा सैन्य अभियानों में जाया करते थे।
 
पेशवा बाजीराव ने दो शादियां की इनकी पहली पत्नी का नाम काशीबाई और बाजीराव के चार बेटे थे। बालाजी बाजीराव उर्फ नानासाहेब का जन्म सन् 1721 में हुआ था और बाद में बाजीराव प्रथम की मौत के बाद सन् 1740 में शाहूजी ने उन्हें अपना पेशवा नियुक्त किया था। दूसरे बेटे की रामचंद्र की मृत्यु जवानी में ही हो गई और तीसरा बेटा रघुनाथराव 1773-74 के दौरान पेशवा के रूप में कार्यरत थे। चौथे पुत्र जनार्दन कि भी जवानी में मृत्यु हो गई थी।

बाजीराव ने मस्तानी से दुसरी शादी की थी जो कि बुंदेलखंड के हिंदू राजा छत्रसाल और उनकी एक फारसी मुस्लिम पत्नी रुहानी बाई की बेटी थी। बाजीराव उससे बहुत अधिक प्रेम करते थे और उसके लिए पुणे के पास एक महल भी बाजीराव ने बनवाया जिसका नाम उन्होंने 'मस्तानी महल' रखा। सन् 1734 में बाजीराव और मस्तानी का एक पुत्र हुआ जिसका नाम कृष्णा राव रखा गया था। जो बाद में शमशेर बहादुर प्रथम कहलाया। लेकिन पेशवा परिवार ने कभी भी इस शादी को स्वीकार नहीं किया। परंतु यह ध्यान देने योग्य बात है कि मस्तानी के खिलाफ पेशवा परिवार द्वारा जो घरेलू युद्ध छिड़ा था, उसमें बाजीराव की प्रथम पत्नी काशीबाई ने कभी भी कोई भूमिका नहीं निभाई थी।  इतिहासकारों के मतानुसार व विभिन्न ऐतिहासिक दस्तावेजों से पता चलता है कि काशीबाई हमेशा मस्तानी को बाजीराव की दूसरी पत्नी के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार थीं, लेकिन उनकी सास राधाबाई और देवर चिमाजी अप्पा के विरोध के कारण ऐसा कभी नहीं हो सका। 

उस समय पुणे के ब्राह्मणों ने बाजीराव के मस्तानी के साथ संबंधों के कारण पेशवा परिवार का बहिष्कार तक कर दिया था। चिमाजी अप्पा और बालाजी बाजीराव उर्फ नानासाहेब ने सन् 1740 में बाजीराव और मस्तानी को अलग करने हेतु बलप्रयोग की शुरुआत की थी। जब बाजीराव किसी अभियान पर पुणे से बाहर गये हुए थे, तब उन्होंने मस्तानी को घर में नजरबंद किया था। जब एक अभियान पर बाजीराव कि बिगड़ती स्वास्थ्य को देखकर चिमाजी अप्पा ने नानासाहेब को मस्तानी को छोड़ने और बाजीराव से मिलने के लिए भेज देने का आदेश दिया था। लेकिन नानासाहेब ने इसके बजाय अपनी मां काशीबाई को उनके पास भेजा था। कहा जाता है कि काशीबाई ने बाजीराव की मृत्युशैया पर एक वफ़ादार और कर्तव्य परायण पत्नी बनकर बहुत सेवा की थी। 28 अप्रैल 1740 को वीर महान योद्धा बाजीराव प्रथम की बुखार बीमारी के चलते आकस्मिक मृत्यु हो गयी तब उनकी पत्नी काशीबाई और उनके बेटे जनार्दन ने नर्मदा नदी के किनारे रावेरखेडी, पश्चिम निमाड, मध्य प्रदेश में बाजीराव का अंतिम संस्कार किया था।

बाजीराव की मौत के बाद सन् 1740 में उनकी दूसरी पत्नी मस्तानी का भी निधन हो गया और तब बाजीराव की पहली पत्नी काशीबाई ने मस्तानी व बाजीराव के पुत्र शमशेर बहादुर प्रथम का हमेशा ख्याल रखा था। 

पेशवा बाजीराव, जिन्हें बाजीराव प्रथम भी कहा जाता है, मराठा साम्राज्य के एक महान पेशवा थे। उस समय पेशवा का अर्थ होता था प्रधानमंत्री। वे मराठा छत्रपति शाहूजी महाराज के चतुर्थ प्रधानमंत्री थे। बाजीराव ने अपना प्रधानमंत्री का पद सन् 1720 से अपनी मृत्यु सन् 1740 तक बहुत ही सफलतापूर्वक संभाला था। 

●बाजीराव का गौरवशाली इतिहास :- बचपन से बाजीराव को घुड़सवारी करना, तीरंदाजी, तलवार, भाला, बनेठी, लाठी आदि चलाने का बहुत शौक था। 13-14 वर्ष की खेलने की आयु में बाजीराव अपने पिताजी के साथ अभियानों पर घूमते थे। वह उनके साथ घूमते हुए राज दरबारी चालों, युद्ध नीति व रीति-रिवाजों को आत्मसात करते रहते थे। यह क्रम 19-20 वर्ष की आयु तक चलता रहा। अचानक एक दिन बाजीराव के पिता का निधन हो गया, तो वह मात्र बीस वर्ष की उम्र में छत्रपति शाहूजी महाराज के पेशवा बना गये। इतिहास के अनुसार बाजीराव घुड़सवारी करते हुए लड़ने में सबसे माहिर थे और यह माना जाता है कि उनसे अच्छा घुड़सवार सैनिक भारत में आज तक कभी नहीं देखा गया। उनके पास 4 घोड़े थे, जिनका नाम नीला, गंगा, सारंगा और औलख था। अपने प्रिय घोडों की देखभाल बाजीराव स्वयं करते थे। पेशवा बाजीराव की लंबाई 6 फुट, हाथ लंबे, शरीर बलिष्ठ था। पूरी सेना को वो हमेशा बेहद सख्त अनुशासन में रखते थे। अपनी बेहतरीन भाषण शैली से वो सेना में एक नया जोश भर देते थे।

अल्पवयस्क उम्र के होते हुए भी बाजीराव ने अपनी असाधारण योग्यता प्रदर्शित की। पेशवा बनने के बाद अगले बीस वर्षों तक बाजीराव मराठा साम्राज्य को  लगातार बहुत तेजी से बढ़ाते रहे। उनका व्यक्तित्व अत्यंत प्रभावशाली था।  वह जन्मजात नेतृत्वशक्ति, अद्भुत रणकौशल, अदम्य साहस की प्रतिमूर्ति थे। उन्होंने अपने बेहद प्रतिभासंपन्न अनुज भाई चिमाजी अप्पा के सहयोग द्वारा शीघ्र ही मराठा साम्राज्य को भारत में सर्वशक्तिमान् बना दिया था।  अपनी वीरता, अपने नेतृत्व क्षमता, गुरिल्ला युद्ध तकनीक व बेहतरीन युद्ध-कौशल योजना के द्वारा यह महान वीर योद्धा बाजीराव जंग के मैदान में 41 लड़ाई लड़ा और हर लड़ाई को जीतकर हमेशा अजेय विजेता रहा। छत्रपति शिवाजी महाराज की तरह वह बहुत ही कुशल घुड़सवार थे। घोड़े पर बैठे-बैठे भाला चलाना, बनेठी घुमाना, बंदूक चलाना उनके बाएँ हाथ का खेल था। घोड़े पर बैठकर 
बाजीराव के भाले की फेंक इतनी जबरदस्त होती थी कि सामने वालें दुश्मन को जान बचने के लाले पड़ जाते थे।

बाजीराव के समय में भारत की जनता मुगलों के साथ-साथ अंग्रेजों व पुर्तगालियों के अत्याचारों से त्रस्त हो चुकी थी। यह आक्रांता भारत के देवस्थान मंदिरों को तोड़ते, जबरन धर्म परिवर्तन करते, महिलाओं व बच्चों को मारते व उनका भयंकर शोषण करते थे। ऐसे में बाजीराव पेशवा ने उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक ऐसी विजय पताका फहराई कि चारों ओर उनके नाम का डंका बजने लगा। उनकी वीरता को देखकर लोग उन्हें शिवाजी का साक्षात अवतार मानने लगे थे। 

●बाजीराव की शौर्यगाथा :-

-सन् 1724 में शकरखेडला में बाजीराव पेशवा ने मुबारिज़खाँ को परास्त किया था।

-सन् 1724 से 1726 तक मालवा तथा कर्नाटक पर प्रभुत्व स्थापित कर लिया। 

-सन् 1728 में पालखेड़ में महाराष्ट्र के शत्रु निजामउलमुल्क को पराजित करके उससे चौथ तथा सरदेशमुखी वसूली की। 

-सन् 1728 में मालवा और बुंदेलखंड पर आक्रमण कर मुगल सेनानायक गिरधरबहादुर तथा दयाबहादुर पर विजय प्राप्त की। तदनंतर मुहम्मद खाँ बंगश को परास्त किया सन् 1729 में। 

-सन् 1731 में दभोई में त्रिंबकराव को नतमस्तक कर बाजीराव ने आंतरिक विरोध का दमन किया। सीदी, आंग्रिया तथा पुर्तगालियों एवं अंग्रेजो को भी बहुत ही बुरी तरह पराजित किया।

-बाजीराव का मुगलों की दिल्ली को जिताने का अभियान, उन्होंने सादात खां और मुगल दरबार को सबक सिखाने की सोची। उस वक्त देश में कोई भी ऐसी ताकत नहीं थी, जो सीधे दिल्ली पर आक्रमण करने का ख्वाब भी दिल में ला सके। मुगलों का और खासकर दिल्ली दरबार का ऐसा खौफ सबके सिर चढ़कर बोलता था। लेकिन बाजीराव को पता था कि ये खौफ तभी हटेगा जब दिल्ली पर खुद सीधा हमला होगा। बाजीराव ने उसी उद्देश्य से दिल्ली पर चढ़ाई कर दी। 10 दिन की दूरी बाजीराव ने केवल 500 घोड़ों के साथ 48 घंटे में बिना रुके बिना थके पूरी कर ली। देश के इतिहास में अब तक 2 राजाओं के आक्रमण ही सबसे तेज माने गए हैं- एक अकबर का फतेहपुर से गुजरात के विद्रोह को दबाने के लिए 9 दिन के अंदर वापस गुजरात जाकर हमला करना और दूसरा महान योद्धा बाजीराव का दिल्ली की मुगल सल्तनत पर हमला करना। बाजीराव ने आज जहां तालकटोरा स्टेडियम है वहां पर अपनी सेना का कैंप डाल दिया, उसके पास केवल 500 घुड़सवार सैनिक योद्धा थे। मुगल बादशाह मोहम्मद शाह रंगीला बाजीराव को लाल किले के इतना करीब देखकर घबरा गया। उसने खुद को लाल किले के अंदर सुरक्षित इलाके में कैद कर लिया और मीर हसन कोका की अगुआई में 10 हजार सैनिकों की टोली को बाजीराव से निपटने के लिए भेजा। बाजीराव के 500 लड़ाकों ने उस सेना को 28 मार्च 1737 के दिन बुरी तरह शिकस्त दी। यह दिन भारत के इतिहास का स्वर्णिम दिन था और मराठा ताकत के लिए सबसे बड़ा दिन।


-सन् 1737 तक बाजीराव की सैन्यशक्ति का चरमोत्कर्ष था। उसी वर्ष भोपाल में बाजीराव पेशवा ने फिर से निजाम को पराजय दी। अंतत: 1739 में उन्होनें नासिरजंग पर विजय प्राप्त की थी। 

बाजीराव प्रथम को एक महान घुड़सवार सेनापति के रूप में जाना जाता है और इतिहास के उन महान योद्धाओं में बाजीराव का नाम आता है जिन्होंने कभी भी अपने जीवन में एक भी युद्ध नहीं हारा, यह उनकी महानता व युद्ध कौशल को दर्शाता है। बाजीराव के रूप में भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा वीर महायोद्धा घुड़सवार सेनापति हुआ था।

अमेरिकी इतिहासकार बर्नार्ड मांटोगोमेरी के अनुसार
"बाजीराव पेशवा भारत के इतिहास का सबसे महानतम सेनापति था और पालखेड़ युद्ध में जिस तरीके से उन्होंने निजाम की विशाल सेनाओं को पराजित किया उस वक्त सिर्फ बाजीराव प्रथम ही कर सकते थे उसके अलावा भारत या भारतीय उपमहाद्वीप में यह सब करने की क्षमता किसी और से नहीं थी।"

बाजीराव प्रथम और उनके भाई चिमाजी अप्पा ने बेसिन के लोगों को पुर्तगालियों के अत्याचार से भी बचाया जो जबरन धर्म परिवर्तन करवा रहे थे और  जबरन यूरोपीय सभ्यता को भारत में लाने की कोशिश कर रहे थे। सन् 1739 में अंतिम दिनों में अपने भाई चिमाजी अप्पा को भेजकर उन्हें पुर्तगालियों को हरा दिया और वसई की संधि करवा दी थी।

जिस समय बाजीराव प्रथम को सन् 1720 में छत्रपति शाहूजी महाराज ने मराठा साम्राज्य का पेशवा नियुक्त किया था, जिसके बाद कई सारे बड़े मंत्री बाजीराव से नाराज हो गए जिसके कारण उन्होंने युवा सरदारों को अपने साथ में लाना शुरू कर दिया जिसमें मल्हारराव होलकर, राणोजीराव शिंदे आदि मुख्य रूप से शामिल थे, इन सभी ने बाजीराव के साथ मिलकर संपूर्ण भारत पर अपना प्रभाव जमाने को रात-दिन एक कर दिया था। बाजीराव प्रथम कि सबसे बड़ी जीत सन् 1728 में पालखेड की लड़ाई में हुई जिसमें उन्होंने निजाम की सेनाओं को पूर्णतया दलदली नदी के किनारे लाकर खड़ा कर दिया था, अब निजाम के पास आत्मसमर्पण के अलावा और कोई चारा नहीं बचा था, 6 मार्च 1728 को उन्होंने मुंशी शेवगाँव की संधि की थी। 

उन्होंने छत्रपति शाहूजी महाराज को मराठा साम्राज्य का वास्तविक छत्रपति घोषित कर दिया और संभाजी द्वितीय को कोल्हापुर का छत्रपति। उसके बाद बाजीराव ने कई और लड़ाई लड़ी।

सन् 1737 में जब बाजीराव दिल्ली फतह के बाद वापस पुणे की ओर लौटे, जहां पर मुगल बादशाह मोहम्मद शाह रंगीला ने साआदत अली खान और हैदराबाद के निजाम को लिखा कि आप बाजीराव को पुणे से पहले ही रोक ले, जिसके चलते निजाम व बाकी सभी की सेना का सामना बाजीराव से भोपाल के निकट हुआ। जिसमें 24 दिसंबर 1737 के दिन मराठा सेना ने सभी को जबरदस्त तरीके से हराया। निजाम ने अपनी जान बचाने के के लिए बाजीराव से संधि कर ली। इस बार 7 जनवरी 1738 को ये संधि दोराहा में हुई। मालवा, मराठों को सौंप दिया गया और मुगलों ने 50 लाख रुपए बतौर हर्जाना बाजीराव को सौंपे।

मालवा का संपूर्ण क्षेत्र अब मराठो को प्राप्त हो गया, इससे मराठों का प्रभाव संपूर्ण भारत में स्थापित हो गया। बाजीराव ने सन् 1730 मे शनिवार वाड़ा का पुणे में निर्माण करवाया और पुणे को राजधानी बनाया। बाजीराव ने ही पहली बार देश में "हिंदु पदशाही" का सिद्धांत दिया और सभी हिंदुओं को एक कर विदेशी शक्तियों के खिलाफ लड़ने का बीड़ा उठाया, हालांकि उन्होंने कभी भी किसी अन्य धर्म के मानने वाले लोगों पर कोई अत्याचार नहीं किया। 

उन्होंने सन् 1739 में अपने भाई की चिमाजी की सेनाओं के द्वारा पुर्तगालियों को बेसिन में पराजित करके वसई की संधि कर ली, जिसके तहत पुर्तगालियों के अभद्र पूर्ण व्यवहार से भारतीय जनता को बाजीराव प्रथम ने बचा लिया। बाजीराव प्रथम बहुत ही महान और काबिल हिंदू  महायोद्धा थे, संपूर्ण भारत में बाजीराव प्रथम की ताकत का जबरदस्त खौफ फैला हुआ था, यहां तक कि जयपुर के राजा जयसिंह द्वितीय भी उनकी काफी तारीफ करते थे। सन् 1731 में उन्होंने मोहम्मद खान बंगस की सेना को पराजित कर महाराजा छत्रसाल को उसे बचा लिया और वापस उनका बुंदेलखंड राज्य उनको सम्मान के साथ लौटा दिया, इसे प्रसन्न होकर उन्होंने अपनी पुत्री मस्तानी का विवाह बाजीराव से कर दिया और जब छत्रसाल की मौत हुई तो बाजीराव को बुंदेलखंड राज्य का एक तिहाई हिस्सा मराठा साम्राज्य में मिलाने के लिए दे दिया गया था।

बाजीराव पेशवा की वीरता के बारे में इतिहास तथा राजनीति के एक विद्वान् सर रिचर्ड टेंपिल ने बाजीराव की महत्ता का यथार्थ अनुमान एक वाक्य समूह में किया है। वह लिखते है कि- "

"सवार के रूप में बाजीराव को कोई भी मात नहीं दे सकता था। युद्ध में वह सदैव अग्रगामी रहता था। यदि कार्य दुस्साध्य होता तो वह सदैव अग्नि-वर्षा का सामना करने को उत्सुक रहता। वह कभी थकता न था। उसे अपने सिपाहियों के साथ दुःख-सुख उठाने में बड़ा आनंद आता था। विरोधी मुसलमानों और राजनीतिक क्षितिज पर नवोदित यूरोपीय सत्ताओं के विरुद्ध राष्ट्रीय उद्योगों में सफलता प्राप्त करने की प्रेरणा उसे हिंदुओं के विश्वास और श्रद्धा में सदैव मिलती रही। वह उस समय तक जीवित रहा जब तक अरब सागर से बंगाल की खाड़ी तक संपूर्ण भारतीय महाद्वीप पर मराठों का भय व्याप्त न हो गया। उसकी मृत्यु डेरे में हुई, जिसमें वह अपने सिपाहियों के साथ आजीवन रहा। महान योद्धा युद्धकर्ता पेशवा के रूप में तथा हिंदू शक्ति के महान अवतार के रूप में मराठे उसका हमेशा स्मरण करते रहेंगे।"

देश में जब भी होलकर, सिंधिया, पवार, शिंदे, गायकवाड़ जैसी ताकतों की बात होगी तो पता चलेगा कि वे सब पेशवा बाजीराव  प्रथम की ही देन थीं। ग्वालियर, इंदौर, पूना और बड़ौदा जैसी ताकतवर रियासतें बाजीराव के चलते ही अस्तित्व में आईं। बुंदेलखंड की रियासत बाजीराव के दम पर ही जिंदा थी।

बाजीराव का 28 अप्रैल 1740 में केवल 40 वर्ष की उम्र में इस दुनिया से चले जाना मराठा शासकों के लिए ही नहीं, बल्कि देश की बाकी पीढ़ियों के लिए भी बहुत ही दर्दनाक भविष्य लेकर आया। उनकी मृत्यु के चलते ही अगले 200 वर्ष तक भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़े रहा और उनके बाद देश में कोई भी ऐसा योद्धा नहीं हुआ, जो पूरे देश को एक सूत्र में बांधकर आजाद करवा पाता। जब भी भारत के इतिहास के महान योद्धाओं की बात होगी तो निस्संदेह महान पेशवा श्रीमंत बाजीराव प्रथम का नाम हमेशा गर्व से लिया जायेगा और वह हमेशा हम सभी भारतवासियों के आदर्श व प्रेरणास्रोत सदा बने रहेंगे। आज पुण्यतिथि पर हम सभी भारत के महावीर महान योद्धा बाजीराव प्रथम को भावपूर्ण श्रदांजलि अर्पित करते हैं।

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।

शनिवार, 25 अप्रैल 2020

अदम्य साहस व बहादुरी की प्रतीक गोरखा रेजिमेंट

अदम्य साहस व बहादुरी की प्रतीक गोरखा रेजिमेंट

हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व रचनाकार


विश्व की बेहतरीन फ़ौजों में सुमार भारतीय फ़ौज की सबसे विध्वंसक व आक्रामक बटालियन के रूप में अपनी एक अलग पहचान रखने वाली "गोरखा रेजिमेंट" की स्थापना हिमाचल प्रदेश के सुबाथू में ब्रिटिश सरकार ने 24 अप्रैल को सन् 1815 को (1/1 जीआर) गुरखा राइफल्स बटालियन के साथ की थी। इस बटालियन को अब 1/3 गोरखा राइफल्स के नाम से जाना जाता है जो आज भारतीय सेना का एक महत्वपूर्ण सैन्य-दल है। यह एक गोरखा इंफेंट्री रेजिमेंट है जिसमें 70 प्रतिशत नेपाली मूल के गोरखा सैनिक मुख्य रूप से शामिल हैं। मूल रूप से वर्ष 1815 में ब्रिटिश भारतीय सेना के हिस्से के रूप में इसका गठन किया गया था। लेकिन जिसने बाद में, प्रथम किंग जॉर्ज पंचम की खुद की गोरखा राइफल्स (मलऊन रेजिमेंट) के शीर्षक को अपना लिया गया। वर्ष 1947 में, भारत की स्वतंत्रता के बाद, इसे भारतीय सेना को हस्तांतरित कर दिया गया। सेना और 1950 में जब भारत एक गणराज्य बन गया, तो इसका नाम गोरखा राइफल्स (मलऊन रेजिमेंट) रखा गया। वर्तमान समय में यह भारतीय जवानों की ऐसी बटालियन है जिससे देश के दुश्मन इतना घबराते हैं कि वो कभी इस रेजिमेंट के सामने नहीं आना चाहते। गोरखा बटालियन को देश की सबसे खतरनाक रेजिमेंट कहा जाता है क्योंकि ये देश के किसी भी दुश्मन पर रहम नहीं करते हैं और उन्हें निर्ममता से मौत के घाट उतार देते हैं और यही वजह है कि दुश्मन इनका सामना नहीं करना चाहते हैं, इनको हमेशा दुश्मनों काल कहा जाता है।

प्राचीन इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो हिमाचल के सुबाथू में स्थित रेजिमेंट के संग्रहालय में गोरखा सेना प्रमुख अमर सिंह थापा व अन्य सभी जाब़ाज गोरखा फ़ौज की बहादुरी के किस्से सुनहरे अक्षरों से स्वयं अपना परिचय दे रहे हैं। देश की आजादी से पहले व बाद के हर युद्ध में गोरखा फ़ौज ने वीरता के साथ हिस्सा लिया है। रेजिमेंट को हर तरह के मोर्चे पर जंग लड़ने का काफी लंबा अनुभव है। और उसने आजादी से पहले कई औपनिवेशिक संघर्षों के साथ ही प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध सहित कई संघर्षों में भाग लिया। अंग्रेजों के लिए गोरखा सैनिकों ने दोनों विश्वयुद्धों में अपनी वीरता, अप्रतिम साहस और युद्ध कौशल का परिचय दिया था। प्रथम विश्व युद्ध में लगभग दो लाख गोरखा सैनिकों ने हिस्सा लिया था, जिनमें से लगभग 20 हजार सैनिकों ने रणभूमि में वीरगति प्राप्त की थी। द्वितीय विश्वयुद्ध में भी लगभग ढाई लाख गोरखा जवान सीरिया, उत्तर अफ्रीका, इटली, ग्रीस व बर्मा आदि के युद्ध मोर्चे पर भी भेजे गए थे। उस विश्वयुद्ध में 32 हजार से अधिक वीर गोरखों ने अपनी शहादत दी थी। ब्रिटिश आर्मी और भारत के अलावा कई देशों की सेनाओं में गोरखा योद्धा आज भी भारी संख्या में मौजूद हैं। 

भारत की स्वतंत्रता के बाद के समय में भी वीर गोरखा जवानों ने अपनी वीरता का परिचय जंग के मोर्चे पर बार-बार दिया है।
वर्ष 1947 के बाद से रेजिमेंट विश्व के अलग-अलग देशों में संयुक्त राष्ट्र संघ के विभिन्न शांति अभियानों का हिस्सा रही है। वर्ष 1962 का चीन से युद्ध व वर्ष 1965 और वर्ष 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध अभियानों में गोरखाओं ने जाब़ाजी के साथ भाग लिया था। पाकिस्तान और चीन के खिलाफ हुई सभी लड़ाइयों में शत्रु के सामने अपने अदम्य साहस व बहादुरी का लोहा मनवाया था। "गोरखा रेजिमेंट" को इन युद्धों में वीरता के लिए अनेक पदक व सम्मानों से अलंकृत किया गया, जिनमें महावीर चक्र और परम वीर चक्र भी शामिल हैं। वर्ष 2015 तक रेजिमेंट को 3 परम वीर चक्र, 33 महावीर चक्र, और 84 वीर चक्र से सम्मानित किया चुका गया है।


आज 205 वर्ष बाद भी देश की रक्षा में 14 गोरखा प्रशिक्षण केंद्र अपनी अहम भूमिका निभा रहा है। अंग्रेजों ने जब भारत छोड़ा तो उस समय ब्रिटेन, भारत व नेपाल सरकार के सहमति से गोरखा राइफल के कुछ सैनिक ब्रिटिश सेना में शामिल हुए और कुछ भारत में रह गए। प्रथम गोरखा राइफल और चतुर्थ गोरखा राइफल को मिलाकर 14 जीटीसी प्रशिक्षण केंद्र बना है। देश की रक्षा में अपना जीवन कुर्बान करने वाले शहीदों ने इस सेंटर का नाम हमेशा गर्व से ऊंचा किया है। गोरखा सिपाही निडरता की ट्रेनिंग के बाद अजेय विजेता योद्धा बनते हैं। इस सेंटर से हर वर्ष बेहद कठिन प्रशिक्षण के बाद सैकड़ों अनुशासित जवानों को देश की रक्षा के लिए शपथ लेने के उपरांत, देश सेवा के लिए बॉर्डर पर तैनात किया जाता है। जंग के मैदान में गोरखा फ़ौजियों का केवल एक ही लक्ष्य होता है कि दुश्मन का सफाया। इस रेजिमेंट के आदर्श वाक्य है “कायर हुनु भन्दा मर्नु राम्रो”, “शौर्य एवं निष्ठा” तथा “यत्राहम् विजयस्तत्रः।”
जिसमें “कायर हुनु भन्दा मर्नु राम्रो” का अर्थ है "कायर होने से मरना बेहतर है" जिसको सुनकर दुश्मन युद्ध के मैदान में थरथर कांप जाता है। "जय महाकाली आयो गोरखाली" के युद्धघोष के साथ हर वक्त दुश्मन व विरोधी सेना से लोहा लेने के लिए तैयार रहने वाली "गोरखा रेजिमेंट" का स्वर्णिम इतिहास हिमाचल प्रदेश के सोलन के सुबाथू से स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया। गोरखा जंग के मैदान में जब अपने नारों का जयकारा लगाते हैं, तो उसको सुनकर ही दुश्मन भय से थरथर कांप उठता है। जब वीर गोरखा सेना जंग के मैदान में उतरती है, उस वक्त उन सब वीर जाब़ाज सैनिकों का केवल एक ही लक्ष्य होता है कि हर परिस्थिति में अपने आदर्श वाक्य पर कायम रहना है, "कायर होने से मरना बेहतर है।"

भारतीय आर्मी के भूतपूर्व चीफ ऑफ स्टाफ जनरल सैम मानेकशॉ ने एक बार कहा था कि "यदि कोई कहता है कि मुझे मौत से डर नहीं लगता, वह या तो झूठ बोल रहा है या गोरखा है।"
"गोरखा रेजीमेंट" से सेना के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचे जनरल दलबीर सिंह को जून 1974 को 4/5 जीआर (एफएफ) में कमीशन दिया गया था। वर्तमान में
जनरल बिपिन रावत जो कि देश के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्‍टाफ हैं। उन्हें 16 दिसंबर, 1978 को 11 गोरखा रायफल्स की 5वीं बटालियन में कमीशन मिला था। आज "गोरखा रेजिमेंट" के स्थापना दिवस पर हम बटालियन के सभी वीरों को नमन करते हैं।

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भगवान विष्णु के छठे अवतार महावीर परशुराम की गाथा

भगवान विष्णु के छठे अवतार महावीर परशुराम की गाथा 

हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व रचनाकार

आज देश जगत के पालनहार भगवान विष्णु जी के छठे अवतार  भगवान परशुराम जी के जन्मोत्सव का पावन पर्व मना रहा है। हमारे वैदिक सनातन धर्म की धार्मिक मान्यताओं व पौराणिक वृत्तान्तों के अनुसार भृगुकुल तिलक, अजर-अमर, अविनाशी, विश्व के अष्ट चिरंजीवियों में सम्मिलित, शस्त्र व शास्त्र के महान ज्ञाता परम वीर भगवान परशुराम जी का जन्म वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया अर्थात अक्षय तृतीया के पावन दिन माता रेणुका के गर्भ से हुआ था। भगवान परशुराम जी राजा प्रसेनजित की पुत्री रेणुका और भृगुवंशीय सप्तऋषि महर्षि जमदग्नि के पाँचवें पुत्र थे। भगवान परशुराम जी के पिता महर्षि जमदग्नि वेद-शास्त्रों के महान ज्ञाता थे और वो सप्तऋषियों में से एक थे। हमारे शास्त्रों के अनुसार भगवान परशुराम अजर-अमर हैं और वह किसी समाज विशेष के आदर्श ना होकर, बल्कि वो संपूर्ण वैदिक सनातन धर्म को मानने वालें सभी हिन्दूओं के आदर्श हैं। उनको अष्ट चिरंजीवियों में से एक चिरंजीवी माना गया हैं, उनका उल्लेख हमें रामायण में माता सीता के स्वंयवर के समय भगवान श्रीराम के काल में भी मिलता है, तो उनका उल्लेख हमें महाभारत के भगवान श्रीकृष्ण के काल में भी मिलता है। उन्होंने ही भगवान श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र उपलब्ध कराया था। श्रीमद्भागवत पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण तथा कल्कि पुराण में भी भगवान परशुराम जी का उल्लेख मिलता है। धर्म के ज्ञाता कहते हैं कि वे कलिकाल के अंत में उपस्थित होंगे, ऐसी धार्मिक मान्यता है। ऐसा माना जाता है कि वे कल्प के अंत तक धरती पर ही तपस्यारत रहेंगे। पौराणिक कथा में वर्णित है कि महेंद्रगिरि पर्वत पर भगवान परशुराम जी की तपोस्थली है और वह उसी पर्वत पर कल्पांत तक के लिए तपस्यारत होने के लिए चले गए।

भगवान परशुराम जी को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। वह भगवान शिव के अनन्य परम भक्त हैं। इन्हें भगवान शिव से ही विशेष परशु प्राप्त हुआ था। जिसके चलते इनका नाम परशुराम हो गया। वैसे इनका नाम तो राम था, किन्तु शंकर के द्वारा प्रदत्त अमोघ परशु को सदैव धारण किये रहने के कारण इनका नाम परशुराम पड़ गया था। परशुराम भगवान विष्णु के दस अंशावतार में से छठे अवतार थे, जो वामन अवतार एवं राम के मध्य में आता है। सप्तऋषि महर्षि जमदग्नि के पुत्र होने के कारण इन्हें 'जामदग्न्य' भी कहा जाता हैं। भृगु कुल में उत्पन्न परशुराम जी सदैव अपने गुरुजनों तथा माता-पिता की आज्ञा का पालन हर हाल में करते थे। भगवान परशुराम के कथनानुसार राजा का कर्तव्य होता है वैदिक सनातन धर्म के अनुसार राजधर्म का पालन करते हुए प्रजा के हित में कार्य करे, न कि प्रजा से अपनी आज्ञा का पालन करवाए और राजा उसके अधिकारों पर अंकुश लगाए।

*धरती को पाप से मुक्त करने के लिए अवतार :-*
 
जब परशुराम का धरती पर जन्म हुआ तब उस समय दुष्ट व राक्षसी प्रवृत्ति के बहुत सारे राजाओं का पृथ्वी पर बोलबाला था। उन्हीं में से एक राजा ने उनके पिता महर्षि जमदग्नि को मार दिया था। इससे परशुराम बहुत कुपित हुए और उन्होंने उस दुष्ट राजा का वध किया। उन्होंने राक्षसी प्रवृत्ति के सभी राजाओं का वध करके पृथ्वीवासियों को भयमुक्त किया था। कुछ कथाओं के आनुसार परशुराम ने पृथ्वी पर क्षत्रियों का अनेक बार विनाश किया। उस समय के क्षत्रियों के अहंकारपूर्ण दमन से व पापियों से विश्व को मुक्ति दिलाने के लिए ही भगवान परशुराम का जन्म हुआ था।

*भगवान परशुराम जन्म कथा :-*
 
भृगु ने अपने पुत्र के विवाह के विषय में जाना तो बहुत प्रसन्न हुए तथा अपनी पुत्रवधू से वर माँगने को कहा। उनकी पुत्रवधू सत्यवती ने अपने तथा अपनी माता के लिए पुत्र की कामना की। भृगु ने उन दोनों को 'चरु' भक्षणार्थ दिये तथा कहा कि ऋतुकाल के उपरान्त स्नान करके सत्यवती गूलर के पेड़ तथा उसकी माता पीपल के पेड़ का आलिंगन करे तो दोनों को पुत्र प्राप्त होंगे। माँ-बेटी के चरु खाने में उलट-फेर हो गयी। दिव्य दृष्टि से देखकर भृगु ऋषि पुनः वहाँ पधारे तथा उन्होंन सत्यवती से कहा कि तुम्हारी माता का पुत्र क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मणोचित व्यवहार करेगा तथा तुम्हारा बेटा ब्राह्मणोचित होकर भी क्षत्रियोचित आचार-विचार करने वाला होगा। सत्यवती के बहुत अनुनय-विनय करने पर भृगु ने मान लिया कि सत्यवती का बेटा ब्राह्मणोचित रहेगा, किंतु पोता क्षत्रियों की तरह कार्य करने वाला होगा। सत्यवती के पुत्र जमदग्नि मुनि हुए। उन्होंने राजा प्रसेनजित की पुत्री रेणुका से विवाह किया। रेणुका के पाँच पुत्र हुए, जो क्रमशः रुमण्वान, सुषेण, वसु, विश्वावसु तथा पाँचवें पुत्र का नाम परशुराम था और वही क्षत्रियोचित आचार-विचार वाला पुत्र था। 

*परशुराम की गाथाएं :-*

 भगवान परशुराम की शिक्षा महर्षि विश्वामित्र एवं ऋचीक के आश्रम में प्राप्त होने के साथ ही महर्षि ऋचीक से सारंग नामक दिव्य वैष्णव धनुष और ब्रह्मर्षि कश्यप से विधिवत अविनाशी वैष्णव मन्त्र प्राप्त हुआ। तदनन्तर कैलाश गिरिश्रृंग पर स्थित भगवान शंकर के आश्रम में विद्या प्राप्त कर विशिष्ट दिव्यास्त्र विद्युदभि नामक परशु प्राप्त किया। शिवजी से उन्हें श्रीकृष्ण का त्रैलोक्य विजय कवच, स्तवराज स्तोत्र एवं मन्त्र कल्पतरु भी प्राप्त हुए। चक्रतीर्थ में किये कठिन तप से प्रसन्न हो भगवान विष्णु ने उन्हें त्रेता में रामावतार होने पर तेजोहरण के उपरान्त कल्पान्त पर्यन्त तपस्यारत भूलोक पर रहने का वर दिया ।

- परशुराम गुरुजनों, माता-पिता की आज्ञा का पालन हर हाल में करते थे। एकबार जमदग्नि मुनि ने क्रोध के आवेश में बारी-बारी से अपने चारों बेटों को माँ रेणुका की हत्या करने का आदेश दिया। किंतु कोई भी तैयार नहीं हुआ। जमदग्नि ने अपने चारों पुत्रों को जड़बुद्ध होने का शाप दिया। फिर उन्होंने परशुराम को आदेश दिया कि वो अपनी माँ की हत्या करें। आज्ञाकारी परशुराम ने तुरन्त पिता की आज्ञा का पालन किया। जमदग्नि ऋषि ने प्रसन्न होकर परशुराम से वर माँगने के लिए कहा। परशुराम ने सबसे पहले वर से माँ का पुनर्जीवन माँगा और फिर अपने भाईयों को क्षमा कर देने के लिए कहा। जमदग्नि ऋषि ने परशुराम को आशीर्वाद देते हुए  कहा कि वो सदा अजर-अमर रहेगा।

- एक दूसरी कथा के अनुसार ऋषि वशिष्ठ से शाप का भाजन बनने के कारण सहस्त्रार्जुन की मति मारी गई थी। तब सहस्त्रार्जुन ने परशुराम के पिता महर्षि जमदग्नि के आश्रम में एक कपिला कामधेनु गाय को देखा और उसे पाने की लालसा से वह कामधेनु को बलपूर्वक आश्रम से ले गया। जब परशुराम को यह बात पता चली तो उन्होंने पिता के सम्मान के खातिर कामधेनु वापस लाने की सोची और सहस्त्रार्जुन से उन्होंने युद्ध किया। इस युद्ध में उन्होंने सहस्त्रार्जुन की भुजाएं और मस्तक काट दिया था।
 
- ऐसा भी कहा जाता है कि उस काल में हैहयवंशीय क्षत्रिय राजाओं का अत्याचार था। भार्गव और हैहयवंशियों की पुरानी दुश्मनी चली आ रही थी। हैहयवंशियों का राजा सहस्रबाहु अर्जुन भार्गव आश्रमों के ऋषियों को सताया करता था। एक समय सहस्रबाहु के पुत्रों ने जमदग्नि ऋषि के आश्रम की कामधेनु गाय को लेने तथा परशुराम से बदला लेने की भावना से परशुराम के पिता का वध कर दिया। जब परशुराम घर पहुँचे तो बहुत दुखी हुए और क्रोधवश उन्होंने हैहयवंशीय क्षत्रियों की वंश-बेल का विनाश करने की कसम खाई। 
 पिता के वियोग में भगवान परशुराम की माता चिता पर सती हो गयीं। पिता के शरीर पर 21 घाव को देखकर भगवान परशुराम ने प्रतिज्ञा ली कि वह इस धरती से समस्त क्षत्रिय वंशों का संहार कर देंगे। इसके बाद पूरे 21 बार उन्होंने पृथ्वी से क्षत्रियों का विनाश कर अपनी प्रतिज्ञा पूरी की। इसी कसम के तहत उन्होंने इस वंश के लोगों से बार-बार युद्ध कर उनका 21बार समूल नाश कर दिया था। तभी से शायद यह भ्रम फैल गया कि भगवान परशुराम ने धरती पर से क्षत्रियों का समूल नाश कर दिया था, लेकिन धर्म के ज्ञाता कहते है कि परशुराम ने महिलाओं का वध नहीं किया था जिससे बाद में वंश चलता रहा। उन्होंने संमत पंचक क्षेत्र (कुरुक्षेत्र) में क्षत्रियों के रुधिर से पाँच कुंड भर दिये थे। रुधिर से परशुराम ने अपने पितरों का तर्पण किया। उस समय ऋचीक ऋषि साक्षात प्रकट हुए तथा उन्होंने परशुराम को ऐसा कार्य करने से रोका। ऋत्विजों को दक्षिणा में समस्त पृथ्वी प्रदान की। ब्राह्मणों ने कश्यप की आज्ञा से उस वेदी को खंड-खंड करके बाँट लिया, अतः वे ब्राह्मण जिन्होंने वेदी को परस्पर बाँट लिया था, खांडवायन कहलाये।


-भगवान गणेश और परशुराम के बीच युद्ध- ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार एक बार भगवान परशुराम अपने इष्ट भगवान शंकर के दर्शन के लिए कैलाश पर्वत पर गए। वहां भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान थे और वह माता पार्वती को राम-कथा सुना रहे थे। कथा में बाधा उत्पन्न न हो इसके लिए उन्होंने अपना दिव्य त्रिशूल गणेश जी को प्रदान कर दरवाजे पर यह कहकर खड़ा कर दिया था कि किसी को भी वहां न आने दे।

लेकिन जब भगवान परशुराम  कैलाश पहुंचकर सीधे भगवान शंकर के दर्शन के लिए कैलाश के द्वार में प्रवेश करने लगे। तो द्वार पर नंदी, शृंग आदि शिवगणों से उनकी भेंट हुई। भगवान परशुराम ने उनसे भगवान शिव के बारे में पूछा कि इस समय वे कहां हैं? इस पर नंदी ने कहा कि इस बात की उन्हें कोई जानकारी नहीं है कि भगवान शिव कहां हैं। इस पर भगवान परशुराम ने नंदी आदि शिवगणों पर गुस्सा करते हुए कहा कि तुम्हें यह भी नहीं पता कि तुम्हारे आराध्य देव कहां हैं। ऐसे में तुम शिवगण कहलाने के लायक ही नहीं हो।

परशुराम जी ने शिवगणों पर क्रोध किया और खुद भगवान शिव को ढूंढने कैलाश में प्रवेश कर गए। बहुत ढूंढने के बाद भी उन्हें भगवान शंकर कहीं नहीं मिले। अंत में एक घर दिखाई दिया, जहां द्वार पर एक बालक पहरा दे रहा था। भगवान परशुराम उस बालक के पास पहुंचे और वहीं से द्वार में प्रवेश करने लगे। तब भगवान गणेश जी ने उन्हें वहीं रोक दिया। इस पर परशुराम जी ने कहा तुम कौन हो जो मुझे इस तरह यहां रोकने का प्रयास कर रहे हो? इस पर गणेश जी ने कहा आप कौन हैं जो इस तरह अंतःपुर में बिना अनुमति के प्रवेश कर रहे हैं।

इतने में नंदी आदि शिवगण वहां आए और भगवान परशुराम को बताया यह गजमुख वाला बच्चा माता पार्वती के पुत्र गणेश जी हैं। साथ ही गणेश जी से कहा कि ये परशुधारी भगवान शिव के अनन्य भक्त परशुराम हैं। भगवान परशुराम ने कहा कि ये विचित्र बालक, जिसका मुंह गज का है और बाकी का शरीर इंसान का, कैसे माता पार्वती का पुत्र हो सकता है। तभी गणेश जी ने भगवान परशुराम का उपहास करते हुए कहा कि आप देखने में तो ब्राह्मण लगते हैं, लेकिन आपके हाथों में कमंडल की जगह यह परशु क्यों है? इस पर दोनों में बहस होती रही।

इसके बाद परशुराम भगवान शिव से मिलने के लिए उनके निवास स्थान पर अंदर जाने लगे। इतने में गणेश जी ने शिव जी द्वारा दिए गए त्रिशूल को परशुराम के सामने कर उन्हें युद्ध के लिए सावधान किया। उधर परशुराम जी ने भी अपना परशु तान कर चुनौती स्वीकार की। फिर दोनों के बीच भयंकर युद्ध शुरू हो गया। इस युद्ध में परशुराम जी के फरसे द्वारा गणेश जी का एक दांत काट गया जिसके चलते उनका नाम एकदंत भी पड़ा।

- परशुराम भीष्म युद्ध-
भगवान परशुराम वह शूरवीर थे, जिन्होंने एक स्त्री के अनुरोध पर स्त्री की रक्षा के लिए भीष्म के साथ इसलिए युद्ध किया था ताकि भीष्म खुद अपने द्वारा अपहरण करके लाई गई अम्बा (अम्बा, अम्बिका, अम्बालिका वाली अम्बा) के साथ विवाह करें, पर वे भीष्म को आजीवन विवाह न करने की प्रतिज्ञा के चलते उन्हें डिगा नहीं सके। 

भगवान परशुराम जी शस्त्रविद्या के महान गुरु थे। उन्होंने भीष्म, द्रोण व कर्ण को शस्त्रविद्या प्रदान की थी। उन्होंने एकादश छन्दयुक्त "शिव पंचत्वारिंशनाम स्तोत्र" भी लिखा। इच्छित फल-प्रदाता परशुराम गायत्री है-"ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि, तन्नोपरशुराम: प्रचोदयात्।" वे पुरुषों के लिये आजीवन एक पत्नीव्रत के पक्षधर थे। उन्होंने ऋषि अत्रि की पत्नी अनसूया, ऋषि अगस्त्य की पत्नी लोपामुद्रा व अपने प्रिय शिष्य अकृतवण के सहयोग से विराट नारी-जागृति-अभियान का संचालन भी किया था। अवशेष कार्यो में कल्कि अवतार होने पर उनका गुरुपद ग्रहण कर उन्हें शस्त्रविद्या प्रदान करना भी बताया गया है। यह भी कहा जाता है कि भारत के अधिकांश ग्राम उन्हीं के द्वारा बसाये गये। जिस मे कोंकण, गोवा एवं केरल का समावेश है। एक पौराणिक कथा के अनुसार जब उन्होंने पृथ्वी कश्यप ऋषि को दान कर दी थी तो भगवान परशुराम ने तीर चला कर गुजरात से लेकर केरल तक समुद्र को पीछे धकेल दिया था, और अपनी तपस्या के लिए नई भूमि का निर्माण किया। इसी कारण से कोंकण, गोवा और केरल में भगवान परशुराम बहुत अधिक वंदनीय हैं। वो ब्राह्मण के रूप में जन्में अवश्य थे, लेकिन वह अपने कर्म से एक महान क्षत्रिय योद्धा थे। भगवान परशुराम जी एक ऐसे सच्चे शूरवीर थे, जिनका जन्म पृथ्वी पर धर्म, संस्कृति, न्याय, सदाचार व सत्य की रक्षा करने के लिए हुआ था। आज जन्मोत्सव उन्हें हम सभी कोटि-कोटि नमन करते हैं। 

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

मार्मिक कहानी आपदा और मध्यमवर्गीय परिवार का दर्द

मार्मिक कहानी

आपदा और मध्यमवर्गीय परिवार का दर्द

देश में आपदा के हालात चल रहे है, इस स्थिति में लोग ना जाने कैसे-कैसे अपने व अपने परिवार का पेट भर रहे है, उस स्थिति पर  एक बहुत ही मार्मिक कहानी प्रस्तुत है।
राजू - नमस्कार जी क्या आप आपदा कंट्रोल रूम से बोल रहे हैं। 
ऑफिसर - हां जी बोलिए आपदा कंट्रोल रूम से ही बोल रहे है।
राजू - लड़खड़ाती जुबान से, साहब हमारे घर के पास झुग्गियों में कुछ बेहद लाचार मजबूर किस्मत के मारें मजदूर लोग रहते है, जो की अपना राशन खत्म होने के कारण कई दिनों से भूख से तड़प रहे है, साहब इन बेचारों की तुरंत मदद करवा दो, उनकी जान बचा लो साहब। 
ऑफिसर - हड़काते हुए, उन लोगों ने मदद मांगने के लिए फोन क्यों नहीं किया और तुम क्यों कर रहे हो।
राजू - साहब कृपया गुस्सा नहीं हो वो बेचारे भूख से बहुत परेशान है वो बात करने की स्थिति में नहीं है।
ऑफिसर - ठीक है एड्रेस बताओं कहा मदद पहुंचवानी है और वो कितने लोग है।
राजू - जी साहब लिखों मकान नबंर 1008 सेक्टर 27 सिटी सेंटर और यहाँ 2 बच्चे व 4 बड़े लोग हैं।
ऑफिसर - क्या तेरा दिमाग खराब हो गया है, अभी तो झुग्गी बता रहा था और अब मकान का पता लिखवा रहा है, वैसे भी इस सेक्टर में तो सब पैसे वाली पार्टी रहती है।
राजू - जी साहब दिमाग भी खराब है और समय भी व किस्मत भी आजकल खराब चल रही है, आप सब कुछ ठीक कह रहे है कि इस सेक्टर में सब पैसे वाले लोग रहते है, लेकिन साहब झुग्गी का कोई नंबर तो होता नहीं और अगर आपकी टीम झुग्गी ढूंढने में इधर-उधर भटकती रही और उनको मदद देर से पहुंची तो उन मुसीबत के मारे दुखियारों पर भूख के चलते पहाड़ टूट सकता है साहब, उनकी जान जा सकती है, इसलिए मैंने अपने घर का पता लिखवा दिया है साहब।
ऑफिसर - अच्छा तुम्हारी बातों से लगता है कि उन लोगों की बहुत गंभीर स्थिति है तो चलो ठीक है हम तुरंत मदद भिजवा रहे है, लेकिन तुमको जरा भी इंसान व इंसानियत की फिक्र नहीं है, एक टाइम रोटी बनवाकर तुम भी उन बेचारों को खिलवा सकते थे तुम्हारा कुछ बिगड़ नहीं जाता, खैर मैं तुरंत मदद करने वाली जिला राहत टीम को आपके पास भेज रहा हूँ वो आधे घंटे में तुम्हारे पास उन लोगों के लिए खाना व एक माह का राशन लेकर पहुंच रहे हैं। 
राजू - बहुत-बहुत धन्यवाद साहब मैं आपका हमेशा बहुत एहसानमंद रहूंगा, वो मजबूर व लाचर भूखे लोग आपको हमेशा दिल से दुआ देंगे साहब।
ऑफिसर - ठीक है मैने टीम के वरिष्ठ अधिकारी विजय की ड्यूटी लगा दी इस काम के लिए वो खाना व राशन लेकर निकलने वाला है, तुम उनका इंतजार करना। इतने इन लोगों ढ़ाढस बनाकर रखना।
राजू - जी साहब मैं उनके इंतजार में बैठा हूँ और आप चिंता ना करें मैं पिछले कई दिनों से इन लोगों का ढ़ाढस बनाकर रख रहा हूँ।

लगभग आधें घंटे बाद राजू के मोबाइल की घंटी बजती है, मैं जिला राहत टीम से विजय बोल रहा हूँ, घर के बाहर आ जाओं।
राजू - जी साहब में अभी आया, वह घर से बाहर निकला तो उसने देखा एक जीप में दो लोग उसका खाना व सामान लेकर इंतजार कर रहे हैं, वो उनके पास घबराते हुए पहुंचा और बोला साहब नमस्कार में राजू हूँ।
विजय - ठीक है बताओं वो कौन सी झुग्गी है जिनके लोगों को खाना व राशन की मदद करनी है।
राजू - जी आप क्यों परेशान होते हैं, आप खाना व सामना मुझे दे दो, मैं उनकी झुग्गी पर अभी खुद ही पहुंचा दुंगा।
विजय - नहीं मैं खुद देकर आऊंगा मेरे साहब का आदेश है कि उन बेचारे मुसीबत के मारे लोगों से मिलकर जरूर आना और उनकी कोई जरूरत हो उसको पूछ कर आना, तुम मुझको जल्दी उनसे मिलवाओं जिससे में समय से अपना काम करके, किसी दूसरे व्यक्ति की मदद करने जाऊं।
राजू - पसीने से तरबतर होकर घबराते हुए बोला जी ठीक है जैसा आपका आदेश चलों।

और वो विजय को अपने छोटे से अव्यवस्थित घर के अंदर ले जाने लगा।

विजय - बेहद गुस्से में आकर उससे बोला, तुम आपदा के समय में मेरा टाईम खराब नहीं करो और जरूरतमंदों की भी हमको सहायता करनी है। जल्दी से उन झुग्गियों पर ले चलों।
राजू - उससे नजरें छिपा कर बोला साहब मैं आपका टाईम खराब नहीं कर रहा बल्कि आपको जरूरतमंद लोगों के पास ही ले जा रहा था।
विजय - मैं तुमको अभी जेल भिजवाता हूँ, तुमने इस भयंकर आपदाकाल में झूठ बोलकर हमारा टाईम खराब किया, तुम इस समय इंसान व इंसानियत के दुश्मन हो, जिस घर में तुम चलने के लिए बोल रहे हो, उस घर के लोगों को मदद की आवश्यकता बिल्कुल नहीं हो सकती, इस बात का घर व गाड़ी देखकर कोई भी अंदाजा लगा सकता है। मैं फोन करके अभी पुलिस को बुलाता हूँ और तुमको गिरफ्तार करवाकर जेल भिजवाता हूँ।

और विजय गुस्से से लाल होकर अपने मोबाइल से कोई नंबर मिलाने लगता है, राजू ने उसकी मानमनौव्वल करके उसको जैसे तैसे रोका तो वो बेहद गुस्से में होकर वापस अपनी गाड़ी की तरफ जाने लगा।

राजू - उससे रोकते हुए बोला साहब भगवान के लिए वो खाना और राशन तो दे जाते आपका बहुत एहसान होगा, हम लोगों की जान बच जायेगी। मुझे और मेरे घर वालों को खाने व राशन की बहुत ज्यादा आवश्यकता है साहब।
विजय - क्यों झूठ बोल रहे हो, तुमको भीख मांगते हुए व जरूरतमंद लोगों का अधिकार मारते हुए शर्म नहीं आती, तुम्हें व तुम्हारे घर के लोगों को मदद की क्या जरूरत वो तो स्वयं सक्षम है। तुम लोग क्यों लाचार, मजबूर व गरीबों का हक मारना चाहते हो, ईश्वर से ड़रों और भयावह आपदा के काल में इतना बड़ा अपराध नहीं करो और वैसे भी तुमने मदद झूठ बोलकर किसी अन्य व्यक्ति के लिए मंगवाई है।
राजू - साहब कुछ तो रहम करों मुझ पर और मेरे परिवार पर, हम लोग सक्षम नहीं है आप एकबार घर के अंदर जाकर देखों तो सही, हमको मदद की बहुत ज्यादा आवश्यकता है साहब।
विजय - अगर तुम्हारी बात झूठ निकली तो मैं तुम्हें अब जेल भिजवाकर ही दम लुंगा। ठीक है चलों तुम्हारे घर के अंदर चलकर देखते हैं।
राजू - घबराते हुए मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना करते हुए, लड़खड़ाते हुए विजय को अपने घर के अंदर ले जाने लगता है।
विजय - घर के अंदर की हालात देखकर विजय के पैरों तले की जमीन खिसक जाती है, वहां की हालत देखकर उसकी आँखें फटी रह जाती है, वहां पर भूख से बिलखते 12 व 15 साल के दो बच्चे व राजू के 65 साल के बुजुर्ग  माता-पिता व उसकी 40 वर्षीय पत्नी मौजूद होती है, जिनकी स्थिति बेहद दयनीय व खराब होती है, यह देखकर विजय कुछ नहीं बोलपाता है वो तुरंत ही उन लोगों की जांच के लिए चिकित्सक को बुलाने के लिए फोन करता है और साथ आये आदमी से गाड़ी से खाना व राशन घर के अंदर रखने के लिए बोलता है।
राजू - यह सब देखकर उसकी आँखों से अश्रु की धारा फूट पड़ती है और वह कहता है साहब आज आपने मेरे परिवार की जान बचाकर मुझको अपना हमेशा के लिए ऋणी बना लिया, साहब एक हफ्ते से मेरा परिवार भूखा है और मुझको कोई मदद नहीं मिल पा रही थी, इसलिए साहब आज मैंने परिवार की जान बचाने की खातिर झुग्गियों का नाम लेकर झूठ बोलकर राहत सामग्री मंगवाई थी, साहब मैं आपका जीवन भर एहसानमंद रहुंगा। 

ऐसा बोलकर राजू जमीन पर बैठकर फूट-फूट कर रोने लगा,

विजय - उसका धीरज बांधते हुए उसको चुप करवाता है और फिर राजू से कहता है जब तक डॉक्टर साहब आते है तब तक जरा मुझे अपने वारें में विस्तार से बताओं और यह घर और गाड़ी तो तुम्हारी ही है ना।
राजू - हाँ जी साहब यह घर भी मेरा है यह गाड़ी भी मेरी है, अभी 1 साल पूर्व अपनी व माता-पिता की ताउम्र की कमाई व बैंक से लोन लेकर दोनों खरीदे थे। लेकिन साहब यह पता नहीं था कि लोन लेने के एक साल बाद ही आपदा के चक्कर में एकाएक मेरी नौकरी चली जायेगी और हमारी दर-दर की ठोकर खाने वाली स्थिति हो जायेगी। क्योंकि साहब हमारी कमाई तो बैंक के लोन पटाने में व बच्चों की पढाई में ही खत्म हो जाती है। घर का खर्चा पिताजी की पेंशन से बड़ी ही मुश्किल से चल पाता है साहब। किसी तरह की कोई भी बचत हमारे पास हो नहीं पाती साहब, हम मध्यवर्गीय तो आज के व्यवसायिक दिखावे वाले दौर में केवल कर्ज चुकाने के लिए जिंदा है साहब।
विजय - लेकिन तुम अपने पड़ोसियों, परिचितों, रिश्तेदारों व यार दोस्तों से तो मदद मांग सकते थे।
राजू - आप ठीक कह रहे है साहब, मैंने मदद लेने के लिए बहुत प्रयास किये, लेकिन हर कोई मदद की बात को मजाक मानकर डाल देता था, यह उधार की गाड़ी व मकान आज मेरी व मेरे परिवार की जान का दुश्मन बन गया है साहब, इसके चलते कोई भी मेरी मदद करने के लिए तैयार नहीं है। कई बार मदद के लिए आपदा कंट्रोल रूम भी फोन किया लेकिन उन्होंने भी परिचय सुनते ही मुझको बार-बार झिड़क दिया और दुत्कारते हुए कहा कि तुम गरीबों का हक मारना चाहते हो। मैं खुद कई बार सामाजिक संगठनों के द्वारा बट़ने वाला भोजन व राशन भी लेने गया साहब, लेकिन वहां पर वो लोग मदद करते समय फोटो खींच रहे थे इसलिए शर्म व बच्चों के भविष्य के बारें में सोचकर मैं बार-बार वहां से वापस आ जाता था।

राजू की बेहद खराब वित्तीय स्थिति समझने के बाद विजय की आँखों में आंसू आ जाते है, वह निशब्द हो जाता है, वह सोचता है कि एक मध्यवर्गीय परिवार भी इतने गंभीर आर्थिक संकट में हो सकता आज उसकी समझ में आ गया और उसने इतने ही घर के गेट पर डॉक्टर की गाड़ी आकर रुकता देख उनको अंदर बुलाया, विजय डॉक्टर को घर के अंदर उपस्थित लोगों की स्थिति से अवगत कराता है, डॉक्टर व उसकी टीम उन सभी का चैकअप करती है और डॉक्टर विजय से कहता है भगवान का लाख-लाख शुक्र है जो आपने मुझे बुला लिया भूख के चलते इन लोगों की हालत बहुत खराब है अगर इनको आज समय पर भोजन व चिकित्सा नहीं मिलती तो इनकी जान किसी भी समय जा सकती थी, अब मैंने इनकों एक हफ्ते की दवाई व विटामिन की गोलियां दे दी है अपना मोबाइल नबंर भी दे दिया है अगर कोई दिक्कत होगी तो ये मुझको फोन करके बुला लेंगे वैसे एक हफ्ते बाद में स्वयं इनकों देखने आ जाऊंगा, मैंने इनको थोड़ा-थोड़ा खाना खिलाकर अभी की दवाइयां खिला दी है और बाकी कैसे खानी वो समझा दी है, सुबह तक यह लोग अपने आपको काफी ठीक महसूस करने लगेंगे और डॉक्टर फिर वहां से चला जाता है।
विजय - राजू की तरफ रुख करके उसको अपना पर्सनल नबंर देता है और उससे बोलता है कि तुमने मेरी आँखें खोल दी, शासन-प्रशासन व जिला राहत टीम ने यह कभी भी नहीं सोचा था कि एक मध्यवर्गीय परिवार पर भी आपदा के कारण इतनी भयंकर मार पड़ सकती है, मैं अभी ऑफिस जाकर अपने सीनियरों को स्थिति से अवगत करवाऊंगा और भविष्य में मध्यमवर्गीय परिवारों की मदद का भी प्रावधान करवाऊंगा।
राजू - एकबार फिर साहब आज आपने मेरी व मेरे परिवार की जान बचा ली, मैं जिंदगी में कभी आपके इस ऋण को चुका नहीं पाऊंगा। बस साहब मेरा भी आपसे एक यही निवेदन है कि सरकार को अब मध्यवर्गीय परिवारों पर मदद के लिए भी अपना ध्यान केन्द्रित करना चाहिए , क्योंकि उनकी मदद लेते समय फोटो ना खिचवाने पाने की मजबूरी व लाचारी अब उनके जीवन पर बहुत भारी पड़ सकती है, इसलिए सरकार को उनका ध्यान रखना चाहिए।
विजय - बिल्कुल तुमने हमारी आँखें खोल दी है और अब हम मध्यमवर्गीय परिवारों के सहयोग के लिए भी हर संभव प्रयास करेंगे, वो अपनी जेब में रखे 5 हजार रूपये राजू के बहुत इंकार करने के बाद भी उसको अधिकार के साथ जबरन देते हुए बोला सब का ध्यान रखना कोई दिक्कत हो तो मुझको फोन करना अच्छा अब मैं चलता हूँ और वह घर से निकल कर गाड़ी में बैठकर आँखों में आंसू लिए अपने ऑफिस की तरफ यह सोचता हुआ चल दिया कि धनवान लोगों के पास दौलत की कोई कमी नहीं वह आपदा में भी साधन इकट्ठा करके जीवन जी लेंगे, गरीब की मदद सरकार व समाजसेवी और धनवान लोग करते है वह उस मदद के सहारे जीवन जी लेता है, लेकिन एक मध्यवर्गीय परिवार के पास ना तो दौलत है ना वो गरीब है जो कोई उसकी मदद करें तो वो आपदा के वक्त में कैसे अपना और अपने परिवार का गुजारा करेगा। जरा आप सभी लोग भी सोचों और विचार करों और सरकारी तंत्र को भी समय रहते इस तरह के हालात बनने से पहले ही मध्यमवर्गीय परिवारों की इस समस्या का समाधान करना चाहिए। हमारे देश के सिस्टम को ध्यान रखना चाहिए कि मजबूरी, लाचारी किसी भी वक्त किसी भी व्यक्ति के सामने आ सकती है, इसलिए हमेशा मानवीय मूल्यों व संवेदनाओं के आधार पर भी मदद का प्रावधान करना चाहिए।

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।

*लेखक*
 दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व रचनाकार

*24 अप्रैल "गोरखा रेजिमेंट" के स्थापना दिवस पर* विशेषअदम्य साहस व बहादुरी की प्रतीक गोरखा रेजिमेंटहस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागीस्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व रचनाकार

24 अप्रैल "गोरखा रेजिमेंट" के स्थापना दिवस पर विशेष

अदम्य साहस व बहादुरी की प्रतीक गोरखा रेजिमेंट

हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व रचनाकार


विश्व की बेहतरीन फ़ौजों में सुमार भारतीय फ़ौज की सबसे विध्वंसक व आक्रामक बटालियन के रूप में अपनी एक अलग पहचान रखने वाली "गोरखा रेजिमेंट" की स्थापना हिमाचल प्रदेश के सुबाथू में ब्रिटिश सरकार ने 24 अप्रैल को सन् 1815 को (1/1 जीआर) गुरखा राइफल्स बटालियन के साथ की थी। इस बटालियन को अब 1/3 गोरखा राइफल्स के नाम से जाना जाता है जो आज भारतीय सेना का एक महत्वपूर्ण सैन्य-दल है। यह एक गोरखा इंफेंट्री रेजिमेंट है जिसमें 70 प्रतिशत नेपाली मूल के गोरखा सैनिक मुख्य रूप से शामिल हैं। मूल रूप से वर्ष 1815 में ब्रिटिश भारतीय सेना के हिस्से के रूप में इसका गठन किया गया था। लेकिन जिसने बाद में, प्रथम किंग जॉर्ज पंचम की खुद की गोरखा राइफल्स (मलऊन रेजिमेंट) के शीर्षक को अपना लिया गया। वर्ष 1947 में, भारत की स्वतंत्रता के बाद, इसे भारतीय सेना को हस्तांतरित कर दिया गया। सेना और 1950 में जब भारत एक गणराज्य बन गया, तो इसका नाम गोरखा राइफल्स (मलऊन रेजिमेंट) रखा गया। वर्तमान समय में यह भारतीय जवानों की ऐसी बटालियन है जिससे देश के दुश्मन इतना घबराते हैं कि वो कभी इस रेजिमेंट के सामने नहीं आना चाहते। गोरखा बटालियन को देश की सबसे खतरनाक रेजिमेंट कहा जाता है क्योंकि ये देश के किसी भी दुश्मन पर रहम नहीं करते हैं और उन्हें निर्ममता से मौत के घाट उतार देते हैं और यही वजह है कि दुश्मन इनका सामना नहीं करना चाहते हैं, इनको हमेशा दुश्मनों काल कहा जाता है।

प्राचीन इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो हिमाचल के सुबाथू में स्थित रेजिमेंट के संग्रहालय में गोरखा सेना प्रमुख अमर सिंह थापा व अन्य सभी जाब़ाज गोरखा फ़ौज की बहादुरी के किस्से सुनहरे अक्षरों से स्वयं अपना परिचय दे रहे हैं। देश की आजादी से पहले व बाद के हर युद्ध में गोरखा फ़ौज ने वीरता के साथ हिस्सा लिया है। रेजिमेंट को हर तरह के मोर्चे पर जंग लड़ने का काफी लंबा अनुभव है। और उसने आजादी से पहले कई औपनिवेशिक संघर्षों के साथ ही प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध सहित कई संघर्षों में भाग लिया। अंग्रेजों के लिए गोरखा सैनिकों ने दोनों विश्वयुद्धों में अपनी वीरता, अप्रतिम साहस और युद्ध कौशल का परिचय दिया था। प्रथम विश्व युद्ध में लगभग दो लाख गोरखा सैनिकों ने हिस्सा लिया था, जिनमें से लगभग 20 हजार सैनिकों ने रणभूमि में वीरगति प्राप्त की थी। द्वितीय विश्वयुद्ध में भी लगभग ढाई लाख गोरखा जवान सीरिया, उत्तर अफ्रीका, इटली, ग्रीस व बर्मा आदि के युद्ध मोर्चे पर भी भेजे गए थे। उस विश्वयुद्ध में 32 हजार से अधिक वीर गोरखों ने अपनी शहादत दी थी। ब्रिटिश आर्मी और भारत के अलावा कई देशों की सेनाओं में गोरखा योद्धा आज भी भारी संख्या में मौजूद हैं। 

भारत की स्वतंत्रता के बाद के समय में भी वीर गोरखा जवानों ने अपनी वीरता का परिचय जंग के मोर्चे पर बार-बार दिया है।
वर्ष 1947 के बाद से रेजिमेंट विश्व के अलग-अलग देशों में संयुक्त राष्ट्र संघ के विभिन्न शांति अभियानों का हिस्सा रही है। वर्ष 1962 का चीन से युद्ध व वर्ष 1965 और वर्ष 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध अभियानों में गोरखाओं ने जाब़ाजी के साथ भाग लिया था। पाकिस्तान और चीन के खिलाफ हुई सभी लड़ाइयों में शत्रु के सामने अपने अदम्य साहस व बहादुरी का लोहा मनवाया था। "गोरखा रेजिमेंट" को इन युद्धों में वीरता के लिए अनेक पदक व सम्मानों से अलंकृत किया गया, जिनमें महावीर चक्र और परम वीर चक्र भी शामिल हैं। वर्ष 2015 तक रेजिमेंट को 3 परम वीर चक्र, 33 महावीर चक्र, और 84 वीर चक्र से सम्मानित किया चुका गया है।


आज 205 वर्ष बाद भी देश की रक्षा में 14 गोरखा प्रशिक्षण केंद्र अपनी अहम भूमिका निभा रहा है। अंग्रेजों ने जब भारत छोड़ा तो उस समय ब्रिटेन, भारत व नेपाल सरकार के सहमति से गोरखा राइफल के कुछ सैनिक ब्रिटिश सेना में शामिल हुए और कुछ भारत में रह गए। प्रथम गोरखा राइफल और चतुर्थ गोरखा राइफल को मिलाकर 14 जीटीसी प्रशिक्षण केंद्र बना है। देश की रक्षा में अपना जीवन कुर्बान करने वाले शहीदों ने इस सेंटर का नाम हमेशा गर्व से ऊंचा किया है। गोरखा सिपाही निडरता की ट्रेनिंग के बाद अजेय विजेता योद्धा बनते हैं। इस सेंटर से हर वर्ष बेहद कठिन प्रशिक्षण के बाद सैकड़ों अनुशासित जवानों को देश की रक्षा के लिए शपथ लेने के उपरांत, देश सेवा के लिए बॉर्डर पर तैनात किया जाता है। जंग के मैदान में गोरखा फ़ौजियों का केवल एक ही लक्ष्य होता है कि दुश्मन का सफाया। इस रेजिमेंट के आदर्श वाक्य है “कायर हुनु भन्दा मर्नु राम्रो”, “शौर्य एवं निष्ठा” तथा “यत्राहम् विजयस्तत्रः।”
जिसमें “कायर हुनु भन्दा मर्नु राम्रो” का अर्थ है "कायर होने से मरना बेहतर है" जिसको सुनकर दुश्मन युद्ध के मैदान में थरथर कांप जाता है। "जय महाकाली आयो गोरखाली" के युद्धघोष के साथ हर वक्त दुश्मन व विरोधी सेना से लोहा लेने के लिए तैयार रहने वाली "गोरखा रेजिमेंट" का स्वर्णिम इतिहास हिमाचल प्रदेश के सोलन के सुबाथू से स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया। गोरखा जंग के मैदान में जब अपने नारों का जयकारा लगाते हैं, तो उसको सुनकर ही दुश्मन भय से थरथर कांप उठता है। जब वीर गोरखा सेना जंग के मैदान में उतरती है, उस वक्त उन सब वीर जाब़ाज सैनिकों का केवल एक ही लक्ष्य होता है कि हर परिस्थिति में अपने आदर्श वाक्य पर कायम रहना है, "कायर होने से मरना बेहतर है।"

भारतीय आर्मी के भूतपूर्व चीफ ऑफ स्टाफ जनरल सैम मानेकशॉ ने एक बार कहा था कि "यदि कोई कहता है कि मुझे मौत से डर नहीं लगता, वह या तो झूठ बोल रहा है या गोरखा है।"
"गोरखा रेजीमेंट" से सेना के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचे जनरल दलबीर सिंह को जून 1974 को 4/5 जीआर (एफएफ) में कमीशन दिया गया था। वर्तमान में
जनरल बिपिन रावत जो कि देश के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्‍टाफ हैं। उन्हें 16 दिसंबर, 1978 को 11 गोरखा रायफल्स की 5वीं बटालियन में कमीशन मिला था। आज "गोरखा रेजिमेंट" के स्थापना दिवस पर हम बटालियन के सभी वीरों को नमन करते हैं।

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।

बुधवार, 22 अप्रैल 2020

पृथ्वी दिवस पर विशेष :- धरती माँँ की सुनो पुकार बंद करो ये अत्याचार

पृथ्वी दिवस पर विशेष :- धरती माँँ की सुनो पुकार बंद करो ये अत्याचार

हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व रचनाकार


हमारे गौरवशाली सनातन धर्म में हम सभी का अपनी मिट्टी में लालन-पालन करने वाली पृथ्वी  को माँ का दर्जा दिया गया है, दुनिया भर में पर्यावरण संरक्षण करके पृथ्वी की रक्षा करने को समर्थन देने के लिए 22 अप्रैल 2020 को हम सभी लोग लॉकडाउन में रहकर सोशल मीडिया व अन्य माध्यमों के द्वारा पृथ्वी की रक्षा करने के संदेशों का आदान-प्रदान करके "पृथ्वी दिवस" मनाकर पृथ्वी माँ के प्रति अपनी सभी महत्वपूर्ण  जिम्मेदारियों की इतिश्री कर लेंगे। आज जिस समय सम्पूर्ण विश्व बेहद गंभीर कोरोना वायरस संक्रमण की आपदा से जूझ रहा है। जिसके बचाव के लिए विश्व के अधिकांश भागों में लॉकडाउन जारी है, जिसके चलते लोगों को बहुत सारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन इस दौरान हम सभी लोगों को पृथ्वी पर फलने-फूलने वाली बेहद खूबसूरत प्रकृति के तरह-तरह के सुंदर अनमोल नजारे भी देखने को मिल रहे हैं। एकाएक विश्व में सब कुछ बंद होने के चलते हर तरफ बेहद शांति है, वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी का कंपन तक कम हो गया है, इस अद्भुत शांति का प्रकृति प्रेमी लोगों के साथ-साथ वन्यजीव-जंतु भी भरपूर आनंद ले रहे हैं, सबसे बड़ी अच्छी बात यह है कि भारत में पर्यावरण को लॉकडाउन से संजीवनी मिली है, हवा-पानी एकाएक साफ हो गये हैं। जिस तरह से हम लोगों ने अंधाधुंध शहरीकरण करके अव्यवस्थित विकास के नाम पर पृथ्वी को खोखला करके हर जगह भारी उथलपुथल मचाकर प्रकृति का अपने हाथों से विनाश किया है, आज उसके चलते प्राकृतिक संतुलन की स्थिति बहुत ही चिंताजनक हो गयी है। कहीं ना कहीं आयेदिन हम लोगों को विनाश की तर्ज पर किये गये विकास का खामियाजा प्रकृति के अलग-अलग तरह के प्रकोप के रूप में उठाना पड़ता है। जब से हम लोगों ने शहरी सभ्यता की ओर बढ़ने की चाह में पृथ्वी पर तरह-तरह के अत्याचार करने शुरू किये उसके चलते पृथ्वी का अस्तित्व तो हमेशा बना रहेगा, लेकिन अगर सब कुछ इसी तरह अंधाधुंध अव्यवस्थित ढंग से चलता रहा तो मानव सभ्यता के अस्तित्व पर एक दिन जरूर प्रश्नचिन्ह लग सकता है। जिस ढंग से हमने पेड़ों की अंधाधुंध कटाई करके जंगलों को साफ करना शुरू किया, जगह-जगह बिना किसी व्यवस्थित प्लानिंग के कल-कारखाने लगाए, पक्के घर बनाए, आसमान तक जाती गगनचुंबी इमारतें बनाईं, नदियों के प्रवाह को रोककर बड़े-बड़े डैम बनाए, पृथ्वी का सीना चीरकर जगह-जगह बड़े पैमाने पर खनन किया, यह हमको विकास के रूप में आज तो बहुत अच्छा लगता है, लेकिन क्या कभी हमने यह सोचा है कि इस विकास की हमको आने वाले समय में क्या कीमत चुकानी पड़ेगी। वैसे भी हम लोगों के गलत व्यवहार के चलते पेड़-पोधों के अंधाधुंध कटान व वन्यजीवों पर अत्याचार के चलते आज दुनिया में बहुत सारी प्रजातियों का तो अस्तित्व ही समाप्त हो गया या फिर बहुत ही जल्द समाप्त होने वाला है, जिसकी रक्षा के लिए हम सभी को अब तुरंत कुम्भकर्णी नींद से जगना होगा।

पृथ्वी पर निवास करने वाले तमाम वन्यजीव-जंतुओं और पेड़-पौधों वनस्पतियों आदि को बचाने के उद्देश्य से तथा दुनिया भर में पर्यावरण की सुरक्षा के प्रति लोगों में जागरुकता बढ़ाने के उद्देश्य के साथ ही 22 अप्रैल के दिन "पृथ्वी दिवस" यानी "अर्थ डे" मनाने की शुरुआत की गई थी। यहां आपको बता दें कि "पृथ्वी दिवस" की शुरुआत अमेरिकी सीनेटर गेलॉर्ड एंटोन नेल्सन ने पर्यावरण की शिक्षा के रूप में की थी। नेल्सन ने पर्यावरण को राष्ट्रीय ऐजंडा से जोड़ने के लिए लगातार प्रयास किये और वर्ष 1970 में अमेरिका के कई स्कूली और कॉलेज स्तर के छात्रों ने लोगों में स्वस्थ पर्यावरण के लिए जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से एक राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लिया था। इस आंदोलन में 20 हजार अमेरिकी शामिल हुए थे, तब से ही "पृथ्वी दिवस" मनाने की शुरुआत हुई थी। जिसे धीरे-धीरे आज लगभग 195 से अधिक देश हर वर्ष मनाते हैं। इस दिवस को मनाने के लिए हर वर्ष एक विशेष थीम भी होती है।

आज हमारे देश में पृथ्वी की रक्षा के लिए पर्यावरण सुरक्षा के लिए बहुत तेजी से पहल करने की आवश्यकता है। क्योंकि भारत में जिस तरह से बहुत ही तेजी से स्वच्छ जल व स्वच्छ वायु का दिन-प्रतिदिन अभाव होता जा रहा है, वह स्थिति हमारे लिए व हमारी आने वाली पीढियों के लिए ठीक नहीं है। लॉकडाउन से पहले देश में हर तरफ वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण ने लोगों का जीवन जीना मुश्किल कर रखा है। देश में कहीं-कहीं तो जल व वायु में प्रदूषण का लेवल इतना अधिक बढ़ गया था कि वहां ना तो पीने के लिए स्वच्छ पेयजल है और ना ही सांस लेने के लिए स्वच्छ हवा लोगों को मिल पा रही थी। जिसके चलते हमारे देश में पेयजल व वायु प्रदूषण से जनति रोगियों की संख्या में बहुत तेजी से बढोत्तरी हो रही है।
 
वैसे भी सम्पूर्ण विश्व में आज मानव सभ्यता के आगे ग्लोबल वार्मिंग की समस्या सबसे बड़ी चुनौती के रूप में खड़ी है, आने वाले समय में जलवायु परिवर्तन पृथ्वी पर मानव सभ्यता के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है, क्योंकि प्रकृति का सही अनुपात ही हमारी दुनिया को सहज रूप से रहने के योग्य बनाता है। 

आज हम लोगों ने अपने घरों में सुख-सुविधा के तरह-तरह के साधन तो जुटा लिए है, हमको चार कदम जाने के लिए भी  मोटरसाइकिल व कार चाहिए। वायुमंडल में हर वक्त हवाई जहाजों की दौड़ ने कभी ना रुकने वाली रफ्तार पकड़ रखी है। जीवन के लिए कल-कारखाने आवश्यक हो गये हैं। लेकिन क्या कभी हमने सोचा है कि हमारा वातावरण कई तरह की गैसों से मिलकर बना हुआ है, यह सभी  गैसें एक निश्चित आनुपातिक संतुलन में होती हैं। अगर हमारे रोजमर्रा के व्यवहार के चलते इनमें से ऑक्सीजन के साथ कार्बन डाई ऑक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइड आदि गैसों की मात्रा में थोड़ा भी हेरफेर होता है तो पर्यावरण का संतुलन बिगड़ने लगता है और पर्यावरण प्रदूषित होने लगता है। आज पृथ्वी पर अव्यवस्थित मानवजनित गतिविधियों के चलते वायुमंडल में कार्बन डाई ऑक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइड और मीथेन जैसी गैसों की मात्रा बढ़ने लगी है। जिसके चलते पर्यावरण संतुलन बिगाड़ने लगा है। हम लोगों को इस बिगड़ती हालात को समय रहते सजग होकर स्थिति को कारगर ढंग से नियंत्रित करना होगा।

अब वह समय आ गया है जब हमको पृथ्वी व पर्यावरण को बचाने के लिए हर संभव प्रयास हर हाल में करना ही होगा। अपनी बहुत सारी रोजमर्रा की आदतों में तुरंत बदलाव करना होगा। अपने आसपास साफ-सफाई रखनी होगी, पृथ्वी को हर तरह के कचरे का ढेर बनने से बचाना होगा, हवा-पानी को स्वच्छ रखना होगा, प्लास्टिक का उपयोग कम करना होगा, वायु प्रदूषण कम करने के लिए बेहतरीन सार्वजनिक यातायात प्रणाली विकसित करनी होगी, सौर ऊर्जा पर अपनी निर्भरता बढ़ानी होगी, हरियाली बरकरार रखने के लिए व पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए तत्काल जगंलों की कटाई रोककर बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण करना होगा, कल-कारखानों से निकलने वाली जहरीली गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करना होगा, केमिकलों के उपयोग को भी नियंत्रित करना होगा, सभी का पेट भरने के लिए बंजर होती भूमि को बचाना होगा उसकी उर्वरकता को बढ़ाना होगा, रोडियो-एक्टिव पदार्थों के रेडिएशियन से धरा को सुरक्षित रखना होगा। धरती पर रहने वाले हर जीव जंतु व वनस्पति का संरक्षण करके इकोलॉजिकल बेलेंस को बनाए रखना होगा, ध्वनि प्रदूषण कम करना होगा, पृथ्वी पर कंपन कम करना होगा, प्राकृतिक जलस्रोतों व नदियों को स्वच्छ रखना होगा, कल-कल करती नदियों के बहाव को अविरल बनाना होगा, पहाड़ों की अंधाधुंध कटाई को बंद करके उनको टूटने से बचाना होगा, बेवजह जमीन की खुदाई रोकनी होगी, देश में अधिकतर समस्याओं की जननी बढ़ती जनसंख्या के दुष्प्रभावों के बारे में लोगों को समझाकर तत्काल जनसंख्या नियंत्रण करने के लिए केंद्र सरकार को ठोस प्रभावी कदम उठाने होंगे, सरकार को लोगों में साक्षरता के स्तर को बढ़ाना होगा, सभी लोगों में पृथ्वी व पर्यावरण के हमारे जीवन में महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ानी होगी, तभी आने वाले समय में हम व हमारी जीवनदायिनी पृथ्वी माँ सुरक्षित रह सकेंगी। हम लोगों को समय रहते ही पृथ्वी की रक्षा के लिए उपरोक्त महत्वपूर्ण कदम धरातल पर उठाने होंगे, हमकों पृथ्वी को वास्तव में माँ का दर्जा अपने रोजमर्रा के व्यवहार में देना होगा, किसी भी कार्य को करने से पहले पृथ्वी व पर्यावरण के प्रति अपने परिवार की तरह अपनत्व की भावना रखनी होगी, क्योंकि जिस प्रकार हम स्वयं कभी अपने परिवार को हानि नहीं पहुंचा सकते है ठीक उसी प्रकार हम अपनी पृथ्वी माता को भी हानि नहीं पहुंचा सकते, अब हमारे देश में लोगों के जीवन को सुरक्षित रखने के लिए वह समय आ गया कि धरती माँँ की सुनो पुकार बंद करो ये अत्याचार, तब ही पृथ्वी दिवस माने का असली लक्ष्य हम सभी देशवासियों को जल्द प्राप्त होगा।।

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

धर्म और मज़हब का चश्मा उतार कर देखो, कुछ लोगों की वजह से इंसान व इंसानियत खतरे में हैं

धर्म और मज़हब का चश्मा उतार कर देखो, कुछ लोगों की वजह से इंसान व  इंसानियत खतरे में हैं

हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार


"मजहब के नाम पर लोगों को यूं ना बरगलाओं,
इंसान को आपस में एकदूसरे का दुश्मन ना बनाओं,
मजहब कमजोर नहीं इतना जो जरूरत पड़े तुम्हारी,
बस तुम देशहित में खुद एक अच्छा इंसान बनकर,
इंसानियत के प्रति कुछ तो जिम्मेदारी निभाओं।।"

आज सम्पूर्ण विश्व एकजुट होकर वैश्विक आपदा बन चुके कोरोना वायरस से अघोषित लम्बी जंग लड़ रहा है, वहीं हमारा प्यारा देश बेहद गंभीर आपदा के समय में भी चंद नाकारा लोगों की भीड़ व सोशलमीडिया के इंसानियत के दुश्मन बन गये बयानवीरों के चलते हिन्दू-मुसलमान व तरह-तरह की फर्जी खबरों के खिलाफ जंग लड़ रहा है। जब से दिल्ली के निजामुद्दीन में तब्लीगी-ए-जमात के कार्यक्रम में शामिल लोगों में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की लम्बी फौज मिली है, तब से ही लॉकडाउन की अपनी सारी कबायद पर पानी-फिरता देखकर शासन-प्रशासन निजामुद्दीन मरकज के कार्यक्रम में शामिल लोगों को चिन्हित करके युद्ध स्तर पर उन्हें तलाश रहा है। इस तलाशी का असली उद्देश्य है कि उन लोगों के द्वारा और लोगों में कोरोना संक्रमण ना फैले, इसको समय रहते रोकने के लिए शासन-प्रशासन लोगों को ढूंढ-ढूंढ कर क्वारंटाइन में और संक्रमितों को आइसोलेशन में भेज रहा है। लेकिन बहुत अफसोस की बात यह है कि कुछ लोगों को प्रशासन की देश के इंसानों के जीवन को बचाने की इस कवायद से भी ना जाने क्या दिक्कत हो रही है, वो लोगों के जीवन बचाने की इस कवायद को भी अपनी गंदी जहरीली सोच के चलते मजहबी रंग देने पर तुले हुए है। तब्लीगी जमात के कार्यक्रम में शामिल जिन लोगों को प्रशासन के द्वारा अपने ढूंढने की खबर सुनने के बाद इंसान व इंसानियत के नाते देश व समाज के हित में स्वयं ही नजदीक के अस्पताल या प्रशासन को सूचना देकर सामने आकर उन सभी के द्वारा दिये गये दिशानिर्देशों का अक्षरसः पालन करना चाहिए था, लेकिन ना जाने क्यों वो लोग जगह-जगह छिपते हुए लोगों को संक्रमित करके मौत का सामना बाट़ते फिर रहे है। हम सभी देेशवासियों के लिए चिंता की बात यह है कि जिस तरह से जमात में शामिल कुछ लोग इंसान व इंसानियत का दुश्मन बनकर कुछ लोगों के बहकावे में आकर अपने ही मिलने वाले चहेते लोगों, परिवारजनों व अन्य लोगों को बेहद घातक मौत का सामान कोरोना वायरस का संक्रमण बाट़ते घूम रहे हैं, उसने देश में चल रहे लॉकडाउन की कवायद को पलीता लगाकार कोरोना से लड़ी जा रही जंग को कमजोर किया है। यह लोग एक उस व्यक्ति की दी गयी तकरीर पर तो अमल कर रहें है, जिसने पूरे विश्व में फैले कोरोना वायरस के संक्रमण को सिरे से नकार कर इस्लाम के खिलाफ साजिश करार दे दिया था। लेकिन इनको अपने खुद के विवेक व अपनी खुद की खुली हुई आँखों से पूरे विश्व के भयावह हालात नजर नहीं आते है, विश्व में हर तरफ कोरोना की वजह से मचा मौत का तांडव नजर नहीं आता है, ना ही इनको कोरोना संक्रमण के चलते विश्व के अलग-अलग देशों में इकट्ठा अनगिनत लाशों के ढेर की खबरें मीडिया के माध्यम से नजर आती हैं। भारत में इस तरह की हालात कुछ लोगों के द्वारा धर्म के नाम पर किसी व्यक्ति विशेष के अंधानुकरण के चलते आयेदिन उत्पन्न हो रही है, जिससे आयेदिन देश में कानून-व्यवस्था व इंसान और इंसानियत को खतरा उत्पन्न होता रहता है। जमात में शामिल कुछ लोगों ने अपने विवेक का प्रयोग ना करके जिस तरह से एक व्यक्ति की कही बात को पत्थर की लकीर मानकर उसका  अनुसरण करना शुरू कर दिया, लोगों की इस बेहद बचकानी हरकत के चलते देश में आज एकाएक कोरोना वायरस संक्रमण के चलते भयावह स्थिति उत्पन्न होनी शुरू हो गयी है, जो स्थिति हम सभी  देशवासियों के हित में ठीक नहीं है। आपदा के समय में भी देश में कुछ लोगों की बेवकूफी की इंतहा तो देखों कि अलग-अलग राज्यों में जब डॉक्टर व पुलिस की टीम लोगों के पास उनकी जांच करके जान बचाने के उद्देश्य से गयी, तो कुछ जाहिल लोगों ने लोगों की जान बचाने के लिए दिन-रात अपने मिशन पर लगे साक्षात देवदूत जाबांज "कोरोना वारियर्स" पर पत्थराव करके जानलेवा हमला करना शुरू कर दिया, देश के विभिन्न राज्यों से इस तरह की बेहद शर्मनाक खबरें लगातार आ रही हैं। इन लोगों ने जरा भी यह नहीं सोचा कि उनके इस जहालत भरे कदम से इंसान व इंसानियत का कितना बड़ा नुकसान हो सकता है। क्या इन लोगों ने कभी यह सोचा है कि अगर भय के चलते डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ व पुलिस ने लोगों की इस तरह की हरकतों के चलते भयंकर आपदा के समय अपनी जिम्मेदारियों का सही ढंग से पालन नहीं किया, तो देश में क्या भयावह स्थिति होगी, आज उसकी कल्पना करके ही रूह कांप जाती है। जिस तरह से लॉकडाउन का सही ढंग से पालन कराने के लिए शुक्रवार को भीड़ इकट्ठा होने से रोकने पर पुलिस पर कुछ नादान नमाजियों के द्वारा देश के विभिन्न हिस्सों में पत्थराव किया गया, वह सरासर गलत है। कुछ लोगों को अभी भी समय रहते समझ जाना चाहिए की लॉकडाउन में लोगों को सख्ती से सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कराने के लिए पुलिस-प्रशासन की किसी भी तरह की कोई कार्यवाही किसी धर्म या व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं है, बल्कि उन्हीं लोगों की जान को सुरक्षित रखने के लिए की जा रही कवायद का हिस्सा है। लेकिन फिर भी मजहब के तथाकथित ठेकेदारों के द्वारा कुछ लोगों की आँखों पर अंधभक्ति की पट्टी बांधकर इन लोगों को बरगलाकर भ्रमित करके उनकी जान को घातक कोरोना वायरस संक्रमण के खतरे में आखिर जानबूझकर क्यों डाला जा रहा है,  यह स्थिति देश की खुफिया ऐजेंसी के लिए जांच का विषय है और हम सभी के लिए चिंतनीय है। आपदा के समय में देश में इस तरह के हालात ना तो अंधभक्त बने इन लोगों की जमात के लिए ठीक है, ना ही उनके परिवार, पड़ोसियों व संपर्क में आने वाले अन्य लोगों के लिए ठीक, ना ही इंसान, इंसानियत, समाज व देशहित में ठीक है। वैसे अधिकांश देशवासियों को याद होगा की इन मजहब के कुछ ठेकेदारों ने यह हरकत उस समय भी की थी, जिस समय देश में बच्चों को पोलियो की बीमारी से बचाने के लिए पोलियो ड्राप पिलाने का अभियान युद्ध स्तर पर चलाया जा रहा था। तो उस समय भी कुछ मजहब के तथाकथित ठेकेदारों के द्वारा अफवाह फेलाई गयी थी कि पोलियो की ड्राप अपने बच्चों को बिल्कुल भी नहीं पिलाएं, इसको पीने से बच्चें नपुंसक हो जायेंगे। जिसके परिणाम स्वरूप पोलियो पिलाने वाली टीमों पर भी देश के अलग-अलग हिस्सों में आयेदिन जानलेवा हमला होने लगा था, लेकिन सरकार की सख्ती व निरंतर प्रयास के बाद बच्चों को लगातार पोलियो की ड्राप पिलाकर, आज देश को पोलियो से मुक्त कर दिया गया है। सरकार के उस बेहतरीन प्रयास के सकारात्मक परिणाम आज सभी देशवासियों के सामने है और इस पोलियो ड्राप पीने से कोई भी बच्चा नपुंसक नहीं हुआ है यह कटु सच्चाई भी हम सभी के सामने है। उस समय पोलियो ड्राप पिलाने के विरोध का वो सारा घटनाक्रम कुछ मजहब के ठेकेदारों के द्वारा अपने निजी स्वार्थ को पूरा करने के लिए लोगों के बीच फैलाये गये एक षडयंत्र मात्र से अधिक कुछ नहीं था। आज फिर देश में कुछ मजहब के ठेकेदारों के द्वारा षडयंत्र रचकर वही स्थिति उत्पन्न करके लोगों को लगातार विभिन्न-विभिन्न मसलों को लेकर आयेदिन बरगलाया जा रहा है। आज के समय में विश्व में मानव सभ्यता के लिए सबसे बड़े खतरा बन चूके कोरोना वायरस को कुछ लोगों के द्वारा इस्लाम के खिलाफ सोची समझी साजिश बताया जा रहा है, कोई इन लोगों से पूछे की लोगों में एक घातक वायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए सरकार के द्वारा किये जाने वालें उपाय से कोई मजहब कैसे खतरे में पड़ सकता है। क्या विश्व में कोई भी मजहब इतना कमजोर है कि वो जरा-जरा सी बातों में खतरे में पड़ जाये या कुछ लोगों की जहालत भरी हरकत से खतरे में आ सकता है, बिल्कुल भी नहीं। वैसे जो लोग आज डॉक्टरों व उनके सभी सहयोगी स्टाफ पर पत्थरबाजी कर रहे हैं क्या वो संकल्प लेंगे की कभी भी अपने या अपने परिवार के किसी भी सदस्य के मर्ज को दिखाने के लिए किसी भी डॉक्टर के पास नहीं जायेंगे?

खैर अब लकीर पीटने से क्या होता है एक मौलाना की भंयकर लापरवाही और सबसे अधिक ताकतवर होने की ज़िद की वजह से ना जाने आज देश के कितने लोगों की जान पर बन आयी है, उनकी लापरवाही भरे कृत्य से देश में आज हजारों लोग कोरोना से संक्रमित हो चुके हैं। 
लेकिन अब केंद्र व राज्य सरकारों को भी यह तय कर लेना चाहिए कि जो लोग अपने आपकों देश के नियम-कायदे व संविधान से ऊपर मानने वाले इंसानियत के दुश्मन बन चुके है, चाहे वो बड़े राजनेता, मजहब व धर्म के कुछ तथाकथित बड़े ठेकेदार ही क्यों ना हो, देशहित में अब किसी भी गलत करने वाले व्यक्ति को भी बख्शा नहीं जाना चाहिए। आयेदिन लोगों के बीच में बैठकर मजहब व धर्म को बदनाम करने का काम करने वाले कुछ धर्मान्धों को अब देशहित में कानून से सख्त से सख्त सजा अवश्य मिलनी चाहिए, चाहे वो किसी भी जाति, धर्म या मजहब के कितने भी बड़े ठेकेदार क्यों ना हो। साथ ही साथ "कोरोना वारियर्स" के हौसले व सेवाभाव को बनाए रखने के लिए भी सरकार को उनसे बदसलूकी करने वाले लोगों और पुलिस, डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ व अन्य लोगों को संक्रमित करने के उद्देश्य से जगह-जगह थूकने वाले लोगों, अस्पताल में कोरोना वारियर्स को बेवजह परेशान करने वाले लोगों व उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद व कानपुर में अस्पताल में जमातियों के द्वारा नर्सों से अश्लील हरकतें करके छेड़छाड़ करने वाले लोगों को सख्त से सख्त सजा देकर और लोगों के लिए नजीर बना देनी चाहिए। देश में इस तरह के मामले सामने आने के बाद लोग हैरान है, कि ऐसी शर्मनाक हरकत करने वाले ये लोग आखिर किस तरह के जमाती हैं आखिर ये जमात में किस तरह की शिक्षा ले रहे थे। वहीं 3 अप्रैल शुक्रवार को कोरोना से बचाने के लिए इकट्ठा होकर नमाज पढ़ने से पुलिस के द्वारा मना करने पर, कुछ लोगों ने जिस तरह पुलिस पर पत्थरबाजी की यह स्थिति समझ से परे है कि भयावह कोरोना आपदा के वक्त भी कुछ लोगों की इंसानियत को शर्मसार करने वाली हरकतें किस उद्देश्य से और क्यों जारी हैं, केंद्र व राज्य सरकार की जांच ऐजेंसियों को मामले की तह में जाना चाहिए। लेकिन हम सभी लोगों को भी यह ध्यान रखना है कि कुछ जाहिल लोगों के द्वारा किये गए मानव सभ्यता के प्रति जघन्य अपराध के लिए हमको किसी मजहब, धर्म व समाज को नफरत की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए, कुछ लोगों की जहालत की सजा किसी भी हाल में सभी को नहीं मिलनी चाहिए, आपसी प्रेम व भाईचारे को बरकरार रखना आज हम सभी देशवासियों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। हम सभी को यह हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि सच्चा धर्म हमें अनुशासित जीवन जीना सिखाता है ना कि जीवन में अनुशासन हीनता करना सिखाता है। आज हमारे देश में राजनीति के चलते हर मजहब, धर्म व जाति में ऐसे लोग ठेकेदार बनकर इकट्ठा हो गये है जो अपने आपको देश के नियम-कानून व संविधान से तो ऊपर मानते ही है, बल्कि इन्होंने अपने आपको सर्वशक्तिमान ईश्वर से भी अधिक शक्तिशाली मानने की गलतफहमी पाल रखी है, तो देश का संविधान व संवैधानिक व्यवस्था इनके लिए क्या मायने रखती है आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं। जिसका उदाहरण पिछ़ले कुछ वर्षों में देश के अलग-अलग हिस्सों में देखने को मिला है, लेकिन अब ऐसे तथाकथित सभी मजहब के ठेकेदारों को सरकार को देशहित में तुरंत संवैधानिक ताकत का आईना दिखा देना चाहिए, इनकी गलतफहमी सरकार को तुरंत दूर करनी चाहिए, इन सभी को उनके द्वारा समझ में आने वाली सबसे सरल भाषा में समझा देना चाहिए कि देश संविधान के बनाये नियम कायदे व कानून से चलेगा ना कि उनके द्वारा बताए गयी बातों या किसी भी अन्य धार्मिक पुस्तक से चलेगा। सरकार को ऐसे सभी तथाकथित ठेकेदारों पर तुरंत कार्यवाही करनी चाहिए जो अपने आपको देश से बड़ा मान बैठे है, जिनके लिए देश, देशहित व इंसान-इंसानियत कोई मायने नहीं रखती है। क्योंकि आज इन इंसान व इंसानियत के दुश्मन बन चुके चंद लोगों के द्वारा कुछ लोगों को पहनाएं गये, धर्म और मज़हब के खतरनाक चश्मे की वजह से ही आज भयंकर कोरोना वायरस आपदा के समय में हमारे प्यारे हिन्दुस्तान में इंसान व इंसानियत खतरे में हैं। जिसकी रक्षा के लिए हम सभी देशवासियों को समय रहते जागना होगा और ऐसे तथाकथित धर्म के ठेकेदारों की दुकानों पर सरकार की कार्यवाही से पहले जनता को खुद जागरूक होकर आगे आकर ताला जड़ना होगा तब ही देश देशवासी और देश की एकता, अखंडता, अमनचैन व भाईचारा कायम रह सकता है। वरना वह समय दूर नहीं है जब शायर 'मुज़फ़्फ़र रज़्मी' का शेर हर देशवासी को याद आयेगा

""ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने। 
लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई ।।"

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।
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आदरणीय, 
समाचार संपादक जी,


आपसे विनम्र अनुरोध है कि कृपया संपादकीय पृष्ठ पर मेरे आलेख को अपने प्रतिष्ठित समाचारपत्र में प्रकाशित करने का कष्ट करें ।।धन्यवाद।।
निवेदक 
✍️दीपक कुमार त्यागी✍️
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार,
ट्विटर हैंडल :- @deepakgzb9 
मोबाइल :- 9999379962 
🌻🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🌻


*प्रकाशनार्थ आलेख*

धर्म और मज़हब का चश्मा उतार कर देखो, कुछ लोगों की वजह से इंसान व  इंसानियत खतरे में हैं

हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार


"मजहब के नाम पर लोगों को यूं ना बरगलाओं,
इंसान को आपस में एकदूसरे का दुश्मन ना बनाओं,
मजहब कमजोर नहीं इतना जो जरूरत पड़े तुम्हारी,
बस तुम देशहित में खुद एक अच्छा इंसान बनकर,
इंसानियत के प्रति कुछ तो जिम्मेदारी निभाओं।।"

आज सम्पूर्ण विश्व एकजुट होकर वैश्विक आपदा बन चुके कोरोना वायरस से अघोषित लम्बी जंग लड़ रहा है, वहीं हमारा प्यारा देश बेहद गंभीर आपदा के समय में भी चंद नाकारा लोगों की भीड़ व सोशलमीडिया के इंसानियत के दुश्मन बन गये बयानवीरों के चलते हिन्दू-मुसलमान व तरह-तरह की फर्जी खबरों के खिलाफ जंग लड़ रहा है। जब से दिल्ली के निजामुद्दीन में तब्लीगी-ए-जमात के कार्यक्रम में शामिल लोगों में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की लम्बी फौज मिली है, तब से ही लॉकडाउन की अपनी सारी कबायद पर पानी-फिरता देखकर शासन-प्रशासन निजामुद्दीन मरकज के कार्यक्रम में शामिल लोगों को चिन्हित करके युद्ध स्तर पर उन्हें तलाश रहा है। इस तलाशी का असली उद्देश्य है कि उन लोगों के द्वारा और लोगों में कोरोना संक्रमण ना फैले, इसको समय रहते रोकने के लिए शासन-प्रशासन लोगों को ढूंढ-ढूंढ कर क्वारंटाइन में और संक्रमितों को आइसोलेशन में भेज रहा है। लेकिन बहुत अफसोस की बात यह है कि कुछ लोगों को प्रशासन की देश के इंसानों के जीवन को बचाने की इस कवायद से भी ना जाने क्या दिक्कत हो रही है, वो लोगों के जीवन बचाने की इस कवायद को भी अपनी गंदी जहरीली सोच के चलते मजहबी रंग देने पर तुले हुए है। तब्लीगी जमात के कार्यक्रम में शामिल जिन लोगों को प्रशासन के द्वारा अपने ढूंढने की खबर सुनने के बाद इंसान व इंसानियत के नाते देश व समाज के हित में स्वयं ही नजदीक के अस्पताल या प्रशासन को सूचना देकर सामने आकर उन सभी के द्वारा दिये गये दिशानिर्देशों का अक्षरसः पालन करना चाहिए था, लेकिन ना जाने क्यों वो लोग जगह-जगह छिपते हुए लोगों को संक्रमित करके मौत का सामना बाट़ते फिर रहे है। हम सभी देेशवासियों के लिए चिंता की बात यह है कि जिस तरह से जमात में शामिल कुछ लोग इंसान व इंसानियत का दुश्मन बनकर कुछ लोगों के बहकावे में आकर अपने ही मिलने वाले चहेते लोगों, परिवारजनों व अन्य लोगों को बेहद घातक मौत का सामान कोरोना वायरस का संक्रमण बाट़ते घूम रहे हैं, उसने देश में चल रहे लॉकडाउन की कवायद को पलीता लगाकार कोरोना से लड़ी जा रही जंग को कमजोर किया है। यह लोग एक उस व्यक्ति की दी गयी तकरीर पर तो अमल कर रहें है, जिसने पूरे विश्व में फैले कोरोना वायरस के संक्रमण को सिरे से नकार कर इस्लाम के खिलाफ साजिश करार दे दिया था। लेकिन इनको अपने खुद के विवेक व अपनी खुद की खुली हुई आँखों से पूरे विश्व के भयावह हालात नजर नहीं आते है, विश्व में हर तरफ कोरोना की वजह से मचा मौत का तांडव नजर नहीं आता है, ना ही इनको कोरोना संक्रमण के चलते विश्व के अलग-अलग देशों में इकट्ठा अनगिनत लाशों के ढेर की खबरें मीडिया के माध्यम से नजर आती हैं। भारत में इस तरह की हालात कुछ लोगों के द्वारा धर्म के नाम पर किसी व्यक्ति विशेष के अंधानुकरण के चलते आयेदिन उत्पन्न हो रही है, जिससे आयेदिन देश में कानून-व्यवस्था व इंसान और इंसानियत को खतरा उत्पन्न होता रहता है। जमात में शामिल कुछ लोगों ने अपने विवेक का प्रयोग ना करके जिस तरह से एक व्यक्ति की कही बात को पत्थर की लकीर मानकर उसका  अनुसरण करना शुरू कर दिया, लोगों की इस बेहद बचकानी हरकत के चलते देश में आज एकाएक कोरोना वायरस संक्रमण के चलते भयावह स्थिति उत्पन्न होनी शुरू हो गयी है, जो स्थिति हम सभी  देशवासियों के हित में ठीक नहीं है। आपदा के समय में भी देश में कुछ लोगों की बेवकूफी की इंतहा तो देखों कि अलग-अलग राज्यों में जब डॉक्टर व पुलिस की टीम लोगों के पास उनकी जांच करके जान बचाने के उद्देश्य से गयी, तो कुछ जाहिल लोगों ने लोगों की जान बचाने के लिए दिन-रात अपने मिशन पर लगे साक्षात देवदूत जाबांज "कोरोना वारियर्स" पर पत्थराव करके जानलेवा हमला करना शुरू कर दिया, देश के विभिन्न राज्यों से इस तरह की बेहद शर्मनाक खबरें लगातार आ रही हैं। इन लोगों ने जरा भी यह नहीं सोचा कि उनके इस जहालत भरे कदम से इंसान व इंसानियत का कितना बड़ा नुकसान हो सकता है। क्या इन लोगों ने कभी यह सोचा है कि अगर भय के चलते डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ व पुलिस ने लोगों की इस तरह की हरकतों के चलते भयंकर आपदा के समय अपनी जिम्मेदारियों का सही ढंग से पालन नहीं किया, तो देश में क्या भयावह स्थिति होगी, आज उसकी कल्पना करके ही रूह कांप जाती है। जिस तरह से लॉकडाउन का सही ढंग से पालन कराने के लिए शुक्रवार को भीड़ इकट्ठा होने से रोकने पर पुलिस पर कुछ नादान नमाजियों के द्वारा देश के विभिन्न हिस्सों में पत्थराव किया गया, वह सरासर गलत है। कुछ लोगों को अभी भी समय रहते समझ जाना चाहिए की लॉकडाउन में लोगों को सख्ती से सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कराने के लिए पुलिस-प्रशासन की किसी भी तरह की कोई कार्यवाही किसी धर्म या व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं है, बल्कि उन्हीं लोगों की जान को सुरक्षित रखने के लिए की जा रही कवायद का हिस्सा है। लेकिन फिर भी मजहब के तथाकथित ठेकेदारों के द्वारा कुछ लोगों की आँखों पर अंधभक्ति की पट्टी बांधकर इन लोगों को बरगलाकर भ्रमित करके उनकी जान को घातक कोरोना वायरस संक्रमण के खतरे में आखिर जानबूझकर क्यों डाला जा रहा है,  यह स्थिति देश की खुफिया ऐजेंसी के लिए जांच का विषय है और हम सभी के लिए चिंतनीय है। आपदा के समय में देश में इस तरह के हालात ना तो अंधभक्त बने इन लोगों की जमात के लिए ठीक है, ना ही उनके परिवार, पड़ोसियों व संपर्क में आने वाले अन्य लोगों के लिए ठीक, ना ही इंसान, इंसानियत, समाज व देशहित में ठीक है। वैसे अधिकांश देशवासियों को याद होगा की इन मजहब के कुछ ठेकेदारों ने यह हरकत उस समय भी की थी, जिस समय देश में बच्चों को पोलियो की बीमारी से बचाने के लिए पोलियो ड्राप पिलाने का अभियान युद्ध स्तर पर चलाया जा रहा था। तो उस समय भी कुछ मजहब के तथाकथित ठेकेदारों के द्वारा अफवाह फेलाई गयी थी कि पोलियो की ड्राप अपने बच्चों को बिल्कुल भी नहीं पिलाएं, इसको पीने से बच्चें नपुंसक हो जायेंगे। जिसके परिणाम स्वरूप पोलियो पिलाने वाली टीमों पर भी देश के अलग-अलग हिस्सों में आयेदिन जानलेवा हमला होने लगा था, लेकिन सरकार की सख्ती व निरंतर प्रयास के बाद बच्चों को लगातार पोलियो की ड्राप पिलाकर, आज देश को पोलियो से मुक्त कर दिया गया है। सरकार के उस बेहतरीन प्रयास के सकारात्मक परिणाम आज सभी देशवासियों के सामने है और इस पोलियो ड्राप पीने से कोई भी बच्चा नपुंसक नहीं हुआ है यह कटु सच्चाई भी हम सभी के सामने है। उस समय पोलियो ड्राप पिलाने के विरोध का वो सारा घटनाक्रम कुछ मजहब के ठेकेदारों के द्वारा अपने निजी स्वार्थ को पूरा करने के लिए लोगों के बीच फैलाये गये एक षडयंत्र मात्र से अधिक कुछ नहीं था। आज फिर देश में कुछ मजहब के ठेकेदारों के द्वारा षडयंत्र रचकर वही स्थिति उत्पन्न करके लोगों को लगातार विभिन्न-विभिन्न मसलों को लेकर आयेदिन बरगलाया जा रहा है। आज के समय में विश्व में मानव सभ्यता के लिए सबसे बड़े खतरा बन चूके कोरोना वायरस को कुछ लोगों के द्वारा इस्लाम के खिलाफ सोची समझी साजिश बताया जा रहा है, कोई इन लोगों से पूछे की लोगों में एक घातक वायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए सरकार के द्वारा किये जाने वालें उपाय से कोई मजहब कैसे खतरे में पड़ सकता है। क्या विश्व में कोई भी मजहब इतना कमजोर है कि वो जरा-जरा सी बातों में खतरे में पड़ जाये या कुछ लोगों की जहालत भरी हरकत से खतरे में आ सकता है, बिल्कुल भी नहीं। वैसे जो लोग आज डॉक्टरों व उनके सभी सहयोगी स्टाफ पर पत्थरबाजी कर रहे हैं क्या वो संकल्प लेंगे की कभी भी अपने या अपने परिवार के किसी भी सदस्य के मर्ज को दिखाने के लिए किसी भी डॉक्टर के पास नहीं जायेंगे?

खैर अब लकीर पीटने से क्या होता है एक मौलाना की भंयकर लापरवाही और सबसे अधिक ताकतवर होने की ज़िद की वजह से ना जाने आज देश के कितने लोगों की जान पर बन आयी है, उनकी लापरवाही भरे कृत्य से देश में आज हजारों लोग कोरोना से संक्रमित हो चुके हैं। 
लेकिन अब केंद्र व राज्य सरकारों को भी यह तय कर लेना चाहिए कि जो लोग अपने आपकों देश के नियम-कायदे व संविधान से ऊपर मानने वाले इंसानियत के दुश्मन बन चुके है, चाहे वो बड़े राजनेता, मजहब व धर्म के कुछ तथाकथित बड़े ठेकेदार ही क्यों ना हो, देशहित में अब किसी भी गलत करने वाले व्यक्ति को भी बख्शा नहीं जाना चाहिए। आयेदिन लोगों के बीच में बैठकर मजहब व धर्म को बदनाम करने का काम करने वाले कुछ धर्मान्धों को अब देशहित में कानून से सख्त से सख्त सजा अवश्य मिलनी चाहिए, चाहे वो किसी भी जाति, धर्म या मजहब के कितने भी बड़े ठेकेदार क्यों ना हो। साथ ही साथ "कोरोना वारियर्स" के हौसले व सेवाभाव को बनाए रखने के लिए भी सरकार को उनसे बदसलूकी करने वाले लोगों और पुलिस, डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ व अन्य लोगों को संक्रमित करने के उद्देश्य से जगह-जगह थूकने वाले लोगों, अस्पताल में कोरोना वारियर्स को बेवजह परेशान करने वाले लोगों व उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद व कानपुर में अस्पताल में जमातियों के द्वारा नर्सों से अश्लील हरकतें करके छेड़छाड़ करने वाले लोगों को सख्त से सख्त सजा देकर और लोगों के लिए नजीर बना देनी चाहिए। देश में इस तरह के मामले सामने आने के बाद लोग हैरान है, कि ऐसी शर्मनाक हरकत करने वाले ये लोग आखिर किस तरह के जमाती हैं आखिर ये जमात में किस तरह की शिक्षा ले रहे थे। वहीं 3 अप्रैल शुक्रवार को कोरोना से बचाने के लिए इकट्ठा होकर नमाज पढ़ने से पुलिस के द्वारा मना करने पर, कुछ लोगों ने जिस तरह पुलिस पर पत्थरबाजी की यह स्थिति समझ से परे है कि भयावह कोरोना आपदा के वक्त भी कुछ लोगों की इंसानियत को शर्मसार करने वाली हरकतें किस उद्देश्य से और क्यों जारी हैं, केंद्र व राज्य सरकार की जांच ऐजेंसियों को मामले की तह में जाना चाहिए। लेकिन हम सभी लोगों को भी यह ध्यान रखना है कि कुछ जाहिल लोगों के द्वारा किये गए मानव सभ्यता के प्रति जघन्य अपराध के लिए हमको किसी मजहब, धर्म व समाज को नफरत की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए, कुछ लोगों की जहालत की सजा किसी भी हाल में सभी को नहीं मिलनी चाहिए, आपसी प्रेम व भाईचारे को बरकरार रखना आज हम सभी देशवासियों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। हम सभी को यह हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि सच्चा धर्म हमें अनुशासित जीवन जीना सिखाता है ना कि जीवन में अनुशासन हीनता करना सिखाता है। आज हमारे देश में राजनीति के चलते हर मजहब, धर्म व जाति में ऐसे लोग ठेकेदार बनकर इकट्ठा हो गये है जो अपने आपको देश के नियम-कानून व संविधान से तो ऊपर मानते ही है, बल्कि इन्होंने अपने आपको सर्वशक्तिमान ईश्वर से भी अधिक शक्तिशाली मानने की गलतफहमी पाल रखी है, तो देश का संविधान व संवैधानिक व्यवस्था इनके लिए क्या मायने रखती है आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं। जिसका उदाहरण पिछ़ले कुछ वर्षों में देश के अलग-अलग हिस्सों में देखने को मिला है, लेकिन अब ऐसे तथाकथित सभी मजहब के ठेकेदारों को सरकार को देशहित में तुरंत संवैधानिक ताकत का आईना दिखा देना चाहिए, इनकी गलतफहमी सरकार को तुरंत दूर करनी चाहिए, इन सभी को उनके द्वारा समझ में आने वाली सबसे सरल भाषा में समझा देना चाहिए कि देश संविधान के बनाये नियम कायदे व कानून से चलेगा ना कि उनके द्वारा बताए गयी बातों या किसी भी अन्य धार्मिक पुस्तक से चलेगा। सरकार को ऐसे सभी तथाकथित ठेकेदारों पर तुरंत कार्यवाही करनी चाहिए जो अपने आपको देश से बड़ा मान बैठे है, जिनके लिए देश, देशहित व इंसान-इंसानियत कोई मायने नहीं रखती है। क्योंकि आज इन इंसान व इंसानियत के दुश्मन बन चुके चंद लोगों के द्वारा कुछ लोगों को पहनाएं गये, धर्म और मज़हब के खतरनाक चश्मे की वजह से ही आज भयंकर कोरोना वायरस आपदा के समय में हमारे प्यारे हिन्दुस्तान में इंसान व इंसानियत खतरे में हैं। जिसकी रक्षा के लिए हम सभी देशवासियों को समय रहते जागना होगा और ऐसे तथाकथित धर्म के ठेकेदारों की दुकानों पर सरकार की कार्यवाही से पहले जनता को खुद जागरूक होकर आगे आकर ताला जड़ना होगा तब ही देश देशवासी और देश की एकता, अखंडता, अमनचैन व भाईचारा कायम रह सकता है। वरना वह समय दूर नहीं है जब शायर 'मुज़फ़्फ़र रज़्मी' का शेर हर देशवासी को याद आयेगा

""ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने। 
लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई ।।"

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।

रविवार, 5 अप्रैल 2020

*✍️प्रकाशनार्थ आलेख✍️* लोगों की नादानी और ओछी राजनीति आपदा से जूझ रहे देश पर पड़ ना जाये बहुत भारी हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार



लोगों की नादानी और ओछी राजनीति आपदा से जूझ रहे देश  पर पड़ ना जाये बहुत भारी

हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार

हमारे देश का सम्पूर्ण सिस्टम आज एक घातक वायरस कोरोना के चलते उत्पन्न बेहद गंभीर परिस्थितियों से जंग लड़ रहा है। हमारे देश के नीतिनिर्माताओं और सिस्टम के सामने आज बहुत बड़े चुनौती पूर्ण हालात बन गये है कि कोरोना वायरस का संक्रमण देश में फैलने से किस प्रकार से रोककर उसको जल्द से जल्द देश से खत्म किया जाये। एक वायरस की बेहद तेजी से फैलने वाली प्रवृत्ति के चलते, लॉकडाउन के बाद भी सरकार के दिये निर्देशों का सही ढंग से पालन नहीं करने के चलते, कुछ नासमझ जमात के लोगों की भंयकर लापरवाही से आज हम बेहद विकट समस्या वाली स्थिति से अब घिरते जा रहे हैं। वहीं कभी एकजुट ना रहने की कसम खा चुके भारत के ना सुधरने वाले कुछ राजनेताओं ने आपदा के समय में भी ओछी राजनीति करनी शुरू कर दी है। उन्होंने लोगों की मदद ना करके इस समय भी देशवासियों को बरगलाकर अलग-अलग राज्य का निवासी बनाकर हिन्दू-मुसलमान में बांटना शुरू कर दिया है। देश में आपदा के चलते उत्पन्न बेहद तनावपूर्ण भरे माहौल की हालात में भी पिछले कई दिनों से कुछ राजनेताओं के द्वारा आरोप-प्रत्यारोप की ओछी शर्मनाक राजनीति की जा रही है, ये चंद राजनेता बड़ी ही चतुराई के साथ अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़कर मौजूदा समय में उत्पन्न हालात के लिए एक-दूसरे दल के राजनेताओं व राज्यों को जिम्मेदार ठहरा कर अपनी जिम्मेदारी से इतिश्री कर रहे हैं, जिसको अब जल्द से जल्द समय रहते ही देश के आम-जनमानस को देशहित में समझना होगा। जिस भयावह कोरोना वायरस संक्रमण की आपदा के समय में देश के राजनेताओं को इंसान व इंसानियत को जिंदा रखने के लिए अपने-अपने राजनीतिक दलों से उपर उठाकर देश व देशवासियों के हित में एकजुट होकर लोगों की मदद करके सभी के लिए नज़ीर बनना था, लेकिन उस विकट समय में कुछ नादान लोगों को छोड़कर देश के अधिकांश समझदार निवासी तो एकजुट हैं, लेकिन अफसोस इस भयंकर महामारी के समय भी देश के कुछ राजनेता एकजुट नहीं होकर, आपदा में भी अपने राजनीतिक हित तलाशने से बाज नहीं आ रहे हैं, हालांकि देश के कुछ बेहद अच्छे इंसान राजनेताओं के द्वारा की जाने वाली हर तरह से लोगों के मदद के अपवाद भी हमारे सामने मौजूद हैं, वहीं दूसरी तरफ आपदा के समय में भी निस्वार्थ भाव से लोगों की मदद करने के लिए कुछ राजनेता तैयार नहीं है, कुछ नेता तो अपनी सरकारी निधि से दिये गये फंड का ऐसे ढ़िढोरा पीट रहे हैं जैसे उन्होंने लोगों पर बहुत बड़ा एहसान कर दिया है, यहां भी केवल कुछ अपवादों को छोड़ दे तो किसी भी राजनेता ने अपने निजी खाते से शायद ही सरकार या लोगों की कोई मदद की हो। मानव सभ्यता पर आये भयानक संकट के समय में भी वो देश के लोगों को एकजुट रखने की जगह हिन्दू-मुसलमान करने में लगे हैं, अपने राजनीतिक स्वार्थों को पूरा करने के लिए आपदा के समय में भी वोट बैंक के अनुसार लोगों को अलग-अलग बाट़ रहे हैं, वो भयंकर आपदा में भी लोगों को हालात की गलत जानकारी देकर बरगलाकर उनकों गलत कदम उठाने के लिए उकसा रहे हैं, जो देश की मौजूदा परिस्थितियों में देश व देशवासियों के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं है। यह हमारे देश के चंद नेताओं की अपने कार्य व समाज की जिम्मेदारी के प्रति घोर लापरवाही को उजागर करता है और उनका देश की जनता के प्रति गैरजिम्मेदाराना शर्मनाक रवैये वाले व्यवहार को दर्शाता है। लेकिन अभी तक हमारे देशवासियों पर ईश्वर की विशेष कृपा के चलते और अधिकांश लोगों के द्वारा बरती जा रही कोरोना वायरस से बचाव के लिए पूर्ण सुरक्षा व सावधानी के चलते हालात नियंत्रण में हैं। सरकार के द्वारा समय रहते लिए गये लॉकडाउन के निर्णय और अधिकांश जनता का उस पर खुद के द्वारा की गयी सख्ती व सही ढंग से अमल करने के चलते, देश में अभी तक तो इक्कीस दिन के चल रहे लॉकडाउन के दौरान हालात सरकार के पूर्ण नियंत्रण में हैं। लेकिन देश में भयानक आपदा के समय में भी हमारे कुछ राजनेताओं को चैन से नींद कहाँ है, उन्होंने पिछले कई दिनों से देश में हो रहे बड़े पैमाने पर प्रवासी लोगों के पलायन के नाम पर आरोप-प्रत्यारोप की ओछी राजनीति करना शुरू कर दी है। जबकि प्रवासी लोगों के द्वारा किया जा रहा यह पलायन कुछ जरूरतमंद मजबूर लोगों को छोड़कर बाकी का कहीं से भी उचित नहीं है, पलायन होने वाली राज्यों की सरकारों को समय रहते लोगों को समझाबुझाकर व उनकी जरूरत की मदद करके उसको रोकना चाहिए था, लेकिन कुछ नेताओं के द्वारा चतुराई के साथ अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की नीति के चलते उन्होंने पलायन को रोकने के लिए कोई प्रभावी ठोस कदम नहीं उठाया, बल्कि लोगों को पलायन के लिए उकसाया। वहीं इन कुछ लोगों के बेवजह शहरों से गांवों में पलायन करने कि जिद्द ने ना जाने देश के कितने लोगों में संक्रमण फैलाने के खतरे को बढ़ा दिया है। इन कुछ पलायन करने वाले लोगों ने आम-जनमानस के साथ-साथ शासन-प्रशासन के लिए बहुत बड़ा सिरदर्द पैदा करके पूर्ण नियंत्रण में अच्छे से चल रही लॉकडाउन की हालात को बेवजह बेहद तनावपूर्ण बना दिया है। 
कुछ लापरवाह नासमझ व्यक्तियों की गलतियों ने आपदा के समय में वास्तव में संकट में फंसे मजबूर व लाचर लोगों, परिंदों व बेजुबान जानवरों की मदद के अधिकांश अवसरों को छीन लिया है। 

लॉकडाउन के समय में देश में चंद नादान लोगों व चंद राजनेताओं के द्वारा उकसाने वाली की गयी ओछी हरकत से उत्पन्न किये गए अफरातफरी की हालातों में, यह सोचकर ही रुह कांप जाती है कि मजबूर, जरूरतमंद, दिहाड़ी मजदूर, रिक्शा वाले, फेरीवाले, भिखारी, विक्षिप्त, अन्य बेघर लोगों, परिंदों व बेजुबान जानवरों का क्या हाल हुआ होगा, किस तरह उन्होंने अपना पेट भरा होगा क्या अभी तक किसी भी राजनेता ने भी इसकी कल्पना की है?  क्या कोरोना आपदा के चलते संकट के इस माहौल के समय में भूख-प्यास से जूझ रहे इन सभी के पास समय से वास्तव में ईमानदारी से मदद पहुंच पायी होगी? इन बेचारों की स्थिति केवल सर्वशक्तिमान ईश्वर ही जानता है या फिर मदद में लगा हमारा सिस्टम जानता है। लेकिन जिसने जो किया उसमें ना उलझकर हम सभी को एक जिम्मेदार नागरिक बनते हुए, अपने आसपास इस तरह के हालात में फंसे मजबूर व लाचार इंसान और जीव-जंतुओं पर उसकी मजबूरी को हावी नहीं होने देना है समय रहते ही सभी के लिए भोजन पानी की व्यवस्था करनी है या प्रशासन से करवानी है। आपदा के समय बनें इस बदहाल अव्यवस्थित हालात के लिए जिम्मेदार कुछ राजनेताओं के द्वारा इस समय भी राजनीति चमकाने का काम जरूर शुरू कर दिया गया है और वो भयावह स्थिति की जिम्मेदारी के लिए आपदा के समय में भी एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने से बाज नहीं आ रहे हैं। 

कोरोना महामारी की हालात में लोगों को ध्यान रखना होगा कि वो केन्द्र सरकार व राज्य सरकार के दिये गये दिशानिर्देशों का  सही ढंग से पालन करें। लेकिन कुछ लोग है कि किसी भी तरह की हालात में भी सुधारने का नाम ही नहीं लेते है, सबसे शर्मनाक बात यह है कि भयंकर आपदा के समय में भी देश में हिन्दू-मुसलमान करना जारी है, धर्म की आड़ लेकर देश में चोरी-छुपे लोगों का इकट्ठा होना अभी भी जारी है, जबकि सरकार बार-बार चेता रही है कि सोशल डिस्टेंसिंग का हर हाल में पालन करें, वरना लोगों को बहुत बड़ा खामियाजा उठाना पड़ सकता है, जिसका नमूना देश की राजधानी दिल्ली में देखने को मिला है, जहां निजामुद्दीन में तब्लीगी-ए-जमात के कार्यक्रम में पिछले कुछ दिनों में हजारों लोग आए थे। इनमें देश के 19 अलग-अलग राज्यों के निवासियों के साथ-साथ बंग्लादेश, चीन, इंडोनेशिया, मलेशिया और थाईलैंड आदि बहुत सारे देशों के विदेशी लोग भी शामिल थे। सूत्रों के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा घोषित 22 मार्च के लॉकडाउन की घोषणा के बाद भी यहां पर लगभग 2 हजार से ज्यादा लोग ठहरे हुए थे, देश की राजधानी दिल्ली के खूफिया तंत्र की खस्ताहाल हालात देखिए कि उनकी नाक के नीचे लोगों के इकट्ठा होने का सारा खेल चलता रहा और वो हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहे। इस मामले की सूचना अंडमान निकोबार प्रशासन ने जमात के कार्यक्रम से वापस आये 2 लोगों के कोरोना से संक्रमित पाये जाने पर केंद्र सरकार को तुरंत दे दी थी, लेकिन देश में वीवीआईपी का अघोषित दर्जा प्राप्त धर्मों के तथाकथित ठेकेदारों व उनके कार्यक्रमों पर सिस्टम के द्वारा कोई कार्यवाही करने की आसानी से हिम्मत नहीं होती है, आपदा के समय में मरकज के इस ज्वंलत मसले पर 24 मार्च से 29 मार्च तक सरकारों की तेरी ठोपी उसके सर करने की नीयत रही और केवल इस मसले पर कागजों में खानापूर्ति की जाती रही, लेकिन 30 मार्च को जब बात मीडिया के संज्ञान में आयी, तब तक इकट्ठा लोगों की जमात में कोरोना संक्रमित लोगों ने अन्य को गंभीर बिमारी बाट़ दी। इसके बाद ही जमात पर कानून कार्यवाही शुरू हुई है। जिसके चलते जमात में शामिल लोगों के कोरोना संक्रमित होने की आशंका के चलते संदिग्धों को जांच के लिए दिल्ली के अस्पताल भेजा गया है, जहां बहुत सारे लोगों की जाचं रिपोर्ट में कोरोना संक्रमण पाया गया है। सरकार ने यहां इकट्ठा लोगों को निकाला कर क्वारंटाइन में रखने के लिए भेजा दिया। वहीं दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार व उसके मंत्री मीडिया के सामने कर्ताधर्ताओं पर सख्त कार्यवाही करने के लिए बोल रहे हैं, इस मसले पर आयोजकों पर एफआईआर दर्ज हो गयी है। लेकिन आपदा के समय में राजनीति के गंदे खेल के चलते और चंद नेताओं की कृपा से इस मसले पर सख्त कार्यवाही की जगह राजनीति शुरू हो गयी है। हालांकि पुलिस ने क्षेत्र के लोगों की सुरक्षा के मद्देनजर निजामुद्दीन के पूरे इलाके से इस मरकज वाली इमारत के एरिया को सील करके अलग-थलग कर दिया है। अब सरकार के सामने बहुत बड़ी चुनौती है कि वो जमात के कार्यक्रम में शामिल हुए 19 राज्यों के लोगों की जल्द से जल्द पहचान करके संक्रमण को लोगों मे फैलने से कैसे रोकें, इसके लिए सभी राज्यों से संपर्क करके लोगों की पहचान के कार्य को युद्ध स्तर पर अंजाम दिया जा रहा है, जिसमें राज्यों को काफी सफलता हाथ लगी है। अब चाहे कुछ भी होता रहे लेकिन यह तय है कि इन लोगों की लापरवाही व नादानी भरी हरकत ने लॉकडाउन के उद्देश्य को पलीता जरूर लगा दिया है। वहीं इस जमात के कार्यक्रम में शामिल लोगों के संदर्भ में अलग-अलग राज्यों से आ रही जानकारी के अनुसार सरकार ने बताया कि इस आयोजन में हिस्सा लेनेे वाले 9 लोगों की कोरोना संक्रमण के चलते मौत हो गई है, जो देश व समाज के हित में बेहद भयावह खबर है। सबसे बड़ी चिंता की बात यह की जमात के इस आयोजन में शामिल लोग ने सरकार के द्वारा बनाये गये बचाव के नियमों का पालन ना करके व एडवाईजरी की अनेदखी करके, ये लोग बेखौफ होकर देश के अलग-अलग भागों में मस्जिदों में अन्य लोगों से मिलते घूम रहे है, इन चंद लोगों की यह भंयकर गलती ना जाने कितने लोगों की अनमोल जिंदगी पर भारी पड़ेगी यह तो आने वाला समय ही तय करेगा। लेकिन कुछ राजनेताओं व सोशलमीडिया के इंसान व इंसानियत के दुश्मन वीरों की कृपा से सारे मसले पर हिन्दू-मुसलमान का रंग जरूर चढ़ा दिया गया है।

कोरोना वायरस की चपेट में आये विश्व के साधन संपन्न सुपरपावर ताकतवर देशों का वायरस के संक्रमण के सामने सरेंडर करना और उनकी भयानक स्थिति से आज हम सभी लोगों को और हमारी सरकार को समय रहते सीखना होगा, क्योंकि हमारे 130 करोड़ लोगों की जनसंख्या वाले देश में कुछ लोगों की नादानी व कुछ नेताओं की कृपा से अब जो स्थिति दिखाई दे रही है, उससे यह साफ होने लगा है कि लोगों की नादानी, राजनेताओं की स्वार्थ के वशीभूत होकर की गयी ओछी राजनीति, भयंकर आपदा से जूझ रहे देश व देशवासियों पर अब बहुत भारी पड़ सकती है। इसलिए अब हम सभी जागरूक देशवासियों को यह ध्यान रखना होगा कि कुछ नादान लोगों के द्वारा की गयी लॉकडाउन की अवेहलना के चलते, कोरोना वायरस का संक्रमण देश में बड़े स्तर पर किसी भी हालात में ना फैल पाये। क्योंकि उस भयावह स्थिति में कोरोना जैसी भयंकर महामारी से लड़ने के लिए हमारे पास विकसित देशों की तरह भरपूर संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। बल्कि हमारे देश में उच्च गुणवत्ता पूर्ण चिकित्सा से जुड़े हुए संसाधनों व चिकित्सकों का तो सामान्य दिनों में भी अभाव रहता है। हमारे देश में आबादी के अनुपात में जाचं के लिए ना ही तो कोरोना की जांच में इस्तेमाल होने वाली किट मौजूद हैं, ना ही मरीजों के बचाव के लिए प्रर्याप्त संख्या में डॉक्टर व नर्सिंग स्टाफ मौजूद हैं, ना मरीजों के लिए जरूरत के मुताबिक आइसोलेशन वार्ड मौजूद हैं, ना ही वेंटिलेटर व ना ही अन्य जीवन रक्षक चिकित्सा उपकरण मौजूद हैं। सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि  मरीजों के उपचार में और सिस्टम में व्यवस्था बनाने में लगे हुए सभी जाबांज़ कोरोना वारियर्स की सुरक्षा के लिए जरूरी वस्तुओं की आज आपदा के समय में भी भारी किल्लत है, इलाज में लगे डॉक्टरों व नर्सिंग स्टाफ की संक्रमण से सुरक्षा लिए पीपीई सूट, एन 95 मास्क व अन्य सुरक्षा के लिए जरुरी वस्तुओं तक की भारी किल्लत है, जो स्थिति इन कोरोना वारियर्स की कार्य करने की क्षमता व कार्यशैली को प्रभावित कर सकती है, हालांकि संतोष की बात यह है कि हमारी सरकार ने अन्य देशों की स्थिति से सबक लेकर समय रहते ही इन सभी के लिए युद्ध स्तर पर तैयारी शुरू कर रखीं है। वहीं इस आपदा से लड़ने के जज्बे को देखें तो अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के बलबूते आज दक्षिण कोरिया जैसा दुनिया का एक छोटा-सा देश के लाखों लोगों की कोरोना जांच कर चुका है, वह हर जगह को सेनेटाइज करवा कर संक्रमण को बहुत तेजी से नियंत्रित कर रहा है। जबकि दूसरी तरफ हमारे देश में संसाधनों की भारी कमी व सिस्टम में शामिल कुछ लोगों की अपनी जिम्मेदारी के प्रति दृढ़ इच्छाशक्ति के अभाव के चलते हमारे देश के बड़े-बड़े शहर तक भी समय से सेनेटाइज नहीं हो पा रहे हैं, तो कस्बों व गांव का क्या हाल होगा आप खुद सोच सकते हैं, हमारे देश में कोरोना के संभावित मरीजों की जांच भी बहुत कम संख्या में हो पा रही हैं। इस तरह की आपात स्थिति में सबसे जरूरी कदम यह है कि देश का प्रत्येक नागरिक व राजनेता अपनी जिम्मेदारी को देशहित में समय रहते समझें और उसका सही ढंग से पालन करें। इक्कीस दिनों के चल रहे लॉकडाउन के पीरियड़ के समय में हम सभी देशवासियों को यह ध्यान रखना है कि कोरोना वायरस के भयावह प्रकोप से बचने के लिए संयम, संकल्प व दृढ़ इच्छाशक्ति से केंद्र व राज्य सरकार द्वारा उठाए जा रहे हमारे बचाव संबंधी कदमों और जीवन रक्षक उपायों की हम लोग जरा भी अवहेलना नहीं करेंगे, उनका ध्यान से सावधानी पूर्वक पूर्ण सुरक्षा बरतते हुए अक्षरशः पालन करेंगे। कोरोना आपदा के समय में यही हम सभी देशवासियों की सबसे बड़ी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है, जिसका हम सभी लोग अपने प्यारे देश व देशवासियों की खातिर दिल से व पूर्ण जिम्मेदारी और ईमानदारी से पालन करेंगे और चंद जाहिल लोगों की तरह कोई नादानी नहीं करेंगे, यही हमारा आपदा से जूझ रहे देश के लिए सबसे बड़ा सहयोग व अनमोल योगदान होगा।

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।