सोमवार, 27 जनवरी 2020

युद्ध लड़ने की हनक, बदला लेने की सनक में विमान पर हमला करके 176 लोगों की जिंदगियों को लील गया ईरान

युद्ध लड़ने की हनक, बदला लेने की सनक में विमान पर हमला करके 176 लोगों की जिंदगियों को लील गया ईरान

हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार

हम सभी अच्छी तरह से जानते हैं कि युद्ध की हनक भी बहुत भयंकर त्रासदी लेकर आती है, ना जाने कितने लोग अहंकार के चलते होने वाले इस टकराव में एक पल में असमय काल का ग्रास बन जाते हैं। जिसका ताजा उदाहरण ईरान व अमेरिका का तनाव हैं। जब से अमेरिकी सेना ने ईरान के सेना के टॉप कमांडर कासिम सुलेमानी को अपने ड्रोन हमले में मौत के घाट उतारा है तब से ही जिस तरह से ईरान के द्वारा "युद्ध लड़ने की हनक, बदला लेने की सनक" बेहद आक्रामक अंदाज में जारी थी वह 176 निर्दोष यात्रियों व उनके परिजनों को हमेशा के लिए गहरे जख्म दे गयी है। क्योंकि जिस तरह से ईरान ने मानवीय भूल के चलते यूक्रेन के यात्री विमान पर मिसाइल से हमला किया था, जिसके चलते इसमें सवार सभी 176 यात्रियों की मौत हो गई मारे गए लोगों में ईरान के 82, कनाडा के 63, यूक्रेन के 11, स्वीडन के 10, अफ़गानिस्तान के 4, जर्मनी और ब्रिटेन के तीन-तीन लोगों की जिंदगियों को असमय लील लिया गया है। यह स्थिति सभ्य शांतिप्रिय समाज के लिए बहुत ही चिंताजनक है, आप बदला लेने के लिए इतने उतावले व अंधे हो जाते हो कि सही व गलत तक का निर्णय भी समय रहते नहीं कर पाते हो।

आपको बता दे कि जब से ईरान की राजधानी तेहरान के पास पिछले बुधवार को यूक्रैन का एक यात्री विमान हादसे में क्रैश हुआ था। जिसे उस समय ईरान सरकार के द्वारा हादसा करार दिया जा रहा था, लेकिन हादसे के बाद से ही अमेरिका व कुछ अन्य देशों के द्वारा इस बात की आशंका जताई जाने लगी थी कि कहीं किसी ने इस विमान को साजिशन तो नहीं मार नहीं गिराया है। सुत्रों के अनुसार बताया जा रहा है कि हादसे के वक्त यूक्रेन के इस विमान में 176 लोग मौजूद थे जिनमें से कोई भी जीवित नहीं बचा पाया था। यह हादसा ईरान में तेहरान एयरपोर्ट के पास हुआ था। जिसकी शुरुआती जांच के मुताबिक ये कहा जा रहा था कि हादसा प्लेन में तकनीकी खराबी के चलते हुआ है। लेकिन अमेरिका व ईरान के तनाव पूर्ण माहौल के वक्त हुए इस दर्दनाक हादसे के समय को देखते हुए लोगों के बीच तरह-तरह की चर्चाएं लगातार चल रही थी की यह यात्री विमान हादसा नहीं बल्कि ईरान व अमेरिका के हालात के चलते किसी के षड्यंत्र का शिकार हुआ है।

इस हादसे को लेकर विश्व समुदाय के बीच तरह-तरह की आशंकाए बलबती होती जा रही हैं। हादसे के बाद बृहस्पतिवार को ही कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो और ब्रिटिश पीएम बोरिस जॉनसन ने अपने खुफिया सूत्रों के हवाले से दावा किया था कि विमान ईरान की मिसाइल टकराने से ही दुर्घटनाग्रस्त हुआ है। लेकिन शनिवार को ईरान सरकार के कबूलनामे के बाद अब विश्व समुदाय की वो शंका एकदम सही निकली है, जिस तरह से ईरान ने शनिवार को कबूला है कि उसकी सेना ने गलती से यूक्रेन के यात्री विमान को मिसाइल से निशाना बना दिया था। ईरान की सरकार ने अपने बयान में इसे इंसान के द्वारा की गयी मानवीय भूल बताया है। हालांकि इससे पहले ईरान ने हादसे के दो दिन बाद तक विमान पर किसी भी तरह के मिसाइल हमले की बात से विश्व समुदाय के सामने लगतार इनकार किया था, उसने इस हादसे को तकनीकी खराबी के चलते होने वाली मात्र एक दुर्घटना बताया था। ईरान ने अमेरिका, कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो और ब्रिटिश पीएम बोरिस जॉनसन से विमान हादसे पर किये जा रहे दावों के सबूत सौंपने के लिए कहा था, लेकिन शनिवार को आखिरकार ईरानी सरकार ने अपनी गलती कबूलते हुए कहा कि यूक्रेन का जो यात्री विमान 8 जनवरी 2020 को तेहरान के एयरस्पेस में दुर्घटनाग्रस्त हुआ था जिसमें 176 यात्रियों की मौत हो  गयी थी।

ईरानी सेना के अनुसार यह यात्री विमान ईरान के रेवॉल्यूशनरी गार्ड्स के बेस के काफी नजदीक उड़ान भर रहा था। ऐसे में इसके उड़ान भरने का ढंग और ऊंचाई देखकर मानवीय भूल के चलते यह विमान ईरानी सेना के द्वारा दुश्मन के टारगेट के तौर पर चिन्हित कर लिया गया और इसी वजह से ईरान के द्वारा विमान पर मिसाइल दागी गईं। ईरान के विदेश मंत्री जावेद जरीफ ने अपनी कूटनीतिक चाल चलते हुए इस यात्री विमान हादसे के लिए अमेरिका को भी जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की है। उन्होंने कहा, यह अमेरिका के दुस्साहस की वजह से हुआ है। ईरानी सेना ने अपने बयान में कहा है कि उसे अमेरिका की तरफ से अपने संवेदनशील रक्षा क्षेत्रों और अन्य ठिकानों पर हमले की सटीक जानकारी मिली थी। जिसके चलते ईरान की एंटी-एयरक्राफ्ट यूनिट्स ने बहुत ज्यादा संवेदनशील तरीके को अपनाते हुए मानवीय भूल के चलते यूक्रेन के इस यात्री विमान को मार गिराया।

शनिवार को ईरानी सेना के इस कबूलनामे के बाद अब ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने एक ट्वीट करके कहा है कि, “सेना की आतंरिक जांच में सामने आया है कि मानवीय भूल के चलते मिसाइल हमले में यूक्रेन का विमान क्रैश हुआ और 176 लोगों की मौत हुई। इस बड़ी त्रासदी और अक्षम्य घटना के जिम्मेदारों की पहचान और उन पर कार्रवाई के लिए जांच जारी रहेगी। ईरान इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना पर गहरा दुख व्यक्त करता है। मृतकों के परिजनों के प्रति मेरी संवेदना"।
इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद हर समय युद्ध के लिए उतावले रहने वाले देशों को एकबार पुनः विचार करना होगा कि "युद्ध की हनक व बदला लेने की सनक" में वो कब तक इंसान व इंसानियत के दुश्मन बने रहेंगे। इस पर दुनिया के सभी मठाधीशों को सच्चे मन से विचार करना होगा।

सोमवार, 20 जनवरी 2020

निर्भया के दोषियों की फांसी पर अंतिम मोहर, अपराधियों के लिए सुधर जाने का सबक



निर्भया के दोषियों की फांसी पर अंतिम मोहर, अपराधियों के लिए सुधर जाने का सबक 

हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार

देश में महिलाओं को उपभोग की वस्तु मानकर उनकी अस्मिता से खिलवाड़ करने वालों सुधर जाओं, अब ऐसे अपराधियों को देश में फांसी लगने की शुरुआत बहुत जल्द होने वाली है। 16 दिसंबर 2012 की स्याह रात को जब लोग चैन से अपने घरों में सो रहे थे, तब देश का दिल राजधानी दिल्ली में निर्भया के साथ सड़क पर दौड़ती बस में रेप करके इंसानियत को शर्मसार करने वाली ऐसी हैवानियत को अंजाम दिया गया था, जिससे सारा देश एकजुट होकर बेहद आक्रोशित होकर बहन, बेटी व सभी महिलाओं की सुरक्षा के लिए सड़कों पर उतर गया था। देश में हर तरफ से केवल एक मांग उठ रही थी कि निर्भया के दोषियों को जल्द से जल्द फांसी दो। लेकिन हमारे यहाँ कछुए की चाल से चलने वाली कार्यपालिका व न्यायिक प्रक्रिया के चलते, वर्ष 2012 के निर्भया गैंगरेप के इस झकझोर देने वाले मामले के सभी दोषियों की फांसी पर सात साल की लम्बी जटिल कानूनी प्रक्रिया के बाद 7 जनवरी 2020 मंगलवार को पटियाला हाउस कोर्ट ने अपनी मोहर लगा दी है। कोर्ट ने मंगलवार को डेथ वॉरंट जारी करते हुए आदेश दिया है कि इन चारों दोषियों को 22 जनवरी को सुबह 7 बजे फांसी दे दी जाएगी। आखिरकार मंगलवार को सभी देशवासियों की 7 साल पुरानी मांग पर अदालत ने डेथ वॉरंट जारी करके अपनी अंतिम मोहर लगा दी। इस निर्णय के बाद जहां एकतरफ लोगों में खुशी है वहीं लम्बी जटिल कानूनी अदालती प्रक्रिया के प्रति आक्रोश भी व्याप्त है, लोगों का मानना है कि न्याय मिलने में देरी भी पीड़ित पक्ष के साथ बड़ा अन्याय है, इसलिए सरकार को पीड़ित को समय से न्याय दिलाने के लिए कारगर तंत्र धरातल पर विकसित करना चाहिए। देश का हर कानून पंसद व्यक्ति 2012 से ही एक-एक दिन गिनकर निर्भया कांड के दोषियों की फांसी का बेहद बेसब्री से इंतजार कर रहा था। अधिकांश न्यायप्रिय देशवासियों का मानना है कि निर्भया के दोषियों को फांसी के फंदे पर झूलता देखकर देश में भविष्य में महिलाओं के प्रति अपराध में आश्चर्यजनक रूप से कमी आयेगी, निर्भया कांड का यह निर्णय आने वाले समय में लोगों के लिए नजीर बनेगा और अपराधियों में मौत के फंदे पर झूलने का पल-पल खौफ पैदा करेगा।
इस निर्णय पर अब तत्काल अमल होना इसलिए बेहद जरूरी है कि क्योंकि आज भी हमारे देश में बहन-बेटियों के प्रति लगातार इंसानियत को शर्मसार करने वाली हृदय विदारक घटनाओं का शर्मनाक दौर जारी है। आयेदिन कहीं ना कहीं कोई माता, बहन, बेटी इन इंसानियत के नाम पर कंलक, वहशी, राक्षस, दरिंदों की दरिंदगी व हैवानियत का शिकार बन जाती है। ये शर्मनाक हालात आज हमारे देश में महिलाओं की जानमाल की सुरक्षा के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बन गये है। जिसको आने वाले समय में कम करने व रोकने में निर्भया कांड के दोषियों की फांसी मदद अवश्य करेगी।

वैसे तो हमारे देश में कानून के कम होते सम्मान व भय के चलते हर तरह के अपराध चरम पर हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह महिलाओं के प्रति हैवानियत के मामलों में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई है वह चिंताजनक है। देश की पुलिस की कार्यप्रणाली और निचली अदालत से लेकर सर्वोच्च अदालत तक की लम्बी व बेहद  जटिल न्यायिक प्रक्रिया के चलते अपराधियों के हौसले बुलंद व पीड़ित के हौसले पस्त हो जाते हैं, जिसमें तत्काल सुधार की आवश्यकता है। आज की मौजूदा परिस्थितियों में देखें तो देश की राजधानी सहित अधिकांश राज्यों की स्थिति यह है कि वहां अपराध चरम पर हैं अपराधियों के हौसले बुलंद हैं। सभी राज्यों में महिलाओं के प्रति अपराध अपने चरम पर हैं। सभी जगह भोलीभाली जनता अपराध व अपराधियों से त्रस्त है, सिस्टम में बैठे अपने आकाओं की कृपा से व भ्रष्ट सिस्टम के आशिर्वाद से अपराधी बेखौफ कानून को अपनी जेब में रखकर अपराध करने में मस्त हैं। लेकिन देश में महिलाओं के प्रति जिस तरह अपराध बढ़े हैं वह स्थिति बेहद चिंताजनक है। उसके लिए कहीं ना कहीं हमारे समाज में लोगों के कम होते संस्कार, आज के व्यवसायिक दौर में खत्म होती नैतिकता, आपस में एकदूसरे की मदद ना करने का हम सभी का भाव भी जिम्मेदार हैं। अफसोस की बात है कि यह स्थिति संस्कारों के अभाव में उस देश में उत्पन्न हो गयी है जिस देश की संस्कृति में स्त्री को सर्वोच्च स्थान देकर पूजा जाता है, जहां कदम-कदम पर माता, बहन व बेटियों के सम्मान की खातिर प्राण न्यौछावर करना सिखाया जाता है। 


खैर निर्भया के मसले पर अब देशवासियों का इंतज़ार खत्म होने वाला है देर से ही सही अब वह वक्त आ गया है जब निर्भया रेप कांड के दोषियों को फंसी के फंदे पर झुलाकर निर्भया को सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित की जायेगी। अब इस तरह के अन्य मामलों में भी देशवासियों को उम्मीद बनी है कि यह मामला भविष्य में नजीर बनकर दोषियों को फांसी दिलायेगा और महिलाओं के प्रति होने वाली हैवानियत में कमी लायेगा। केंद्र व राज्य सरकारों के तंत्र को भी अपराधियों में कानून का भय व सम्मान पैदा करने के लिए इस तरह के सभी मामलों में फास्टट्रैक कोर्ट में चलाकर अपराधी को जल्द से जल्द सख्त सजा देकर समाज के सामने नजीर पेश करनी होगी, तब ही इस हालात में सुधार हो पायेगा और देश में मातृशक्ति सुरक्षित रह पायेंगी और फिर किसी निर्भया के परिवार के साथ न्याय मिलने में होने वाली देरी का अन्याय नहीं होगा।

बुधवार, 15 जनवरी 2020

शिक्षा की जगह ओछी राजनीति का अखाड़ा बनता शिक्षा का मंदिर जेएनयू


शिक्षा की जगह ओछी राजनीति का अखाड़ा बनता शिक्षा का मंदिर जेएनयू

हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार

जेएनयू कैंपस में नकाबपोश गुंडों के द्वारा जिस तरह से बेखौफ होकर प्रोफेसर व छात्रों से मारपीट करके कैंपस में तोडफ़ोड़ की गयी है, यह हालात जेएनयू की छवि के लिए चिंताजनक हैं। विश्वस्तरीय विद्वानों को तैयार करने वाला शिक्षा का प्रसिद्ध मंदिर जेएनयू जिस तरह से हाल के वर्षों मैं आयेदिन ओछी राजनीति की प्रयोगशाला बन रहा है, वह जेएनयू के छात्रों के भविष्य के लिए अच्छा संदेश नहीं है। जिस तरह से विचारधारा की आड़ में अपना वर्चस्व साबित करने के लिए कुछ अराजक तत्वों के द्वारा विश्वविद्यालय परिसर में लाठी डंडे, हथियारों से लैस होकर छात्रों पर जानलेवा हमला किया गया है और कैंपस में तोडफ़ोड़ की गयी है वह बेहद शर्मनाक घटना है। इस घटना ने हमारे देश के विश्वविद्यालयों में बढ़ती ओछी राजनैतिक दखलंदाजी की पोलखोल कर रख दी है, देश के प्रतिष्ठित शिक्षा के मंदिरों की हालात को भी सभी देशवासियों के सामने रख दिया है। विश्वविद्यालय परिसरों में आयेदिन होने वाली इस तरह के झगड़ों की घटनाओं ने हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था व उसको संभालने वाले शासन-प्रशासन के तंत्र की कार्यशैली पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। देश के नीतिनिर्माताओं व आम देशवासियों के लिए सोचने वाली बात यह है कि चंद लोगों की ओछी राजनीति के स्वार्थ को पूरा करने के लिए, देश के शिक्षा के मंदिर स्कूल, कॉलेज व विश्विद्यालयों का राजनीतिकरण कहां तक उचित है, क्या उनको राजनीति का अखाड़ा बनाना ठीक है, क्या यह देशहित में सही कदम है। जेएनयू की इस घटना के बाद इस पर हम सभी देशवासियों को निष्पक्ष रूप से व शांत मन से विचार अवश्य करना चाहिए। जिस शिक्षा के मंदिर जेएनयू में मेहनत की भट्टी में तपाकर छात्रों को तराश कर योग्य इंसान बनाने का कार्य किया जाता था। आज वहाँ कुछ राजनेताओं के निजी एजेंडे को पूरा करने के लिए कुछ छात्रों का जमकर राजनीति के लिए आयेदिन इस्तेमाल हो रहा है। जिससे इस प्रतिष्ठित संस्थान की छवि को देश ही नहीं विदेशों में भी बट्टा लग रहा है, लेकिन उसके बाद भी हमारा सिस्टम कुम्भकर्णी नींद में सोया हुआ है। उसने हालात को सुधारने के लिए अभीतक कोई ठोस प्रयास धरातल पर नहीं किये हैं।

जिस जेएनयू से निकलने वाले  छात्र आज भी देश के सर्वोच्च पदों पर आसीन होकर देश के शासन-प्रशासन की व्यवस्था को चला रहे हैं, वहीं जेएनयू आज उन्हीं लोगों की उपेक्षा का शिकार क्यों हो रहा है। केंद्र सरकार के पदों पर आसीन लोगों पर निगाह डाले, तो आज भी हम पाते हैं कि मोदी सरकार के सबसे महत्वपूर्ण पदों पर जेएनयू से पढ़े-लिखे लोग ही विराजमान हैं। यहां तक की देश के वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी उठाने वाली मंत्री निर्मला सीतारमन भी जेएनयू से शिक्षा प्राप्त हैं और सबसे बड़ी बात यह है कि सत्ता पक्ष व विपक्ष के शीर्ष पदों पर आसीन कुछ राजनेता भी जेएनयू से शिक्षित हैं। फिर भी जेएनयू के गतिरोध को खत्म करके वापस शिक्षा की पटरी पर लाने के लिए कोई कारगर ठोस पहल सत्ता पक्ष व विपक्ष के द्वारा क्यों नहीं हो रही है, यह बेहद चिंतनीय है। 

अगर हम देश के अन्य क्षेत्रों की बात करे तो देश के निजी क्षेत्र के शीर्षस्थ पदों पर, शिक्षण के क्षेत्र में और इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट मीडिया के क्षेत्र में भी जेएनयू से पढ़े लोगों की भरमार है। फिर भी जेएनयू की हालात दिनप्रतिदिन शिक्षा की जगह अन्य गतिविधियों पर केंद्रित क्यों होती जा रही है, विश्वविद्यालय प्रशासन इस हाल पर कबुतर की तरह आँखों को बंद करके क्यों बैठा हुआ है, वह यह क्यों नहीं सोचता की परिस्थितियों से आँखें फेरने से मौजूदा संकट का समाधान नहीं निकल सकता उसके लिए धरातल पर काम करना होगा।  सरकार से जुड़े बहुत सारे लोग जगह-जगह अपने बयानों में कहते हैं कि जेएनयू राष्ट्र विरोधी लोगों का गढ़ बन गया है, उनका मानना है कि जेएनयू के छात्र, देश और समाज को तोड़ने में लगे हुए है, तो भाई आप सत्ता में हो फिर आप कोई ठोस कार्यवाही इस तरह के छात्रों पर क्यों नहीं करते हो, सार्वजनिक रूप से एक प्रतिष्ठित संस्थान की छवि खराब करने की जगह इस शिक्षा के मंदिर को बचाने के लिए धरातल पर पहल क्यों नहीं करते हो।

देश में हाल के दिनों में जिस तरह अलग-अलग विश्वविद्यालयों में बवाल कटा है, उन हालातों को देखकर लगता है कि अब देश में वह समय आ गया है जब केंद्र व राज्य सरकारों को यह तय करना होगा कि उनको शिक्षा के मंदिरों को चंद लोगों व छात्रों की ओछी राजनीति का अखाड़ा बनने देना है या फिर पढ़ने लिखने आने वाले अधिकांश छात्रों की पढ़ाई का केंद्र बनाना है। क्योंकि आजकल देश के विश्वविद्यालयों में जिस तरह की राजनीति दिखाई पड़ती है, उससे लोगों के दिमाग में शिक्षा के इन मंदिरों की नकारात्मक तस्वीर उभरती है। जिन विश्वविद्यालयों में कभी छात्र उच्च गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा का पाठ पढ़ते थे, आज वहां शिक्षा का बहुत  बुरा हाल है, जहां कभी छात्र आपसी चर्चाओं में शिक्षा, रोजमर्रा के लोक हित के व्यवहारिक ज्ञान व तथ्यों पर आधारित वैचारिक राजनीति की दीक्षा लेते थे और चर्चा करते थे, आज वहां शिक्षा-दिक्षा का स्तर बहुत तेजी से गिर रहा है। अधिकांश छात्र नेता छात्रों के हितों की बात करने की जगह स्वयं का स्वार्थ पूरा करने के लिए चंद राजनेताओं के हाथों की कठपुतली बन कर रह गये हैं। जो स्थिति शिक्षा के मंदिरों के लिए व छात्रों के भविष्य के लिए ठीक नहीं है। देश में अब वह समय आ गया है जब केंद्र व राज्य सरकारों को तय करना होगा कि उनको विश्वविद्यालयों को शिक्षा का मंदिर बनाना है या चंद राजनैतिक लोगों के छुपे हुए एजेंडा को पूरा करने व ओछी राजनीति के लिए इस्तेमाल होने वाला अखाड़ा बनने देना है।

शुक्रवार, 3 जनवरी 2020

*शौर्य गाथा मेजर आसाराम त्यागी*अदम्य साहस वीरता व शौर्य की प्रतिमूर्ति मेजर आसाराम त्यागी



*शौर्य गाथा मेजर आसाराम त्यागी*

अदम्य साहस वीरता व शौर्य की प्रतिमूर्ति मेजर आसाराम त्यागी

हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार

भारतीय इतिहास में एक से बढ़कर एक वीर योद्धा हुए हैं जिन्होंने अपनी वीरता और युद्ध कौशल से इतिहास में अपना नाम  स्वर्णिम अक्षरों में हमेशा के लिए अजर-अमर कर लिया, अगर हम आजादी के बाद भारत के इतिहास की जानकारी करें, तो पता चलता है कि मेजर आसाराम त्यागी भी माँ भारती के उन वीर योद्धाओं में शामिल हैं जिन्होंने देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों की परवाह ना करते हुए युद्ध के मैदान में अदम्य साहस व वीरता का परिचय देते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिये थे। वैसे तो नापाक पाकिस्तान की नापाक हरकतें हर हिन्दुस्तानी के दिलों-दिमाग में हर वक्त रहती हैं, लेकिन वर्ष 1965 में भारत-पाक के बीच लड़े गए युद्ध की यादें आज भी बहुत सारे लोगों के जहन में एकदम ताजा हैं। खासकर उन लोगों के जिन्होंने इस युद्ध में अपने घरों के अनमोल चिरागों को युद्धभूमि में हमेशा के लिए खो दिया था। देश के सभी 'महावीरों' की इसी वीरगाथा की कड़ी में ‘मेजर आसाराम त्यागी’ भी एक बहुत महत्वपूर्ण नाम है। मेजर आसाराम त्यागी ने वर्ष 1965 के भारत-पाक युद्ध में जाट रेजिमेंट की अपनी बटालियन की तरफ से कारगर रणनीति, कुशल युद्ध कौशल व अदम्य साहस का परिचय देते हुए युद्ध भूमि में दुश्मनों के दांत खट्टे करने का काम बाखूबी किया था। 
जब मेजर आसाराम त्यागी को डोगरई फतेह का जिम्मा मिला, और उनकी 3 जाट बटालियन को पाकिस्तान के डोगरई गांव में दुश्मन की स्थिति पर कब्जा करने का कार्य दिया गया। उस समय की परिस्थितियों के अनुसार सामरिक दृष्टि से यह चुनौती बहुत बड़ी व महत्वपूर्ण थी क्योंकि इस स्थल पर दुश्मन अच्छी पोजीशन में था। इसके बावजूद मेजर आसाराम त्यागी ने आगे बढ़कर इस चुनौती को सहर्ष स्वीकार किया और अपने दल के साथ निडरता के साथ लक्ष्य की तरफ आगे बढ़ चले।
उन्होंने पाकिस्तान के डोगरई मोर्चे पर फतह हासिल करने के लिए अपने प्राण माँ भारती के श्री चरणों में अर्पित कर भारतीय सेना को जंग के इस मोर्चे पर विजय दिलाई थी। उन्होंने जंग के मैदान में अद्‍भुत शौर्य व वीरता का प्रदर्शन किया और युद्ध खत्म होने के पहले तक गम्भीर रूप से घायल होने की अवस्था में भी बहादुरी के साथ दुश्मन की सेना का युद्ध मोर्चे पर जमकर सामना किया था। वीर मेजर त्यागी युद्ध भूमि में घायल होने और खून से लथपथ होने के बावजूद भी अपने सैनिकों के लगातार हौसलें को बढ़ाते हुए, उनके साथ युद्धभूमि में दुश्मन की सेना के हर कदम
का डटकर मुकाबला किया था और एक के बाद एक दुश्मन देश के सैनिकों को भारतीय सेना के रास्ते से हटाते चले गए थे। इस मोर्चे की लड़ाई पर कई भारतीय वीर सपूत जाबांजी से लड़ते हुए अपने वतन पर न्यौछावर हो गए थे।  
आईये आज हम सभी देशवासी भारत माता के इस लाड़ले अजर-अमर सपूत मेजर आसाराम त्यागी के युद्ध पराक्रम की शौर्य गाथा को जानने का प्रयास करते हैं।

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जनपद के मोदीनगर तहसील के फतेहपुर गांव में रहने वाले सागुवा सिंह त्यागी के यहाँ 2 जनवरी 1939 को मेजर आसाराम त्यागी का जन्म हुआ। बचपन से ही वह बहुत चुस्त-दुरुस्त, तेजतर्रार व फुर्तीले थे, जिससे देखकर लोगों ने उनके पिता से कहना शुरु कर दिया था कि सागुवा देखना तुम्हारा यह बेटा बड़ा होकर, तुम्हारा व तुम्हारे परिवार का नाम एकदिन पूरे देश में रोशन करेगा। उस समय आसाराम त्यागी के पिता मुस्कुराते हुए लोगों का अभिवादन कर देते थे, किन्तु उन्हें भी बिल्कुल इस बात का आभास नहीं था कि एक दिन सच में अपनी वीरता के दम पर उनका बेटा आसाराम देश ही नहीं पूरी दुनिया में उनका नाम हमेशा के लिए अजर-अमर कर देगा।
धीरे-धीरे समय बीता गया आसाराम बड़े हो गये, इसी बीच उनके मन में सेना का हिस्सा बनाने का विचार आया। चूंकि, अब उनके दिल और दिमाग में सिर्फ सेना की ही तस्वीरें घर चुकी थी, इसलिए आसाराम ने सेना में जाने के लिए जबरदस्त मेहनत के साथ तैयारियां शुरू की और भारतीय सेना को अपने जीवन का अभिन्न अंग बना लिया। अपनी कड़ी मेहनत, योग्यता और हुनर के बदोलत 17 दिसंबर, 1961 को जब उनके कंधे पर देश की प्रतिष्ठित जाट रेजिमेंट के फीते लगे, तो वह देश के सभी गरीब, किसान व खेतिहर मजदूरों के परिवारों को यह संदेश देने में कामयाब रहे कि छोटे से गांव में रहने वाले लोग भी बड़े सपने देख सकते हैं और उनको अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति व मेहनत के बलबूते पूरा कर सकते हैं। उस समय कोई भी सोच नहीं सकता था कि यह तो मात्र आसाराम त्यागी के जीवन के एक नए सफर की शुरुआत भर है। उन्हें तो जीवन पथ पर अभी बहुत दूर तलक जाकर दुनिया के पटल पर छा जाना था, नियति ने उन्हें देश सेवा के किसी खास मिशन को पूरा करने के लिए ही बनाया था।

आसाराम त्यागी को सेना की नौकरी करते हुए अभी 4 साल ही हुए थे कि नापाक पाकिस्तान ने वर्ष 1965 में दोबारा से भारत पर हमला करने का दुस्साहस कर दिया। जाट रेजिमेंट की तरफ से उनकी बटालियन को तुरंत दुश्मन को मुंहतोड़ जवाब देने का आदेश मिला। आदेश मिलते ही आसाराम के शरीर का कण-कण युद्ध भूमि में जाकर दुश्मनों के छक्के छुड़ाने के लिए ललायित हो उठा। 6 सितंबर, 1965 को सुबह 9 बजे भारतीय सेना की 3 जाट बटालियन ने जब पाकिस्तान की इच्छोगिल नहर की तरफ़ बढ़ना शुरू किया, तो नहर के किनारे हुई भयंकर लड़ाई में पाकिस्तानी वायु सेना ने, भारतीय सेना की इस बटालियन के भारी हथियारों को बहुत अधिक नुक़सान पहुंचाया। इसके बावजूद भी भारतीय सेना ने 11 बजे तक नहर के पश्चिमी किनारे के बाटानगर पर कब्ज़ा कर लिया था।
लेकिन भारतीय सेना के उच्च अधिकारियों को उनके इस साहसपूर्ण कारनामे की सही ढंग से जानकारी नहीं मिल पाई। सेना के डिवीजन मुख्यालय को कुछ ग़लत सूचनाएं मिलने के बाद बटालियन के कर्नल हेड से कहा गया कि वो अपनी टुकड़ी को डोगरई से 9 किलोमीटर पीछे हटा कर संतपुरा में पोज़ीशन ले लें। वहाँ उन्होंने अपनी सुरक्षा के मद्देनजर ट्रेन्चेज़ खोदे और पाकिस्तानी सैनिकों के भारी दबाव के बावजूद वहीं मोर्चे पर जमकर डटे रहे।
21 सितंबर की रात को 3 जाट बटालियन ने पाकिस्तान के डोगरई पर फिर हमला कर दोबारा उस पर कब्ज़ा किया, लेकिन इस लड़ाई में दोनों तरफ़ से बहुत से सैनिक मारे गए व हथियार नष्ट हो गये थे।
जिसके बाद 21 सितंबर की रात जब बटालियन के कर्नल हेड ने अपने सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए उनको संबोधित किया और उनसे दो मांगें की, मोर्चे से एक भी सैनिक पीछे नहीं हटेगा और दूसरा 'जिंदा या मुर्दा डोगरई में मिलना' यह हमारी बटालियन का दृढ़ संकल्प है। कर्नल हेड ने कहा अगर तुम भाग भी जाओगे, तब भी मैं लड़ाई के मैदान में अकेला लड़ता रहूँगा। तुम जब अपने गाँव जाओगे तो गाँव वाले अपने सीओ का साथ छोड़ने के लिए तुम पर थूकेंगे। इसके बाद जब सारे सैनिकों ने खाना खा लिया तो वो अपने सहयोगी मेजर शेखावत के साथ हर ट्रेंच में गए और सिपाहियों से कहा, "अगर हम आज मर जाते हैं तो ये हमारी बहुत अच्छी शानदार मौत होगी। बटालियन आपके परिवारों की देखभाल करेगी। इसलिए आपको परिवारों की चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं है।"
"कर्नल हेड की बात सुन कर प्रत्येक सैनिक में जोश भर गया। उन्होंने एक सिपाही से पूछा भी कि कल कहाँ मिलना है तो उसने जवाब दिया डोगरई में। कर्नल हेड ने तब तक जाटों की थोड़ी बहुत भाषा सीख ली थी। वो अपनी मुस्कान दबाते हुए बोले, ससुरे अगर सीओ साहब ज़ख्मी हो गये तो क्या करोगे। सिपाही ने जवाब दिया, सीओ साहब को उठा कर डोगरई ले जाएंगे, क्यों कि सीओ साहब के आदेश साफ़ हैं... "जिंदा या मुर्दा डोगरई में मिलना।"

हमला शुरू हो चुका है 54 इंफ़ैंट्री ब्रिगेड ने दो चरणों में हमले की योजना बनाई थी। पहले 13 पंजाब को 13 मील के पत्थर पर पाकिस्तानी रक्षण को भेदना था और फिर 3 जाट बटालियन को हमला कर डोगरई पर कब्ज़ा करना था। लेकिन कर्नल हेड ने ब्रिगेड कमांडर से पहले ही स्पष्ट कह दिया था कि 13 पंजाब का हमला सफल हो या न हो, 3 जाट बटालियन दूसरे चरण को अपनी जान की बाजी लगाकर अवश्य पूरा करेगी। युद्ध के मैदान में हुआ भी यही 13 पंजाब का हमला असफल हो गया और ब्रिगेड कमांडर ने वायरलेस पर कर्नल हेड से उस रात हमला रोक देने के लिए कहा। लेकिन जोश से ओतप्रोत अपनी बटालियन को देख कर्नल हेड ने अपने कमांडर की सलाह मानने से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा, हम हमला करेंगे, बल्कि वास्तव में हमला शुरू हो चुका है। ठीक 1 बज कर चालीस मिनट पर हमले की शुरुआत हुई। डोगरई के बाहरी इलाके में सीमेंट के बने पिल बॉक्स से पाकिस्तान के सैनिकों ने मशीन गन से भारतीय सेना पर ज़बरदस्त हमला किया।
सूबेदार पाले राम ने चिल्ला कर कहा, "सब जवान दाहिने तरफ़ से मेरे साथ चार्ज करेंगे।" कैप्टेन कपिल सिंह थापा की प्लाटून ने भी लगभग साथ-साथ चार्ज किया। सूबेदार पाले राम के सीने और पेट में छह गोलियाँ लगीं लेकिन उन्होंने बुलंद हौसलों के बलबूते तब भी अपने जवानों को कमांड देना जारी रखा। हमला कर रहे 108 भारतीय जवानों में से सिर्फ़ 27 ही जीवित शेष बच पाए। बाद में कर्नल हेड ने अपनी किताब 'द बैटिल ऑफ़ डोगरई' मे लिखा, "ये एक अविश्वसनीय हमला था। इसका हिस्सा होना और इसको इतने नज़दीक से देख पाना मेरे लिए बहुत सम्मान की बात थी।"

कर्नल हेड व उनकी बटालियन के सभी सदस्य 'मेजर आसाराम त्यागी' की बहादुरी से बहुत प्रभावित थे। कैप्टेन बीआर वर्मा अपने सीओ से 18 गज़ पीछे चल रहे थे कि अचानक उनकी दाहिनी जाँघ में कई गोलियाँ लगी और वो जमीन पर गिर पड़े। 21 सितम्बर 1965 की रात को जब डोगरई गांव पर कब्जा करने के लिए मेजर आसाराम त्यागी अपनी टीम के साथ निकले थे तो उनको भी दो गोलियाँ लगीं, लेकिन उन्होंने अपनी जान की परवाह किये बिना मोर्चे पर अदम्य साहस का परिचय देते हुए दुश्मन की सेना से  लड़ना जारी रखकर दुश्मन का खात्मा करना शुरू रखा। उन्होंने एक पाकिस्तानी मेजर पर गोली चलाई और फिर उस पर संगीन से हमला किया। इस बीच बिल्कुल प्वॉएंट ब्लैंक रेंज से उनको दो गोलियाँ और लगीं और एक पाकिस्तानी सैनिक ने उनके पेट में संगीन घोंप दी। गम्भीर रूप से घायल होकर जब वो अपना लगभग खुल चुके पेट को पकड़ कर जैसे ही धरती माता के आगोश में गिरे, तब ही उनके साथी हवलदार राम सिंह ने एक बड़ा पत्थर उठा कर उन्हें संगीन घोंपने वाले पाक सिपाही के सिर पर दे मारा।
21 सितंबर 1965 को डोगरई की जमीन पर मेजर आसाराम त्यागी ने गोलियों से छलनी होने के बावजूद, जिस वीरता पूर्ण ढंग से भारत माता की रक्षा के लिए पाकिस्तानी सैनिकों का सफाया किया, वह वीरता किसी भी व्यक्ति की कल्पना से परे लगती है।

इस युद्ध के दौरान युद्धभूमि में घायल उनके सहयोगी कैप्टेन वर्मा    के संस्मरणों के अनुसार, "त्यागी कभी बेहोश हो रहे थे तो कभी उन्हें होश आ रहा था। मैं भी घायल था। मुझे भी उस झोंपड़ी में ले जाया गया जहाँ सभी घायल सैनिक थे। जब घायल सैनिकों को वहाँ से हटाने का समय आया तो त्यागी ने मुझसे अपने दर्द की परवाह करे बिना कराहते हुए कहा, आप सीनियर हैं, पहले आप जाइए। मैंने उन्हें चुप रहने के लिए कहा और सबसे पहले इलाज के लिए उनको ही भेजा। पेट फटने के कारण उनके शरीर का आधिकांश ख़ून युद्धभूमि में ही बह चुका था।"
मेजर शेख़ावत बताते हैं, "मेजर त्यागी बहुत ज्यादा पीड़ा में थे। उन्होंने मुझसे कहा सर, मैं बचूंगा नहीं। आप एक गोली मार दीजिए। आपके हाथ से मर जाना चाहता हूँ। इस पर हम उनकी हौंसला अफजाई करते और कहते “मेजर तुम्हें कुछ नहीं होगा” हम सभी साथी चाहते थे कि वीर मेजर आसाराम त्यागी माँ भारती की सेवा के लिए ज़िंदा रहें।
लेकिन अफसोस ईश्वर को कुछ और मंजूर था डाक्टरों के तमाम अथक प्रयासों के बावजूद 25 सिंतंबर को भारत माता के लाड़ले सपूत वीर मेजर आशाराम त्यागी हम सभी की आँखों को नम  करते हुए इस दुनिया से हमेशा के लिए चले गये और अजर-अमर हो गये। 

सुबह के तीन बजते-बजते डोगरई गांव के पाकिस्तानी मोर्चे पर भारतीय सैनिकों का कब्ज़ा हो गया। सवा छह बजे भारतीय टैंक भी वहाँ पहुंच गए और उन्होंने इच्छोगिल नहर के दूसरे किनारे पर जबरदस्त गोलाबारी शुरू कर दी, जहाँ से भारतीय सैनिकों पर लगातार भयानक फ़ायर आ रहा था। 3 जाट बटालियन के सैनिकों ने झोंपड़ी में छिपे हुए पाकिस्तानी सैनिकों को एक-एक कर पकड़ना शुरू किया। पकड़े जाने वालों में थे लेफ़्टिनेंट कर्नल जे एफ़ गोलवाला जो कि 16 पंजाब (पठान) के कमांडिंग ऑफ़ीसर थे।
इच्छोगिल नहर पर लांस नायक ओमप्रकाश ने भारत का झंडा फहराया। वहाँ मौजूद भारतीय सैनिकों व लोगों के लिए यह बहुत गौरवशाली क्षण था। बाद में इस लड़ाई के दौरान अदम्य साहस, शौर्य, वीरता और पराक्रम का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने के लिए लेफ़्टिनेंट कर्नल डी एफ़ हेड, मेजर आसाराम त्यागी और कैप्टेन के एस थापा को भारत सरकार के द्वारा 'महावीर चक्र' से सम्मानित किया गया। 

वीर मेजर आसाराम त्यागी को मरते दम तक अपना मिशन 'जिंदा या मुर्दा डोगरई में मिलना' अंतिम पलों तक याद रहा, जिस मिशन को उनके साथियों ने जल्द ही पूरा कर लिया। इस तरह से डोगरई पर भारतीय तिरंगा लहराया और पाकिस्तान ने भारतीय सेना के वीरों के हौसले को बहुत ही करीब से देखा।
भारत के दुश्मन पर विजय हासिल करने वाले मेजर आसाराम त्यागी भले ही मृत्यु पर विजय प्राप्त नहीं कर सके हो, लेकिन उनकी वीरता व शौर्यता की कहानी आज भी देश के हर वर्ग विशेषकर युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है। कुछ लोग तो मातृभूमि के रक्षक अमर शहीद मेजर आसाराम त्यागी को अपना दिल से आदर्श मानते हैं और उन्हीं की तरह देश सेवा का सपना पाले हुए भारतीय सेना में शामिल होना चाहते हैं। वर्ष 1965 की भारत पाक जंग में डोगरई मोर्च की लड़ाई के हीरो शहीद मेजर आशाराम त्यागी को जयंती पर मैं अपनी चंद पंक्तियों के साथ कोटि-कोटि नमन् वंदन करता हूँ।

"वीरों की धरा है यह पावन भारत भूमि,
दुश्मनों को माकूल जवाब देती है यह भारत भूमि,
देश पर शहीद होने के लिए तत्पर रहते है अनगिनत लोग यहां,
नमन् करते है दिल से उनको हम देशवासी सदा।।"

बुधवार, 1 जनवरी 2020

*नववर्ष 2020 पर विशेष*देश में अमनचैन भाईचारा और तरक्की के नये आयाम स्थापित करने वाला हो अंग्रेजी नववर्ष 2020

*नववर्ष 2020 पर विशेष*

देश में अमनचैन भाईचारा और तरक्की के नये आयाम स्थापित करने वाला हो अंग्रेजी नववर्ष 2020 

हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार

आज अंग्रेजी नववर्ष 2020 का आगमन है, पिछले कुछ दिनों से  हर किसी को नववर्ष का बेहद बेसब्री इंतजार है। लोग कड़ाके की ठंड में बेहद गर्मजोशी व  उत्साह के साथ नववर्ष 2020 का अपने अलग-अलग अंदाज में स्वागत करने में व्यस्त हैं। प्रत्येक व्यक्ति जीवन के पिछले वर्ष कैसे बीते उसे याद करते हुए नववर्ष को जीवन में एक नई उम्मीद से देखते हुए सकारात्मक ऊर्जा के साथ नए वर्ष की शुरुआत कर रहा है। आज के दिन हर व्यक्ति अपने कष्टों को भूलकर ईश्वर आराधना करके हर तरफ खुशियों का माहौल बनाने में व्यस्त है, एकदिन के लिए ही सही देश में चारों और खुशनुमा माहौल व्याप्त है। वैसे तो अलग-अलग देशों में नववर्ष अलग-अलग दिन भी मनाया जाता है, और हमारे देश भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में भी  हमारे हिंदू नववर्ष की शुरूआत अलग-अलग दिन से होती है। लेकिन बहुत लंबे समय से देश में जिस तरह से हर कार्य में अंग्रेजी कैलेंडर प्रचलन में है, जिसके अनुसार 31 दिसंबर का दिन एक वर्ष के अंत होने का सूचक है और अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 1 जनवरी से ही अंग्रेजी नववर्ष की शुरूआत मानी जाती है। इसलिए ही 1 जनवरी के दिन को भारत के साथ-साथ पूरी दुनिया के अधिकांश देशों में नववर्ष के शुरू होने के उपलक्ष्य में बेहद हर्षोल्लास के साथ पर्व की तरह मनाना शुरू कर दिया है। हम सभी देशवासी भी अंग्रेजी नववर्ष का दिल खोलकर स्वागत करते हैं, हम लोग पूजापाठ करके अपनी रोजमर्रा की दिनचर्या का आरंभ करते हैं। मैं भी अपनी चंद पंक्तियों के द्वारा नववर्ष पर अपनी भावना प्रकट करके नववर्ष की आप सभी को तहेदिल से शुभकामनाएं देता हूँ

"सभी के जीवन में फिर आया,
एक और अनमोल नया साल है,
आपसी प्रेम भाईचारे की बनेगा,
भारत नववर्ष 2020 में,
सम्पूर्ण विश्व में एक मिसाल है,
मेहनतकश लोगों के चलते,
देश में चारों ओर बहेगी तरक्की, और खुशहाली की बयार है,
यही सपना मिलजुलकर,
साकार करना अबकी बार है।।

चूंकि हर व्यक्ति के जीवन के लिए साल नया है, इसलिए हर व्यक्ति अपनी नई उम्मीदें, नए सपने, नए लक्ष्य, नए आईडियाज के साथ उसका दिल खोलकर स्वागत करता है। नया साल को पर्व की तरह हर्षोल्लास से मनाने के पीछे मान्यता है कि साल का पहला दिन अगर उत्साह और खुशी के साथ मनाया जाए, तो साल भर इसी उत्साह और खुशियों के साथ सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ व्यक्ति का जीवन व्यतीत होगा।

आपको जानकारी के लिए बता दे कि हिन्दू पंचांग के अनुसार के मुताबिक नया साल 1 जनवरी से शुरू नहीं होता यह तो पाश्चात्य सभ्यता की तर्ज पर होता है। देश में हिंदू नववर्ष हर साल चैत्र प्रतिपदा से ही शुरू हो जाता है लेकिन भारत में अलग-अलग लोक मान्यताओं और स्थानीय रीति रिवाज़ों में थोड़ी भिन्नता होने के चलते ये अलग-अलग दिन से भी शुरू होता है, हालांकि हिंदू नववर्ष की खास बात ये है कि ये बेशक अलग-अलग नाम व दिन से ही शुरू होता हो, लेकिन इसकी शुरूआत मार्च या अप्रैल माह से ही होती है। देश के अधिकांश क्षेत्रों में हिंदू नववर्ष हमारे पंचांग या कैलेंडर के प्रथम माह चैत्र प्रतिपदा के प्रथम दिन को मनाया जाता है। जो हर बार मार्च के आखिर या फिर अप्रैल महीने में होता है। यानि कि देश में चैत्र नवरात्र से ही हो जाता है हिंदू नववर्ष का आगाज़। हिंदू नववर्ष के पहले दिन को नव संवत्सर भी कहा जाता है। जिसे विक्रम संवत भी कहकर बुलाते हैं।

लेकिन बाजारवाद के इस दौर के दौरान उसके प्रभाव से कोई अछूता नहीं हैं, जिसके चलते अब अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 1 जनवरी को नववर्ष मनाने का चलन बहुत तेजी से बढ़ गया है, जिसकों सभी जाति व धर्म के लोग मनाने लगें हैं। नववर्ष हमारे जीवन में एक नई शुरूआत को दर्शाता है और हमेशा बुलंद हौसले के साथ आगे बढ़ते रहने की सीख देता है। पुराने वर्ष में हमने जो भी किया, सीखा, सफल या असफल हुए उससे सीख लेकर, एक नई आशा व उम्मीद के साथ हम लोगों को जीवन पथ पर अग्रसर रहना चाहिए। जिस प्रकार हम पुराने साल के समाप्त होने पर दुखी नहीं होते बल्‍कि नए साल का स्वागत बड़े उत्साह और खुशी के साथ करते हैं, ठीक उसी तरह जीवन में भी बीते हुए समय को लेकर हमें दुखी नहीं होना चाहिए। जो बीत गया उसके बारे में सोचने की अपेक्षा आने वाले अवसरों का तहेदिल से स्वागत करें और उनके जरिए अपने जीवन, समाज, व देश को बेहतर बनाने की कोशिश करें।

इस बार नये साल पर हम सभी देशवासियों को सकंल्प लेना चाहिए कि नववर्ष 2020 में देश को खुशहाल बनाने के लिए हम सभी देशवासी एकजुट होकर सरकार के साथ मिलकर देशहित के लिए धरातल पर ठोस कारगर पहल करेंगे और देश में खुशहाली के नये आयाम स्थापित करेंगे।  साथ ही जिस तरह से देश में कुछ लोगों के द्वारा जाति-धर्म का ठेकेदार बनकर माहौल खराब करके समाज में जहर बोया जा रहा है उसको समाज के सभी वर्गों को एकत्र होकर रोकना होगा। कुछ लोगों के चलते देश में जाति-धर्म के जहर बहुत तेजी से फैला है। इंसान व इंसानियत की रक्षा के लिए उसको तत्काल सभी के सहयोग से खत्म करना होगा। नववर्ष 2020 में अपना प्यारा भारत अमनचैन व आपसी भाईचारे के साथ ईश्वर के आशीर्वाद से इस वर्ष सभी देशवासियों के सकारात्मक सहयोग से, कामयाबी का नया इतिहास लिखेगा और भारत हर क्षेत्र में तरक्की के नये आयाम स्थापित करके विश्व गुरु बनेगा।
इसी उम्मीद के साथ आप सभी सम्मानित देशवासियों को अंग्रेजी नववर्ष 2020 की बहुत-बहुत हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।