सोमवार, 30 दिसंबर 2019

*दुष्यंत कुमार की पुण्यतिथि पर विशेष* सत्ता के अन्याय के खिलाफ बागी तेवरों की दबंग आवाज़ दुष्यंत कुमार



*दुष्यंत कुमार की पुण्यतिथि पर विशेष*
 
सत्ता के अन्याय के खिलाफ बागी तेवरों की दबंग आवाज़ दुष्यंत कुमार

हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार
  
30 दिसंबर को देश के हिंदी साहित्य के महान गजलकार दुष्यंत कुमार की पुण्यतिथि है, वो हिंदी साहित्य में एक बहुत बड़ा नाम है जिसकी मिसाल हर कोई देता है। दुष्यंत कुमार अपनी बेहद सरल हिंदी और बेहद आसानी से समझ आने वाली उर्दू में कविताएं लिखकर लोगों के दिलों-दिमाग पर एकदम से छा गए थे। इन्होंने देश के सामने सरल हिंदी भाषा में गजलों को पेश करके, देश के हिंदी साहित्य में एक नई बयार बहाई थी। आज उनकी पुण्यतिथि पर प्रस्तुत हैं दुष्यंत कुमार कुछ बेहतरीन रचनाएं

"रहनुमाओं की अदाओं पर फ़िदा है दुनिया,

इस बहकती हुई दुनिया को संभालो यारों,

कैसे आकाश में सुराख़ हो नहीं सकता,

एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो।"

महान कवि दुष्यंत कुमार का जन्म 27 सितंबर 1931 को  उत्तर प्रदेश के बिजनौर जनपद की तहसील नजीबाबाद के ग्राम राजपुर नवादा में हुआ था। वो एक सरल हिन्दी कवि, कथाकार और ग़ज़लकार थे। हालांकि दुष्यंत कुमार की पुस्तकों में उनकी जन्मतिथि 1 सितंबर 1933 लिखी है, किन्तु साहित्य के मर्मज्ञ विजय बहादुर सिंह के अनुसार उनकी की वास्तविक जन्मतिथि 27 सितंबर 1931 है।उनके पिता का नाम भगवत सहाय त्यागी और माता का नाम रामकिशोरी देवी था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा गाँव की पाठशाला में हुई, माध्यमिक शिक्षा नहटौर से हाईस्कूल और चंदौसी में इंटरमीडिएट से हुई थी। दुष्यंत कुमार ने दसवीं कक्षा से कविता लिखना प्रारम्भ कर दिया। इंटरमीडिएट करने के दौरान ही राजेश्वरी कौशिक से उनका विवाह हो गया था। बाद उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी में बी०ए० और एम०ए० किया। उनको कथाकार कमलेश्वर और मार्कण्डेय तथा कविमित्रों धर्मवीर भारती, विजयदेवनारायण साही आदि के संपर्क से, उनकी साहित्यिक अभिरुचि को एक नया आयाम मिला था। मुरादाबाद से बी०एड० करने के बाद वर्ष 1958 में वो आकाशवाणी दिल्ली में आये। उसके बाद मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग के अंतर्गत भाषा विभाग में कार्यरत रहे। देश में लगे आपातकाल के समय उनका कविमन बेहद क्षुब्ध और आक्रोशित हो उठा जिसकी अभिव्यक्ति कुछ कालजयी ग़ज़लों के रूप में हुई, जो उनके ग़ज़ल संग्रह 'साये में धूप' का हिस्सा बनीं। सरकारी सेवा में रहते हुए सरकार विरोधी काव्य रचना के कारण उन्हें समय-समय पर सरकार के कोपभाजन का भी शिकार बनना पड़ा था। अपनी गजलों से देश के मठाधीशों के सिंहासन को हिलाने वाला यह महान योद्धा 30 दिसंबर 1975 की रात्रि में हृदयाघात के चलते, साहित्य की दुनिया का यह महान सितारा असमय अल्पायु में दुनिया को छोड़कर चिरनिद्रा में हमेशा के लिए सो गया।

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी, शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गांव में, हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।


जिस दौर के दौरान दुष्यंत कुमार ने साहित्य की दुनिया में अपने कदम रखे थे, उस समय भोपाल के दो प्रगतिशील शायरों ताज भोपाली तथा क़ैफ़ भोपाली का ग़ज़लों की दुनिया पर एकक्षत्र राज था। हिन्दी भाषा में भी उस समय अज्ञेय तथा गजानन माधव मुक्तिबोध की कठिन कविताओं का देश में जबरदस्त बोलबाला था। उस समय आम आदमी के लिए नागार्जुन तथा धूमिल जैसे नाममात्र के कुछ कवि ही बच गए थे। इस समय सिर्फ़ 44 वर्ष के जीवन में दुष्यंत कुमार ने अपार ख्याति अर्जित की। दुष्यंत कुमार देश के उन महान कवियों में से एक हैं, जिनकी हिंदी भाषा पर जितनी अच्छी पकड़ थी, उर्दू भाषा की भी उतनी अच्छी जानकारी भी। यही वजह है कि उनको देश का पहला हिंदी ग़ज़ल लेखक माना जाता है। दुष्यंत कुमार ने कविता, गीत, गजल, काव्य, नाटक, कथा, हिंदी की सभी विधाओं में लेखन किया था, लेकिन उनकी गजलें उनके लेखन की दूसरी विधाओं पर हमेशा भारी पड़ी और लोगों के दिलों-दिमाग पर छा गयीं। उनकी हर गज़ल आम आदमी की आवाज़ बन गयी है, जिसमें चित्रित है, आम आदमी के जीवन संघर्ष की दास्तान, आम आदमी के जीवना का दर्द व दर्पण, देश की राजनैतिक विडम्बनाएं और विसंगतियां। राजनीतिक क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार, प्रशासनिक तन्त्र की संवेदनहीनता, वही उनकी गजलों का ताकतवर स्वर है। दुष्यन्त कुमार ने गज़ल को रूमानी तबिअत से निकालकर देश के आम आदमी से जोड़ने का कार्य सफलतापूर्वक किया है। दुष्यंत कुमार ने गजल को हिंदी कविता की मुख्य धारा में शामिल करने की पुरजोर कोशिश की और वह इसमें पूरी तरह सफल भी हुए। 

कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए 

यहाँ दरख़तों के साये में धूप लगती है
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए 

न हो कमीज़ तो पाँओं से पेट ढँक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए 

ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए 

वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिए 

तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर की
ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए 

जिएँ तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए

उनकी इन पंक्तियों के साथ आज हम इस महान लेखक आदरणीय दुष्यंत कुमार को पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

रविवार, 29 दिसंबर 2019

देश में मोदी-शाह की जोड़ी के मैजिक के बाद भी राज्यों में सिकुड़ते साम्राज्य को बचाना भाजपा के सामने बड़ी चुनौती



देश में मोदी-शाह की जोड़ी के मैजिक के बाद भी राज्यों में सिकुड़ते साम्राज्य को बचाना भाजपा के सामने बड़ी चुनौती

हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सम्पूर्ण विश्व में एक बहुत ही शानदार ढंग से धाराप्रवाह बोलने वाले अच्छे वक्ता के रूप में जाना जाता है। वह विश्व के जिस भी कोने में जाकर जनता का संबोधन करते हैं, उस जगह की जनता मंत्रमुग्ध होकर उनकी मुरीद होकर उनसे दिल से जुड़ जाती है और उनकी हाँ में हाँ मिलाने लगती है। लेकिन इस बार  झारखंड राज्य की जनता ने विधानसभा चुनावों में उनकी हाँ में हाँ मिलाने के बजाए उन्हें ही ना कह कर भाजपा के रणनीतिकारों व देश के दिग्गज चुनावी पंडितों को आश्चर्यचकित कर दिया है। झारखंड की जनता ने सारे देश को व सभी राजनैतिक दलों को यह साफ़ संदेश दे दिया है कि वो अब अच्छे लच्छेदार धाराप्रवाह भाषणों व भावनात्मक मुद्दों पर नहीं बल्कि जनभावनाओं के अनुरूप होने वाले जनहित के कार्यों व सरकार के अच्छे-बुरे  कामों का आकलन करके वोट करेगी। इन चुनावों में मोदी-शाह की जोड़ी की जबरदस्त मेहनत के बाद भी चुनाव परिणामों में भाजपा को महागठबंधन के हाथों करारी शिकस्त हाथ लगी हैं। भाजपा ने झारखंड विधानसभा चुनाव में 9 रैलियां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व 9 रैलियां गृहमंत्री अमित शाह की करवाई थी साथ ही भाजपा के स्टार प्रचारकों की पूरी फोज ने चुनाव जीतने के लिए जबरदस्त ताकत झोंक रखी थी। प्रचार में इन सभी नेताओं ने स्थानीय मुद्दों की जगह राष्ट्रीय मुद्दों को प्रमुखता से उठाकर भावनात्मक रूप से भुनाने का प्रयास किया था। जिसको झारखंड की जनता ने अस्वीकार कर दिया, भाजपा नेताओं ने राम मंदिर और कश्मीर से धारा 370 हटाने के अपने फैसले को पूरे चुनाव प्रचार में जोर-शोर से उठाया था, स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व गृहमंत्री अमित शाह ने अपने चुनावी भाषणों में राष्ट्रीय मुद्दों को जोर-शोर से उठाया था। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को उम्मीद थी कि कश्मीर से धारा 370 हटाने और राम मंदिर निर्माण जैसे बड़े मुद्दों का उसे विधानसभा चुनाव में जबरदस्त फायदा होगा, लेकिन जनता ने इसके विपरीत भाजपा को झारखंड की सत्ता से बाहर कर विपक्ष में बैठने का रास्ता दिखा दिया। राज्य में पार्टी बहुमत के आंकड़े से काफी पीछे रह गयी। अबकी बार 65 पार का नारा देने वाली पार्टी भाजपा महज़ 25 सीटों पर सिमट कर रह गयी। झारखंड की जनता ने भाजपा के सभी राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों को सिरे से नकार कर स्पष्ट संदेश दे दिया है कि राज्यों के विधानसभा चुनावों में राष्ट्रीय मुद्दें कम चलेंगे, भविष्य में विधानसभा के चुनावों में राजनैतिक दलों को राष्ट्रीय मुद्दों के साथ-साथ स्थानीय मुद्दों को भी तरजीह देनी होगी तब ही राज्यों के चुनावों में विजय हासिल होगी। 

झारखंड के चुनाव परिणामों ने देश में भविष्य की राजनैतिक दिशा व दशा की स्थिति को भी काफी हद तक साफ कर दिया है। एकबार फिर राज्यों में गठबंधन सरकारों का दौर ही कामयाब हो गया है। साथ ही राज्य की जन अदालत ने यह भी संदेश दे दिया है कि अगर भाजपा सरकार ने देश में व्याप्त आर्थिक मंदी को दूर करने व आमजनमानस की रोजमर्रा की रोजीरोटी की समस्याओं का समाधान जल्द नहीं किया, तो वह दिन दूर नहीं है जब कांग्रेस मुक्त भारत का नारा देने वाली भाजपा का साम्राज्य वर्ष 2017 तक जिस तेजी के साथ फैला था उस ही तेजी के साथ घटकर चंद राज्यों में ही सिमट कर सीमित रह जायेगा। भाजपा नेतृत्व को समय रहते ही जन भावनाओं व देशहित में लिए जाने वाले सख्त फैसलों के बीच बेहतर तालमेल करना होगा, अपने बड़बोले नेताओं पर लगाम लगानी होगी। साथ ही पार्टी के शीर्ष नेताओं को अंहकार से मुक्त होकर बिखरते एनडीए के सभी सहयोगियों को सम्मान देते हुए एकजुट रखना होगा।

"भाजपा के रणनीतिकारों को देश के आमजनमानस की पीढ़ा को समझना होगा, उन्हें समझना होगा कि उसके लिए देश की एकता अखंडता, अमनचैन, आपसी भाईचारे के साथ रोजीरोटी रोजगार महत्वपूर्ण है ना कि अन्य ज्वंलत मुद्दें महत्वपूर्ण हैं।"

भाजपा को अपने तेजी के साथ घटते साम्राज्य को बचाने के लिए अब सत्ता के महलों से बाहर आकर, धरातल की वास्तुस्थिति को समझते हुए उसका विश्लेषण करके तत्काल आत्मचिंतन कर भविष्य के लिए कारगर रणनीति वाली रूपरेखा बनानी होगी। तब ही भविष्य में मोदी-शाह की जोड़ी की लोकप्रियता व मैजिक के जलवे को देश की जनता के बीच बरकरार रखा जा सकता है।
भाजपा के कुछ नेताओं को समझना होगा कि वो अब सत्ता में है, इसलिए अब विपक्षी नेताओं की तरह उग्र व्यवहार करना बंद करें। क्योंकि विपक्ष में रहकर आग लगाना बहुत आसान कार्य है, लेकिन सत्ता में रह कर आग ना लगने देना बहुत कठिन कार्य है।
 
झारखंड राज्य में आये चुनाव परिणाम सत्ता पक्ष भाजपा के लिए एकदम अप्रत्याशित हैं, ये चुनाव परिणाम सत्ताधारी दल भाजपा व मोदी-शाह की जोड़ी की लोकप्रियता के लिए बहुत बड़ा झटका है। विचारणीय प्रश्न यह है कि भाजपा के द्वारा जिस तरह से झारखंड में अपने चुनाव प्रचार को हिन्दू-मुसलमान, मंदिर-मस्जिद, आर्टिकल 370, राम मंदिर, एनआरसी व कैब आदि भावनात्मक व ज्वंलत मसलों के आसपास रखा गया, उसके बाद भी इन भावनात्मक मुद्दों का चुनावों में भाजपा को कोई राजनैतिक लाभ हासिल नहीं हुआ है यह भाजपा नेतृत्व के लिए सोचनीय है। कहीं ना कहीं इन विधानसभा चुनाव परिणामों पर देश में व्याप्त आर्थिक मंदी, रोजीरोटी व रोजगार संकट के मसलों पर केंद्र सरकार से जनता की नाराजगी सत्ता पक्ष भाजपा को भारी पड़ी है। जिस तरह से पिछले एक वर्ष में भाजपा के साम्राज्य से राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र के बाद झारखंड बाहर हुए है, वह राज्यों में भाजपा के घटते तेजी से प्रभाव व जनता की नाराजगी को दर्शाता है। हालांकि कुछ समय पहले ही हरियाणा में भी भाजपा को सरकार बनाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी थी। हरियाणा में तो गृहमंत्री अमित शाह की चाणक्य नीति से भाजपा को सरकार बनाने में सफलता मिल गई थी, लेकिन महाराष्ट्र में शिवसेना के एनडीए से बाहर होने के बाद भी जुगाड़ से देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री की शपथ दिलाने के बाद भी भाजपा सरकार बचाने के लिए बहुमत का बंदोबस्त नहीं कर पायी थी।

सबसे बड़ी खास बात यह है कि आज भी राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसा  लोकप्रिय व कद्दावर नेता भाजपा के पास मौजूद है। पार्टी के पास आज भी गृहमंत्री अमित शाह के रूप में कुशल राजनैतिक रणनीतिकार मौजूद है। लेकिन उसके बाद भी हाल के राज्यों के चुनाव परिणामों पर नजर डालें तो विधानसभा चुनाव में स्थानीय मुद्दों की अनदेखी के चलते व भाजपा के दूसरी पंक्ति के दिग्गज नेताओं के सत्ता के अंहकार में चूर  होकर अनापशनाप बडबोलेपन वाले बयानों के चलते, कहीं ना कहीं भाजपा को मोदी-शाह की जोड़ी का अब वो फायदा नहीं मिल पा रहा है जो राज्यों के चुनावों में 2017 तक मिलता था और 2019 के लोकसभा चुनावों अप्रत्याशित रूप से मिला था। जिस तरह से मोदी-शाह की जोड़ी ने वर्ष 2014 के बाद वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों में भी बड़ी जीत हासिल करके सभी को चौंका दिया था। उसके बाद देश के सभी राजनैतिक विश्लेषकों को भाजपा की प्रचंड जीत को देखकर लगता था कि पूरे देश में भाजपा की स्थिति अब काफी मजबूत है वह राज्यों के चुनावों में पहले से बहुत बेहतर करेगी। लेकिन हकीकत में रोजीरोटी पर बढ़ते जनआक्रोश के चलते राज्यों में धरातल पर अब ऐसी स्थिति नहीं हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहले कार्यकाल के अंतिम समय से लेकर अब तक अगर भाजपा ने यूपी जैसे बड़े राज्यों में प्रचंड जीत भी हासिल की तो पंजाब, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्य खो भी दिए है। इसके साथ-साथ छत्तीसगढ़ और अब झारखंड जैसा छोटा राज्य भी भाजपा के पास नहीं रहा। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि देश में राज्यों की सत्ता हासिल करने में अब क्यों नहीं चल रहा मोदी-शाह की जोड़ी का मैजिक।
लोग जब लोकसभा चुनावों के लिए वोटिंग करने जाते हैं तो उनके मन में पूरे देश के विकास के लिए राष्ट्रीय स्तर के मुद्दे होते हैं साथ ही मतदाता सभी राजनैतिक विकल्पों को ध्यान में रखते हुए मतदान करता है। लेकिन वही मतदाता विधानसभा चुनावों में राज्यस्तरीय मुद्दों से प्रभावित होता है वो उनके ही आधार पर राज्य सरकार का चयन करता है। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों में मिले जनता के अपार प्रेम के  बूते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के सबसे लोकप्रिय नेता के रूप में शीर्ष स्थान पर काबिज हैं। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी का चयन करने वाली देश की सम्मानित जनता राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी भाजपा का चयन करने के लिए बाध्य है।
क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर देश की जनता को लगता है कि देश में फिलहाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कोई विकल्प मौजूद नहीं है। लेकिन राज्य स्तर के चुनावों में अब जनता को लगने लगा है कि भाजपा के राज्यस्तरीय नेतृत्व का अच्छा विकल्प अन्य राजनैतिक दलों में मौजूद है और जनता अब उन विकल्पों को चुनने का कार्य हर एक राज्य में करने लगी है जो कि भाजपा के साम्राज्य के लिए खतरें की घंटी है।

हमारे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की यह खूबसूरती है कि अलग-अलग चुनावों में जनता के बीच अलग-अलग मुद्दे हावी होते हैं। हर राज्य में छोटे-छोटे कई ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें देखकर लोग वोट करते हैं। ऐसे में अगर भविष्य में भी राज्यों के चुनावों में भी भाजपा की राज्य सरकारें अपने काम की जगह व स्थानीय मुद्दों की जगह सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर ही वोट हासिल करने की कोशिश करेगी तो उसके लिए चुनावों में जीतना मुश्किल ही होगा। इसलिए राज्यों में विजय प्राप्त करने के लिए व अपने सिकुड़ते साम्राज्य को बचाने के लिए भाजपा के रणनीतिकारों को स्थानीय मुद्दों व सहयोगियों को तरजीह देनी ही होगी, तब ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व गृहमंत्री अमित शाह की जोड़ी का मैजिक जनता के बीच बरकरार रह सकता है।

सोमवार, 23 दिसंबर 2019

इक्कीसवीं सदी के भारत में जाति-धर्म के नाम पर माहौल खराब करते चंद लोग व राजनेता

इक्कीसवीं सदी के भारत में जाति-धर्म के नाम पर माहौल खराब करते चंद लोग व राजनेता

हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार


महात्मा गांधी जी का सत्य एवं अहिंसा का संदेश किसी भी देश में शांति, विकास एवं प्रगति के लिए आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना पहले था। सम्पूर्ण विश्व को महात्मा गांधी जी के सत्य-अहिंसा के संदेश को देने वाला हमारा प्यारा भारत, आज कुछ जाति-धर्म के ठेकेदारों, चंद इंसानियत के दुश्मन लोगों व राजनेताओं के क्षणिक स्वार्थ के चलते बहुत तेजी के साथ झूठ, छल-कपट व हिंसा से दिनप्रतिदिन ग्रस्त होता जा रहा है। देश में अपनी ओछी राजनीति चमकाने के फैशन के चलते जाति-धर्म, हिन्दू-मुसलमान व अमीर-गरीब के नाम पर लगातार घृणा फैलाई जा रही है, सत्ता हासिल करने के लालच में चंद राजनेताओं के द्वारा आम देशवासियों के बीच में नफरत की कभी ना टूटने वाली मजबूत दीवार खड़ी करने का लगातार शर्मनाक प्रयास जारी है। 

आज कुछ लोगों व नेताओं की कृपा से देश में चारों तरफ धार्मिक व जातिगत उन्माद चरम पर है। पिछले कुछ समय से धर्म को आधार बनाकर राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी), नागरिकता संशोधन बिल (कैब) जैसे मुद्दों पर राजनीति की खातिर देशहित छोड़कर विरोध करने के चलते, मौजूदा समय में हमारे प्यारे देश में जो हालात दिखाई दे रहे हैं उनसें अगर आपको डर नहीं लगता तो समझिये आप एक अमनचैन पसंद वाले अच्छे बुद्धिजीवी इंसान नहीं बल्कि इंसान के रूप में सभ्य समाज के लिए एक खतरनाक हिंसक प्रवृत्ति वाले व्यक्ति हैं। आज परिस्थितियों की चुनौती व समय की मांग है कि देश में अमनचैन प्यार मोहब्बत के साथ समय से सभी देशवासियों को रोजीरोटी रोजगार कैसे मिले, चारों तरफ किसी ना किसी रूप से डिस्टर्ब पड़ोसी देशों से घिरे भारत की सीमाओं को हमारे वीर जवान कैसे सुरक्षित रखें, देश विकास के नये आयाम स्थापित करके कैसे सम्पूर्ण विश्व में भारत की पताका फहराये। लेकिन बहुत अफसोस की बात है कि कुछ स्वार्थी लोगों की वजह से व राजनीति की कुटिल चालों ने हमको जनहित के मुद्दों से दूर करके देश व समाज का अहित करने वाले बेवजह के ज्वंलत मसलों में उलझा दिया है। चंद लोगों व राजनेताओं की वजह से आज हम लोग देशहित व अपनी रोजमर्रा की समस्याओं को भूलकर राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी), नागरिकता संशोधन बिल (कैब), मंदिर-मस्जिद, हिन्दू-मुसलमान व पाकिस्तान जैसे नाकाम देश के मुद्दों में उलझते जा रहे है। जिसके चलते जाति-धर्म की आड़ में देश में रोजाना जमकर हंगामा बरपा हुआ है, आयेदिन कुछ देशद्रोही लोग जाति-धर्म के नाम पर सार्वजनिक व निजी सम्पत्ति को तोड़फोड़ करके नुकसान पहुंचा कर जानमाल व देश का अहित करने में व्यस्त हैं। जो धर्म हमको अनुशासित जीवन जीना सिखाता है, उस धर्म का इस्तेमाल कुछ राजनेताओं के द्वारा अब सत्ता हासिल करने के लिए और अपने निजी छुपे हुए जहरीले ऐजेंडा को जनता के बीच फैलाने के लिए हो रहा है। कुछ लोगों ने तो धर्म को ही अपनी राजनीति और व्यापार के सफलतापूर्वक विस्तार करने का सबसे सशक्त माध्यम बना लिया है। ये लोग धर्म के नाम पर भोलीभाली जनता को अपने जाल में फांस कर उनकी भावनाओं से खिलवाड़ करके, उनको छलकर अपना उल्लू सीधा करने का काम बड़ी चतुराई से कर रहे हैं। इन धर्म के तथाकथित ठेकेदारों की हरकतों को देखकर लगता है कि धर्म के नाम पर हंगामा करने वालों को धर्म की जरा भी समझ नहीं है। जबकि हम धर्म की परिभाषा को देखें और उसके एक-एक शब्द पर गौर करें तो हम उसकी महानता व विशालता के बारें में जान सकते है। प्रत्येक धर्म हमको प्रेरित करता है कि हम अपने जीवन को नैतिकता के साथ अनुशासित करते हुए मानवता व जन कल्याण के लिए कार्य करें, ना कि हर समय छल-कपट करके एक-दूसरे की गर्दन काटने के लिए उतावले रहें।

लेकिन अफसोस हम में से कुछ लोग अपने स्वार्थ के चलते आज धर्म की आड़ लेकर इंसानियत व मानवता को शर्मसार करने वाले अधार्मिक कार्य करने में व्यस्त हैं और इन चतुर लोगों की कुटिलता का कमाल देखों कि वो उस गलत अधार्मिक कृत्य को बहुत खूबी के साथ धर्म का अमलीजामा पहना कर, जनता के सामने धार्मिक कार्य बता कर उन पर थोपकर समाज को पथभ्रष्ट करने पर लगे हुए हैं।

कभी इन धर्म के तथाकथित ठेकेदारों को अखंड भारत को विभाजित करके धर्म के नाम पर बने पाकिस्तान की हालत को देखकर उससे सबक लेना चाहिए कि आज धर्म के नाम पर बना पाकिस्तान हर तरह से खस्ताहाल होकर दुनिया में किस पायेदान पर खड़ा है और हम कहां खड़े हैं। बदहाल पाकिस्तान में आयेदिन आतंकी मस्जिदों तक में बम ब्लास्ट करके जनता को अपना शिकार बनाते रहते हैं, कभी निष्पक्ष रूप से व शांत मन से आंख बंद करके सोचना कौन करता है ये सब, कौन है ये लोग जो इंसानियत को कलंकित कर रहे है उनके पीछे कौन खड़ा है। 
हमारे पूर्वजों ने अपनी बुद्धि व दूरदर्शी नजरों से देश की आजादी के समय ही भाँप लिया था कि भविष्य में चंद धर्म के तथाकथित ठेकेदारों की वजह से धर्म को इंसानियत को खत्म करने के लिए इस्तेमाल किया जायेगा। इसीलिए उन्होंने भारत के संविधान को धर्म व पंथ निरपेक्ष बनाया था। आज के स्वघोषित राष्ट्रभक्तों को देखना चाहिए कि धर्म के नाम पर बने देशों का हश्र क्या होता है, यह सबके सामने है। चंद देश के दुश्मन लोगों की गंदी सोच के चलते हमें अपने प्यारे भारत को सीरिया और पाकिस्तान की तरह नहीं बनाना, बल्कि उसको दुनिया का शक्तिशाली वो खूबसूरत विश्व गुरु भारत बनाना है जिसकी कल्पना हमारे सबसे बड़े ग्रंथ संविधान की प्रस्तावना में की गई है। जो एक समानता, बंधुता और स्वतंत्रता पर आधारित विकसित खुशहाल धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र हो। जिसके सर्वांगीण विकास में समाज के सभी वर्गों की पूर्ण भागीदारी हो। भारत एक ऐसा गौरवशाली राष्ट्र हो, जो विकास करुणा मैत्री और सद्भावना के मार्ग पर चलते हुए सम्पूर्ण विश्व का मार्गदर्शन करें। आज के तथाकथित राष्ट्रवाद के ठेकेदार लोगों व राजनेताओं को भी सोचना होगा कि राष्ट्रवादी होने का अर्थ सिर्फ राष्ट्रवाद के नाम पर जोश भरे तरह-तरह के नारे गढ़ लेने तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की ज्वंलत जन समस्यायों से निपटने का सामूहिक हल ढूंढ कर देशवासियों को अमनचैन युक्त माहौल देकर उनको खुशहाल करके देश को विकसित करना असली राष्ट्रवाद है। इसलिए मेरे प्यारे भाइयों इन चंद स्वार्थी लोगों व राजनेताओं के द्वारा बनाये गये झूठ-प्रपंच, धार्मिक-जातिवाद के जहरीले भ्रमजाल से मुक्त होकर, सामुहिक रूप से पूर्ण एकता व विश्वास के साथ देश की ज्वंलत समस्याओं के विरुद्ध खड़े होकर, उनका स्थाई समाधान करके देश की एकता अखंडता को कायम रखे यही मेरी आप सभी से विनम्र विनती है। यही देशहित में हर सच्चे देशभक्त भारतवासी का सबसे बड़ा सच्चा धर्म व सबसे बड़ा कर्तव्य है।

'हजारों रंग बिरंगे फूलों का,
यह प्यारा गुलिस्तां है मेरा,
इसकी खुबसूरती बचाना दोस्तों,
यही सच्चा धर्म है तेरा और मेरा ।।

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।

रविवार, 8 दिसंबर 2019

न्याय मांगने वाली उन्नाव की बहादुर बेटी को इंसाफ कब!



न्याय मांगने वाली उन्नाव की बहादुर बेटी को इंसाफ कब!

हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार

देश में बेटियों के प्रति लगातार इंसानियत को शर्मसार करने वाली हृदय विदारक घटनाओं का शर्मनाक दौर जारी है। आयेदिन कहीं ना कहीं कोई माता, बहन, बेटी इन इंसानियत के नाम पर कंलक, जाहिल, वहशी, राक्षस, दरिंदों की दरिंदगी का शिकार हो जाती है, ये हालात आज देश में महिलाओं की जानमाल की सुरक्षा के लिए बहुत बड़ी चुनौती बन गये है। सबसे बड़ी अफसोस की बात यह है कि ये हाल संस्कारों के अभाव में हमारे प्यारे उस देश में आज उत्पन्न हो गये हैं, जिस देश की संस्कृति में स्त्री को सर्वोच्च स्थान देकर पूजा जाता है जहां कदम-कदम पर माता, बहन व बेटियों के सम्मान की खातिर प्राण न्यौछावर करना सिखाया जाता था। वैसे तो कानून के कम होते सम्मान व भय के चलते देश में हर तरह के अपराध चरम पर हैं लेकिन आज के हालात में देखें तो देश की राजधानी सहित अधिकांश राज्यों की स्थिति यह है कि वहां अपराधियों के हौसले बुलंद है सभी राज्यों में महिलाओं के प्रति अपराध चरम पर हैं। सभी जगह भोलीभाली जनता अपराध व अपराधियों से त्रस्त है, अपने आकाओं की कृपा से व भ्रष्ट सिस्टम के आशिर्वाद से अपराधी बेखौफ कानून को अपनी जेब में रखकर अपराध करने में मस्त हैं। लेकिन देश में महिलाओं के प्रति जिस तरह अपराध बढ़े हैं वह स्थिति बेहद चिंताजनक है। उसके लिए कहीं ना कहीं हमारे समाज में लोगों के कम होते संस्कार, आज के व्यवसायिक दौर में खत्म होती नैतिकता, आपस में एकदूसरे की मदद ना करने का भाव भी जिम्मेदार हैं।

लेकिन जिस तरह से 6 दिसंबर 2019 को हैदराबाद की बेटी के चारों रेपिस्ट व क्रूर हत्यारों को जब तेलंगाना पुलिस ने एनकाउंटर में मार गिराया, तो उसके बाद पीड़ित को मिले त्वरित न्याय का जश्न अधिकांश देशवासियों ने जमकर मनाया। चंद लोगों को छोड़कर सभी ने पुलिस के इस कदम की जमकर सराहना की थी। लेकिन उसी समय हैदराबाद की तरह 5 दिसंबर 2019 को हैवानियत का शिकार बनी उन्नाव की रेप पीड़िता बहादुर बेटी दिल्ली के सफदरजंग हॉस्पिटल में जीवन जीने के लिए संघर्ष कर रही थी। वो बहादुर बेटी जीवन जीने के संघर्ष भरे इस दौर में खुद को इंसाफ मिलने की उम्मीद दिल में पाले, शरीर के साथ ना देने के चलते कार्डियक अरेस्ट होने के कारण आखिर में 6 दिसंबर को जिंदगी की जंग हार गयी। इस रेप पीड़ित बहादुर बेटी की दर्दनाक मौत कानून का सम्मान करने वाले प्रत्येक भारतीय को अंदर तक झकझोर गयी है, नियम कायदों का पालन करने वाले ये लोग अब सरकार से पूछ रहे है कि पिछले 1 साल से इंसाफ के लिए दर-दर ठोकर खाने वाली उन्नाव की बहादुर बेटी को आखिर इंसाफ कब तक मिलेगा दोषियों को फांसी के फंदे पर कब तक लटकाया जायेगा। लेकिन यह भी कटु सत्य है कि विश्व में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की जन्मभूमि के रूप में अपनी पहचान रखने वाले राज्य उत्तर प्रदेश के सरकारी सिस्टम की अमर्यादित आचरण व गलत कार्यशैली ने एक और बेटी की अनमोल जान को लील लिया। आज देश के कानून में आस्था रखने वाले करोड़ों लोगों का सरकार से सवाल है कि आखिर कब तक हमारे देश में इस तरह अपराधी कानून को अपनी कठपुतली बनाकर रखेंगे और बेखौफ होकर अपराधों को अंजाम देते रहेंगे। आज लोगों का नीतिनिर्माताओं से प्रश्न है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले हमारे देश के सत्ता में आसीन राजनेताओं, पुलिस-प्रसाशन की राजशाही वाली कार्यशैली में धरातल पर कब बदलाव होगा, ये चंद ताकतवर लोग आम-आदमी के दुख-दर्द को शासन-प्रशासन की कुर्सी पर बैठकर कब महसूस करना शुरू करेंगे और सभी को समय से सस्ता-सुलभ न्याय व सभी के जानमाल की सुरक्षा की आस वाले रामराज्य की उम्मीद को पूरा करेंगे। 

यहां आपको बता दे कि उन्नाव की पीड़िता बेटी का आरोप था कि शिवम और शुभम ने 12 दिसंबर 2018 में उसे अगवा कर गनपाइंट पर उसका रेप किया था। जिसमें पीड़िता ने 13 दिसंबर 2018 को पुलिस को एफआईआर दर्ज करने के लिए शिकायत दी, लेकिन पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं की। जिसके पश्चात पीड़िता ने 20 दिसंबर 2018 को एसपी रायबरेली को डाक से शिकायत भेजी लेकिन पुलिस ने फिर भी अपराधियों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की। जिससें परेशान होकर बहादुर बेटी ने भ्रष्ट सिस्टम से हिम्मत ना हारते हुए एफआईआर दर्ज कराने के लिए न्यायालय की शरण ली। जिसके चलते इस मामले में न्यायालय ने 4 मार्च 2019 को शिवम व शुभम के खिलाफ मामला दर्ज करने का आदेश दिया था। लेकिन उसके बाद भी भ्रष्ट सिस्टम की कृपा से अपराधी बेखौफ घूमते रहे अंत में शिवम ने 19 सितंबर 2019 को न्यायालय में समर्पण कर दिया। जिसको 25 नवंबर 2019 को हाईकोर्ट से जमानत मिल गयी थी। जमानत मिलने के बाद से ये आरोपी पीड़िता व उसके परिवार को लगातार मुकदमा वापस लेने के लिए धमकी दे रहे थे, इसी मुक़दमे के सिलसिले में पीड़िता पैरवी के लिए रायबरेली रवाना होने के लिये गुरुवार 5 दिसंबर 2019 को सुबह करीब चार बजे बैसवारा रेलवे स्टेशन जा रही थी। तभी रास्ते में गौरा मोड़, बिहार-मौरांवा मार्ग पर मुकदमे में जमानत पर चल रहे शिवम और शुभम ने अपने कुछ साथियों की मदद से पहले लड़की पर लाठी, डंडे, चाकू से वार किया। उसके बाद ज्वलनशील पदार्थ डालकर आग लगा दी थी। स्थानीय लोगों व पुलिस के अनुसार मदद की उम्मीद में पीड़िता जलती हुई अवस्‍था में घटनास्थल से बचाओ-बचाओं की आवाज लगाते हुए काफी दूर तक दौड़ कर आयी थी लेकिन किसी ने कोई मदद नहीं की। कुछ प्रत्‍यक्षदर्शियों ने जब उसे जलते देखा तो पीड़िता ने उनसे पुलिस बुलाने के लिए कहा, जिसके बाद ग्रामीणों ने पुलिस को इस घटना की सूचना दी। मौके पर पहुंची पुलिस ने करीब 90 फीसद तक जल चुकी पीड़िता को पहले सुमेरपुर के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पीएचसी भेजा, जहां से उसे उन्नाव जिला अस्‍पताल रेफर किया गया। बाद में उसकी नाजुक स्थिति को देखते हुए जिला अस्‍पताल के डॉक्‍टरों ने उसको लखनऊ ट्रामा सेंटर रेफ़र के लिए रेफर कर दिया था, जहां से उसे एयरलिफ्ट कर दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल लाया गया। वहीं दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश पुलिस ने इस मामले में शिवम, शुभम, हरिशंकर, रामकिशोर और उमेश नामक व्यक्तियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार करके जेल भेज दिया। उन्नाव की इस बहादुर बेटी को उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के आदेश पर 90 फीसदी जली हुई बेहद गम्भीर अवस्था में 5 दिसंबर को एयरलिफ्ट करके लखनऊ से दिल्ली के सफदरजंग हॉस्पिटल उचित इलाज के द्वारा जान बचाने के उद्देश्य से लाया गया था, लेकिन अफसोस हैवानों की दरिंदगी की शिकार इस पीड़िता ने शुक्रवार 6 दिसंबर की रात को 11 बजकर 40 मिनट पर इस बेरहम दुनिया को अपने प्राण त्यागकर हमेशा के लिए छोड़ दिया। हॉस्पिटल के डॉक्टरों के भरपूर प्रयासों के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका। 

देश में महिलाओं की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए हमारे देश में सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट आदेश व केंद्र सरकार के द्वारा महिलाओं के प्रति अपराध रोकने के लिए बनाये गये सख्त कानूनों के बाद भी, देश में एक पीड़ित महिला के साथ हमारे सिस्टम का कैसा व्यवहार होता है उन्नाव की यह शर्मनाक घटना उसकी मिसाल है। इंसानियत को कंलकित करने वाली यह घटना हम सभी के सामने हमारे देश के भ्रष्ट सिस्टम की एकबार फिर पोल खोल गयी है कि हमारा सिस्टम पीड़ित की नहीं बल्कि अपराधियों की सुनता है, वो कहीं ना कहीं लोभ-लालच व सिफारिशों के दवाब में  गुंडे-मवालियों के हाथ की कठपुतली बनकर रह गया हैं। इस घटना के बाद देश के आमजनमानस में जबरदस्त आक्रोश है लोग त्वरित न्याय के लिए जगह-जगह सड़कों पर धरना-प्रदर्शन, कैंडल मार्च कर रहे हैं, सरकार लोगों को अपराधियों को जल्द से जल्द सख्त से सख्त सजा देने का आश्वासन दे रही है। परंतु यह भी सच है कि सही ढंग से ईमानदारी से देश की बेटियों के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करने के लिए समाज व सिस्टम कोई भी वर्ग तैयार नहीं है, अधिकांश मामलों में रक्षक ही बेटियों के भक्षक बनने पर तुले हुए है जो चरित्रहीनता व संस्कारहीनता का परिचायक है। लेकिन अब समय आ गया है कि देश में मातृशक्ति को सुरक्षित रखने के लिए हम सभी को अपनी-अपनी जिम्मेदारी का सही ढंग से पालन करना होगा। सरकार व सिस्टम को भी अपराधियों में कानून का भय व सम्मान पैदा करने के लिए इस तरह के मामलों में फास्टट्रैक कोर्ट में मामला चलाकर अपराधी को जल्द से जल्द सख्त सजा देकर समाज के सामने नजीर पेश करनी होगी, तब ही इस हालात में सुधार हो पायेगा और देश में मातृशक्ति सुरक्षित रह पायेंगी।

।।जय हिन्द जय भारत ।।
।।मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान।।

सोमवार, 2 दिसंबर 2019

खस्ताहाल अर्थव्यवस्था को सही कारगर नीतियों की संजीवनी बूटी कब !

खस्ताहाल अर्थव्यवस्था को सही कारगर नीतियों की संजीवनी बूटी कब !

दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार

भारत की अर्थव्‍यवस्‍था की रफ्तार बढ़ाने के नरेंद्र मोदी सरकार के प्रयासों को शुक्रवार 29 नवंबर को उस समय तगड़ा झटका लगा जब केन्द्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, लम्बे समय से मंदी की मार झेलने से बेहाल भारत की अर्थव्यवस्था में ताजा जारी किये गये आकड़ों के अनुसार और गिरावट देखने को मिली है। इन आकड़ों के अनुसार चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में भारत की विकास दर में भारी गिरावट आयी है। ताजा रिपोर्ट के मुताबिक भारत का जीडीपी (GDP) ग्रोथ का आंकड़ा 4.5 फीसदी पहुंचा गया है। जो पिछले 6 वर्षों में किसी तिमाही की सबसे बड़ी गिरावट है। जीडीपी के आकड़ों में भारी गिरावट नजर आने के बाद अर्थव्यवस्था को लेकर देश में राजनीति शुरू हो गई है, केंद्र सरकार के कर्ताधर्ता एकबार फिर विपक्षी दलों के निशाने पर आ गये है। 

वैसे भारतीय अर्थव्यवस्था की इस स्थिति के लिए देश के कर्ताधर्ताओं में कोई माने या ना माने, लेकिन यह कटु सत्य है कि कहीं ना कहीं यह मानव जनित आपदा है। सरकार के कुछ गलत आर्थिक निर्णयों के चलते आज भारत की अर्थव्यवस्था बेहद मंदी के नाजुक दौर से गुजर रही है। देश में स्थिति यह हो गयी है कि भारतीय बाजार पर उसका दुष्प्रभाव अब आकड़ों की बाजीगरी के बाद भी छिपाया नहीं जा सकता है। लेकिन फिर भी ना जाने क्यों देश के नीतिनिर्माता स्थिति की गम्भीरता को अब भी समझने के लिए तैयार नहीं हैं, वो इस हालात को या तो जानबूझकर समझने के लिए तैयार नहीं है या यह भी हो सकता है कि उनकी टीम में शामिल लोग अर्थव्यवस्था को कमजोर करने वाले ठोस कारकों को पकड़ नहीं पा रहे हो। खैर अर्थव्यवस्था कितनी भी खस्ताहाल बेहाल हो, लोगों को बेशक रोजीरोटी रोजगार ना मिल रहा हो उससे हमारे देश के चंद ताकतवर राजनेताओं पर कुछ असर नहीं पढ़ता है वो अब भी लोगों को बरगला के हिन्दू-मुसलमान , मंदिर-मस्जिद में उलझा कर भीड़तंत्र का बेहुदा माहौल बनाने में व्यस्त है। सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि वो भारत जैसे विकासशील देश की तुलना बात-बात में हर मोर्चे पर असफल पाकिस्तान से करके भारतीय जनसमूह से खूब तालियां बटोरते हैं।  
 
वर्तमान में देश की अर्थव्यवस्था के इस हालात के लिए उच्च जीएसटी दरें, कृषि क्षेत्र में संकट, वेतनभोगियों के वेतन में कमी और नकदी की कमी आदि कारक की वजह से देश को भारी मंदी का सामना करना पड़ रहा है। साथ ही अर्थशास्त्रियों के अनुसार उपभोग में भारी मंदी के रुझान, जीडीपी विकास दर में लगातार गिरावट का सबसे प्रमुख कारण है। जिसके चलते भारतीय अर्थव्यवस्था के मजबूत स्तंभ ऑटोमोबाइल, पूंजीगत वस्तुएं, बैंक, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, एफएमसीजी और रियल एस्टेट आदि सहित देश के सभी प्रमुख सेक्टरों में भारी गिरावट आई है। जोकि अर्थव्यवस्था में मंदी का माहौल पैदा कर रहे हैं।

लेकिन फिर भी अपनी हठधर्मिता वाली नीति के चलते अब भी सरकार में बैठे कुछ लोग स्थिति को सामान्य बता रहे हैं। इस स्थिति में कहा जा सकता है कि देश की अर्थव्यवस्था की सरकार जितनी गुलाबी तस्वीर पेश कर रही है। हकीकत में धरातल पर हालात सामान्य नहीं हैं। इस स्थिति के लिए वजह चाहे जो भी हो लेकिन सरकार को चाहिए की वो तत्काल अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए सही नीतियों की संजीवनी बूटी की ताकतवर डोज प्रदान कर, इस गम्भीर बीमारी का उपचार कर संकटग्रस्त देशवासियों को राहत प्रदान करें। क्योंकि आजकल आर्थिक स्थिति को लेकर जमीन स्तर पर जो स्थिति बनती जा रही है वो देशहित में व आमजनमानस के हित में ठीक नहीं है। अब लोगों से उनकी रोजीरोटी रोजगार छिनने लगा है जिससे आमजन को भारी दिक्कत होने लगी है, देश में लोगों की नौकरी जा रही नये रोजगार पैदा होने के अवसर दिनप्रतिदिन खत्म होते जा रहे हैं। जिसके चलते अब देश के आमजनमानस को लगने लगा है कि सरकार आर्थिक मोर्चे पर पूर्ण रूप से विफल है और स्थिति उनके नियंत्रण से दिनप्रतिदिन बाहर होती जा रही है, जो हालत चिंतनीय हैं।

खस्ताहाल अर्थव्यवस्था की हालत पर भाजपा सरकार के नेता भले ही कहें कि कुछ लोगों को उनकी सरकार की आलोचना करने में मजा आता है। लेकिन हक़ीक़त यह है कि अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्र इन दिनों बहुत संकट में हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक़ निजी निवेश में मंदी की हालत में सुधार के संकेत जल्द दिखाई नहीं दे रहे है। देश को धन उपलब्ध करवाने वाला बैंकिंग क्षेत्र फंसे क़र्ज़ (एनपीए) की समस्या से बेहाल है। कोयला, क्रूड ऑयल, प्राकृतिक गैस, रिफाइनरी प्रोडक्ट्स, उर्वरक, सीमेंट, बिजली और इस्पात देश के आठ महत्वपूर्ण कोर सेक्टर हैं। इन सेक्टर का देश के औद्योगिक उत्पादन इंडेक्स में लगभग 40 फीसदी का योगदान है। लेकिन वैश्विक मोर्चे पर बिगड़ती स्थितियों के बीच निजी निवेश और उपभोक्ता मांग में जबरदस्त सुस्ती के चलते भारत की आर्थिक वृद्धि लगातार कम होती जा रही है। जिसका उत्पादन वृद्धि और रोजगार सृजन पर भी दबाव पड़ा है। आईएचएस मार्किट का इंडिया मैन्यूफैक्चरिंग पर्चेजिंग मैनेजर्स सूचकांक (पीएमआई) निचले स्तर पर है। लागत बढ़ने और डिमांड घटने की वजह से मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की ग्रोथ में कमी आई है। PMI इंडेक्स घट रहा है। सोचने वाली बात यह है कि देश के कई क्षेत्रों में विकास की रफ्तार एकदम थम सी गयी है। मंदी की मार के चलते कमजोर होती अर्थव्यवस्था के ये हालात खुद प्रधानमंत्री मंत्री नरेंद्र मोदी के "फॉइव ट्रिलियन इकॉनमी" के सपने के लिए बेहद घातक है। अगर भारतीय अर्थव्यवस्था इसी तरह के ढ़र्रे पर चलती रही तो यह तय है कि मोदी का "फॉइव ट्रिलियन इकॉनमी" का सपना जल्द पूरा नहीं होने वाला है। जो स्थिति आर्थिक रूप से देश की जनता के लिए व राजनैतिक रूप से भाजपा के लिए सही नहीं है। मंदी के यह हालात तेजी से विकास के पथ पर चलकर विकसित बनने के कतार में शामिल विकासशील भारत के लिए भी बेहद चिंताजनक है। इसलिए सरकार को मंदी की स्थिति से निपटने के लिए तत्काल प्रभावी कदम उठाने होंगे ।