रविवार, 22 सितंबर 2019

*देश की आर्थिक स्थिति ठीक रखने के लिए समय की मांग है वर्षा जल संचयन व उसका उचित प्रबंधन*



*देश की आर्थिक स्थिति ठीक रखने के लिए समय की मांग है वर्षा जल संचयन व उसका उचित प्रबंधन*

*हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी*


*स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार*


जल ही जीवन है, जल जीवन का अमृत है इसके बिना पृथ्वी पर जीवन की कल्पना करना भी संभव नहीं है। आज समय की मांग है कि हम सभी को वर्तमान व भावी पीढ़ियों के लिये जल संरक्षण व उसके उचित प्रबंधन पर तेजी से कार्य करना होगा। आज देश में प्राकृतिक स्वच्छ जल स्रोतों का अस्तित्व तेजी से सिमटता जा रहा है और देश में अंधाधुंध भूजल दोहन के चलते अब यह स्थिति हो गयी है कि नदियों की गोद में आबाद क्षेत्रों में भी स्वच्छ पेयजल की किल्लत होने लगी हैं। वैसे तो हमारे देश में भविष्य में भीषण पेयजल संकट और लातुर जैसे हालत पैदा न हों, इसके लिए समय रहते ही केंद्र सरकार व राज्य सरकारों के स्तरों पर देश में विभिन्न जल परियोजनाएं शुरू कर दी हैं और देश के अधिंकाश जल बोर्ड ने वर्षा जल संचयन और जल प्रबंधन करके स्वच्छ जल के उपलब्ध स्रोतों के बेहतर इस्तेमाल की दिशा में काम करना शुरू कर दिया है। लेकिन अभी ये सब प्रयास नाकाफी है हम सभी आम देशवासियों को इसके लिए सरकार के साथ कंधा से कंधा  मिलकर लगातार सामुहिक प्रयास धरातल पर करने होंगे। तब ही देश में भविष्य में जल संकट की इस ज्वंलत समस्या का कोई स्थाई समाधान हो पायेगा। 


हालातों पर नजर डाले तो पिछले लगभग सौ वर्ष के दौरान विश्व में जल संचयन व प्रबंधन के मामले में लोगों की आदत में दो बड़े बदलाव समय के साथ हुए हैं।


 


पहला- आम व्यक्ति और समुदायों ने अब जल संचयन व उसके उचित प्रबंधन से अपने हाथ खींच लिए है और देश में सरकार को यह जिम्मेदारी सौंप दी है, जबकि पहले किसी भी सरकार द्वारा लोगों को पानी उपलब्ध नहीं कराया जाता था। आमजनमानस पानी का संचयन व इंतजाम स्वयं करता था। जो चलन विश्व में अब पूर्ण रूप से समाप्त हो गया हैं।

दूसरा- वर्षा जल के इस्तेमाल और इकट्ठा करने के आसान तरीकों में अब काफी कमी आई है, जबकि अब बांधों के माध्यम से नदियों और नल व नलकूपों के माध्यम से भूजल का बहुत तेजी के साथ रोजमर्रा के इस्तेमाल के लिए दोहन किया जाने लगा और इन्हें ही सभी लोगों को जल प्रदान करने का मुख्य स्त्रोत बना दिया गया। आकडों के अनुसार नदियों और जलाशयों का जल वर्षा के जल का एक छोटा सा हिस्सा मात्र है। जबकि उन पर सभी को पानी पिलाने का दबाव दिनप्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। जो स्थिति भविष्य के लिए ठीक नहीं हैं।

वैसे भी जल संकट आज के पूरे विश्व की मुख्य चिंता का विषय है, इस गम्भीर समस्या का हमको समय रहते निदान करना होगा। मित्रों प्रकृति हमकों निरंतर वायु, जल, प्रकाश, फल, फूल, कंदमूल, खनिज संपदा आदि बिना किसी भेदभाव के दे रही है 


लेकिन हम अव्यवस्थित विकास की आंधी दौड़ में लगातार प्राकृतिक संतुलन को अपने ही हाथों से बिगाड़ते जा रहे हैं। इसलिए अब समय आ गया हैं कि हम प्रकृति के द्वारा दी गयी वस्तुओं का सही ढंग से उपयोग करते हुए, जल संचयन के लिए समय रहते जाग जाये क्योंकि-

*"रहिमन पानी राखिए,*


*बिन पानी सब सून ।*


*पानी गए न उबरे,*


*मोती, मानुस, चून’।।"*

अब समय आ गया कि हमको जल की अहमियत को बिना एक पल गवायें समझ कर उसका भविष्य के लिए संचयन शुरू करना होगा। तब ही हमारी आने वाली पीढियों को जल संकट से बचाया जा सकता हैं। 

*भारत में हालात -:* देश में तेजी से बढ़ती जनसंख्या के चलते जल की मांग बहुत तेजी से बढ़ रही हैं। बढ़ती मांग के चलते भारत में भी पानी का संकट हर वर्ष नयी चुनौतियां पैदा कर रहा है, जिस पर यदि तत्काल ध्यान न दिया गया तो स्थिति बेहद भयावह व विस्फोटक हो सकती है। 


आकडों पर नजर डाले तो भारत में विश्व की 18 प्रतिशत से अधिक आबादी है, लेकिन  विश्व का केवल 4 प्रतिशत नवीकरणीय जल संसाधन और विश्व के भूक्षेत्र का 2.4 प्रतिशत भूक्षेत्र उपलब्ध है। 


आज देश के हालात यह हैं कि लगभग 55 प्रतिशत कुएँ पूरी तरह सूख चुके हैं, पिछले दस वर्षों में भूजल स्तर में बहुत तेजी से कमी दर्ज की गई है, जलाशय सूख रहे हैं और नदियों में पानी के बहाव में दिनप्रतिदिन कमी आ रही है। यह स्थिति तब है जब देश में प्रतिवर्ष 1170 मिमी. औसतन वर्षा होती है, जो कि विश्व के बहुत सारे देशों से बहुत अधिक है व पश्चिम अमेरिका से 6 गुना अधिक है। 


भारत के शहरी क्षेत्रों के हालात यह है कि अधिकांश लोगों को पीने का साफ पानी मुहैया करना सरकार के सामने बहुत बड़ी चुनौती है।


वहीं अब तो बढ़ते जल प्रदूषण के चलते ग्रामीण क्षेत्रों में भी 70 प्रतिशत लोग प्रदूषित जल पीने के लिए विवश हैं। 


लगभग 33 करोड़ लोग देश में ऐसी जगह रहने को मजबूर हैं जहाँ हर साल सूखा पड़ता है। 


भारत में 85 प्रतिशत पानी कृषि कार्य, 10 प्रतिशत उद्योगों और 5 प्रतिशत घरेलू कार्यों में इस्तेमाल किया जाता है। 


देश में पानी की मांग 2030 तक दोगुना हो जाने की संभावना है। 


देश में वर्ष 1994 में पानी की उपलब्धता प्रति व्यक्ति 6000 घनमीटर थी, जो वर्ष 2000 में 2300 घनमीटर रह गई तथा वर्ष 2025 तक इसके और घटकर 1600 घनमीटर रह जाने का अनुमान है। 


देश में होने वाली कुल वर्षा के 5 प्रतिशत जल का भी यदि संचयन कर लिया जाए तो देश के करोड़ लोगों, कृषि व उधोगों की सालभर की पानी की आवश्यकता को पूरा किया जा सकता है। 


*वर्षा जल संचयन व प्रबंधन की आवश्यकता क्यों-:* पहले देश की जनसंख्या कम थी और सभी लोगों की आवश्यकता पूर्ति करने के लिए शुद्ध जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध था। लेकिन उस समय भी देश में पानी का महत्व कम नहीं था। हालात ये थे कि देश व विश्व में पेयजल व कृषि भूमि की सिंचाई के लिए लड़ाइयां तक होती रही हैं। अब जिस तरह से निरंतर बढ़ती जनसंख्या तथा बढ़ते हुए औद्योगिकीकरण की वजह से धरती पर तेजी से स्वच्छ जल की कमी महसूस की जा रही है, वह सोचनीय स्थिति है। इस मसले पर कुछ विशेषज्ञों का तो यहां तक कहना है कि अगर समय रहते पानी के संचयन, उचित प्रबंधन करके उपयोग करना, पुनः उपयोग और बेहतर इस्तेमाल के कारगर उपाय नहीं किए गए तो अगला विश्व-युद्ध जल के लिए हो सकता है।


देश में बढ़ते जल संकट को देखकर अब समय आ गया है कि हम सभी को समझना होगा कि धरती पर पेट भरने के लिए भोजन, सांस लेने के लिए आक्सीजन के बाद जल एक ऐसा पदार्थ है जिसकी वजह से ही पृथ्वी पर जीवन मौजूद है। जीवन के लिए जल बहुत महत्वपूर्ण इसके बिना पृथ्वी पर जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। लेकिन फिर भी सरकार से लेकर के आमजनमानस तक जल को स्वच्छ रखने, उसके संचयन करने व उचित प्रबंधन को लेकर पूर्ण रूप से जागरूक नहीं है। आज देश में हालात यह हैं कि हम लोगों के रोजमर्रा के गलत तरीकों के चलते आज देश में स्वच्छ जल का बहुत गम्भीर संकट उत्पन्न होने लगा है। आज देश में गुजरते समय के साथ-साथ बहुत ही तेजी के साथ स्वच्छ ताजे पानी के स्रोत दिनप्रतिदिन कम होते जा रहे हैं। इस संकट को लेकर संयुक्त राष्ट्र सहित कई वैश्विक एजेंसियों की रिपोर्ट से यह स्पष्ट संकेत मिले हैं कि यदि स्वच्छ जल संचयन की वर्तमान स्थित में जल्द ही कोई सकारात्मक बदलाव धरातल पर नहीं किया जाता है और सही ढंग से उचित जल प्रबंधन व जल प्रदूषण के निवारक उपायों पर ध्यान नहीं दिया जाता है, तो वर्ष 2050 तक दुनियाभर में ताजे पानी के स्रोत बहुत ही तेजी से समाप्त होने शुरू हो जाएंगे। अपने देश भारत में इस स्थिति से बचने के लिए आज समय की मांग के अनुसार हमको वर्षा जल के संचयन व उसके उचित प्रबंधन के लिए तत्काल कारगर ठोस पहल धरातल पर करनी होगी तब ही आने वाली पीढियों के लिए हम स्वच्छ पेय जल का संग्रहण करके उनको जीवन दे सकते हैं। 


वैसे भी अब वह समय आ गया है कि जब हम सभी को समझना होगा कि वर्षा जल संचयन एक बहुत ही दीर्घकालिक प्रक्रिया है, जिसके लिए हमको समय रहते ही प्रयास करने होंगे। तब ही हम वर्षा जल संचयन कि इस दीर्घकालिक प्रक्रिया से भविष्य के विभिन्न उद्देश्यों के लिए और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए वर्षा जल को संरक्षित कर उसका उपयोग कर सकते है। देशभर में आयेदिन जगह-जगह व्याप्त गम्भीर जल संकट की स्थिति से निपटने के लिए वर्षा जल को बड़ी मात्रा में बचाने का अब समय आ गया है। वैसे तो हमारे गांवों में वर्षा जल संचयन कभी रोजमर्रा की परंपरा का एक अभिन्न अंग हुआ करता था। हम लोग पानी की एक-एक बूंद की बर्बादी को बहुत बड़ा पाप समझते थे, हमारे लिए जल भगवान का साक्षात स्वरूप होता था। लेकिन तेजी से होते शहरीकरण के चपेटे में हमारे गांवों के भी आ जाने से जल केवल अब एक उपभोग की एक वस्तु मात्र बन गया है, जिसके चलते अब गांवों में भी भूजल का अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है। आज हमारे गांवों में भी वर्षा जल संचयन व उसका प्रबंधन दिनप्रतिदिन बहुत तेजी से कम होता जा रहा हैं और शहर में तो धन कमाने की दौड़ में चंद जिम्मेदार लोगों को छोड़कर किसी को भी जल संचयन की चिंता नहीं हैं। जो हालात भविष्य के भारत के लिए ठीक नहीं है। 

आपको बता दे कि आकडों के अनुसार विश्व के सबसे ज्यादा बारिश होने वाले क्षेत्रों में हमारा देश भारत भी शामिल है, हमारे देश में हर वर्ष बर्फ पिघलने और वर्षा जल के रूप में औसतन 4000 अरब घन मीटर जल प्राप्त होता है, जिसमें से काफी पानी बिना किसी उपयोग के व्यर्थ में बहकर नदी-नालों के द्वारा समुद्र में चला जाता है जिसमें वर्षा जल का भाग अधिकांश होता है। जल संचयन व उसके प्रबंधन के लिए आज हमको इजराइल जैसे छोटे देश से सीखना होगा जहाँ वर्षा का औसत बहुत कम है, वहाँ भी सरकार व आमजनता के जागरूक होने व उन्नत तकनीक के इस्तेमाल के चलते लोगों का जीवन सुचारू रूप से चल रहा है। वहाँ जल प्रबंधन तकनीक व प्रबंधन के तरीक़े अति विकसित होकर लोगों को जल की कमी का आभास नहीं होने देते है, अपितु आज इजरायल उन्नत तकनीक से जल संचयन व प्रबंधन के चलते कृषि क्षेत्र से भी कई बहुमूल्य उत्पादों का निर्यात करके खूब विदेशी मुद्रा अर्जित कर रहा है। तो अंतरिक्ष तक अपनी तकनीक का डंका बजवाने वाला भारत ये कार्य क्यों नहीं कर सकता !

*वर्षा जल संचयन क्या है -:*


वर्षा के जल को किसी खास माध्यम से संचय करने या इकट्ठा करने की प्रक्रिया को वर्षा जल संचयन कहा जाता है।


वर्षा जल संचयन रोजमर्रा के जीवन में विभिन्न उद्देश्यों के लिए उपयोग में किए जाने वाले वर्षा के जल को इकट्ठा करने और उसको संग्रहीत करने की एक विधि है जिससे कि उस जल का उपयोग  भविष्य में भी किया जा सकता है। वर्षा जल संचयन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें हम बारिश के पानी को इकट्ठा करके भविष्य की अपनी जरूरत के समय आवश्यकतानुसार उपयोग कर सकते हैं। वर्षा के पानी को एक निर्धारित किए हुए स्थान पर जमा करके हम वर्षा जल संचयन कर सकते हैं और भूजल को रिचार्ज कर सकते है जिससे भू-जल के गिरते स्तर पर रोक लगायी जा सकती है और स्वच्छ भूजल के स्रोतों को बचाया व बढ़ाया जा सकता है। 

*वर्षा जल संचयन की आवश्यकता क्यों -:* वर्षा जल संचयन की आवश्यकता इसलिए है क्योंकि आज भारत ही नहीं बल्कि विश्व भर में जल की कमी एक बड़ा संकट बनती जा रही है। जिसका सबसे बड़ा कारण भूजल के जलस्तर का लगातार नीचे जाना भी है। इसके लिये बारिश के समय जो वर्षा जल बहकर सागर में मिल जाता है, उसका संचयन करके व उचित प्रबंधन करके भूजल का पुनर्भरण किया जाना बहुत आवश्यक है, ताकि भविष्य के लिए भूजल संसाधनों का संवर्धन हो पाये। आकडों के अनुसार आज अकेले भारत में ही व्यवहार्य भूजल भण्डारण का आकलन 214 बिलियन घन मी. (बीसीएम) के रूप में किया गया है जिसमें से 160 बीसीएम की पुन: प्राप्ति हो सकती है। इस जल संकट की ज्वंलत समस्या का एक मात्र समाधान है जल संचयन व उसका उचित प्रबंधन है। पशुओं के पीने के पानी की उपलब्धता, फसलों की सिंचाई के विकल्प के रूप में वर्षा जल संचयन प्रणाली को विश्वव्यापी तौर पर अपनाया जाता रहा है। वर्षा जल संचयन प्रणाली उन सभी स्थानों के लिए उचित है, जहां प्रतिवर्ष न्यूनतम 200 मिमी वर्षा होती हो। जिसके संचयन के लिए भारत में अपार संभावनाएं हैं।


*वर्षा जल संचयन के कारगर तरीके :-* वर्षा जल संचयन करने के कई आधुनिक व पुरातन तरीके हैं। इनमें से कुछ तरीके वर्षा जल का संचयन करने में बहुत ही कारगर साबित हुए हैं। जिनमें से कुछ तरीकों को तो हम सदियों से अपनाते आये है। इन तरीकों से संचयन किए हुए वर्षा जल का हम उचित ढंग से प्रबंधन करके उसको घरेलू, कृषि व व्यावसायिक उपयोग में लाकर भूजल के गिरते स्तर पर लगाम लगा सकते हैं व भूजल के स्रोतों को बचा सकते हैं। इसके लिये हम विभिन्न तकनीकों को अपनाते हुए मुख्य रूप से दो तरीकों से वर्षा जल का संचयन करके उसका भविष्य में उपयोग करते हैं।

1-: सतह अपवाह वर्षा जल संचयन -: शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में बहने वाले वर्षा जल को नदी, नालों व नालियों में बहाने देने की बजाय, भूजल स्तर या जलवाही स्तर तल पर एकत्रित किया जा सकता है। इस तरीक़े के द्वारा हम भविष्य में उपयोग के लिये सतह के जल को एक जगह इकट्ठा करते हैं। बरसात के दिनों में सतह से बारिश के पानी को इकट्ठा करना एक बहुत ही असरदार और पारंपरिक प्राचीन तकनीक है। इस तकनीक में छोटे-बड़े तालाबों, जगह-जगह भूमिगत टैंकों, चैक डैम, छोटे-बड़े बांध में आदि में वर्षा जल का संचयन करके उसका भविष्य में इस्तेमाल किया जा सकता है। इस तरीक़े के द्वारा वर्षा जल का संचयन व उसका उचित प्रबंधन करके काफी भूजल की बचत की जा सकती है।


2-: गिरते भूजल के स्तर को रोकने के लिए भूमिजल का पुनर्भरण करना -: हमारे देश में भूमिजल का पुनर्भरण तकनीक जल संग्रहण का एक नया आधुनिक तरीका है और प्रायः इसके लिये निम्न प्रकार के संरचनाओं (ढांचों) का प्रयोग किया जाता है।


भवनों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग के द्वारा -: वर्षा जल सीधे इमारतों की छतों से रेन वाटर हार्वेस्टिंग वाली जगह पर बने टैंक में एकत्र किया जाता है जोकि धीरे-धीरे भूमि के अंदर जाकर भूजल का पुनर्भरण (रिचार्ज) करके भूजल के स्तर को बहाल करने में मदद करता है।


गड्ढे -: पुनःभरणगड्ढे या पिट्स को उथले जलभृत के पुनर्भरण के लिये बनाया जाता है। जिसके द्वारा भूजल के स्तर को रिचार्ज करके भविष्य में सही रखा जा सकता है।


जलभृत -: यह रेत, पथरीली या चट्टानों की बनी मिट्टी की छिद्रनीय परतें हैं जिनसे प्रचुर मात्रा में जल को उपयोग करने के लिये निकाला जा सकता है। इनका निर्माण एक से दो मीटर की चौड़ाई में और एक से 1.5 मीटर की गहराई में किया जाता है और जिनको रेत, मिट्टी, कंकड़ों से भी भर दिया जाता है। 


खाइयाँ -: इनका तब निर्माण होता है, जब पारगम्य (भेद्य) चट्टानें उथली गहराई पर उपलब्ध होती है। खाई 0.5 से 1 मीटर चौड़ी, 1 से 1.5 मीटर गहरी और, 10 से 20 मीटर की लम्बी हो सकती है। इसकी चौड़ाई, लंबाई और गहराई जल व स्थान की उपलब्धता पर निर्भर है। इनको पाटने के लिये फिल्टर सामग्री का प्रयोग होता है। 


खुदे हुए कुएँ -: कुएँ का पुनःभरण ढाँचे के रूप में उपयोग किया जा सकता है। यह आवश्यक है कि पानी को कुएँ में डालने से पहले उसको फिल्टर (छानने वाले यंत्रों) से गुजारना चाहिये जिससे भूजल प्रदूषित ना हो सके।


हाथ से संचलित पंप (हैंडपंप) -: यदि जल की उपलब्धता सीमित हो, तो मौजूदा हैंडपंपों को उथले/गहरे जलभृतों को पुनर्भरित करने के लिये प्रयोग में लाया जा सकता है। इन में जल को छानने के यंत्रों द्वारा प्रवाहित करना जरूरी है। इससे पुनःभरण के काम आने वाले कुओं में अवरोधन नहीं होगा।


पुनःभरण कुएँ -: अधिक गहरे जलकोषों के पुनःभरण के लिये 100 से 300 मि. मी. व्यास के पुनःभरण कुओं का प्रायः निर्माण किया जाता है। इनमें जल को फिल्टर उपकरणों से अवरोधन को रोकने की दृष्टि से पारित किया जाता है। 


पुनःभरण शाफ्ट -: उथले जलकोषों के पुनःभरण के लिये इनका निर्माण होता है। (ये मिट्टी की गीली सतह से नीचे स्थित है)। इन पुनःभरण शाफ्टों का 0.5 से 3 मीटर का व्यास है और ये 10 से 25 मीटर गहराई के हैं। ये शाफ्ट पत्थरों और मोटी रेत से भरा होता है। 


बोर कुओं के पार्श्व शाफ्ट -: उथले एवं गहरे जलभृतों के पुनःभरण के उद्देश्य से, पानी की उपलब्धता से संबंधित, 1.5 मीटर से 2 मीटर चौड़े और 10 से 30 मीटर लम्बे पार्श्व शाफ्टों का एक या दो बोर कुओं के संग निर्माण होता है। पार्श्व शाफ्ट के पीछे पत्थर और मोटी रेत बिछी होती है। 

ये वो कुछ तरीक़े है जिनके द्वारा हम वर्षा जल का संचयन कर सकते हैं।

*वर्षा जल संचयन व उसके प्रबंधन के लाभ-:*  विश्व में जिस तरह से बहुत तेजी के साथ बढ़ते प्रदूषण व ग्लोबल वार्मिंग के चलते दुनिया भर में जलवायु को बहुत अधिक क्षति पहुंचा रही है। उसके चलते आजकल सभी जगह सही मात्रा में बारिश का होना अप्रत्याशित हो गया है। आज जहाँ एक तरफ भारी बारिश की मार के चलते लोगों को जानमाल का नुकसान होता है, वहीं दूसरी तरफ सूखे के हालात के चलते भी जानमाल का नुकसान होता हैं। इस नुकसान को कम करने में वर्षा जल संचयन व उसका उचित प्रबंधन बहुत कारगर है। भारी वर्षा से प्रभावित बाढ़ग्रस्त क्षेत्र में वर्षा जल संचयन करके हम बाढ़ की समस्या को कम करके जानमाल की रक्षा कर सकते हैं, जबकि वर्षा जल संचयन करके हम जलीय दुर्लभ क्षेत्रों में जल उपलब्ध कराने में मदद कर सकते हैं। जल प्रबंधन का यह नवीकरणीय स्रोत जल से संबंधित उन सभी प्रमुख समस्याओं पर काबू पाने में मदद कर सकता है, जो समस्याएं न केवल अभी के लिए दुनिया को परेशान कर रही हैं बल्कि जो भविष्य में भी वैश्विक आबादी और पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव डाल सकती हैं। जिससे बचने के लिए वर्षा जल संचयन व उसके प्रबंधन पर सरकार के साथ अब आम जनता को भी पूर्व की भांति ध्यान देना होगा, क्योंकि बूंद-बूंद जल मिलकर ही सागर बनता है।उसी उद्देश्य को हासिल करने के लिए हम सभी को मिलजुलकर सामुहिक प्रयास करने होगें। जिससे हमें भविष्य में बहुत लाभ होगा।


अगर हम वर्षा जल का संचयन ज्यादा से ज्यादा अलग-अलग जगहों में इकट्ठा करके करे, जैसे बांधों में, कुओं में और तालाबों आदि में। अलग-अलग जगहों में पानी का संचयन करने के कारण जमीन पर बहकर व्यर्थ जाने वाले वर्षा जल की मात्रा में कमी आती है जिससे बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा को रोकने में व भूजल को रिचार्ज करने में स्वाभाविक रूप से मदद मिलती है। जिसके चलते भविष्य में हमारे जानमाल के नुकसान में कमी आ सकती है व जल पर होने वाले खर्च को कम किया जा सकता है। इसके कुछ लाभ इस प्रकार है-:


वर्षा जल संचयन व उसका उचित प्रबंधन करके हम घरेलू काम के लिए ज्यादा से ज्यादा पानी बचा सकते हैं और इस पानी को अपने पालतू जानवरों के लिए, कपड़े साफ करने के लिए खाना पकाने के लिए, तथा घर साफ करने के लिए, नहाने में इस्तेमाल कर सकते है।


देश के औद्योगिक संस्थानों में वर्षा जल संचयन करके संचयन किया हुआ वर्षा जल का उपयोग कम्पनी में करके हम भविष्य के लिए स्वच्छ भूजल की बचत कर सकते हैं।

जल की किल्लत वाले क्षेत्र में उन क्षेत्रों में जहां पानी को भी लोग बेचा करते हैं। ऐसी जगह में वर्षा के महीने में जल संचयन करके गर्मी के महीने में पानी की कमी को कुछ प्रतिशत तक कम करा जा सकता है।

गांवों में वर्षा जल संचयन के द्वारा ज्यादा से ज्यादा पानी एकत्र किया जा सकता है। जिससे सिंचाई करके किसान अपनी फसलों की सिंचाई पर होने वाले खर्च को भी बचा सकते हैं। और इसकी मदद से साथ ही ज्यादा बोरवेल वाले क्षेत्रों में भूजल के स्तर को गिरने से रोका जा सकता है। क्योंकि सबसे अधिक जल कृषि क्षेत्र में ही इस्तेमाल होता है।वर्षा जल संचयन किसानों के लिए सबसे कारगर साबित हो सकता है क्योंकि वर्षा के पानी को बचाकर ज्यादातर किसान गर्मियों के महीने में बहुत ही आसानी से पानी की किल्लत को दूर कर सकते हैं।

आज दुनिया एक आधुनिक टेक्नोलॉजी से जुड़ी दुनिया बन चुकी है। ऐसे में लोगों के बढ़ती जनसंख्या के कारण आज विश्व के हर एक क्षेत्र मे बड़ी बड़ी इमारतों का निर्माण हो रहा है। यह बात तो साधारण है कि इन इमारतों के निर्माण के लिए सबसे ज्यादा पानी का उपयोग हो रहा है। ऐसे में वर्षा जल संचयन के माध्यम से बचाए हुए पानी को इन इमारतों के निर्माण मैं लगा कर कई प्रतिशत स्वच्छ पानी को बचा सकते हैं।

पूरे वर्ष लोग आसपास के जमीन में कचरा फेंकते हैं और बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां अपने कारखानों से निकली हुई जहरीली या रासायनिक पानी को पास के क्षेत्रों में निकाल देते हैं। परंतु मुश्किल तब आती है जब बारिश का महीना आता है क्योंकि बारिश होने पर वही रासायनिक पदार्थ और कचरा जमीन पर बहते हुए पानी से मिलता है और लोगों के खेतों, तालाबों और कुओं में जाकर गिरता है। ऐसे में ज्यादा से ज्यादा वर्षा के पानी को जमीन पर ना बहने देकर उसे किसी अन्य स्थान पर इकट्ठा करके हम उपयोग में ला सकते हैं और अपने आसपास के जल स्रोतों को भी इन जहरीले रासायनिक तत्वों से दूर रख सकते हैं।

हमको समझना होगा कि आज वर्षा जल का संचयन व उसका उचित प्रबंधन करके, हम ज्यादा से ज्यादा वर्षा जल का इस्तेमाल करके भविष्य के लिए स्वच्छ जल के स्रोतों व भूजल को ज्यादा से ज्यादा बचा सकते हैं। हम लोग अपनी रोजमर्रा की आदतों में कुछ बदलाव करके भविष्य के जल संचयन करके आने वाली पीढियों पर उपकार कर सकते है।


जीवन में जल के महत्व पर मैं चंद लाईन कहना चाहता हूँ 

जीवन में जरूरी है जल,


नहीं चल सकता इसके बिना,


जीवन का एक भी पल,


ना करो जल की एक-एक,


बूंद को भी व्यर्थ बर्बाद,


जल संचयन करके करों,


पीढियों के भविष्य को आबाद।।

*दीपक कुमार त्यागी*


शनिवार, 7 सितंबर 2019

*"मिशन चंद्रयान-2" सम्पर्क टूटा है संकल्प नहीं, वैज्ञानिकों के हौसले को देश का नमन्*

*"मिशन चंद्रयान-2" सम्पर्क टूटा है संकल्प नहीं, वैज्ञानिकों के हौसले को देश का नमन्*

*हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी*
*स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार*

भारत की शान "भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन" (इसरो) के वैज्ञानिकों के लम्बे अथक प्रयास से चलाये गये पूर्ण रूप से स्वदेश निर्मित तकनीक पर आधारित "मिशन चंद्रयान-2" में, भारत शुक्रवार की रात इतिहास रचने से मात्र दो क़दम दूर रह गया। अभियान के अंतिम समय पर अगर लैंडर विक्रम से इसरो के वैज्ञानिकों का संपर्क बना रहता और सब कुछ ठीक रहता। तो आज भारत दुनिया पहला ऐसा देश बन जाता जिसका अंतरिक्ष यान चन्द्रमा की सतह के दक्षिणी ध्रुव के क़रीब उतरता।
इससे पहले अमरीका, रूस और चीन ने ही चन्द्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैन्डिंग करवाई थी लेकिन वो भी दक्षिणी ध्रुव पर नहीं। क्योंकि कहा जाता है कि चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर जाना बहुत जटिल है। अपने अंतिम क्षणों में  भारत भी मिशन चन्द्रमा की सतह से महज 2.1 किलोमीटर दूर रह गया।

जिस तरह के बुलंद हौसलों के साथ भारतीय वैज्ञानिकों ने चंद्रमा को अपने आगोश में लेने के लिए मिशन "चंद्रयान-2" की चांद पर सफल लैन्डिंग कराने का प्रयास किया वह काबिलेतारीफ है। देश की जनता इसरो के सभी वैज्ञानिकों व कर्मचारियों के बुलंद हौसलों को नमन् करती है।

देश के इस महत्वाकांक्षी "मिशन चंद्रयान-2" को शनिवार तड़के उस समय बड़ा झटका लगा, जब मिशन के अंतिम क्षणों में लैंडर विक्रम का चंद्रमा की सतह से महज 2.1 किलोमीटर पहले ही इसरो के वैज्ञानिकों से संपर्क टूट गया। सम्पर्क टूटने कि इस बड़ी घटना के साथ ही इसरो के वैज्ञानिक इतिहास दर्ज कराने से भी महज एक कदम दूर रह गये। इस मिशन के समीक्षकों का मानना है कि यह मिशन 95 प्रतिशत कामयाब रहा व मात्र 5 प्रतिशत नाकामयाब रहा है। क्योंकि विक्रम लैंडर से भले ही निराशा मिली है लेकिन यह मिशन नाकाम नहीं रहा है, क्योंकि चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर चंद्रमा की कक्षा में अपना काम सही ढंग से कर रहा है। इस ऑर्बिटर में कई साइंटिफिक उपकरण हैं जो कि बहुत ही अच्छे से काम कर रहे हैं। इस घटना के साथ ही इसरो के 978 करोड़ रुपये लागत वाले इस महत्वाकांक्षी मिशन चंद्रयान-2  के भविष्य पर अब सस्पेंस बन गया है। इसरो के वैज्ञानिक लैंडर विक्रम से संपर्क साधने का लगातार प्रयास कर रहे है।

इस मिशन पर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अध्यक्ष के. सिवन ने इसरो के वैज्ञानिकों का लैंडर विक्रम से संपर्क टूटने का ऐलान करते हुए कहा कि चंद्रमा की सतह से 2.1 किमी पहले तक लैंडर विक्रम का काम वैज्ञानिकों की प्लानिंग के मुताबिक सफलतापूर्वक चल रहा था। उन्होंने बताया कि उसके बाद लैंडर विक्रम का संपर्क टूट गया हैं। हम उसके डेटा का विश्लेषण कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस ऐतिहासिक क्षण का गवाह बनने के लिए इसरो के मुख्यालय बेंगलुरु पहुंचे थे। लेकिन आख़िरी पल में मिशन चंद्रयान-2 का 47 दिनों का सफ़र अधूरा रह गया।

आईये जानते है आखिर क्या है भारत का महत्वाकांक्षी "मिशन चंद्रयान-2"

*मिशन चंद्रयान-2 की शुरुआत -:* इस मिशन की नींव 12 नवम्बर 2007 को रखी गयी थी। जब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और रूसी अंतरिक्ष एजेंसी (रोसकोसमोस) के प्रतिनिधियों ने चंद्रयान-2 परियोजना पर साथ काम करने के एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। जिसके अनुसार ऑर्बिटर तथा रोवर की मुख्य जिम्मेदारी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की होगी तथा रोसकोसमोस लैंडर के लिए जिम्मेदार होगा।

मिशन चंद्रयान-2 को तत्कालीन भारत सरकार ने 18 सितंबर 2008 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में आयोजित केन्द्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में स्वीकृति दी थी। अंतरिक्ष यान के डिजाइन को अगस्त 2009 में पूर्ण कर लिया गया था। हालांकि इसरो ने चंद्रयान -2 कार्यक्रम के अनुसार पेलोड को अंतिम रूप दिया। परंतु अभियान को जनवरी 2013 में स्थगित कर दिया गया तथा अभियान को 2016 के लिये पुनर्निर्धारित किया। क्योंकि रूस लैंडर को समय पर विकसित करने में असमर्थ था।रोसकोसमोस को बाद में मंगल ग्रह के लिए भेज़े फोबोस-ग्रन्ट अभियान मे मिली विफलता के कारण चंद्रयान-2 कार्यक्रम से अलग कर दिया गया था। तथा भारत ने चंद्रयान-2 मिशन को स्वतंत्र रूप से इसरो के नेतृत्व में विकसित करने का फैसला किया था।

*मिशन चंद्रयान-2 का उद्देश्य -:* आपको बता दे कि इसरो का बहुत ही महत्वाकांक्षी मिशन चंद्रयान-2 अब तक के सभी  मिशनों से भिन्न है। करीब दस वर्ष  के लम्बे वैज्ञानिक अनुसंधान और अभियान्त्रिकी विकास के कामयाब दौर के बाद चंद्रयान-2 को इस मिशन पर भेजा गया था।
इस मिशन का लक्ष्य भारत के द्वारा चंद्रमा के दक्षिण ध्रुवीय क्षेत्र के अब तक के अछूते भाग के बारे में जानकारी हासिल करके इतिहास रचना था। इस मिशन के द्वारा व्यापक भौगौलिक, मौसम सम्बन्धी अध्ययन, चंद्रयान-1 द्वारा खोजे गए खनिजों का विश्लेषण करके चंद्रमा के अस्तित्त्व में आने और उसके क्रमिक विकास की और ज़्यादा जानकारी मिल पाती। इसके चंद्रमा पर रहने के दौरान हम चाँद की सतह पर अनेक और परिक्षण भी करते जिनमें चाँद पर पानी होने की पुष्टि और वहां अनूठी रासायनिक संरचना वाली नई किस्म की चट्टानों का विश्लेषण शामिल हैं। मिशन चंद्रयान-2 से चाँद की भौगोलिक संरचना, भूकम्पीय स्थिति, खनिजों की मौजूदगी और उनके वितरण का पता लगाने, सतह की रासायनिक संरचना, ऊपर मिट्टी की ताप भौतिकी विशेषताओं का अध्ययन करके चन्द्रमा के अस्तित्व में आने तथा उसके क्रमिक विकास के बारे में नई जानकारियां मिल पाती।

इस मिशन के दौरान ऑर्बिटर पे-लोड 100 किलोमीटर दूर की कक्षा से रिमोट सेंसिंग अध्ययन करेगा, जो कि पूर्ण रूप से सफलतापूर्वक अपना कार्य करते हुए इसरो के वैज्ञानिकों को लगातार अपने संदेश प्रदान कर रहा है। जिससे भारतीय वैज्ञानिकों का यह मिशन 95 प्रतिशत कामयाब रहा हैं।
जबकि लैंडर विक्रम और रोवर पे-लोड लैंडिंग साइट के नज़दीक चन्द्रमा की संरचना समझने के लिए वहां की सतह में मौजूद तत्वों का पता लगाने और उनके वितरण के बारे में जाने के लिए व्यापक स्तर पर और इन - सिटु स्वर पर परीक्षण करता। साथ ही चन्द्रमा के चट्टानी क्षेत्र "रेगोलिथ" की विस्तृत 3-डी मैपिंग की जाती। चन्द्रमा के आयनमंडल में इलेक्ट्रान घनत्व (डेंसिटी) और सतह के पास प्लाज़्मा वातावरण का भी अध्ययन किया जाता। चन्द्रमा की सतह के ताप भौतिकी गुणों (विशेषताओं) और वहां की भूकम्पीय गतिविधियों को भी मापा जाता। इंफ़्रा रेड स्पेक्ट्रोस्कोपी, सिंथेटिक अपर्चर रेडियोमीट्री और पोलरीमिट्री की सहायता से और व्यापक स्पेक्ट्रोस्कोपी तकनीकों से चाँद पर पानी की मौजूदगी के ज़्यादा से ज़्यादा आंकड़े इकठ्ठा किए जाते। लेकिन अफसोस मिशन के अंतिम क्षणों कि लैंडर विक्रम से इसरो का संपर्क टूट गया और मिशन को अपने अंतिम चरण में  सफलता की जगह विफलता हाथ लगी।

*चंद्रयान-2 का प्रक्षेपण -:*
भारत का "मिशन चंद्रयान-2"  चंद्रयान-1 मिशन के बाद भारत का दूसरा महत्वाकांक्षी चन्द्र अन्वेषण अभियान है, जिसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसन्धान संगठन (इसरो) ने विकसित किया है। इस चंद्रयान-2 अभियान को जीएसएलवी संस्करण 3 प्रक्षेपण यान द्वारा प्रक्षेपित किया गया। इस अभियान में भारत में निर्मित एक चंद्र कक्षयान, एक रोवर एवं एक लैंडर विक्रम शामिल हैं। इन सब का विकास इसरो के द्वारा किया गया है। भारत ने चंद्रयान-2 को 22 जुलाई 2019 को आंध्रप्रदेश के श्रीहरिकोटा रेंज के
"सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र" प्रक्षेपण स्थल से भारतीय समयानुसार 02:43 अपराह्न को सफलता पूर्वक प्रक्षेपित किया था। उसके बाद 14 अगस्त तक पृथ्वी की कक्षा में रहने के बाद चंद्रमा की ओर उसकी यात्रा शुरू हुई थी और छह दिन बाद 20 अगस्त को वह चंद्रमा की कक्षा में सफलतापूर्वक पहुंचा था।

*मिशन चंद्रयान-2 के आखिरी क्षण -:* शनिवार तड़के लगभग 1.38 बजे जब 30 किलोमीटर की ऊंचाई से 1,680 मीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से 1,471 किलोग्राम का लैंडर विक्रम ने चंद्रमा की सतह की ओर बढ़ना शुरू किया, उस समय तक सबकुछ ठीक था। विक्रम लैंडर योजना के अनुरूप चंद्रमा की सतह पर उतरने के जा रहा था और गंतव्य से 2.1 किलोमीटर पहले तक उसका प्रदर्शन सामान्य था। उसके बाद लैंडर का संपर्क जमीन पर स्थित केंद्र से टूट गया। जिसके डेटा का विश्लेषण वैज्ञानिकों के द्वारा किया जा रहा है।”
इसरो के टेलीमेट्री, ट्रैकिंग एंड कमांड नेटवर्क केंद्र के स्क्रीन पर देखा गया कि विक्रम अपने निर्धारित पथ से थोड़ा हट गया और उसके बाद उसका संपर्क टूट गया। लैंडर बड़े ही आराम से नीचे उतर रहा था, लैंडर ने सफलतापूर्वक अपना रफ ब्रेक्रिंग चरण को पूरा किया और यह अच्छी गति से सतह की ओर बढ़ रहा था। उसके बाद मात्र 2.1 किलोमीटर की दूरी पर इसरो का विक्रम से संपर्क टूट गया। हालांकि 978 करोड़ रुपये लागत वाले चंद्रयान-2 मिशन में सभी कुछ समाप्त नहीं हुआ है।
इस मिशन के सिर्फ 5 प्रतिशत भाग लैंडर विक्रम और प्रज्ञान रोवर वाले हिस्से को नुकसान हुआ है, जबकि बाकी 95 प्रतिशत भाग चंद्रयान-2 व ऑर्बिटर अभी भी चंद्रमा के सफलतापूर्वक चक्कर काट रहा है। एक साल मिशन अवधि वाला ऑर्बिटर चंद्रमा की तस्वीरें लेकर लगातार इसरो को भेज रहा है। भविष्य में यह भी संभावना है कि ऑर्बिटर लैंडर विक्रम की तस्वीरें भी लेकर भेज सकता है, जिससे उसकी सही स्थिति के बारे में पता चल सकता है। इस मिशन के लिए बने चंद्रयान-2 अंतरिक्ष यान में तीन खंड हैं -ऑर्बिटर (2,379 किलोग्राम, आठ पेलोड), विक्रम (1,471 किलोग्राम, चार पेलोट) और प्रज्ञान (27 किलोग्राम, दो पेलोड)। विक्रम दो सितंबर को आर्बिटर से सफलतापूर्वक अलग हो गया था।

इस महत्वाकांक्षी मिशन चंद्रयान-2 के लैंडर विक्रम के चंद्रमा की सतह पर उतरने की प्रक्रिया का जीवंत प्रसारण का अवलोकन करने के लिए इसरो के बेंगलुरु स्थित टेलीमेंट्री ट्रैकिंग एंड कमांड नेटवर्क (आईएसटीआरएसी) केन्द्र में खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मौजूद थे। जिन्होंने लैंडर विक्रम का संपर्क टूटने के बाद इसरो के चेयरमैन डॉक्टर के. सिवन और वहां मौजूद सभी वैज्ञानिकों का उत्साहवर्धन करते हुए कहा, “ जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, यह कोई मामूली उपलब्धि नहीं है, देश को आप पर गर्व है, बेहतर की उम्मीद रखें।”

*मिशन चंद्रयान-2 पर प्रधानमंत्री का संबोधन -:*
मिशन की विफलता के बाद प्रधानमंत्री प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज सुबह आठ बजे राष्ट्र को संबोधित करते हुए वैज्ञानिकों की हौसलाअफजाई करते हुए कहा कि, ''आप वो लोग हैं जो माँ भारती के लिए उसकी जय के लिए जीते हैं। आप वो लोग हैं जो माँ भारती के जय के लिए जूझते हैं। आप वो लोग हैं जो माँ भारती के लिए जज्बा रखते हैं। और इसलिए माँ भारती का सिर ऊंचा हो इसके लिए पूरा जीवन खपा देते हैं। अपने सपनों को समाहित कर देते हैं। साथियों मैं कल रात को आपकी मनोस्थिति को समझता था। आपके आंखें बहुत कुछ कहती थीं। आपके चेहरे की उदासी मैं पढ़ पाता था और उसलिए ज्यादा देर मैं आपके बीच नहीं रुका। कई रातों से आप सोए नहीं है फिर भी मेरा मन करता था कि एक बार सुबह फिर से आपको बुलाऊं आपसे बातें करूं।"

प्रधानमंत्री मोदी ने आगे कहा, ''इस मिशन के साथ जुड़ा हुआ हर व्यक्ति एक अलग ही अवस्था में था। बहुत से सवाल थे और बड़ी सफलता के साथ आगे बढ़ते हैं और अचानक सबकुछ नजर आना बंद हो जाए। मैंने भी उस पल को आपके साथ जिया है जब कम्युनिकेशन ऑफ आया और आप सब हिल गए थे। मैं देख रहा था उसे। मन में स्वाभाविक प्रश्न था क्यों हुआ कैसे हुआ। बहुत सी उम्मीदें थी। मैं देख रहा था कि आपको उसके बाद भी लगता था कि कुछ तो होगा। क्योंकि उसके पीछे आपका परिश्रम था। पल-पल आपने इसको बड़ी जिम्मेदारी बढ़ाया था। साथियों आज भले ही कुछ रुकावटे हाथ लगी हों, लेकिन इससे हमारा हौसला कमजोर नहीं पड़ा है। बल्कि और मजबूत हुआ है।''

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, ''हम अपने रास्ते के आखिरी कदम पर रुकावट पर आई हो, लेकिन हम इससे अपने मंजिल के रास्ते से डिगे नहीं है। आज भले ही हम अपनी योजना से आज चाँद पर नहीं जाए लेकिन किसी कवि को आज की घटना का लिखना होगा तो जरूर लिखेगा कि हमनें चाँद का इतना रोमांटिक वर्णन किया है कि चंद्रयान के स्वभाव में भी वह आ गया। इसलिए आखिरी चरण में चंद्रयान चंद्रमा को गले लगाने के लिए दौड़ पड़ा। आज चंद्रमा को छूने की हमारी इच्छा शक्ति, संकल्प और प्रबल और भी मजबूत हुई है। बीते कुछ घंटे से पूरा देश जगा हुआ है। हम अपने वैज्ञानिकों के साथ खड़े हैं और रहेंगे। हम बहुत करीब थे लेकिन हमें आने वाले समय में और दूरी तय करना है। सभी भारतीय आज खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहे है। हमें अपने स्पेस प्रोग्राम और वैज्ञानिकों पर गर्व है।''

मंगलवार, 3 सितंबर 2019

*व्यक्ति की सफलता में गुरु का अनमोल योगदान*


*शिक्षक दिवस पर विशेष*


*व्यक्ति की सफलता में गुरु का अनमोल योगदान*

*हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी*


*स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार*

भारत के स्वर्णिम इतिहास में गुरु-शिष्य परम्परा के लिए अपना सर्वस्व दाव पर लगा देने वाले बहुत सारे गुरु व शिष्य रहे हैं। भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य की महान परम्परा के अन्तर्गत गुरु (शिक्षक) अपने शिष्य को शिक्षा देता है या किसी अन्य विद्या में निपुण करता है बाद में वही शिष्य गुरु के रूप में दूसरों को शिक्षा देता है। यही क्रम लगातार चलता रहता है। यह परम्परा सनातन धर्म की सभी धाराओं में मिलती है। गुरु-शिष्य की यह परम्परा ज्ञान के किसी भी क्षेत्र में हो सकती है। 


भारतीय संस्कृति में गुरु का बहुत अधिक महत्व है। 'गु' शब्द का अर्थ है अंधकार (अज्ञान) और 'रु' शब्द का अर्थ है प्रकाश ज्ञान। मतलब अज्ञान को नष्ट करने वाला जो ब्रह्म रूप प्रकाश है, वह गुरु है। हमारे देश में प्राचीन काल से ही आश्रमों में गुरु-शिष्य परम्परा का निर्वाह कुशलतापूर्वक होता रहा है। भारतीय संस्कृति में गुरु को अत्यधिक सम्मानित स्थान प्राप्त है। भारतीय इतिहास पर नज़र डाले तो उसमें गुरु की भूमिका समाज को सुधार की ओर ले जाने वाले मार्गदर्शक के रूप में होने के साथ क्रान्ति को दिशा दिखाने वाली भी रही है। भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान ईश्वर से भी ऊपर माना गया है, जो कि निम्न श्लोक से स्पष्ट हो जाता है।

“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वर: ।


गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः”

प्राचीन भारतीय संस्कृति में गुरु और शिष्य के संबंधों का आधार था गुरु का ज्ञान, मौलिकता और नैतिक बल, उनका शिष्यों के प्रति स्नेह भाव, तथा ज्ञान बांटने का निःस्वार्थ भाव। जो भावना उस समय के हर शिक्षक में होती थी। वहीं उस समय के शिष्य भी गुरु के प्रति पूर्ण श्रद्धा, गुरु की क्षमता में पूर्ण विश्वास तथा गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण एवं आज्ञाकारी होते थे, उसके अनुसार अनुशासन को शिष्य का सबसे बड़ा महत्वपूर्ण गुण माना गया है।

आज के आधुनिक समय में किसी भी कामयाब व्यक्ति के जीवन पर नजर डाले, तो यह स्पष्ट नजर आता है कि उसको सफलता की बुलंदियों पर पहुचाने में उसके शिक्षक का अनमोल योगदान रहा है। जीवन में एक अच्छा शिक्षक अपने हर शिष्य को सर्वश्रेष्ठ ज्ञान उपलब्ध करवाने का प्रयास करता है, जिससे कि उसके शिष्य का भविष्य उज्जवल हो और वो सफलता के नित नये आयाम स्थापित करके जीवन को सही मार्ग पर ले जा सके। किसी भी छात्र के जीवन को सफल बनाने में शिक्षक बहुत ही अहम किरदार निभाता है। शिक्षक अपने छात्र को अच्छी शिक्षा देकर उन्हें देश का अच्छा नागरिक बनाता है। माता पिता के बाद शिक्षक की वजह से ही किसी भी छात्र का भविष्य उज्वल होता है। किसी भी व्यक्ति के जीवन में माता-पिता के बाद में केवल शिक्षक की ही सबसे अहम महत्वपूर्ण भूमिका होती है। माता-पिता के दिये गये ज्ञान के बाद बच्चों को शिक्षा प्रदान करने में सबसे अहम भूमिका उनका शिक्षक ही निभाता है, इसीलिए किसी भी छात्र के वर्तमान और भविष्य को सफल बनाने में उसके शिक्षक का योगदान बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। वैसे तो गुरु-शिष्य की महान परम्परा भारत की संस्कृति का आदिकाल से एक अहम और पवित्र हिस्सा रही है। लेकिन हमारे जीवन में माता-पिता हमारे प्रथम गुरु है, क्योंकि वो ही हमारा इस निराली दुनिया से परिचय करवाते हैं और हमको जीवन जीना सिखाते हैं। इसलिए हमेशा कहा जाता है कि जीवन के सबसे पहले गुरु हमारे माता-पिता होते हैं। भारतीय परम्परा के अनुसार, 

"एक शिक्षक वो जलता हुआ दीपक है, जो खुद जलकर दूसरों की जिंदगियों में उजाला भर देता है"।

एक अच्छा शिक्षक अपना पूरा जीवन अपने छात्रों को अच्छा ज्ञान और सही रास्ता दिखने में लगा देता है। शिक्षक हमेशा हमें सफल होने का रास्ता दिखाते हैं और हमारे चरित्र का सर्वांगीण विकास करके उसका सही ढंग से निर्माण करते हैं। वे हमें जिंदगी में एक जिम्मेदार और अच्छा इंसान बनने में हमारी मदद करते हैं। वो ही हमें जीवन जीने का असली सलीका सिखाते हैं और वो ही हमें अपने जीवन पथ पर ताउम्र सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। जिस तरह से शिक्षक हमें शिक्षा और ज्ञान के जरिए बेहतर इंसान बनने के लिए मेहनत करता है। उस शिक्षक की मेहनत व अनमोल योगदान को सम्मान देने व पहचानने का ही दिन है "शिक्षक दिवस"। इस दिन छात्रों को यह महसूस होना चाहिए कि यही वह दिन है जब हम अपने शिक्षकों के सामने वचन ले कि उनकी कोशिशों को हम जीवन में कभी व्यर्थ नहीं जाने देंगे। छात्रों को यह भी वचन देना होगा कि शिक्षकों ने जो भी हमें सकारात्मक मूल्य सिखाए हैं, हम उनका अपने जीवन में सदैव पालन करेंगे और उनके दिखाये रास्ते पर चलकर देश, परिवार व अपने शिक्षकों का नाम हमेशा रोशन करेंगे।

*शिक्षक दिवस मनाने का इतिहास :-*  शिक्षक दिवस भारत के प्रथम उप-राष्ट्रपति और द्वितीय राष्ट्रपति रहे डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी के जन्मदिवस 5 सितंबर के अवसर पर वर्ष 1962, से "शिक्षक दिवस" के रुप में मनाया जाता है।  ऐसा माना जाता है कि एक बार डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के कुछ छात्रों और दोस्तों ने उनका जन्म दिवस मनाने की उनसे इच्छा ज़ाहिर कि इसके जवाब में डॉक्टर राधाकृष्णन ने कहा कि मेरा जन्मदिन अलग से बनाने की बजाय इसे टीचर्स डे (शिक्षक दिवस) के रूप में मनाया जाए तो मुझे बहुत गर्व होगा। इसके बाद से ही पूरे भारत में 5 सितंबर का दिन टीचर्स डे या शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। इस दिन हम महान शिक्षाविद डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन को याद करते हैं और सभी शिक्षकों का सम्मान पूर्वक आभार व्यक्त करते हैं। इस दिन को सभी स्कूलों व संस्थानों के बच्चे और युवा छात्र उत्सव के रूप में मनाते है। 


*शिक्षक के सामने आने वाली चुनौतियां -:* एक शिक्षक के सामने अपने छात्र को शिक्षा प्रदान करते समय बहुत सारी चुनौतियों का सामना करना होता है। क्योंकि उनके छात्र अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमि, अलग सांस्कृतिक, अलग-अलग तरह की आर्थिक और धार्मिक पृष्ठभूमि से आने वाले होते है। इस तरह के छात्रों को एक साथ संबोधित करना या संभालना बहुत कठिन काम है। इतना ही नहीं, सबसे बड़ी चुनौती होती है हर छात्र में सीखने और समझने की क्षमता, जो कि हर बच्चे में अलग-अलग होती है। ऐसे में शिक्षक को सभी छात्रों को एक साथ लेकर चलते हुए, अपने तय समय पर कोर्स के मापदंडों के दायरे में रहते हुए शैक्षणिक पाठ्यक्रम को पूरा करने की बड़ी चुनौती होती है। एक शिक्षक फिर चाहे वह पुरुष हो या महिला, पर अपने घर परिवार की भी बहुत जिम्मेदारियां होती है और उन पर भी गृहस्थ जीवन का उतना ही दबाव होता है, जितना हम पर व हमारे माता-पिता पर हमारे घरों में होता है। इस सब के बाद भी एक शिक्षक को हर सुबह कक्षा शुरू होने से पहले उत्साहित और ताजगी से भरे नजर आना होता है। एक शिक्षक को अपनी व्यक्तिगत और पेशेवर चुनौतियों का सामना करते हुए शिक्षक के दायित्व को हंसते हुए निभाना होता है। वो कभी भी कक्षा में रहते समय अपने जीवन की समस्याओं का छात्रों की शिक्षण प्रक्रिया पर कोई असर नहीं होने देता। यह स्कूल में रहते हुए बच्चे नहीं महसूस कर पाते, लेकिन जब वो समय के साथ परिपक्व होते हैं तो खुद-ब-खुद ही इसका महत्व समझ जाते हैं कि विपरीत हालातों में भी मुस्कराना कोई अपने शिक्षकों से सीखें।

*शिक्षक का जीवन में महत्व -:* वैसे तो जीवन में सीखने की कोई उम्र नहीं होती हैं और जो सिखाता हैं वो शिक्षक होता है। इसलिए व्यक्ति के जीवन में शिक्षक का बहुत महत्व होता है। किसी छात्र को शिक्षा प्रदान करने में सबसे अहम भूमिका शिक्षक ही निभाता है, इसीलिए किसी भी छात्र के वर्तमान और भविष्य को बनाने में शिक्षक का अनमोल योगदान बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। एक शिक्षक अपनी पूरी जिंदगी में ना जाने कितने अनगिनत छात्रों को पढ़ाकर उनके भविष्य को उज्जवल बनाने की कारगर कोशिश करता है। वो छात्रों को पढाई से लेकर के लोकव्यवहार का ज्ञान जीवन में किस तरह से रहना, किस तरह का सभी से बर्ताव करना, मुश्किल हालातों का कैसे सामना करना है यह सब सिखाता है।


एक अच्छा शिक्षक अपने छात्रों का मित्र बनकर व कुशल मार्गदर्शक बनकर उन्हें अच्छे और बुरे का फर्क सिखाता है। वो छात्रों का सच्चा मार्गदर्शक बनकर जीवन को सही रास्ते पर ले जाने में सहायता करता है। बचपन में बच्चे अपना समय माता-पिता के अलावा सबसे अधिक किसी के साथ व्यतीत करते है तो वो उसका शिक्षक ही होता है और यह उम्र ही बच्चों के जीवन में महत्वपूर्ण होती है। जिस तरह से गीली मिट्टी को किसी भी तरह का आकार दिया जा सकता है। उसी तरह माता-पिता के साथ मिलकर एक शिक्षक ही बच्चों को अच्छे संस्कार दे सकता है क्योंकि बचपन की यह उम्र ऐसी उम्र होती है कि जब बच्चें को हम कुछ भी सिखा सकते है। इसीलिए किसी भी शिक्षक के लिए यह एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है की उसे बच्चे के वर्तमान व उज्जवल भविष्य दोनों का सही ढंग से निर्माण करना है। हर बच्चे के उज्जवल भविष्य के पीछे एक अच्छे शिक्षक का अनमोल योगदान होता है। शिक्षक एकमात्र ऐसा व्यक्ति है जो हमेशा अपने सभी छात्रों का भला ही चाहता है। उनके जीवन का एक मात्र लक्ष्य रहता है की वो अपने सभी छात्रों को अच्छा इंसान, एक आदर्श कामयाब नागरिक बना सके।

*आज के परिदृश्य में गुरु-शिष्य परम्परा :-* देश के मौजूदा परिदृश्य में देखें तो जिस तरह से आज के व्यवसायिक दौर में शिक्षक अपने ज्ञान की बोली लगाने के बाद भी अपने छात्रों के साथ पूर्ण रूप से ईमानदारी नहीं बरतते है वो स्थिति सोचनीय है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखें तो जिस तरह से आयेदिन गुरु-शिष्य की परंपरा कहीं न कहीं कलंकित हो रही है। आए दिन शिक्षकों द्वारा विद्यार्थियों एवं विद्यार्थियों द्वारा शिक्षकों के साथ दुर्व्यवहार की खबरें सुनने को मिलती रहती हैं। जो सभ्य समाज व देशहित में ठीक नहीं है। आज के हालात को देखकर हमारी प्राचीन संस्कृति की इस अमूल्य गुरु-शिष्य परंपरा पर अब प्रश्नचिह्न लगते नजर आते है। शिक्षक दिवस पर विद्यार्थियों और शिक्षकों दोनों का ही दायित्व है कि वे इस महान भारतीय परंपरा को बेहतर ढंग से समझते हुए इसका पूर्ण ईमानदारी से निर्वाह करने का संकल्प ले और एक अच्छे समाज का निर्माण करके भारत को विश्व गुरु बनाने में अपना सहयोग प्रदान करें।