मंगलवार, 23 जुलाई 2019

*कश्मीर मसले पर झूठ बोलकर डोनाल्ड ट्रंप ने भारत से किया विश्वासघात*

*कश्मीर मसले पर झूठ बोलकर डोनाल्ड ट्रंप ने भारत से किया विश्वासघात*

*हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी एडवोकेट*
*स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार*

अपने झूठ बोलने व बड़बोलेपन की आदत के लिए विश्व में प्रसिद्ध अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 22 जुलाई को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से अमेरिका में मुलाकात के दौरान इमरान खान को खुश करने के लिए कश्मीर मसले पर मध्यस्थता करने का बेहद विवादास्पद बयान दिया है। हालांकि उनके बयान को अमेरिकी विदेश मंत्रालय और भारत सरकार ने पूर्ण रूप से नकार दिया है।
कश्मीर मसले पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इंटरनेशनल झूठ से पूरी दुनिया में खलबली मच गई है। उनकी इस हरकत के बाद मीडिया जगत के दिग्गज उनके झूठों का पुलिंदा लोगों के सामने पेश कर रहे है। अमेरिकी मीडिया ट्रंप के झूठ के पिटारों की लम्बी फेहरिस्त को दिखा रही है जिसके द्वारा झूठ बोलने के लिए पूरी दुनिया में बदनाम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अमेरिकी मीडिया ने ही जमकर पोल खोल दी है। अमेरिका के प्रतिष्ठित अखबार वॉशिंगटन पोस्ट ने इस पर विस्तृत रिपोर्ट जारी करते हुए ट्रंप के झूठ को आंकड़ों में उतार दिया है। वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति बनने के बाद से अब तक 10 हजार 796 बार झूठ बोल चुके हैं। इतना ही नहीं, अमेरिका के राष्ट्रपति बनने के बाद से ट्रंप ने औसतन रोजाना 12 बार झूठ बोला है। जो विश्वसमुदाय के सामने उनके बयानों की गम्भीरता व विश्वसनीयता को दर्शाने के लिए काफी हैं।

आपको बताते चले कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम से एक झूठे बयान का दावा किया कि मोदी और उन्होंने पिछले महीने जी -20 शिखर सम्मेलन के मौके पर जापान के ओसाका में कश्मीर के मुद्दे पर चर्चा की थी, जिसमें भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कश्मीर पर तीसरे पक्ष से मध्यस्थता कराने की पेशकश की थी। ट्रंप ने कहा कि 'मैं दो हफ्ते पहले भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ था और हमने कश्मीर के बारे में बात की और उन्होंने वास्तव में कहा, 'क्या आप मध्यस्थ बनना चाहेंगे? मैंने कहा, 'कहाँ?' (मोदी ने कहा) 'कश्मीर' मसले पर, ट्रंप ने जिस तरह से मोदी का हवाला देकर भारत के साथ अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मोदी के नाम से झूठ बोलकर विश्वासघात करके कश्मीर मसले पर मध्यस्थता करने का बेतुका बयान दिया है, वह भारत को भड़काने वाला और कभी भी स्वीकार ना होने वाला बयान है। समाचार एजेंसी AFP के मुताबिक, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान से वार्ता के दौरान ट्रंप ने कश्मीर मुद्दे का समाधान निकालने के लिए भारत व पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता करने की पेशकश की थी। ट्रंप ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान से भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम लेकर बहुत बड़ा झूठ बोला हैं। ट्रंप ने दावा किया है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कश्मीर मुद्दे को सुलझाने के लिए उनसे मदद मांगी थी। जबकि सत्यता यह है कि कश्मीर मसले के समाधान पर भारत हमेशा से ही तीसरे पक्ष की मध्यस्थता के खिलाफ है। देश की किसी भी सरकार ने कश्मीर को लेकर कभी भी किसी अन्य देश की मध्यस्थता के बारे में सोचा भी नहीं हैं। लेकिन सोमवार को जिस तरह पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ बैठक में कश्मीर का राग अलापा है उसके बाद मीडिया की खबरों के अनुसार अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कश्मीर मसले पर मध्यस्थता करने की पेशकश की है।
जो कि अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप के द्वारा मिथ्या व गलत बयानबाजी से ज्यादा कुछ नहीं है, क्योंकि कश्मीर मुद्दे पर देश की सभी सरकारों का स्पष्ट मत रहा है कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है तो इस पर तीसरे पक्ष की मध्यस्थता भारत को कभी भी स्वीकार नहीं है। लेकिन ना जाने किस परिस्थिति में और क्यों ट्रंप ने यह विवादित बयान देकर भारत के साथ विश्वासघात किया है कि मोदी ने उनसे कश्मीर मुद्दा सुलझाने के लिए मदद मांगी थी।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस बयान ने जहां एक-तरफ देश-दुनिया में भूचाल ला दिया वहीं इस बयान के मायने को भी समझा जाना जरूरी है। आज पाकिस्तान के यह हालात है कि वो दिन प्रतिदिन अमेरिका से दूर होता जा रहा है और आर्थिक सहयोग के लालच में चीन की गोद में जा बैठा है। वहीं जब डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका के राष्ट्रपति पद की जिम्मेदारी ली थी तो विश्व में चीन का रौब कम करना उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकताओं की सूची में शामिल था। इस काम के लिए एशियाई देशों में भारत ही उनका सबसे प्रभावी शक्तिशाली सहयोगी हो सकता था। लेकिन भारत के राजनैतिक हालात व देश की लोकतांत्रिक स्थिति ऐसी है कि वो कभी भी किसी अन्य देश का पिट्ठू नहीं बन सकता है। भारत एक सीमा तक ही अमेरिका के करीब जा सकता था। ऐसे में ट्रंप को आर्थिक रूप से कंगाल हो चुकें पाकिस्तान का दोबारा ध्यान आया। उसी के लिए ट्रंप कश्मीर पर मध्यस्थता करने का बयान देकर पाकिस्तान को फिर से अपने पाले में लाने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं उनकी इस हरकत को देखकर ऐसा लगता है कि ट्रंप दुनिया का भाग्यविधाता बनने की चाह में यह दिखाना चाह रहे हैं कि वो इतने बड़े चौधरी है कि वो भारत के मसलों में भी टांग अड़ा सकते हैं। इसके साथ ही ट्रंप को लगता है कि अमेरिका को जल्द से जल्द अफगानिस्तान से बाहर निकल आना चाहिए, तो अमेरिका के इस मिशन में अफगानिस्तान में पाकिस्तान ही उसकी सबसे अधिक सहायता कर सकता है। वो ही अमेरिकी सेना को अफगान से सुरक्षित बाहर निकाल सकता है।

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम लेकर डोनाल्ड ट्रंप के इस झूठे बयान के आने के बाद भारत ने ट्रंप के इस बयान को सिरे से ख़ारिज कर दिया है कि नरेंद्र मोदी ने उनसे कभी कश्मीर मसले पर मध्यस्थता करने के लिए कहा था।

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने ट्विटर पर कहा, "हमने राष्ट्रपति ट्रंप के बयान को प्रेस में देखा कि वो कश्मीर मुद्दे पर मध्यस्थता करने को तैयार हैं, अगर भारत और पाकिस्तान इसकी मांग करें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐसी कोई मांग राष्ट्रपति ट्रंप से नहीं की है।"

प्रवक्ता रवीश कुमार ने कहा, "भारत का लगातार यह पक्ष रहा है कि पाकिस्तान के साथ सभी मुद्दों पर द्विपक्षीय वार्ता ही होगी। पाकिस्तान के साथ किसी भी बातचीत की शर्त ये है कि पहले सीमा पार से आतंकवाद बंद हो।"
उन्होंने कहा, "शिमला समझौता और लाहौर घोषणा पत्र पाकिस्तान और भारत के बीच के सभी मु्द्दों के द्विपक्षीय समाधान का आधार प्रदान करते हैं।"

वहीं राष्ट्रपति ट्रंप के इस बयान पर देश के विभिन्न राजनैतिक दलों की ओर से भी प्रतिक्रिया आई है।
भाजपा के वरिष्ठ नेता राम माधव ने भी ट्रंप के बयान पर निशाना साधा है। उन्होंने ट्वीट कर कहा, 'अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा कश्मीर पर प्रेस को दिया गया बयान US सिस्टम में बड़ी खामी को दिखाता है। वाइट हाउस में लिजा कर्टेस जैसी भारत और दक्षिण एशिया मामले की विशेषज्ञ रहने के बाद भी अगर ऐसा बयान दिया जाता है तो ऐसा लगता है कि कुछ मूलभूत दिक्कतें हैं।'
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने ट्वीट करके कहा है कि, 'ईमानदारी से कहूं तो मुझे नहीं लगता कि अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रम्प को इस बात का थोड़ा भी अंदाजा है कि वह किस बारे में बात कर रहे हैं। ट्रंप को या तो समझाया नहीं गया है या समझ नहीं आया है कि (प्रधानमंत्री) मोदी क्या कह रहे हैं या फिर तीसरे पक्ष की मध्यस्थता पर भारत की स्थिति क्या है। मोदी ऐसा कह ही नहीं सकते है। विदेश मंत्रालय को यह स्पष्ट करना चाहिए कि दिल्ली ने कभी इसकी (तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की) हिमायत नहीं की है।'

कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने ट्विटर पर लिखा, "भारत ने कभी भी जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को स्वीकार नहीं किया है।"

वहीं कश्मीर पर मध्यस्थता के लिए भारत के आग्रह करने वाले बयान पर अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप अपने घर अमेरिका में ही घिरते नजर आ रहे हैं। अमेरिकी सांसद कांग्रेसमैन "ब्रैड शेरमन" ने ट्रंप के इस बयान की आलोचना करते हुए इसे अपरिपक्व और भ्रमित करने वाला बताया है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कभी अमेरिकी राष्ट्रपति से मध्यस्थता का आग्रह नहीं किया।
इस मसले पर विवाद खड़ा होने के बाद व चारों तरफ राष्ट्रपति ट्रंप की हो रही आलोचना के बाद तुरंत ही अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने भी सफाई देते हुए कहा कि कश्मीर मुद्दा भारत और पाकिस्तान का द्विपक्षीय मुद्दा है। हालांकि, ट्रंप-इमरान की मुलाकात पर व्हाइट हाउस द्वारा जो प्रेस रिलीज जारी की गई है, उसमें कश्मीर को लेकर दिया गया डोनाल्ड ट्रंप का यह विवादित बयान शामिल नहीं है।

वहीं मंगलवार को कश्मीर पर मध्यस्थता के बयान पर ट्रंप की ओर से दिए गए बयान को लेकर भारत की राजनीति में खलबली मच गई है। राज्यसभा और लोकसभा में विपक्षी दल सरकार से सफाई मांग रहे है। राज्यसभा में भी कश्मीर पर ट्रंप की ओर से दिए गए बयान पर जोरदार हंगामा हुआ। कांग्रेस के आनंद शर्मा ने इस मुद्दें को उठाते हुए प्रधानमंत्री से जवाब की मांग की। वहीं लोकसभा में भी कार्यवाही शुरू होते ही हंगामा शुरू हो गया और विपक्षी सांसद सरकार से कश्मीर पर जवाब देने के लिए नारेबाजी करने लगे।  
जिसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दावे पर राज्यसभा में अपनी ओर से दिए गए एक बयान में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा, ‘‘हम सदन को पूरी तरह आश्वस्त करना चाहेंगे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐसा कोई अनुरोध नहीं किया है।’’
विदेश मंत्री ने यह भी कहा ‘‘हम अपना रूख फिर से दोहराते हैं कि पाकिस्तान के साथ सभी लंबित मुद्दों का समाधान द्विपक्षीय तरीके से ही किया जाएगा ।’’
उन्होंने कहा ‘‘पाकिस्तान के साथ कोई भी बातचीत सीमा पार से जारी आतंकवाद बंद होने के बाद, लाहौर घोषणापत्र और शिमला समझौते के अंतर्गत ही होगी।’’

विदेश मंत्री के इस बयान के बाद कांग्रेस सहित सभी विपक्षी सदस्यों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस विषय पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने की मांग की। लोकसभा में भी कार्यवाही शुरू होते ही हंगामा शुरू हो गया और विपक्षी सांसद सरकार से कश्मीर पर जवाब देने के लिए नारेबाजी करने लगे। कांग्रेस सांसद अधीर रंजन ने कहा कि भारत की सरकार ने अमेरिका के सामने सिर झुका दिया है, उन्होंने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री से सदन में आकर जवाब देने की मांग की। कांग्रेस के सांसद के. सुरेश ने कश्मीर को लेकर डोनाल्ड ट्रम्प के बयान पर चर्चा के लिए स्थगन प्रस्ताव का नोटिस दिया। कश्मीर मसले के चलते इस मामले पर भारत में अब राजनीति चरम पर है।

लेकिन हमारे देश के राजनेताओं व नीतिनिर्माताओं को भी सोचना चाहिए कि कश्मीर मसले पर हम अमेरिका या किसी अन्य देश के झांसे में ना आये। क्योंकि पिछले कुछ दशकों से भारत आर्थिक तरक्की के नित-नये आयाम बना रहा है। जिसके चलते वह बहुत सारे देशों की आँखों की किरकिरी बना हुआ है। जबकि भारत और पाकिस्तान एक-साथ ठीक 72 साल पहले आजाद हुए थे। लेकिन दोनों देशों में आज कितना बड़ा अंतर है। भारत जहां एक तरफ मंगल ग्रह की तरफ अपने कदम बढ़ा रहा है। वहीं आतंकियों की सुरक्षित पनाहगाह बन चुका पाकिस्तान उर्फ आतंकिस्तान कटोरा लेकर भीख मांग रहा हैं।

रविवार, 21 जुलाई 2019

*"सोनभद्र हत्याकांड" "प्रिंयका नहीं ये आंधी है दूसरी इंदिरा गांधी है"*

*"सोनभद्र हत्याकांड"  "प्रिंयका नहीं ये आंधी है दूसरी इंदिरा गांधी है"*

हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी एडवोकेट
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार 

उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में हुए दस लोगों के जघन्य हत्याकांड के बाद प्रियंका गांधी की संघर्षशील कार्यशैली के चलते देश में अपनी राजनीतिक जमीन को खो चुकी कांग्रेस पार्टी को खोई हुई जमीन हासिल करने के लिए एक बहुत बड़ा मुद्दा हाथ लग गया है। जिस तरह से कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी 19 जुलाई को सोनभद्र गोलीकांड में घायल हुए लोगों से मिलने अचानक वाराणसी पहुंची थी। इसके बाद वो पीड़ित परिवारों से मिलने के लिए सोनभद्र जाने के लिए निकली थी। लेकिन उत्तर प्रदेश के शासन-प्रशासन के दिशानिर्देश पर उन्हें रास्ते में ही रोक लिया गया था। जिसके बाद प्रियंका गांधी नारायणपुर में सड़क पर ही कांग्रेसी नेताओं के साथ धरने पर बैठ गई थी। उत्तर प्रदेश पुलिस ने मामले को बिगड़ता देख तत्काल प्रियंका गांधी को हिरासत में ले लिया था और प्रियंका के साथ कुछ चुनिंदा कांग्रेसी नेताओं को लेकर पुलिस मिर्जापुर के चुनार किले के गेस्ट हाउस पहुंची। जहाँ प्रियंका गांधी कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ फिर धरने पर बैठ गई और प्रियंका ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि वो हर हाल में पीड़ितों से मिले बगैर वापस नहीं लौटेंगी और प्रिंयका गांधी अंत तक अपनी बात पर अड़िग भी रही कि वो इस गोलीकांड में मारे गए दस लोगों के परिवार के सदस्यों से मिले बिना वापस नहीं जायेंगी। जिद पर अड़ीं कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी से पीड़ित परिवार के सदस्यों ने 20 जुलाई को चुनार किला के गेस्ट हाउस में आकर मुलाकात की। चुनार किले के गेस्ट हाउस के बाहर प्रियंका गांधी के साथ कांग्रेस के नेताओं के धरने के बीच में ही गेस्ट हाउस में पीड़ित परिवार को लाया गया। जिसमें चार महिलाओं के साथ एक पुरुष भी था। इन सभी ने प्रियंका गांधी से भेंट की, प्रियंका ने इनसे सोनभद्र कांड के बारे में जानकारी लेकर परिजनों का दुःख की घड़ी में हौसला बंधाया। चुनार गेस्ट हाउस के बगीचे में पीड़ित परिवार की महिलाओं ने प्रियंका गांधी को देखते ही रोना शुरू कर दिया। इस दौरान प्रियंका गांधी भी भावुक हो गईं थी और उन्होंने पीड़ितों के परिजनों के साथ पत्रकारों से बातचीत भी की और परिवारों को पार्टी की तरफ से आर्थिक सहायता के साथ-साथ हर तरह की मदद का आश्वासन दिया।
यहाँ आपको बता दे कि उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जनपद के घोरावल कोतवाली क्षेत्र के ग्राम पंचायत मूर्तिया के उम्भा गांव में बुद्धवार, 17 जुलाई को दो पक्षों में जमकर गोली, लाठी डंडे, कुल्हाड़ी, पत्थर चले थे। जिसमें 10 लोगों की हत्या हो गई जबकि 26 लोग घायल हो गए थे। इस हत्याकांड के बाद शुक्रवार, 19 जुलाई को पीड़ितों से मिलने के लिए दिल्ली से कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी वाराणसी आने वाले इंडिगो एयरलाइंस के विमान से सुबह 9:50 बजे वाराणसी एयरपोर्ट पहुंचीं। प्रियंका गांधी ने बाबतपुर स्थित लाल बहादुर शास्त्री एयरपोर्ट पर पहुंचते ही सर्वप्रथम कांग्रेस कार्यकर्ताओं से मुलाकात की और फिर वह एयरपोर्ट से ही सोनभद्र नरसंहार में गंभीर रुप से घायल लोगों से मिलने सीधे बीएचयू ट्रामा सेंटर रवाना हो गयी। हालांकि प्रशासन ने तत्काल प्रियंका के ट्रामा सेंटर पहुंचने से पहले ही सेंटर की सुरक्षा व्यवस्था को कड़ी करके छावनी में तब्दील कर दिया था। प्रिंयका ने वहां पहुंचकर हादसे में घायल लोगों का हालचाल लिया। उसके बाद प्रियंका गांधी सोनभद्र के लिए रवाना हो गयी थी।

प्रिंयका गांधी के इस काफिले को उत्तर प्रदेश के प्रशासन के आलाधिकारियों के द्वारा मिर्जापुर के नारायणपुर पुलिस चौकी क्षेत्र में जबरन रोक दिया गया। जबकि प्रियंका जमीन विवाद में सोनभद्र में 10 लोगों की हत्या के बाद पीड़ित परिवारों से मिलने के लिए उनके दुःख दर्द साझा करने के लिए पीड़ितों के पास जा रही थीं। लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रियंका गांधी को पीड़ित परिवारों से नहीं मिलने दिया बल्कि उनकों गिरफ्तार करके मिर्जापुर में ही रात को चुनार के किले में रोके रखा। जिस पर कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी ने अपनी गिरफ्तारी और सोनभद्र जाने से रोके जाने पर ट्वीट किया, 'मैंने न कोई कानून तोड़ा है न कोई अपराध किया है। बल्कि सुबह से मैंने स्पष्ट किया था कि प्रशासन चाहे तो मैं अकेली उनके साथ पीड़ित परिवारों से मिलने आदिवासियों के गांव जाने को तैयार हूँ, या प्रशासन जिस तरीके से भी मुझे उनसे मिलाना चाहता है मैं तैयार हूँ। लेकिन उत्तर प्रदेश प्रशासन द्वारा मुझे पिछले 9 घंटे से गिरफ्तार करके चुनार किले में रखा हुआ है। प्रियंका गांधी दूसरे ट्वीट में कहा कि प्रशासन कह रहा है कि मुझे 50,000 की जमानत देनी है अन्यथा मुझे 14 दिन के लिए जेल की सज़ा दी जाएगी, मगर वे मुझे सोनभद्र नहीं जाने देंगे ऐसा उन्हें ऊपर से ऑर्डर है।'

प्रियंका गांधी ने एक अन्य ट्वीट में कहा, 'मैं नरसंहार का दंश झेल रहे गरीब आदिवासियों से मिलने, उनकी व्यथा-कथा जानने आयी हूँ। जनता का सेवक होने के नाते यह मेरा धर्म है और नैतिक अधिकार भी। उनसे मिलने का मेरा निर्णय अडिग है। मगर इसके बावजूद यूपी सरकार ने यह तमाशा किया हुआ है। जनता सब देख रही है।

सोनभद्र जाने की प्रियंका गांधी की इस जिद व संघर्षशील इरादों ने कांग्रेसियों के साथ-साथ देशवासियों को भी उनकी दादी इंदिरा गांधी की कार्यशैली व बिहार के बेलछी दौरे की याद एकबार फिर दिला दी है साथ ही उनके संघर्ष की देश के सभी तबके के लोगों ने सराहना भी की है। प्रियंका गांधी जिस तरह से प्रशासन से सोनभद्र जाने पर अड़ गयी थी, उनकी इस रणनीति को देखकर लगता है कि वो इंदिरा गांधी के पदचिन्हों पर ही राजनीति में आगे बढ़ना चाहती हैं। उनकी इस ज़िद ने बिहार के बेलछी नरसंहार के बाद इंदिरा गांधी के विपरीत परिस्थितियों में बेलछी दौरे की याद ताज़ा कर दी है। आमजनों के लिए प्रियंका गांधी के इस संघर्ष भाव को देखकर लोगों ने उनकी तुलना  इंदिरा गांधी से करनी शुरू कर दी। वो कहने लगे है कि आपातकाल के बाद हुए लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की करारी हार के बाद जिस तरह से वर्ष 1977 में बिहार के बेलछी गांव में दर्दनाक नरसंहार हुआ था जिसमें इंदिरा गांधी खराब कानून व्यवस्था को लेकर सडक़ पर आमजनता के साथ संघर्ष करने के लिए आ गयीं थी। और उसी संघर्ष के बलबूते वर्ष 1980 में  दौबारा देश की सत्ता पर काबिज हुई थी। ठीक उसी तरह सोनभद्र की इस घटना को लेकर प्रियंका जिस तरह उत्तर प्रदेश सरकार और उसकी खराब कानून व्यवस्था पर सवाल उठाने के लिए सड़क पर उतर गईं हैं वह काबिलेतारीफ हैं। उससे राहुल गांधी के अध्यक्ष पद के इस्तीफे के बाद निराशाजनक माहौल से गुजर रही कांग्रेस पार्टी को संजीवनी मिलेगी। प्रिंयका जिस तरह से वह बिना जमानत लिए पीड़ित परिवार से मिलने की जिद्द पर लगातार अड़ी रही। उसके चलते लोगों को एक बार फिर इंदिरा गांधी की याद आ गयी। लोग इस घटना की तुलना वर्ष 1977 में हुए बेलछी गांव के नरसंहार की घटना से कर रहे हैं। कुछ लोग तो कहने लगे हैं कि जिस तरह अपातकाल के बाद इंदिरा गांधी जब वर्ष 1977 का लोकसभा चुनाव हारी थी तो उसके बाद बेलछी की घटना के बाद किये गये जनसंघर्ष से ही इंदिरा गांधी की दमदार वापसी हुई थी। आपको बता दे कि बेलछी नरसंहार, बिहार का पहला जातीय नरसंहार था। ये दर्दनाक घटना 27 मई 1977 को घटित हुई थी। उस दिन बेलछी में 11 दलितों की निर्ममतापूर्वक हत्या कुर्मियों के द्वारा की गयी थी। बिहार का बेलछी गांव भी उत्तर प्रदेश के जनपद सोनभद्र के उम्भा गांव की तरह ही एक बहुत ही दर्दनाक घटना की गवाह बना था। जिसमें बंदूको और अन्य घातक हथियारों से लैस कुर्मियों के बड़े गुट ने गरीब दलितों के घर पर हमला कर दिया था। 11 दलित खेतीहर मजदूरों को घर से बाहर खींच कर जिंदा जला दिया था।  इंदिरा गांधी को जब इस घटना की जानकारी मिली तो उन्हें यह मसला अंधेरे में एक उम्मीद की किरण सी दिखायी पड़ा। क्योंकि वर्ष 1977 में वह आपातकाल के चलते लोकसभा चुनाव हार चुकी थीं और अब वह राजनीति से सन्यास लेने के बारे में सोच रहीं थी। यह वह वक्त था जब देश में मोराजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बने कुछ ही समय बीता था और बेलछी का यह जघन्य कत्लेआम हो गया था। देश के आम जनमानस की नब्ज को अच्छी तरह से पकड़ने में माहिर इंदिरा गांधी ने बिना एक पल गवायें मौके की नजाकत को समझा और वो बिना किसी देर किये दिल्ली से सीधे हवाई जहाज के द्वारा पटना पहुंच गयी। फिर वहां से इंदिरा गांधी कार के जरिए बिहार शरीफ पहुंच गईं और फिर बेलछी जाने की तैयारी हुई। स्पेनिश लेखक जेवियर मोरो की किताब "द रेड साड़ी" में सोनिया गांधी के आधार पर लिखा है कि इंदिरा कहती हैं, ''उस वक्त बहुत तेज बारिश हो रही थी। पटना से बेलछी जाने के जाने के रास्ते पर कई जगह पानी भर गया था। कीचड़ की वजह जीप से व पैदल चलना बहुत मुश्किल हो रहा था। सभी लोगों ने कहा कि अब ट्रैक्टर से ही आगे जाना संभव है। मैं अन्य सहयोगियों के साथ ट्रैक्टर पर चढ़ी। ट्रैक्टर कुछ दूर ही चल पाया था कि चक्का कीचड़ में फंस गया। मौसम और रास्ते की हालत देख कर साथ चल रहे सहयोगियों ने कहा कि अब लौट जाना चाहिए। बेलछी जाने का कार्यक्रम स्थगित कर देना चाहिए। लेकिन मेरे सिर पर धुन सवार थी कि किसी भी तरह बेलछी पहुंचना है। पीड़ित दलित परिवार से हर हाल में मिलना है।"

''मैंने कहा, जो लौटना चाहते हैं वे लौट जाएं, मैं तो बेलछी जाऊंगी ही। मैं जानती थी कि कोई नहीं लौटेगा। कीचड़-पानी के बीच हम आगे बढ़ते रहे। आगे जाने पर एक नदी आ गयी। नदी पार करने का कोई उपाय नहीं था, शाम हो चली थी। गांव वालों से नदी पार करने के बारे में पूछा तब उन्होंने बताया कि यहां के मंदिर में एक हाथी है। लेकिन हाथी पर बैठने का हौदा नहीं है। मैंने कहा, चलेगा. हाथी का नाम मोती था। उस पर कंबल और चादर बिछा कर बैठने की जगह बनायी गयी। सबसे आगे महावत बैठा। उसके बाद मैं बैठी, फिर मेरे पीछे प्रतिभा पाटिल बैंठी। प्रतिभा काफी डरी हुईं थीं। वे कांप रहीं थीं और मेरी साड़ी का पल्लू कसकर पकड़े हुए थीं। जब हाथी नदी के बीच पहुंचा तो पानी उसके पेट तक पहुंच गया। अंधेरा घिर आया था। बिजली कड़क रही थी। ये सब देख कर थोड़ी घबराहट हुई लेकिन फिर मैं बेलछी के पीड़ित परिवारों के बारे में सोचने लगी। जब बेलछी पहुंची तो रात हो चुकी थी। पीड़ित परिवरों से मिली। मेरे कपड़े भींग चुके थे। मेरे पहुंचने पर गांव के लोगों को लगा जैसे कोई देवदूत आ गया है। उन्होंने मुझे पहनने के लिए सूखी साड़ी दी। खाने के लिए मिठाइयां दीं। फिर कहने लगे हमने आपके खिलाफ वोट किया, इसके लिए हमे क्षमा कर दीजिए।''

इसके बाद इंदिरा गांधी बेलछी से पांच दिन बाद वापस दिल्ली लौंटी, तब तक यह घटना राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अखबारों में सुर्खी बन गई थी। हर तरफ लोग इंदिरा गांधी की तारीफ कर रहे थे। सोनिया गांधी ने देखा कि उनके चेहरे पर मुस्कान है और आंखों में जबरदस्त आत्मविश्वास नजर आ रहा है। इंदिरा गांधी को यकीन हो चुका था कि अब देश में उनके दिन एकबार फिर लौटने वाले हैं।

ठीक उसी प्रकार सोनभद्र हत्याकांड के बाद घटे घटनाक्रम की घटना से एक बार फिर प्रियंका गांधी की वही संघर्षशील तस्वीर देशवासियों के सामने आ रही है जो उस वक्त 13 अगस्त 1977 को बिहार के बेलछी में इंदिरा गांधी की थी। लोग कहने लगे हैं कि "प्रिंयका नहीं ये आंधी है दूसरी इंदिरा गांधी है" सोनभद्र के इस घटनाक्रम के बाद लोगों में चर्चा होने लगी है कि प्रिंयका गांधी युवा संघर्षशील है उनके दिल में आमजनमानस के दुःख दर्द के लिए जगह है और वह इंदिरा गांधी के पदचिन्हों पर चल रही है। वो ही राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद कांग्रेस को सही ढंग से संभाल सकती है वो पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के लिए उपयुक्त हैं। आम लोगों को आशा है कि प्रिंयका गांधी ही वो चेहरा है जिनके संघर्षशील कुशल नेतृत्व में कांग्रेस देश में जल्द ही वापसी करेगी और मजबूत विपक्ष के दायित्व का निर्वाह करके आमजनमानस के लिए धरातल पर संघर्ष करेगी ।।