शुक्रवार, 29 नवंबर 2019

सत्ता के लालच में सिद्धांतों को तिलांजलि देते सिद्धांतों पर प्रवचन करने वाले राजनेता


सत्ता के लालच में सिद्धांतों को तिलांजलि देते सिद्धांतों पर प्रवचन करने वाले राजनेता

दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार

महाराष्ट्र में देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को झकझोर देने वाला सत्ता हासिल करने का दंगल अब चरम पर पहुंच गया है। राज्य में देश के शीर्ष राजनीतिज्ञों के द्वारा पूरे जोशोखरोश के साथ पिछले एक माह से जबदस्त सियासी राजनीति की ऐसी कुटिल चाले चली जा रही हैं, जो कि इस जबरदस्त सियासी घमासान को खत्म होने देने का नाम ही नहीं ले रही हैं। देशवासियों को लगता है कि इस घटनाक्रम का अब जल्द ही पटाक्षेप हो जाये और राज्य को नई स्थाई सरकार मिल जायेगी, लेकिन राजनीति की "साम दाम दंड भेद" वाली चाणक्य नीति के चलते देवेंद्र फडणवीस के मुख्यमंत्री व अजीत पवार के उप मुख्यमंत्री की शपथ लेने के बाद भी सरकार की स्थिति स्पष्ट नहीं है। महाराष्ट्र की राजनीति के महासंग्राम में जहां एकतरफ भाजपा सत्ता बरकरार रखने के लिए इस युद्ध को जीतना चाहती है। वहीं शिवसेना, एनसीपी व कांग्रेस के सत्ता हासिल करने की जबरदस्त चाह में, ये दल भी कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार हैं। जिस तरह से सत्ता हासिल करने के लिए रातों रात छिपकर सरकार बनाने वाली "पार्टी विद डिफरेंस" की बात करने वाली भाजपा और अलग-अलग विचारधारा वाले दल शिवसेना, एनसीपी व कांग्रेस आदि सभी दल अपने सिद्धांतों को तिलांजलि देकर राज्य की सत्ता पर काबिज होने की लड़ाई लड़ रहे हैं। वो 21वीं सदी के आधुनिक भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं है। 

महाराष्ट्र के राजनैतिक संकट को लेकर सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय ने अपना फैसला सुनाने के लिए मंगलवार का दिन सुरक्षित रखा हैं। तब से राज्य में सत्ता हासिल करने की चाहत में जबदस्त सियासी ड्रामा जारी है, उसी क्रम में सोमवार को मुंबई के होटल ग्रैंड हयात में शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस आदि दलों के 162 विधायकों की मीडिया के सामने परेड हुई। जिसमें पहली बार तीनों दलों के कद्दावर नेता शरद पवार, उद्धव ठाकरे और पूर्व सीएम अशोक चव्हाण आदि सार्वजनिक रूप से मीडिया के सामने मौजूद रहे। यहां पर सभी विधायकों को एनसीपी नेता जितेंद्र अवहद ने कांग्रेस की अध्यक्षा सोनिया गांधी, एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार और शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे के नाम पर शपथ दिलाई। तीनों पार्टियों के विधायकों ने कहा कि वे इस शपथ के प्रति निष्ठावान रहेंगे, किसी लोभ-लालच में नहीं पड़ेंगे और गठबंधन के प्रति ईमानदार बनें रहेंगे। इन सभी विधायकों ने शपथ ली कि वे भाजपा का समर्थन नहीं करेंगे और न ही अपनी पार्टी के खिलाफ काम करेंगे और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का आदेश मानेंगे। यह सियासी नजारा आज के भारतीय लोकतंत्र का एक नया चेहरा व नयी परिपाटी है। वैसे राजनीति पर शायर बशीर बद्र जी ने खूब कहा है कि

"सियासत की अपनी अलग इक जबा है,
लिखा हो जो इक़रार, इनकार पढ़ना"। 
 
यह शेर महाराष्ट्र के मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम पर एकदम सटीक बैठता हैं।
 
वहीं महाराष्ट्र के इस गम्भीर राजनैतिक संकट पर आज मंगलवार "संविधान दिवस" के दिन सुप्रीम कोर्ट की बैंच ने हॉर्स ट्रेडिंग व अन्य गैरकानूनी दावपेंचों को रोकने के उद्देश्य से अंतरिम आदेश देते हुए प्रोटेम स्पीकर के द्वार 27 नवंबर को सांय 5 बजे तक सभी विधायकों को शपथ दिलावाकर कल ही लाईव प्रसारण के साथ बिना किसी प्रकार के गुप्त मतदान के फ्लोर टेस्ट कराने का आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश शिवसेना, एनसीपी व कांग्रेस के लिए बहुत बड़ी राजनैतिक संजीवनी है। यहां यह भी गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने प्रोटेम स्पीकर की नियुक्ति राज्यपाल के ऊपर छोड़ दी है। इस आदेश के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में घमासान तेज हो गया है और यह आने वाला समय ही बतायेगा की इस महासंग्राम में किसकी विजय होगी और किसकी पराजय होगी।

मित्रों वैसे तो हमारे प्यारे देश भारत को आजाद हुए 72 वर्ष हो चुके हैं, देश में दृढ़ संकल्प, मजबूत इच्छाशक्ति व सशक्त इरादों वाले ईमानदार राजनेताओं के चलते आजादी के बाद दिन-प्रतिदिन लोकतांत्रिक व्यवस्था बेहद मजबूत हुई है, जो देश के लोकतंत्र में परिपक्वता के रूप में लम्बे समय से स्पष्ट नजर आने लगी है। लेकिन साथ ही साथ कुछ राजनेताओं के सत्ता हासिल करने के लालच के चलते पिछले कुछ वर्षों से देश में राजनीति का स्तर भी तेजी से दिन-प्रतिदिन गिरता जा रहा है। अब तो हालात यह हो गये हैं कि कभी समाजसेवा व देशसेवा के जुनून के साथ आमजनमानस की भलाई करने का सबसे सशक्त माध्यम माने जाने वाली राजनीति के स्तर में अब बहुत तेजी से गिरावट आ रही है। पिछले कुछ वर्षों में देश के चंद ताकतवर राजनेताओं के राजनीतिक आचरण के चलते राजनीति के क्षेत्र में सिद्धांतों के प्रति राजनेताओं की प्रतिबद्धता अब बहुत दूर की कौड़ी की बात हो गई है। हालांकि देश में अब राजनीति का वो दौर चल रहा है जब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के नाम पर कसम खाने वाले नेताओं की भरमार है लेकिन उनके दिखाये मार्ग पर चलने वालों कि संख्या बहुत कम है। आज महापुरुष बनने की चाह में हमारे राजनेताओं में सिद्धांतों पर लम्बे चोड़े भाषण देने का फैशन बन गया है, लेकिन जब बात सिद्धांतों पर अमल करने की आती है तो वो राजनेता ही उनको सबसे पहले तिलांजलि देकर छल-कपट, तिकड़मबाजी, धोखेबाजी, झूठ-प्रपंच, अवसरवादिता, धनबल, बाहूबल का प्रयोग करके अपने स्वार्थ सिद्धि को सर्वोपरि मानते हैं और वो उसको पूरा करने के लिए एक ही पल में सिद्धांतों, देश व समाज हित को त्याग देते हैं। अफसोस की बात यह हो गई है कि छल-कपट, कुटिल घटिया स्तर की राजनीति आजकल की राजनीति का एक महत्वपूर्ण अंग बना गयी हैं। आज हकीकत यह है कि जिस राजनीति को देश की सम्मानित जनता के प्रति पूर्ण निष्ठाभाव से समर्पित होना चाहिए था, आज वो सत्ता के लालच में अंधी होकर सिद्धांतों को तिलांजलि देकर स्वयं स्वार्थ के लिए समर्पित हो गयी हैं। आज वो चंद तिकड़मबाज नेताओं की बंधक बन गयी है।

आज की कुटिल राजनीति पर शायर "राज इलाहबादी" का एक शेर एकदम सटीक बैठता है

 "कैसे कैसे हैं रहबर हमारे,
 कभी इस किनारे,
 कभी उस किनारे"। 

क्योंकि आज के राजनेता चुनाव जीतने के बाद एक पल में अपने सिद्धांतों को छोड़कर स्वार्थ के लिए जनभावनाओं के विपरीत जाकर अलग विचारधाराओं से हाथ मिला लेते हैं, केवल सत्ता हासिल करने के लिए। आज हमारे देश के राजनैतिक दल सत्ता की मलाई हासिल करने के लिए अपने सिद्धांतों को एक पल में छोड़कर कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। आज देश की जनता देख रही है कि महाराष्ट्र में सत्ता हथियाने के प्रकरण में कौन भारतीय लोकतंत्र को मजबूत कर रहा है और कौन लोकतंत्र को कमजोर कर रहा है। जिस तरह से चंद राजनेता अंहकार में चूर होकर आज भारतीय राजनीति को जबरन ऐसी करवटें लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं, जिससे ईमानदारी युक्त राजनीति का भविष्य और लोकतांत्रिक मूल्य ही खत्म हो जाएं। हालांकि इस तरह की सिद्धांतों को तिलांजलि देकर ओछी राजनीति करने वाले राजनेताओं को आने वाले समय में देश की सम्मानित जनता माफ नहीं करेगी। यही संकल्प आज "संविधान दिवस" पर हम सभी देशवासियों को ईमानदार लोगों के हित में व देशहित में लेना चाहिए।
 
।। जय हिन्द जय भारत ।। 
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।

रविवार, 3 नवंबर 2019

देश में अन्नदाता किसानों को खुशहाल बनाने की धरातल पर पहल कब



देश में अन्नदाता किसानों को खुशहाल बनाने की धरातल पर पहल कब 

हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार

आजाद भारत में हम सबका पेट भरने वाले अन्नदाता को आयेदिन अपने अधिकारों और हक को हासिल करने के लिए सड़कों पर उतरना पड़ता है। लेकिन देश की सरकारें है कि वो अपनी चतुर चाणक्य नीति से हर बार इन किसानों को आश्वासन देकर समझा-बुझाकर सबका पेट भरने के उद्देश्य से अन्न उगाने के लिए वापस खेतों में काम करने के लिए भेज देती है। देश में सरकार चाहें कोई भी हो, लेकिन अपने अधिकारों के लिए लंबे समय से संघर्षरत किसानों की झोली हमेशा खाली रह जाती है। आज अन्नदाता किसानों के हालात बेहद सोचनीय हैं, स्थिति यह हो गयी है कि एक बड़े काश्तकार को भी अपने परिवार के लालनपालन के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, जो स्थिति देशहित में ठीक नहीं हैं। किसानों के इस हाल के लिए किसी भी एक राजनैतिक दल की सरकार को ज़िम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। उनकी बदहाली के लिए पिछले 72 सालों में किसानों की वोट से देश में सत्ता सुख का आनंद लेने वाले सभी छोटे-बड़े राजनैतिक दल जिम्मेदार हैं। क्योंकि इन सभी की गलत नीतियों के चलते ही आज किसानों की स्थिति यह है कि भले-चंगे मजबूत किसानों को सरकार व सिस्टम ने कमजोर, मजबूर व बीमार बना दिया है। जिसमें रही सही कसर हाल के वर्षों में सत्ता पर आसीन रही राजनैतिक दलों की सरकारों ने पूरी कर दी है। जिनकी गलत नीतियों व हठधर्मी रवैये ने उन परेशान किसानों को सड़क पर आने के लिए मजबूर कर दिया है। जहां अब वो कृषि क्षेत्र की लाइलाज हो चुकी बिमारियों के समाधान की उम्मीद में बैठे है। किसानों में बढ़ते आक्रोश के चलते अब देश में स्थिति यह हो गयी है कि किसानों को आयेदिन अपनी लंबे समय से लंबित मांगों के समाधान को लेकर ना चाहकर भी सड़कों पर उतर आने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। आज मोदी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि वो किसानों की दुश्वारियों को कम करके उनके आर्थिक स्वास्थ्य को जल्द से जल्द ठीक करें। सरकार को समझना होगा भारत एक कृषि प्रधान देश है और हमारा अन्नदाता किसान देश की मजबूत नींव हैं, अगर सरकार किसानों को खुशहाल जीवन जीने का माहौल प्रदान करती है तो देश भी खुशहाल रहेगा। लेकिन वो इसी तरह से गरीबी, कर्ज, फसल खराब होने पर उचित मुआवजा ना मिलने व फसल के उचित मूल्य ना मिलने से परेशान होकर इसी तरह आत्महत्या करता रहा तो इस स्थिति में देश व देशवासियों का खुशहाल रहना संभव नहीं है। किसानों के हालात में अगर जल्द सुधार नहीं हुआ तो वो दिन दूर नहीं है जब बेहद कठिन परिस्थिति, कड़े परिश्रम और अनिश्चितता से भरे कृषि क्षेत्र में आने वाले समय में खेती के कार्य से लोग बहुत तेजी से पलायन करने लगेंगे। 

किसानों के दर्द को समझने के लिए कृषि क्षेत्र से जुड़े कुछ आंकड़ों पर गौर करें तो समझ आता है कि सरकार की उपेक्षा के शिकार कृषि क्षेत्र से देश की आधी से अधिक श्रमशक्ति 53 प्रतिशत लोग अपनी रोजीरोटी आजीविका चलाते हैं। इन लोगों में वो सब शामिल है जो किसी ना किसी रूप से कृषि क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। वहीं देश के आर्थिक विकास के पैमाने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की बात करें तो देश की सरकारों के कृषि क्षेत्र के प्रति उदासीन रवैये के चलते  उसमें भी कृषि क्षेत्र का योगदान बहुत कम हुआ है। यह वर्ष 1950-1951 में 54 प्रतिशत था जो अब गिरकर मात्र लगभग 15 प्रतिशत के आसपास रह गया है। वहीं विगत कुछ वर्षों में हुई किसानों की आत्महत्या पर "राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो" (एनसीआरबी) के आंकड़ों की बात करें तो भारत में 1995 से 2014 के बीच किसानों की आत्महत्या का आंकड़ा तीन लाख पार कर चुका था। वहीं पिछले कुछ वर्षों में भारत में किसानों की आत्महत्या के मामलों में बढ़ोत्तरी हुई है। जो हालात देश के नीतिनिर्माताओं व भाग्यविधाताओं के साथ-साथ आमजनमानस के लिए भी बहुत चिंताजनक व सोचनीय हैं। लेकिन आजतक किसी भी सरकार ने किसानों की आत्महत्या के लिए जिम्मेदार कारकों व हालतों का स्थाई समाधान करने की ठोस कारगर पहल धरातल पर नहीं की है। इस ज्वंलत समस्या पर सरकार तत्कालिक कदम उठाकर अपनी जिम्मेदारी से इतिश्री कर लेती है। आजकल तो देश के भाग्यविधाताओं ने किसानों की होने वाली आत्महत्याओं के आंकड़ों को ही छिपाना शुरू कर दिया है। दुर्भाग्य की बात यह हैं कि पिछले कई वर्षों से किसानों की आत्महत्या का आंकड़ा आमजनमानस के लिए उपलब्ध नहीं है। लेकिन पिछले वर्षों के औसत के आधार पर कहा जा सकता है कि मौजूदा समय में देश में किसान आत्महत्याओं का यह आंकड़ा लगभग 4 लाख के आसपास पहुंच गया होगा। लेकिन फिर भी देश में किसानों की उपेक्षा लगातार जारी है।
एक रिपोर्ट के अनुसार देश में अन्नदाताओं की आत्महत्याओं के पीछे सबसे बड़ा मुख्य कारण साहुकार व बैंकों के ऋण की समय से अदायगी न कर पाना है। क्योंकि किसान व्याज के चलते कर्ज में भारी वृद्धि हो जाने से समय पर कर्ज नहीं चुका पाता है, इसके लिए फसल उत्पादन लागत में भारी वृद्धि के बाद भी फसल उत्पादन में कमी, फसल का उचित मूल्य नहीं मिलना तथा मौसम की बेरुखी के चलते लगातार फसलों का बर्बाद होना, बर्बाद फसलों का उचित मुआवजा नहीं मिल पाना आदि हालात जिम्मेदार है। हमारे देश में आजकल किसानों के द्वारा नगदी फसलें उगाने का चलन ज्यादा चल गया है, जिनकी लागत बहुत अधिक होती है। जिसके चलते किसानों को बहुत पैसे की आवश्यकता होती है और देश में आज भी स्थिति यह है कि बैंकों व अन्य संस्थाओं से किसानों को उनकी जरूरत के मुताबिक कर्ज आसानी से नहीं मिल पाता है। जिसके चलते किसान 24 प्रतिशत से लेकर 50 प्रतिशत ब्याज पर निजी साहूकारों से ऋण लेकर अपनी खेती की जरूरतों को पूरा करता है, लेकिन फसल तैयार होने के बाद गलत नीतियों के चलते उचित मूल्य ना मिल पाने, फसल बर्बाद व उत्पादन कम होने के चलते किसानों की कर्ज अदा करने की स्थिति नहीं रह पाती है, जिसके चलते वो कर्ज के इस खतरनाक दलदल में बुरी तरह धंसता चला जाता हैं और जब उसकी सहने की क्षमता जवाब दे जाती हैं तो वो जिंदगी से खफा हो आत्महत्या करने जैसा कदम उठा कर असमय मौत को गले लगा लेता है। हालांकि भारत में किसान एक ऐसी बहादुर कौम जो हर तरह की विकट से विकट परिस्थितियों में भी बिना हिम्मत हारे उनका डट कर मुकाबला करने का माद्दा रखता है, लेकिन फिर भी कुछ लोग जीवन संघर्ष के इस दौर में अपने परिवारों के कष्टों को देखकर टूट जाते हैं और वो आत्महत्या कर बैठते हैं। देश में बेहद कठिन हालात में काम करने वाले किसानों की समस्याओं की उपेक्षा सभी सरकारों के द्वारा जारी है, किसानों की उपेक्षा का सबसे बड़ा उदाहरण हैं कि देश में उद्योगपतियों ने मंदी की हालात से उत्पन्न समस्या से केंद्र सरकार को अवगत कराया, सरकार ने विकट हालात को तुरंत समझते हुए भारी मंदी की चपेट में आये उधोगों को उबारने के लिए तत्काल कॉरपोरेट टैक्स को घटाकर उनको राहत देने का काम किया, जिससे देश के कॉरपोरेट सेक्टर को 1.45 लाख करोड़ का लाभ आने वाले समय में होगा। जबकि हमारा अन्नदाता किसान अपनी समस्याओं से परेशान होकर आत्महत्या कर लेता है, फिर भी सरकार किसानों की लंबे समय से लंबित चली आ रही विभिन्न मांगों पर समय रहते सुनवाई करके उनका स्थाई हल नहीं करती है। यहां गौरतलब है कि सरकार के द्वारा देश के उधोगों को यह राहत ऐसे समय में दी गई थी, ​जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हजारों अन्नदाता किसान अपनी लंबे समय से लंबित मांगों को पूरा करवाने के लिए पैदल मार्च करके दिल्ली पहुंचे थे। फिर भी सरकार ने किसानों की झोली को खाली ही रखा, केंद्र सरकार ने पूर्व की भांति चाणक्य नीति का इस्तेमाल करते हुए, अन्नदाता को मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने का आश्वासन देकर चतुराई से वापस घर भेज दिया। अब देखना होगा कि सरकार का किसानों की मांगों पर विचार आखिर कब तक चलता है और कब तक किसानों की मांगों पर अमल होता है। देश के अन्नदाताओं के आंदोलन के साथ इसी तरह का सफलता पूर्वक प्रयास मोदी सरकार में पहले भी हो चुका है और समय-समय पर पहले की सरकारें भी इस प्रकार के हथकंडे को अपना कर किसानों के आक्रोश को शांत करती रही हैं। देश में सरकारें बदलती रही है लेकिन किसानों की समस्याओं का पूर्ण स्थाई समाधान फिर भी अभी तक नहीं हो पाया है।
जबकि किसानों की मुख्य मांगे वही वर्षों पुरानी है, फसलों का उचित मूल्य, मौसम की मार के चलते बर्बाद फसलों का उचित मुआवजा, सरकार द्वारा तय रेट पर फसलों की खरीद सुनिश्चित करना, गन्ना का भुगतान समय पर हो, किसानों का कर्ज माफ हो, किसानों को बिजली पानी डीजल सस्ता दिया जाए, किसानों के सुरक्षित जीवन के लिए पेंशन योजना बनायी जाये, किसानों की हालात को सुधारने के लिए देश में स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को जल्द से जल्द लागू किया जाये आदि हैं। किसान का आरोप है कि हम बेहद परेशान हैं लेकिन उसके बाद भी कोई भी सरकार हमारी मांगों पर कभी भी ध्यान से सहानुभूतिपूर्वक विचार करके हमारी समस्याओं का ठोस स्थाई समाधान नहीं निकालती है। किसानों का मानना हैं कि देश में चाहे सरकार कोई भी हो वो सड़क पर आये किसानों के दुखदर्द को समझने के लिए तैयार नहीं है। देश में लंबे समय से किसान आंदोलनरत होकर सड़कों पर है लेकिन कोई भी सरकार किसानों की समस्या जान कर उनका स्थाई समाधान करने के लिए तैयार नहीं है। आज किसानों की स्थिति पर मैं देश के नीतिनिर्माताओं से अनुरोध करना चाहता हूँ कि

"ओ देश के भाग्यविधाता,
ना करों अन्नदाता पर अत्याचार,
अन्न उगा कर सबका पेट भरने वाले,
किसानों की जल्द सुनों पुकार,
ना करों उस पर अब और प्रहार,
दे दो उसको खुशहाली से
जीवन जीने के अधिकार।।"

सबसे बड़ी अफसोस की बात यह हैं कि सबका पेट भरने वाला अन्नदाता किसान खुद खाली पेट अपने ही द्वारा चुनी सरकार से अपने अधिकारों की लड़ाई बहुत लंबे समय से लड़ता आ रहा है। लेकिन उसकी आवाज़ उठाने के सबसे सशक्त माध्यम भारतीय मीडिया के अधिकांश प्रभावशाली चहरे उस पर ना जाने क्यों चुप्पी लगाये बेठे हैं। उनमें से आधिकांश अपने प्राइम टाइम में किसानों की समस्याओं व उनकी बेहाली पर चर्चा करने के लिए तैयार नहीं हैं। लेकिन यह भी सच्चाई है कि आप जब भी टीवी खोलेंगे तो प्राइम टाइम में हिंदू-मुसलमान, अबु बकर अल बगदादी, तानाशाह किम जोंग, आईएसआईएस, पाकिस्तान आदि के टीआरपी हासिल करने वाले मुद्दों पर बेहद गम्भीरतापूर्वक डिवेट चल रही होती है। लेकिन किसी के भी पास सबका पेट भरने वाले देश के अन्नदाता किसान के लिए समय नहीं है।

हालांकि समय-समय पर किसानों के लिए विभिन्न सरकारों के द्वारा कई कल्याणकारी योजनाएं भी चलाई गयी हैं। मोदी सरकार के द्वारा भी किसान हित के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही है, लेकिन उन योजनाओं का धरातल पर कोई खास स्थाई असर होता हुआ नजर नहीं आ रहा है। इसलिए अब मोदी सरकार को जरूरत है कि किसानों की ज्वंलत समस्या के बुनियादी कारणों पर तत्काल गौर कर, उन्हें अच्छी तरह से समझा जाए और फिर सरकार के द्वारा इन समस्याओं के समाधान की दिशा में ठोस प्रयास किये जाए। वैसे भी अब केंद्र में दोबारा चुनकर आयी मोदी सरकार से देशवासियों को बहुत ज्यादा उम्मीदें हैं, सरकार को भी जनता की इस आशा पर खरा उतरने के लिए जनभावनाओं के अनरूप समय रहते काम करना होगा। इसलिए सरकार को भी यह जल्दी ही समझ जाना चाहिए कि किसान देश की नींव है उसको मजबूत करें बिना देश का मजबूत होना संभव नहीं हैं। इसलिए देश की नींव किसानों की जिंदगी को खुशहाल बनाने के लिए सरकार को फाईलों से योजनाओं को जल्द से जल्द निकालकर धरातल पर लाकर अमलीजामा पहना कर, समस्याओं का स्थाई कारगर समाधान करना होगा तब ही देश में खुशहाली व विकास का रामराज्य संभव है।