सोमवार, 30 दिसंबर 2019

*दुष्यंत कुमार की पुण्यतिथि पर विशेष* सत्ता के अन्याय के खिलाफ बागी तेवरों की दबंग आवाज़ दुष्यंत कुमार



*दुष्यंत कुमार की पुण्यतिथि पर विशेष*
 
सत्ता के अन्याय के खिलाफ बागी तेवरों की दबंग आवाज़ दुष्यंत कुमार

हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार
  
30 दिसंबर को देश के हिंदी साहित्य के महान गजलकार दुष्यंत कुमार की पुण्यतिथि है, वो हिंदी साहित्य में एक बहुत बड़ा नाम है जिसकी मिसाल हर कोई देता है। दुष्यंत कुमार अपनी बेहद सरल हिंदी और बेहद आसानी से समझ आने वाली उर्दू में कविताएं लिखकर लोगों के दिलों-दिमाग पर एकदम से छा गए थे। इन्होंने देश के सामने सरल हिंदी भाषा में गजलों को पेश करके, देश के हिंदी साहित्य में एक नई बयार बहाई थी। आज उनकी पुण्यतिथि पर प्रस्तुत हैं दुष्यंत कुमार कुछ बेहतरीन रचनाएं

"रहनुमाओं की अदाओं पर फ़िदा है दुनिया,

इस बहकती हुई दुनिया को संभालो यारों,

कैसे आकाश में सुराख़ हो नहीं सकता,

एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो।"

महान कवि दुष्यंत कुमार का जन्म 27 सितंबर 1931 को  उत्तर प्रदेश के बिजनौर जनपद की तहसील नजीबाबाद के ग्राम राजपुर नवादा में हुआ था। वो एक सरल हिन्दी कवि, कथाकार और ग़ज़लकार थे। हालांकि दुष्यंत कुमार की पुस्तकों में उनकी जन्मतिथि 1 सितंबर 1933 लिखी है, किन्तु साहित्य के मर्मज्ञ विजय बहादुर सिंह के अनुसार उनकी की वास्तविक जन्मतिथि 27 सितंबर 1931 है।उनके पिता का नाम भगवत सहाय त्यागी और माता का नाम रामकिशोरी देवी था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा गाँव की पाठशाला में हुई, माध्यमिक शिक्षा नहटौर से हाईस्कूल और चंदौसी में इंटरमीडिएट से हुई थी। दुष्यंत कुमार ने दसवीं कक्षा से कविता लिखना प्रारम्भ कर दिया। इंटरमीडिएट करने के दौरान ही राजेश्वरी कौशिक से उनका विवाह हो गया था। बाद उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी में बी०ए० और एम०ए० किया। उनको कथाकार कमलेश्वर और मार्कण्डेय तथा कविमित्रों धर्मवीर भारती, विजयदेवनारायण साही आदि के संपर्क से, उनकी साहित्यिक अभिरुचि को एक नया आयाम मिला था। मुरादाबाद से बी०एड० करने के बाद वर्ष 1958 में वो आकाशवाणी दिल्ली में आये। उसके बाद मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग के अंतर्गत भाषा विभाग में कार्यरत रहे। देश में लगे आपातकाल के समय उनका कविमन बेहद क्षुब्ध और आक्रोशित हो उठा जिसकी अभिव्यक्ति कुछ कालजयी ग़ज़लों के रूप में हुई, जो उनके ग़ज़ल संग्रह 'साये में धूप' का हिस्सा बनीं। सरकारी सेवा में रहते हुए सरकार विरोधी काव्य रचना के कारण उन्हें समय-समय पर सरकार के कोपभाजन का भी शिकार बनना पड़ा था। अपनी गजलों से देश के मठाधीशों के सिंहासन को हिलाने वाला यह महान योद्धा 30 दिसंबर 1975 की रात्रि में हृदयाघात के चलते, साहित्य की दुनिया का यह महान सितारा असमय अल्पायु में दुनिया को छोड़कर चिरनिद्रा में हमेशा के लिए सो गया।

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी, शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गांव में, हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।


जिस दौर के दौरान दुष्यंत कुमार ने साहित्य की दुनिया में अपने कदम रखे थे, उस समय भोपाल के दो प्रगतिशील शायरों ताज भोपाली तथा क़ैफ़ भोपाली का ग़ज़लों की दुनिया पर एकक्षत्र राज था। हिन्दी भाषा में भी उस समय अज्ञेय तथा गजानन माधव मुक्तिबोध की कठिन कविताओं का देश में जबरदस्त बोलबाला था। उस समय आम आदमी के लिए नागार्जुन तथा धूमिल जैसे नाममात्र के कुछ कवि ही बच गए थे। इस समय सिर्फ़ 44 वर्ष के जीवन में दुष्यंत कुमार ने अपार ख्याति अर्जित की। दुष्यंत कुमार देश के उन महान कवियों में से एक हैं, जिनकी हिंदी भाषा पर जितनी अच्छी पकड़ थी, उर्दू भाषा की भी उतनी अच्छी जानकारी भी। यही वजह है कि उनको देश का पहला हिंदी ग़ज़ल लेखक माना जाता है। दुष्यंत कुमार ने कविता, गीत, गजल, काव्य, नाटक, कथा, हिंदी की सभी विधाओं में लेखन किया था, लेकिन उनकी गजलें उनके लेखन की दूसरी विधाओं पर हमेशा भारी पड़ी और लोगों के दिलों-दिमाग पर छा गयीं। उनकी हर गज़ल आम आदमी की आवाज़ बन गयी है, जिसमें चित्रित है, आम आदमी के जीवन संघर्ष की दास्तान, आम आदमी के जीवना का दर्द व दर्पण, देश की राजनैतिक विडम्बनाएं और विसंगतियां। राजनीतिक क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार, प्रशासनिक तन्त्र की संवेदनहीनता, वही उनकी गजलों का ताकतवर स्वर है। दुष्यन्त कुमार ने गज़ल को रूमानी तबिअत से निकालकर देश के आम आदमी से जोड़ने का कार्य सफलतापूर्वक किया है। दुष्यंत कुमार ने गजल को हिंदी कविता की मुख्य धारा में शामिल करने की पुरजोर कोशिश की और वह इसमें पूरी तरह सफल भी हुए। 

कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए 

यहाँ दरख़तों के साये में धूप लगती है
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए 

न हो कमीज़ तो पाँओं से पेट ढँक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए 

ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए 

वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिए 

तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर की
ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए 

जिएँ तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए

उनकी इन पंक्तियों के साथ आज हम इस महान लेखक आदरणीय दुष्यंत कुमार को पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

रविवार, 29 दिसंबर 2019

देश में मोदी-शाह की जोड़ी के मैजिक के बाद भी राज्यों में सिकुड़ते साम्राज्य को बचाना भाजपा के सामने बड़ी चुनौती



देश में मोदी-शाह की जोड़ी के मैजिक के बाद भी राज्यों में सिकुड़ते साम्राज्य को बचाना भाजपा के सामने बड़ी चुनौती

हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सम्पूर्ण विश्व में एक बहुत ही शानदार ढंग से धाराप्रवाह बोलने वाले अच्छे वक्ता के रूप में जाना जाता है। वह विश्व के जिस भी कोने में जाकर जनता का संबोधन करते हैं, उस जगह की जनता मंत्रमुग्ध होकर उनकी मुरीद होकर उनसे दिल से जुड़ जाती है और उनकी हाँ में हाँ मिलाने लगती है। लेकिन इस बार  झारखंड राज्य की जनता ने विधानसभा चुनावों में उनकी हाँ में हाँ मिलाने के बजाए उन्हें ही ना कह कर भाजपा के रणनीतिकारों व देश के दिग्गज चुनावी पंडितों को आश्चर्यचकित कर दिया है। झारखंड की जनता ने सारे देश को व सभी राजनैतिक दलों को यह साफ़ संदेश दे दिया है कि वो अब अच्छे लच्छेदार धाराप्रवाह भाषणों व भावनात्मक मुद्दों पर नहीं बल्कि जनभावनाओं के अनुरूप होने वाले जनहित के कार्यों व सरकार के अच्छे-बुरे  कामों का आकलन करके वोट करेगी। इन चुनावों में मोदी-शाह की जोड़ी की जबरदस्त मेहनत के बाद भी चुनाव परिणामों में भाजपा को महागठबंधन के हाथों करारी शिकस्त हाथ लगी हैं। भाजपा ने झारखंड विधानसभा चुनाव में 9 रैलियां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व 9 रैलियां गृहमंत्री अमित शाह की करवाई थी साथ ही भाजपा के स्टार प्रचारकों की पूरी फोज ने चुनाव जीतने के लिए जबरदस्त ताकत झोंक रखी थी। प्रचार में इन सभी नेताओं ने स्थानीय मुद्दों की जगह राष्ट्रीय मुद्दों को प्रमुखता से उठाकर भावनात्मक रूप से भुनाने का प्रयास किया था। जिसको झारखंड की जनता ने अस्वीकार कर दिया, भाजपा नेताओं ने राम मंदिर और कश्मीर से धारा 370 हटाने के अपने फैसले को पूरे चुनाव प्रचार में जोर-शोर से उठाया था, स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व गृहमंत्री अमित शाह ने अपने चुनावी भाषणों में राष्ट्रीय मुद्दों को जोर-शोर से उठाया था। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को उम्मीद थी कि कश्मीर से धारा 370 हटाने और राम मंदिर निर्माण जैसे बड़े मुद्दों का उसे विधानसभा चुनाव में जबरदस्त फायदा होगा, लेकिन जनता ने इसके विपरीत भाजपा को झारखंड की सत्ता से बाहर कर विपक्ष में बैठने का रास्ता दिखा दिया। राज्य में पार्टी बहुमत के आंकड़े से काफी पीछे रह गयी। अबकी बार 65 पार का नारा देने वाली पार्टी भाजपा महज़ 25 सीटों पर सिमट कर रह गयी। झारखंड की जनता ने भाजपा के सभी राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों को सिरे से नकार कर स्पष्ट संदेश दे दिया है कि राज्यों के विधानसभा चुनावों में राष्ट्रीय मुद्दें कम चलेंगे, भविष्य में विधानसभा के चुनावों में राजनैतिक दलों को राष्ट्रीय मुद्दों के साथ-साथ स्थानीय मुद्दों को भी तरजीह देनी होगी तब ही राज्यों के चुनावों में विजय हासिल होगी। 

झारखंड के चुनाव परिणामों ने देश में भविष्य की राजनैतिक दिशा व दशा की स्थिति को भी काफी हद तक साफ कर दिया है। एकबार फिर राज्यों में गठबंधन सरकारों का दौर ही कामयाब हो गया है। साथ ही राज्य की जन अदालत ने यह भी संदेश दे दिया है कि अगर भाजपा सरकार ने देश में व्याप्त आर्थिक मंदी को दूर करने व आमजनमानस की रोजमर्रा की रोजीरोटी की समस्याओं का समाधान जल्द नहीं किया, तो वह दिन दूर नहीं है जब कांग्रेस मुक्त भारत का नारा देने वाली भाजपा का साम्राज्य वर्ष 2017 तक जिस तेजी के साथ फैला था उस ही तेजी के साथ घटकर चंद राज्यों में ही सिमट कर सीमित रह जायेगा। भाजपा नेतृत्व को समय रहते ही जन भावनाओं व देशहित में लिए जाने वाले सख्त फैसलों के बीच बेहतर तालमेल करना होगा, अपने बड़बोले नेताओं पर लगाम लगानी होगी। साथ ही पार्टी के शीर्ष नेताओं को अंहकार से मुक्त होकर बिखरते एनडीए के सभी सहयोगियों को सम्मान देते हुए एकजुट रखना होगा।

"भाजपा के रणनीतिकारों को देश के आमजनमानस की पीढ़ा को समझना होगा, उन्हें समझना होगा कि उसके लिए देश की एकता अखंडता, अमनचैन, आपसी भाईचारे के साथ रोजीरोटी रोजगार महत्वपूर्ण है ना कि अन्य ज्वंलत मुद्दें महत्वपूर्ण हैं।"

भाजपा को अपने तेजी के साथ घटते साम्राज्य को बचाने के लिए अब सत्ता के महलों से बाहर आकर, धरातल की वास्तुस्थिति को समझते हुए उसका विश्लेषण करके तत्काल आत्मचिंतन कर भविष्य के लिए कारगर रणनीति वाली रूपरेखा बनानी होगी। तब ही भविष्य में मोदी-शाह की जोड़ी की लोकप्रियता व मैजिक के जलवे को देश की जनता के बीच बरकरार रखा जा सकता है।
भाजपा के कुछ नेताओं को समझना होगा कि वो अब सत्ता में है, इसलिए अब विपक्षी नेताओं की तरह उग्र व्यवहार करना बंद करें। क्योंकि विपक्ष में रहकर आग लगाना बहुत आसान कार्य है, लेकिन सत्ता में रह कर आग ना लगने देना बहुत कठिन कार्य है।
 
झारखंड राज्य में आये चुनाव परिणाम सत्ता पक्ष भाजपा के लिए एकदम अप्रत्याशित हैं, ये चुनाव परिणाम सत्ताधारी दल भाजपा व मोदी-शाह की जोड़ी की लोकप्रियता के लिए बहुत बड़ा झटका है। विचारणीय प्रश्न यह है कि भाजपा के द्वारा जिस तरह से झारखंड में अपने चुनाव प्रचार को हिन्दू-मुसलमान, मंदिर-मस्जिद, आर्टिकल 370, राम मंदिर, एनआरसी व कैब आदि भावनात्मक व ज्वंलत मसलों के आसपास रखा गया, उसके बाद भी इन भावनात्मक मुद्दों का चुनावों में भाजपा को कोई राजनैतिक लाभ हासिल नहीं हुआ है यह भाजपा नेतृत्व के लिए सोचनीय है। कहीं ना कहीं इन विधानसभा चुनाव परिणामों पर देश में व्याप्त आर्थिक मंदी, रोजीरोटी व रोजगार संकट के मसलों पर केंद्र सरकार से जनता की नाराजगी सत्ता पक्ष भाजपा को भारी पड़ी है। जिस तरह से पिछले एक वर्ष में भाजपा के साम्राज्य से राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र के बाद झारखंड बाहर हुए है, वह राज्यों में भाजपा के घटते तेजी से प्रभाव व जनता की नाराजगी को दर्शाता है। हालांकि कुछ समय पहले ही हरियाणा में भी भाजपा को सरकार बनाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी थी। हरियाणा में तो गृहमंत्री अमित शाह की चाणक्य नीति से भाजपा को सरकार बनाने में सफलता मिल गई थी, लेकिन महाराष्ट्र में शिवसेना के एनडीए से बाहर होने के बाद भी जुगाड़ से देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री की शपथ दिलाने के बाद भी भाजपा सरकार बचाने के लिए बहुमत का बंदोबस्त नहीं कर पायी थी।

सबसे बड़ी खास बात यह है कि आज भी राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसा  लोकप्रिय व कद्दावर नेता भाजपा के पास मौजूद है। पार्टी के पास आज भी गृहमंत्री अमित शाह के रूप में कुशल राजनैतिक रणनीतिकार मौजूद है। लेकिन उसके बाद भी हाल के राज्यों के चुनाव परिणामों पर नजर डालें तो विधानसभा चुनाव में स्थानीय मुद्दों की अनदेखी के चलते व भाजपा के दूसरी पंक्ति के दिग्गज नेताओं के सत्ता के अंहकार में चूर  होकर अनापशनाप बडबोलेपन वाले बयानों के चलते, कहीं ना कहीं भाजपा को मोदी-शाह की जोड़ी का अब वो फायदा नहीं मिल पा रहा है जो राज्यों के चुनावों में 2017 तक मिलता था और 2019 के लोकसभा चुनावों अप्रत्याशित रूप से मिला था। जिस तरह से मोदी-शाह की जोड़ी ने वर्ष 2014 के बाद वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों में भी बड़ी जीत हासिल करके सभी को चौंका दिया था। उसके बाद देश के सभी राजनैतिक विश्लेषकों को भाजपा की प्रचंड जीत को देखकर लगता था कि पूरे देश में भाजपा की स्थिति अब काफी मजबूत है वह राज्यों के चुनावों में पहले से बहुत बेहतर करेगी। लेकिन हकीकत में रोजीरोटी पर बढ़ते जनआक्रोश के चलते राज्यों में धरातल पर अब ऐसी स्थिति नहीं हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहले कार्यकाल के अंतिम समय से लेकर अब तक अगर भाजपा ने यूपी जैसे बड़े राज्यों में प्रचंड जीत भी हासिल की तो पंजाब, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्य खो भी दिए है। इसके साथ-साथ छत्तीसगढ़ और अब झारखंड जैसा छोटा राज्य भी भाजपा के पास नहीं रहा। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि देश में राज्यों की सत्ता हासिल करने में अब क्यों नहीं चल रहा मोदी-शाह की जोड़ी का मैजिक।
लोग जब लोकसभा चुनावों के लिए वोटिंग करने जाते हैं तो उनके मन में पूरे देश के विकास के लिए राष्ट्रीय स्तर के मुद्दे होते हैं साथ ही मतदाता सभी राजनैतिक विकल्पों को ध्यान में रखते हुए मतदान करता है। लेकिन वही मतदाता विधानसभा चुनावों में राज्यस्तरीय मुद्दों से प्रभावित होता है वो उनके ही आधार पर राज्य सरकार का चयन करता है। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों में मिले जनता के अपार प्रेम के  बूते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के सबसे लोकप्रिय नेता के रूप में शीर्ष स्थान पर काबिज हैं। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी का चयन करने वाली देश की सम्मानित जनता राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी भाजपा का चयन करने के लिए बाध्य है।
क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर देश की जनता को लगता है कि देश में फिलहाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कोई विकल्प मौजूद नहीं है। लेकिन राज्य स्तर के चुनावों में अब जनता को लगने लगा है कि भाजपा के राज्यस्तरीय नेतृत्व का अच्छा विकल्प अन्य राजनैतिक दलों में मौजूद है और जनता अब उन विकल्पों को चुनने का कार्य हर एक राज्य में करने लगी है जो कि भाजपा के साम्राज्य के लिए खतरें की घंटी है।

हमारे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की यह खूबसूरती है कि अलग-अलग चुनावों में जनता के बीच अलग-अलग मुद्दे हावी होते हैं। हर राज्य में छोटे-छोटे कई ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें देखकर लोग वोट करते हैं। ऐसे में अगर भविष्य में भी राज्यों के चुनावों में भी भाजपा की राज्य सरकारें अपने काम की जगह व स्थानीय मुद्दों की जगह सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर ही वोट हासिल करने की कोशिश करेगी तो उसके लिए चुनावों में जीतना मुश्किल ही होगा। इसलिए राज्यों में विजय प्राप्त करने के लिए व अपने सिकुड़ते साम्राज्य को बचाने के लिए भाजपा के रणनीतिकारों को स्थानीय मुद्दों व सहयोगियों को तरजीह देनी ही होगी, तब ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व गृहमंत्री अमित शाह की जोड़ी का मैजिक जनता के बीच बरकरार रह सकता है।

सोमवार, 23 दिसंबर 2019

इक्कीसवीं सदी के भारत में जाति-धर्म के नाम पर माहौल खराब करते चंद लोग व राजनेता

इक्कीसवीं सदी के भारत में जाति-धर्म के नाम पर माहौल खराब करते चंद लोग व राजनेता

हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार


महात्मा गांधी जी का सत्य एवं अहिंसा का संदेश किसी भी देश में शांति, विकास एवं प्रगति के लिए आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना पहले था। सम्पूर्ण विश्व को महात्मा गांधी जी के सत्य-अहिंसा के संदेश को देने वाला हमारा प्यारा भारत, आज कुछ जाति-धर्म के ठेकेदारों, चंद इंसानियत के दुश्मन लोगों व राजनेताओं के क्षणिक स्वार्थ के चलते बहुत तेजी के साथ झूठ, छल-कपट व हिंसा से दिनप्रतिदिन ग्रस्त होता जा रहा है। देश में अपनी ओछी राजनीति चमकाने के फैशन के चलते जाति-धर्म, हिन्दू-मुसलमान व अमीर-गरीब के नाम पर लगातार घृणा फैलाई जा रही है, सत्ता हासिल करने के लालच में चंद राजनेताओं के द्वारा आम देशवासियों के बीच में नफरत की कभी ना टूटने वाली मजबूत दीवार खड़ी करने का लगातार शर्मनाक प्रयास जारी है। 

आज कुछ लोगों व नेताओं की कृपा से देश में चारों तरफ धार्मिक व जातिगत उन्माद चरम पर है। पिछले कुछ समय से धर्म को आधार बनाकर राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी), नागरिकता संशोधन बिल (कैब) जैसे मुद्दों पर राजनीति की खातिर देशहित छोड़कर विरोध करने के चलते, मौजूदा समय में हमारे प्यारे देश में जो हालात दिखाई दे रहे हैं उनसें अगर आपको डर नहीं लगता तो समझिये आप एक अमनचैन पसंद वाले अच्छे बुद्धिजीवी इंसान नहीं बल्कि इंसान के रूप में सभ्य समाज के लिए एक खतरनाक हिंसक प्रवृत्ति वाले व्यक्ति हैं। आज परिस्थितियों की चुनौती व समय की मांग है कि देश में अमनचैन प्यार मोहब्बत के साथ समय से सभी देशवासियों को रोजीरोटी रोजगार कैसे मिले, चारों तरफ किसी ना किसी रूप से डिस्टर्ब पड़ोसी देशों से घिरे भारत की सीमाओं को हमारे वीर जवान कैसे सुरक्षित रखें, देश विकास के नये आयाम स्थापित करके कैसे सम्पूर्ण विश्व में भारत की पताका फहराये। लेकिन बहुत अफसोस की बात है कि कुछ स्वार्थी लोगों की वजह से व राजनीति की कुटिल चालों ने हमको जनहित के मुद्दों से दूर करके देश व समाज का अहित करने वाले बेवजह के ज्वंलत मसलों में उलझा दिया है। चंद लोगों व राजनेताओं की वजह से आज हम लोग देशहित व अपनी रोजमर्रा की समस्याओं को भूलकर राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी), नागरिकता संशोधन बिल (कैब), मंदिर-मस्जिद, हिन्दू-मुसलमान व पाकिस्तान जैसे नाकाम देश के मुद्दों में उलझते जा रहे है। जिसके चलते जाति-धर्म की आड़ में देश में रोजाना जमकर हंगामा बरपा हुआ है, आयेदिन कुछ देशद्रोही लोग जाति-धर्म के नाम पर सार्वजनिक व निजी सम्पत्ति को तोड़फोड़ करके नुकसान पहुंचा कर जानमाल व देश का अहित करने में व्यस्त हैं। जो धर्म हमको अनुशासित जीवन जीना सिखाता है, उस धर्म का इस्तेमाल कुछ राजनेताओं के द्वारा अब सत्ता हासिल करने के लिए और अपने निजी छुपे हुए जहरीले ऐजेंडा को जनता के बीच फैलाने के लिए हो रहा है। कुछ लोगों ने तो धर्म को ही अपनी राजनीति और व्यापार के सफलतापूर्वक विस्तार करने का सबसे सशक्त माध्यम बना लिया है। ये लोग धर्म के नाम पर भोलीभाली जनता को अपने जाल में फांस कर उनकी भावनाओं से खिलवाड़ करके, उनको छलकर अपना उल्लू सीधा करने का काम बड़ी चतुराई से कर रहे हैं। इन धर्म के तथाकथित ठेकेदारों की हरकतों को देखकर लगता है कि धर्म के नाम पर हंगामा करने वालों को धर्म की जरा भी समझ नहीं है। जबकि हम धर्म की परिभाषा को देखें और उसके एक-एक शब्द पर गौर करें तो हम उसकी महानता व विशालता के बारें में जान सकते है। प्रत्येक धर्म हमको प्रेरित करता है कि हम अपने जीवन को नैतिकता के साथ अनुशासित करते हुए मानवता व जन कल्याण के लिए कार्य करें, ना कि हर समय छल-कपट करके एक-दूसरे की गर्दन काटने के लिए उतावले रहें।

लेकिन अफसोस हम में से कुछ लोग अपने स्वार्थ के चलते आज धर्म की आड़ लेकर इंसानियत व मानवता को शर्मसार करने वाले अधार्मिक कार्य करने में व्यस्त हैं और इन चतुर लोगों की कुटिलता का कमाल देखों कि वो उस गलत अधार्मिक कृत्य को बहुत खूबी के साथ धर्म का अमलीजामा पहना कर, जनता के सामने धार्मिक कार्य बता कर उन पर थोपकर समाज को पथभ्रष्ट करने पर लगे हुए हैं।

कभी इन धर्म के तथाकथित ठेकेदारों को अखंड भारत को विभाजित करके धर्म के नाम पर बने पाकिस्तान की हालत को देखकर उससे सबक लेना चाहिए कि आज धर्म के नाम पर बना पाकिस्तान हर तरह से खस्ताहाल होकर दुनिया में किस पायेदान पर खड़ा है और हम कहां खड़े हैं। बदहाल पाकिस्तान में आयेदिन आतंकी मस्जिदों तक में बम ब्लास्ट करके जनता को अपना शिकार बनाते रहते हैं, कभी निष्पक्ष रूप से व शांत मन से आंख बंद करके सोचना कौन करता है ये सब, कौन है ये लोग जो इंसानियत को कलंकित कर रहे है उनके पीछे कौन खड़ा है। 
हमारे पूर्वजों ने अपनी बुद्धि व दूरदर्शी नजरों से देश की आजादी के समय ही भाँप लिया था कि भविष्य में चंद धर्म के तथाकथित ठेकेदारों की वजह से धर्म को इंसानियत को खत्म करने के लिए इस्तेमाल किया जायेगा। इसीलिए उन्होंने भारत के संविधान को धर्म व पंथ निरपेक्ष बनाया था। आज के स्वघोषित राष्ट्रभक्तों को देखना चाहिए कि धर्म के नाम पर बने देशों का हश्र क्या होता है, यह सबके सामने है। चंद देश के दुश्मन लोगों की गंदी सोच के चलते हमें अपने प्यारे भारत को सीरिया और पाकिस्तान की तरह नहीं बनाना, बल्कि उसको दुनिया का शक्तिशाली वो खूबसूरत विश्व गुरु भारत बनाना है जिसकी कल्पना हमारे सबसे बड़े ग्रंथ संविधान की प्रस्तावना में की गई है। जो एक समानता, बंधुता और स्वतंत्रता पर आधारित विकसित खुशहाल धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र हो। जिसके सर्वांगीण विकास में समाज के सभी वर्गों की पूर्ण भागीदारी हो। भारत एक ऐसा गौरवशाली राष्ट्र हो, जो विकास करुणा मैत्री और सद्भावना के मार्ग पर चलते हुए सम्पूर्ण विश्व का मार्गदर्शन करें। आज के तथाकथित राष्ट्रवाद के ठेकेदार लोगों व राजनेताओं को भी सोचना होगा कि राष्ट्रवादी होने का अर्थ सिर्फ राष्ट्रवाद के नाम पर जोश भरे तरह-तरह के नारे गढ़ लेने तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की ज्वंलत जन समस्यायों से निपटने का सामूहिक हल ढूंढ कर देशवासियों को अमनचैन युक्त माहौल देकर उनको खुशहाल करके देश को विकसित करना असली राष्ट्रवाद है। इसलिए मेरे प्यारे भाइयों इन चंद स्वार्थी लोगों व राजनेताओं के द्वारा बनाये गये झूठ-प्रपंच, धार्मिक-जातिवाद के जहरीले भ्रमजाल से मुक्त होकर, सामुहिक रूप से पूर्ण एकता व विश्वास के साथ देश की ज्वंलत समस्याओं के विरुद्ध खड़े होकर, उनका स्थाई समाधान करके देश की एकता अखंडता को कायम रखे यही मेरी आप सभी से विनम्र विनती है। यही देशहित में हर सच्चे देशभक्त भारतवासी का सबसे बड़ा सच्चा धर्म व सबसे बड़ा कर्तव्य है।

'हजारों रंग बिरंगे फूलों का,
यह प्यारा गुलिस्तां है मेरा,
इसकी खुबसूरती बचाना दोस्तों,
यही सच्चा धर्म है तेरा और मेरा ।।

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।

रविवार, 8 दिसंबर 2019

न्याय मांगने वाली उन्नाव की बहादुर बेटी को इंसाफ कब!



न्याय मांगने वाली उन्नाव की बहादुर बेटी को इंसाफ कब!

हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार

देश में बेटियों के प्रति लगातार इंसानियत को शर्मसार करने वाली हृदय विदारक घटनाओं का शर्मनाक दौर जारी है। आयेदिन कहीं ना कहीं कोई माता, बहन, बेटी इन इंसानियत के नाम पर कंलक, जाहिल, वहशी, राक्षस, दरिंदों की दरिंदगी का शिकार हो जाती है, ये हालात आज देश में महिलाओं की जानमाल की सुरक्षा के लिए बहुत बड़ी चुनौती बन गये है। सबसे बड़ी अफसोस की बात यह है कि ये हाल संस्कारों के अभाव में हमारे प्यारे उस देश में आज उत्पन्न हो गये हैं, जिस देश की संस्कृति में स्त्री को सर्वोच्च स्थान देकर पूजा जाता है जहां कदम-कदम पर माता, बहन व बेटियों के सम्मान की खातिर प्राण न्यौछावर करना सिखाया जाता था। वैसे तो कानून के कम होते सम्मान व भय के चलते देश में हर तरह के अपराध चरम पर हैं लेकिन आज के हालात में देखें तो देश की राजधानी सहित अधिकांश राज्यों की स्थिति यह है कि वहां अपराधियों के हौसले बुलंद है सभी राज्यों में महिलाओं के प्रति अपराध चरम पर हैं। सभी जगह भोलीभाली जनता अपराध व अपराधियों से त्रस्त है, अपने आकाओं की कृपा से व भ्रष्ट सिस्टम के आशिर्वाद से अपराधी बेखौफ कानून को अपनी जेब में रखकर अपराध करने में मस्त हैं। लेकिन देश में महिलाओं के प्रति जिस तरह अपराध बढ़े हैं वह स्थिति बेहद चिंताजनक है। उसके लिए कहीं ना कहीं हमारे समाज में लोगों के कम होते संस्कार, आज के व्यवसायिक दौर में खत्म होती नैतिकता, आपस में एकदूसरे की मदद ना करने का भाव भी जिम्मेदार हैं।

लेकिन जिस तरह से 6 दिसंबर 2019 को हैदराबाद की बेटी के चारों रेपिस्ट व क्रूर हत्यारों को जब तेलंगाना पुलिस ने एनकाउंटर में मार गिराया, तो उसके बाद पीड़ित को मिले त्वरित न्याय का जश्न अधिकांश देशवासियों ने जमकर मनाया। चंद लोगों को छोड़कर सभी ने पुलिस के इस कदम की जमकर सराहना की थी। लेकिन उसी समय हैदराबाद की तरह 5 दिसंबर 2019 को हैवानियत का शिकार बनी उन्नाव की रेप पीड़िता बहादुर बेटी दिल्ली के सफदरजंग हॉस्पिटल में जीवन जीने के लिए संघर्ष कर रही थी। वो बहादुर बेटी जीवन जीने के संघर्ष भरे इस दौर में खुद को इंसाफ मिलने की उम्मीद दिल में पाले, शरीर के साथ ना देने के चलते कार्डियक अरेस्ट होने के कारण आखिर में 6 दिसंबर को जिंदगी की जंग हार गयी। इस रेप पीड़ित बहादुर बेटी की दर्दनाक मौत कानून का सम्मान करने वाले प्रत्येक भारतीय को अंदर तक झकझोर गयी है, नियम कायदों का पालन करने वाले ये लोग अब सरकार से पूछ रहे है कि पिछले 1 साल से इंसाफ के लिए दर-दर ठोकर खाने वाली उन्नाव की बहादुर बेटी को आखिर इंसाफ कब तक मिलेगा दोषियों को फांसी के फंदे पर कब तक लटकाया जायेगा। लेकिन यह भी कटु सत्य है कि विश्व में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की जन्मभूमि के रूप में अपनी पहचान रखने वाले राज्य उत्तर प्रदेश के सरकारी सिस्टम की अमर्यादित आचरण व गलत कार्यशैली ने एक और बेटी की अनमोल जान को लील लिया। आज देश के कानून में आस्था रखने वाले करोड़ों लोगों का सरकार से सवाल है कि आखिर कब तक हमारे देश में इस तरह अपराधी कानून को अपनी कठपुतली बनाकर रखेंगे और बेखौफ होकर अपराधों को अंजाम देते रहेंगे। आज लोगों का नीतिनिर्माताओं से प्रश्न है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले हमारे देश के सत्ता में आसीन राजनेताओं, पुलिस-प्रसाशन की राजशाही वाली कार्यशैली में धरातल पर कब बदलाव होगा, ये चंद ताकतवर लोग आम-आदमी के दुख-दर्द को शासन-प्रशासन की कुर्सी पर बैठकर कब महसूस करना शुरू करेंगे और सभी को समय से सस्ता-सुलभ न्याय व सभी के जानमाल की सुरक्षा की आस वाले रामराज्य की उम्मीद को पूरा करेंगे। 

यहां आपको बता दे कि उन्नाव की पीड़िता बेटी का आरोप था कि शिवम और शुभम ने 12 दिसंबर 2018 में उसे अगवा कर गनपाइंट पर उसका रेप किया था। जिसमें पीड़िता ने 13 दिसंबर 2018 को पुलिस को एफआईआर दर्ज करने के लिए शिकायत दी, लेकिन पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं की। जिसके पश्चात पीड़िता ने 20 दिसंबर 2018 को एसपी रायबरेली को डाक से शिकायत भेजी लेकिन पुलिस ने फिर भी अपराधियों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की। जिससें परेशान होकर बहादुर बेटी ने भ्रष्ट सिस्टम से हिम्मत ना हारते हुए एफआईआर दर्ज कराने के लिए न्यायालय की शरण ली। जिसके चलते इस मामले में न्यायालय ने 4 मार्च 2019 को शिवम व शुभम के खिलाफ मामला दर्ज करने का आदेश दिया था। लेकिन उसके बाद भी भ्रष्ट सिस्टम की कृपा से अपराधी बेखौफ घूमते रहे अंत में शिवम ने 19 सितंबर 2019 को न्यायालय में समर्पण कर दिया। जिसको 25 नवंबर 2019 को हाईकोर्ट से जमानत मिल गयी थी। जमानत मिलने के बाद से ये आरोपी पीड़िता व उसके परिवार को लगातार मुकदमा वापस लेने के लिए धमकी दे रहे थे, इसी मुक़दमे के सिलसिले में पीड़िता पैरवी के लिए रायबरेली रवाना होने के लिये गुरुवार 5 दिसंबर 2019 को सुबह करीब चार बजे बैसवारा रेलवे स्टेशन जा रही थी। तभी रास्ते में गौरा मोड़, बिहार-मौरांवा मार्ग पर मुकदमे में जमानत पर चल रहे शिवम और शुभम ने अपने कुछ साथियों की मदद से पहले लड़की पर लाठी, डंडे, चाकू से वार किया। उसके बाद ज्वलनशील पदार्थ डालकर आग लगा दी थी। स्थानीय लोगों व पुलिस के अनुसार मदद की उम्मीद में पीड़िता जलती हुई अवस्‍था में घटनास्थल से बचाओ-बचाओं की आवाज लगाते हुए काफी दूर तक दौड़ कर आयी थी लेकिन किसी ने कोई मदद नहीं की। कुछ प्रत्‍यक्षदर्शियों ने जब उसे जलते देखा तो पीड़िता ने उनसे पुलिस बुलाने के लिए कहा, जिसके बाद ग्रामीणों ने पुलिस को इस घटना की सूचना दी। मौके पर पहुंची पुलिस ने करीब 90 फीसद तक जल चुकी पीड़िता को पहले सुमेरपुर के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पीएचसी भेजा, जहां से उसे उन्नाव जिला अस्‍पताल रेफर किया गया। बाद में उसकी नाजुक स्थिति को देखते हुए जिला अस्‍पताल के डॉक्‍टरों ने उसको लखनऊ ट्रामा सेंटर रेफ़र के लिए रेफर कर दिया था, जहां से उसे एयरलिफ्ट कर दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल लाया गया। वहीं दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश पुलिस ने इस मामले में शिवम, शुभम, हरिशंकर, रामकिशोर और उमेश नामक व्यक्तियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार करके जेल भेज दिया। उन्नाव की इस बहादुर बेटी को उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के आदेश पर 90 फीसदी जली हुई बेहद गम्भीर अवस्था में 5 दिसंबर को एयरलिफ्ट करके लखनऊ से दिल्ली के सफदरजंग हॉस्पिटल उचित इलाज के द्वारा जान बचाने के उद्देश्य से लाया गया था, लेकिन अफसोस हैवानों की दरिंदगी की शिकार इस पीड़िता ने शुक्रवार 6 दिसंबर की रात को 11 बजकर 40 मिनट पर इस बेरहम दुनिया को अपने प्राण त्यागकर हमेशा के लिए छोड़ दिया। हॉस्पिटल के डॉक्टरों के भरपूर प्रयासों के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका। 

देश में महिलाओं की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए हमारे देश में सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट आदेश व केंद्र सरकार के द्वारा महिलाओं के प्रति अपराध रोकने के लिए बनाये गये सख्त कानूनों के बाद भी, देश में एक पीड़ित महिला के साथ हमारे सिस्टम का कैसा व्यवहार होता है उन्नाव की यह शर्मनाक घटना उसकी मिसाल है। इंसानियत को कंलकित करने वाली यह घटना हम सभी के सामने हमारे देश के भ्रष्ट सिस्टम की एकबार फिर पोल खोल गयी है कि हमारा सिस्टम पीड़ित की नहीं बल्कि अपराधियों की सुनता है, वो कहीं ना कहीं लोभ-लालच व सिफारिशों के दवाब में  गुंडे-मवालियों के हाथ की कठपुतली बनकर रह गया हैं। इस घटना के बाद देश के आमजनमानस में जबरदस्त आक्रोश है लोग त्वरित न्याय के लिए जगह-जगह सड़कों पर धरना-प्रदर्शन, कैंडल मार्च कर रहे हैं, सरकार लोगों को अपराधियों को जल्द से जल्द सख्त से सख्त सजा देने का आश्वासन दे रही है। परंतु यह भी सच है कि सही ढंग से ईमानदारी से देश की बेटियों के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करने के लिए समाज व सिस्टम कोई भी वर्ग तैयार नहीं है, अधिकांश मामलों में रक्षक ही बेटियों के भक्षक बनने पर तुले हुए है जो चरित्रहीनता व संस्कारहीनता का परिचायक है। लेकिन अब समय आ गया है कि देश में मातृशक्ति को सुरक्षित रखने के लिए हम सभी को अपनी-अपनी जिम्मेदारी का सही ढंग से पालन करना होगा। सरकार व सिस्टम को भी अपराधियों में कानून का भय व सम्मान पैदा करने के लिए इस तरह के मामलों में फास्टट्रैक कोर्ट में मामला चलाकर अपराधी को जल्द से जल्द सख्त सजा देकर समाज के सामने नजीर पेश करनी होगी, तब ही इस हालात में सुधार हो पायेगा और देश में मातृशक्ति सुरक्षित रह पायेंगी।

।।जय हिन्द जय भारत ।।
।।मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान।।

सोमवार, 2 दिसंबर 2019

खस्ताहाल अर्थव्यवस्था को सही कारगर नीतियों की संजीवनी बूटी कब !

खस्ताहाल अर्थव्यवस्था को सही कारगर नीतियों की संजीवनी बूटी कब !

दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार

भारत की अर्थव्‍यवस्‍था की रफ्तार बढ़ाने के नरेंद्र मोदी सरकार के प्रयासों को शुक्रवार 29 नवंबर को उस समय तगड़ा झटका लगा जब केन्द्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, लम्बे समय से मंदी की मार झेलने से बेहाल भारत की अर्थव्यवस्था में ताजा जारी किये गये आकड़ों के अनुसार और गिरावट देखने को मिली है। इन आकड़ों के अनुसार चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में भारत की विकास दर में भारी गिरावट आयी है। ताजा रिपोर्ट के मुताबिक भारत का जीडीपी (GDP) ग्रोथ का आंकड़ा 4.5 फीसदी पहुंचा गया है। जो पिछले 6 वर्षों में किसी तिमाही की सबसे बड़ी गिरावट है। जीडीपी के आकड़ों में भारी गिरावट नजर आने के बाद अर्थव्यवस्था को लेकर देश में राजनीति शुरू हो गई है, केंद्र सरकार के कर्ताधर्ता एकबार फिर विपक्षी दलों के निशाने पर आ गये है। 

वैसे भारतीय अर्थव्यवस्था की इस स्थिति के लिए देश के कर्ताधर्ताओं में कोई माने या ना माने, लेकिन यह कटु सत्य है कि कहीं ना कहीं यह मानव जनित आपदा है। सरकार के कुछ गलत आर्थिक निर्णयों के चलते आज भारत की अर्थव्यवस्था बेहद मंदी के नाजुक दौर से गुजर रही है। देश में स्थिति यह हो गयी है कि भारतीय बाजार पर उसका दुष्प्रभाव अब आकड़ों की बाजीगरी के बाद भी छिपाया नहीं जा सकता है। लेकिन फिर भी ना जाने क्यों देश के नीतिनिर्माता स्थिति की गम्भीरता को अब भी समझने के लिए तैयार नहीं हैं, वो इस हालात को या तो जानबूझकर समझने के लिए तैयार नहीं है या यह भी हो सकता है कि उनकी टीम में शामिल लोग अर्थव्यवस्था को कमजोर करने वाले ठोस कारकों को पकड़ नहीं पा रहे हो। खैर अर्थव्यवस्था कितनी भी खस्ताहाल बेहाल हो, लोगों को बेशक रोजीरोटी रोजगार ना मिल रहा हो उससे हमारे देश के चंद ताकतवर राजनेताओं पर कुछ असर नहीं पढ़ता है वो अब भी लोगों को बरगला के हिन्दू-मुसलमान , मंदिर-मस्जिद में उलझा कर भीड़तंत्र का बेहुदा माहौल बनाने में व्यस्त है। सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि वो भारत जैसे विकासशील देश की तुलना बात-बात में हर मोर्चे पर असफल पाकिस्तान से करके भारतीय जनसमूह से खूब तालियां बटोरते हैं।  
 
वर्तमान में देश की अर्थव्यवस्था के इस हालात के लिए उच्च जीएसटी दरें, कृषि क्षेत्र में संकट, वेतनभोगियों के वेतन में कमी और नकदी की कमी आदि कारक की वजह से देश को भारी मंदी का सामना करना पड़ रहा है। साथ ही अर्थशास्त्रियों के अनुसार उपभोग में भारी मंदी के रुझान, जीडीपी विकास दर में लगातार गिरावट का सबसे प्रमुख कारण है। जिसके चलते भारतीय अर्थव्यवस्था के मजबूत स्तंभ ऑटोमोबाइल, पूंजीगत वस्तुएं, बैंक, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, एफएमसीजी और रियल एस्टेट आदि सहित देश के सभी प्रमुख सेक्टरों में भारी गिरावट आई है। जोकि अर्थव्यवस्था में मंदी का माहौल पैदा कर रहे हैं।

लेकिन फिर भी अपनी हठधर्मिता वाली नीति के चलते अब भी सरकार में बैठे कुछ लोग स्थिति को सामान्य बता रहे हैं। इस स्थिति में कहा जा सकता है कि देश की अर्थव्यवस्था की सरकार जितनी गुलाबी तस्वीर पेश कर रही है। हकीकत में धरातल पर हालात सामान्य नहीं हैं। इस स्थिति के लिए वजह चाहे जो भी हो लेकिन सरकार को चाहिए की वो तत्काल अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए सही नीतियों की संजीवनी बूटी की ताकतवर डोज प्रदान कर, इस गम्भीर बीमारी का उपचार कर संकटग्रस्त देशवासियों को राहत प्रदान करें। क्योंकि आजकल आर्थिक स्थिति को लेकर जमीन स्तर पर जो स्थिति बनती जा रही है वो देशहित में व आमजनमानस के हित में ठीक नहीं है। अब लोगों से उनकी रोजीरोटी रोजगार छिनने लगा है जिससे आमजन को भारी दिक्कत होने लगी है, देश में लोगों की नौकरी जा रही नये रोजगार पैदा होने के अवसर दिनप्रतिदिन खत्म होते जा रहे हैं। जिसके चलते अब देश के आमजनमानस को लगने लगा है कि सरकार आर्थिक मोर्चे पर पूर्ण रूप से विफल है और स्थिति उनके नियंत्रण से दिनप्रतिदिन बाहर होती जा रही है, जो हालत चिंतनीय हैं।

खस्ताहाल अर्थव्यवस्था की हालत पर भाजपा सरकार के नेता भले ही कहें कि कुछ लोगों को उनकी सरकार की आलोचना करने में मजा आता है। लेकिन हक़ीक़त यह है कि अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्र इन दिनों बहुत संकट में हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक़ निजी निवेश में मंदी की हालत में सुधार के संकेत जल्द दिखाई नहीं दे रहे है। देश को धन उपलब्ध करवाने वाला बैंकिंग क्षेत्र फंसे क़र्ज़ (एनपीए) की समस्या से बेहाल है। कोयला, क्रूड ऑयल, प्राकृतिक गैस, रिफाइनरी प्रोडक्ट्स, उर्वरक, सीमेंट, बिजली और इस्पात देश के आठ महत्वपूर्ण कोर सेक्टर हैं। इन सेक्टर का देश के औद्योगिक उत्पादन इंडेक्स में लगभग 40 फीसदी का योगदान है। लेकिन वैश्विक मोर्चे पर बिगड़ती स्थितियों के बीच निजी निवेश और उपभोक्ता मांग में जबरदस्त सुस्ती के चलते भारत की आर्थिक वृद्धि लगातार कम होती जा रही है। जिसका उत्पादन वृद्धि और रोजगार सृजन पर भी दबाव पड़ा है। आईएचएस मार्किट का इंडिया मैन्यूफैक्चरिंग पर्चेजिंग मैनेजर्स सूचकांक (पीएमआई) निचले स्तर पर है। लागत बढ़ने और डिमांड घटने की वजह से मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की ग्रोथ में कमी आई है। PMI इंडेक्स घट रहा है। सोचने वाली बात यह है कि देश के कई क्षेत्रों में विकास की रफ्तार एकदम थम सी गयी है। मंदी की मार के चलते कमजोर होती अर्थव्यवस्था के ये हालात खुद प्रधानमंत्री मंत्री नरेंद्र मोदी के "फॉइव ट्रिलियन इकॉनमी" के सपने के लिए बेहद घातक है। अगर भारतीय अर्थव्यवस्था इसी तरह के ढ़र्रे पर चलती रही तो यह तय है कि मोदी का "फॉइव ट्रिलियन इकॉनमी" का सपना जल्द पूरा नहीं होने वाला है। जो स्थिति आर्थिक रूप से देश की जनता के लिए व राजनैतिक रूप से भाजपा के लिए सही नहीं है। मंदी के यह हालात तेजी से विकास के पथ पर चलकर विकसित बनने के कतार में शामिल विकासशील भारत के लिए भी बेहद चिंताजनक है। इसलिए सरकार को मंदी की स्थिति से निपटने के लिए तत्काल प्रभावी कदम उठाने होंगे ।

शुक्रवार, 29 नवंबर 2019

सत्ता के लालच में सिद्धांतों को तिलांजलि देते सिद्धांतों पर प्रवचन करने वाले राजनेता


सत्ता के लालच में सिद्धांतों को तिलांजलि देते सिद्धांतों पर प्रवचन करने वाले राजनेता

दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार

महाराष्ट्र में देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को झकझोर देने वाला सत्ता हासिल करने का दंगल अब चरम पर पहुंच गया है। राज्य में देश के शीर्ष राजनीतिज्ञों के द्वारा पूरे जोशोखरोश के साथ पिछले एक माह से जबदस्त सियासी राजनीति की ऐसी कुटिल चाले चली जा रही हैं, जो कि इस जबरदस्त सियासी घमासान को खत्म होने देने का नाम ही नहीं ले रही हैं। देशवासियों को लगता है कि इस घटनाक्रम का अब जल्द ही पटाक्षेप हो जाये और राज्य को नई स्थाई सरकार मिल जायेगी, लेकिन राजनीति की "साम दाम दंड भेद" वाली चाणक्य नीति के चलते देवेंद्र फडणवीस के मुख्यमंत्री व अजीत पवार के उप मुख्यमंत्री की शपथ लेने के बाद भी सरकार की स्थिति स्पष्ट नहीं है। महाराष्ट्र की राजनीति के महासंग्राम में जहां एकतरफ भाजपा सत्ता बरकरार रखने के लिए इस युद्ध को जीतना चाहती है। वहीं शिवसेना, एनसीपी व कांग्रेस के सत्ता हासिल करने की जबरदस्त चाह में, ये दल भी कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार हैं। जिस तरह से सत्ता हासिल करने के लिए रातों रात छिपकर सरकार बनाने वाली "पार्टी विद डिफरेंस" की बात करने वाली भाजपा और अलग-अलग विचारधारा वाले दल शिवसेना, एनसीपी व कांग्रेस आदि सभी दल अपने सिद्धांतों को तिलांजलि देकर राज्य की सत्ता पर काबिज होने की लड़ाई लड़ रहे हैं। वो 21वीं सदी के आधुनिक भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं है। 

महाराष्ट्र के राजनैतिक संकट को लेकर सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय ने अपना फैसला सुनाने के लिए मंगलवार का दिन सुरक्षित रखा हैं। तब से राज्य में सत्ता हासिल करने की चाहत में जबदस्त सियासी ड्रामा जारी है, उसी क्रम में सोमवार को मुंबई के होटल ग्रैंड हयात में शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस आदि दलों के 162 विधायकों की मीडिया के सामने परेड हुई। जिसमें पहली बार तीनों दलों के कद्दावर नेता शरद पवार, उद्धव ठाकरे और पूर्व सीएम अशोक चव्हाण आदि सार्वजनिक रूप से मीडिया के सामने मौजूद रहे। यहां पर सभी विधायकों को एनसीपी नेता जितेंद्र अवहद ने कांग्रेस की अध्यक्षा सोनिया गांधी, एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार और शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे के नाम पर शपथ दिलाई। तीनों पार्टियों के विधायकों ने कहा कि वे इस शपथ के प्रति निष्ठावान रहेंगे, किसी लोभ-लालच में नहीं पड़ेंगे और गठबंधन के प्रति ईमानदार बनें रहेंगे। इन सभी विधायकों ने शपथ ली कि वे भाजपा का समर्थन नहीं करेंगे और न ही अपनी पार्टी के खिलाफ काम करेंगे और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का आदेश मानेंगे। यह सियासी नजारा आज के भारतीय लोकतंत्र का एक नया चेहरा व नयी परिपाटी है। वैसे राजनीति पर शायर बशीर बद्र जी ने खूब कहा है कि

"सियासत की अपनी अलग इक जबा है,
लिखा हो जो इक़रार, इनकार पढ़ना"। 
 
यह शेर महाराष्ट्र के मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम पर एकदम सटीक बैठता हैं।
 
वहीं महाराष्ट्र के इस गम्भीर राजनैतिक संकट पर आज मंगलवार "संविधान दिवस" के दिन सुप्रीम कोर्ट की बैंच ने हॉर्स ट्रेडिंग व अन्य गैरकानूनी दावपेंचों को रोकने के उद्देश्य से अंतरिम आदेश देते हुए प्रोटेम स्पीकर के द्वार 27 नवंबर को सांय 5 बजे तक सभी विधायकों को शपथ दिलावाकर कल ही लाईव प्रसारण के साथ बिना किसी प्रकार के गुप्त मतदान के फ्लोर टेस्ट कराने का आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश शिवसेना, एनसीपी व कांग्रेस के लिए बहुत बड़ी राजनैतिक संजीवनी है। यहां यह भी गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने प्रोटेम स्पीकर की नियुक्ति राज्यपाल के ऊपर छोड़ दी है। इस आदेश के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में घमासान तेज हो गया है और यह आने वाला समय ही बतायेगा की इस महासंग्राम में किसकी विजय होगी और किसकी पराजय होगी।

मित्रों वैसे तो हमारे प्यारे देश भारत को आजाद हुए 72 वर्ष हो चुके हैं, देश में दृढ़ संकल्प, मजबूत इच्छाशक्ति व सशक्त इरादों वाले ईमानदार राजनेताओं के चलते आजादी के बाद दिन-प्रतिदिन लोकतांत्रिक व्यवस्था बेहद मजबूत हुई है, जो देश के लोकतंत्र में परिपक्वता के रूप में लम्बे समय से स्पष्ट नजर आने लगी है। लेकिन साथ ही साथ कुछ राजनेताओं के सत्ता हासिल करने के लालच के चलते पिछले कुछ वर्षों से देश में राजनीति का स्तर भी तेजी से दिन-प्रतिदिन गिरता जा रहा है। अब तो हालात यह हो गये हैं कि कभी समाजसेवा व देशसेवा के जुनून के साथ आमजनमानस की भलाई करने का सबसे सशक्त माध्यम माने जाने वाली राजनीति के स्तर में अब बहुत तेजी से गिरावट आ रही है। पिछले कुछ वर्षों में देश के चंद ताकतवर राजनेताओं के राजनीतिक आचरण के चलते राजनीति के क्षेत्र में सिद्धांतों के प्रति राजनेताओं की प्रतिबद्धता अब बहुत दूर की कौड़ी की बात हो गई है। हालांकि देश में अब राजनीति का वो दौर चल रहा है जब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के नाम पर कसम खाने वाले नेताओं की भरमार है लेकिन उनके दिखाये मार्ग पर चलने वालों कि संख्या बहुत कम है। आज महापुरुष बनने की चाह में हमारे राजनेताओं में सिद्धांतों पर लम्बे चोड़े भाषण देने का फैशन बन गया है, लेकिन जब बात सिद्धांतों पर अमल करने की आती है तो वो राजनेता ही उनको सबसे पहले तिलांजलि देकर छल-कपट, तिकड़मबाजी, धोखेबाजी, झूठ-प्रपंच, अवसरवादिता, धनबल, बाहूबल का प्रयोग करके अपने स्वार्थ सिद्धि को सर्वोपरि मानते हैं और वो उसको पूरा करने के लिए एक ही पल में सिद्धांतों, देश व समाज हित को त्याग देते हैं। अफसोस की बात यह हो गई है कि छल-कपट, कुटिल घटिया स्तर की राजनीति आजकल की राजनीति का एक महत्वपूर्ण अंग बना गयी हैं। आज हकीकत यह है कि जिस राजनीति को देश की सम्मानित जनता के प्रति पूर्ण निष्ठाभाव से समर्पित होना चाहिए था, आज वो सत्ता के लालच में अंधी होकर सिद्धांतों को तिलांजलि देकर स्वयं स्वार्थ के लिए समर्पित हो गयी हैं। आज वो चंद तिकड़मबाज नेताओं की बंधक बन गयी है।

आज की कुटिल राजनीति पर शायर "राज इलाहबादी" का एक शेर एकदम सटीक बैठता है

 "कैसे कैसे हैं रहबर हमारे,
 कभी इस किनारे,
 कभी उस किनारे"। 

क्योंकि आज के राजनेता चुनाव जीतने के बाद एक पल में अपने सिद्धांतों को छोड़कर स्वार्थ के लिए जनभावनाओं के विपरीत जाकर अलग विचारधाराओं से हाथ मिला लेते हैं, केवल सत्ता हासिल करने के लिए। आज हमारे देश के राजनैतिक दल सत्ता की मलाई हासिल करने के लिए अपने सिद्धांतों को एक पल में छोड़कर कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। आज देश की जनता देख रही है कि महाराष्ट्र में सत्ता हथियाने के प्रकरण में कौन भारतीय लोकतंत्र को मजबूत कर रहा है और कौन लोकतंत्र को कमजोर कर रहा है। जिस तरह से चंद राजनेता अंहकार में चूर होकर आज भारतीय राजनीति को जबरन ऐसी करवटें लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं, जिससे ईमानदारी युक्त राजनीति का भविष्य और लोकतांत्रिक मूल्य ही खत्म हो जाएं। हालांकि इस तरह की सिद्धांतों को तिलांजलि देकर ओछी राजनीति करने वाले राजनेताओं को आने वाले समय में देश की सम्मानित जनता माफ नहीं करेगी। यही संकल्प आज "संविधान दिवस" पर हम सभी देशवासियों को ईमानदार लोगों के हित में व देशहित में लेना चाहिए।
 
।। जय हिन्द जय भारत ।। 
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।

रविवार, 3 नवंबर 2019

देश में अन्नदाता किसानों को खुशहाल बनाने की धरातल पर पहल कब



देश में अन्नदाता किसानों को खुशहाल बनाने की धरातल पर पहल कब 

हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार

आजाद भारत में हम सबका पेट भरने वाले अन्नदाता को आयेदिन अपने अधिकारों और हक को हासिल करने के लिए सड़कों पर उतरना पड़ता है। लेकिन देश की सरकारें है कि वो अपनी चतुर चाणक्य नीति से हर बार इन किसानों को आश्वासन देकर समझा-बुझाकर सबका पेट भरने के उद्देश्य से अन्न उगाने के लिए वापस खेतों में काम करने के लिए भेज देती है। देश में सरकार चाहें कोई भी हो, लेकिन अपने अधिकारों के लिए लंबे समय से संघर्षरत किसानों की झोली हमेशा खाली रह जाती है। आज अन्नदाता किसानों के हालात बेहद सोचनीय हैं, स्थिति यह हो गयी है कि एक बड़े काश्तकार को भी अपने परिवार के लालनपालन के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, जो स्थिति देशहित में ठीक नहीं हैं। किसानों के इस हाल के लिए किसी भी एक राजनैतिक दल की सरकार को ज़िम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। उनकी बदहाली के लिए पिछले 72 सालों में किसानों की वोट से देश में सत्ता सुख का आनंद लेने वाले सभी छोटे-बड़े राजनैतिक दल जिम्मेदार हैं। क्योंकि इन सभी की गलत नीतियों के चलते ही आज किसानों की स्थिति यह है कि भले-चंगे मजबूत किसानों को सरकार व सिस्टम ने कमजोर, मजबूर व बीमार बना दिया है। जिसमें रही सही कसर हाल के वर्षों में सत्ता पर आसीन रही राजनैतिक दलों की सरकारों ने पूरी कर दी है। जिनकी गलत नीतियों व हठधर्मी रवैये ने उन परेशान किसानों को सड़क पर आने के लिए मजबूर कर दिया है। जहां अब वो कृषि क्षेत्र की लाइलाज हो चुकी बिमारियों के समाधान की उम्मीद में बैठे है। किसानों में बढ़ते आक्रोश के चलते अब देश में स्थिति यह हो गयी है कि किसानों को आयेदिन अपनी लंबे समय से लंबित मांगों के समाधान को लेकर ना चाहकर भी सड़कों पर उतर आने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। आज मोदी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि वो किसानों की दुश्वारियों को कम करके उनके आर्थिक स्वास्थ्य को जल्द से जल्द ठीक करें। सरकार को समझना होगा भारत एक कृषि प्रधान देश है और हमारा अन्नदाता किसान देश की मजबूत नींव हैं, अगर सरकार किसानों को खुशहाल जीवन जीने का माहौल प्रदान करती है तो देश भी खुशहाल रहेगा। लेकिन वो इसी तरह से गरीबी, कर्ज, फसल खराब होने पर उचित मुआवजा ना मिलने व फसल के उचित मूल्य ना मिलने से परेशान होकर इसी तरह आत्महत्या करता रहा तो इस स्थिति में देश व देशवासियों का खुशहाल रहना संभव नहीं है। किसानों के हालात में अगर जल्द सुधार नहीं हुआ तो वो दिन दूर नहीं है जब बेहद कठिन परिस्थिति, कड़े परिश्रम और अनिश्चितता से भरे कृषि क्षेत्र में आने वाले समय में खेती के कार्य से लोग बहुत तेजी से पलायन करने लगेंगे। 

किसानों के दर्द को समझने के लिए कृषि क्षेत्र से जुड़े कुछ आंकड़ों पर गौर करें तो समझ आता है कि सरकार की उपेक्षा के शिकार कृषि क्षेत्र से देश की आधी से अधिक श्रमशक्ति 53 प्रतिशत लोग अपनी रोजीरोटी आजीविका चलाते हैं। इन लोगों में वो सब शामिल है जो किसी ना किसी रूप से कृषि क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। वहीं देश के आर्थिक विकास के पैमाने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की बात करें तो देश की सरकारों के कृषि क्षेत्र के प्रति उदासीन रवैये के चलते  उसमें भी कृषि क्षेत्र का योगदान बहुत कम हुआ है। यह वर्ष 1950-1951 में 54 प्रतिशत था जो अब गिरकर मात्र लगभग 15 प्रतिशत के आसपास रह गया है। वहीं विगत कुछ वर्षों में हुई किसानों की आत्महत्या पर "राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो" (एनसीआरबी) के आंकड़ों की बात करें तो भारत में 1995 से 2014 के बीच किसानों की आत्महत्या का आंकड़ा तीन लाख पार कर चुका था। वहीं पिछले कुछ वर्षों में भारत में किसानों की आत्महत्या के मामलों में बढ़ोत्तरी हुई है। जो हालात देश के नीतिनिर्माताओं व भाग्यविधाताओं के साथ-साथ आमजनमानस के लिए भी बहुत चिंताजनक व सोचनीय हैं। लेकिन आजतक किसी भी सरकार ने किसानों की आत्महत्या के लिए जिम्मेदार कारकों व हालतों का स्थाई समाधान करने की ठोस कारगर पहल धरातल पर नहीं की है। इस ज्वंलत समस्या पर सरकार तत्कालिक कदम उठाकर अपनी जिम्मेदारी से इतिश्री कर लेती है। आजकल तो देश के भाग्यविधाताओं ने किसानों की होने वाली आत्महत्याओं के आंकड़ों को ही छिपाना शुरू कर दिया है। दुर्भाग्य की बात यह हैं कि पिछले कई वर्षों से किसानों की आत्महत्या का आंकड़ा आमजनमानस के लिए उपलब्ध नहीं है। लेकिन पिछले वर्षों के औसत के आधार पर कहा जा सकता है कि मौजूदा समय में देश में किसान आत्महत्याओं का यह आंकड़ा लगभग 4 लाख के आसपास पहुंच गया होगा। लेकिन फिर भी देश में किसानों की उपेक्षा लगातार जारी है।
एक रिपोर्ट के अनुसार देश में अन्नदाताओं की आत्महत्याओं के पीछे सबसे बड़ा मुख्य कारण साहुकार व बैंकों के ऋण की समय से अदायगी न कर पाना है। क्योंकि किसान व्याज के चलते कर्ज में भारी वृद्धि हो जाने से समय पर कर्ज नहीं चुका पाता है, इसके लिए फसल उत्पादन लागत में भारी वृद्धि के बाद भी फसल उत्पादन में कमी, फसल का उचित मूल्य नहीं मिलना तथा मौसम की बेरुखी के चलते लगातार फसलों का बर्बाद होना, बर्बाद फसलों का उचित मुआवजा नहीं मिल पाना आदि हालात जिम्मेदार है। हमारे देश में आजकल किसानों के द्वारा नगदी फसलें उगाने का चलन ज्यादा चल गया है, जिनकी लागत बहुत अधिक होती है। जिसके चलते किसानों को बहुत पैसे की आवश्यकता होती है और देश में आज भी स्थिति यह है कि बैंकों व अन्य संस्थाओं से किसानों को उनकी जरूरत के मुताबिक कर्ज आसानी से नहीं मिल पाता है। जिसके चलते किसान 24 प्रतिशत से लेकर 50 प्रतिशत ब्याज पर निजी साहूकारों से ऋण लेकर अपनी खेती की जरूरतों को पूरा करता है, लेकिन फसल तैयार होने के बाद गलत नीतियों के चलते उचित मूल्य ना मिल पाने, फसल बर्बाद व उत्पादन कम होने के चलते किसानों की कर्ज अदा करने की स्थिति नहीं रह पाती है, जिसके चलते वो कर्ज के इस खतरनाक दलदल में बुरी तरह धंसता चला जाता हैं और जब उसकी सहने की क्षमता जवाब दे जाती हैं तो वो जिंदगी से खफा हो आत्महत्या करने जैसा कदम उठा कर असमय मौत को गले लगा लेता है। हालांकि भारत में किसान एक ऐसी बहादुर कौम जो हर तरह की विकट से विकट परिस्थितियों में भी बिना हिम्मत हारे उनका डट कर मुकाबला करने का माद्दा रखता है, लेकिन फिर भी कुछ लोग जीवन संघर्ष के इस दौर में अपने परिवारों के कष्टों को देखकर टूट जाते हैं और वो आत्महत्या कर बैठते हैं। देश में बेहद कठिन हालात में काम करने वाले किसानों की समस्याओं की उपेक्षा सभी सरकारों के द्वारा जारी है, किसानों की उपेक्षा का सबसे बड़ा उदाहरण हैं कि देश में उद्योगपतियों ने मंदी की हालात से उत्पन्न समस्या से केंद्र सरकार को अवगत कराया, सरकार ने विकट हालात को तुरंत समझते हुए भारी मंदी की चपेट में आये उधोगों को उबारने के लिए तत्काल कॉरपोरेट टैक्स को घटाकर उनको राहत देने का काम किया, जिससे देश के कॉरपोरेट सेक्टर को 1.45 लाख करोड़ का लाभ आने वाले समय में होगा। जबकि हमारा अन्नदाता किसान अपनी समस्याओं से परेशान होकर आत्महत्या कर लेता है, फिर भी सरकार किसानों की लंबे समय से लंबित चली आ रही विभिन्न मांगों पर समय रहते सुनवाई करके उनका स्थाई हल नहीं करती है। यहां गौरतलब है कि सरकार के द्वारा देश के उधोगों को यह राहत ऐसे समय में दी गई थी, ​जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हजारों अन्नदाता किसान अपनी लंबे समय से लंबित मांगों को पूरा करवाने के लिए पैदल मार्च करके दिल्ली पहुंचे थे। फिर भी सरकार ने किसानों की झोली को खाली ही रखा, केंद्र सरकार ने पूर्व की भांति चाणक्य नीति का इस्तेमाल करते हुए, अन्नदाता को मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने का आश्वासन देकर चतुराई से वापस घर भेज दिया। अब देखना होगा कि सरकार का किसानों की मांगों पर विचार आखिर कब तक चलता है और कब तक किसानों की मांगों पर अमल होता है। देश के अन्नदाताओं के आंदोलन के साथ इसी तरह का सफलता पूर्वक प्रयास मोदी सरकार में पहले भी हो चुका है और समय-समय पर पहले की सरकारें भी इस प्रकार के हथकंडे को अपना कर किसानों के आक्रोश को शांत करती रही हैं। देश में सरकारें बदलती रही है लेकिन किसानों की समस्याओं का पूर्ण स्थाई समाधान फिर भी अभी तक नहीं हो पाया है।
जबकि किसानों की मुख्य मांगे वही वर्षों पुरानी है, फसलों का उचित मूल्य, मौसम की मार के चलते बर्बाद फसलों का उचित मुआवजा, सरकार द्वारा तय रेट पर फसलों की खरीद सुनिश्चित करना, गन्ना का भुगतान समय पर हो, किसानों का कर्ज माफ हो, किसानों को बिजली पानी डीजल सस्ता दिया जाए, किसानों के सुरक्षित जीवन के लिए पेंशन योजना बनायी जाये, किसानों की हालात को सुधारने के लिए देश में स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को जल्द से जल्द लागू किया जाये आदि हैं। किसान का आरोप है कि हम बेहद परेशान हैं लेकिन उसके बाद भी कोई भी सरकार हमारी मांगों पर कभी भी ध्यान से सहानुभूतिपूर्वक विचार करके हमारी समस्याओं का ठोस स्थाई समाधान नहीं निकालती है। किसानों का मानना हैं कि देश में चाहे सरकार कोई भी हो वो सड़क पर आये किसानों के दुखदर्द को समझने के लिए तैयार नहीं है। देश में लंबे समय से किसान आंदोलनरत होकर सड़कों पर है लेकिन कोई भी सरकार किसानों की समस्या जान कर उनका स्थाई समाधान करने के लिए तैयार नहीं है। आज किसानों की स्थिति पर मैं देश के नीतिनिर्माताओं से अनुरोध करना चाहता हूँ कि

"ओ देश के भाग्यविधाता,
ना करों अन्नदाता पर अत्याचार,
अन्न उगा कर सबका पेट भरने वाले,
किसानों की जल्द सुनों पुकार,
ना करों उस पर अब और प्रहार,
दे दो उसको खुशहाली से
जीवन जीने के अधिकार।।"

सबसे बड़ी अफसोस की बात यह हैं कि सबका पेट भरने वाला अन्नदाता किसान खुद खाली पेट अपने ही द्वारा चुनी सरकार से अपने अधिकारों की लड़ाई बहुत लंबे समय से लड़ता आ रहा है। लेकिन उसकी आवाज़ उठाने के सबसे सशक्त माध्यम भारतीय मीडिया के अधिकांश प्रभावशाली चहरे उस पर ना जाने क्यों चुप्पी लगाये बेठे हैं। उनमें से आधिकांश अपने प्राइम टाइम में किसानों की समस्याओं व उनकी बेहाली पर चर्चा करने के लिए तैयार नहीं हैं। लेकिन यह भी सच्चाई है कि आप जब भी टीवी खोलेंगे तो प्राइम टाइम में हिंदू-मुसलमान, अबु बकर अल बगदादी, तानाशाह किम जोंग, आईएसआईएस, पाकिस्तान आदि के टीआरपी हासिल करने वाले मुद्दों पर बेहद गम्भीरतापूर्वक डिवेट चल रही होती है। लेकिन किसी के भी पास सबका पेट भरने वाले देश के अन्नदाता किसान के लिए समय नहीं है।

हालांकि समय-समय पर किसानों के लिए विभिन्न सरकारों के द्वारा कई कल्याणकारी योजनाएं भी चलाई गयी हैं। मोदी सरकार के द्वारा भी किसान हित के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही है, लेकिन उन योजनाओं का धरातल पर कोई खास स्थाई असर होता हुआ नजर नहीं आ रहा है। इसलिए अब मोदी सरकार को जरूरत है कि किसानों की ज्वंलत समस्या के बुनियादी कारणों पर तत्काल गौर कर, उन्हें अच्छी तरह से समझा जाए और फिर सरकार के द्वारा इन समस्याओं के समाधान की दिशा में ठोस प्रयास किये जाए। वैसे भी अब केंद्र में दोबारा चुनकर आयी मोदी सरकार से देशवासियों को बहुत ज्यादा उम्मीदें हैं, सरकार को भी जनता की इस आशा पर खरा उतरने के लिए जनभावनाओं के अनरूप समय रहते काम करना होगा। इसलिए सरकार को भी यह जल्दी ही समझ जाना चाहिए कि किसान देश की नींव है उसको मजबूत करें बिना देश का मजबूत होना संभव नहीं हैं। इसलिए देश की नींव किसानों की जिंदगी को खुशहाल बनाने के लिए सरकार को फाईलों से योजनाओं को जल्द से जल्द निकालकर धरातल पर लाकर अमलीजामा पहना कर, समस्याओं का स्थाई कारगर समाधान करना होगा तब ही देश में खुशहाली व विकास का रामराज्य संभव है।

गुरुवार, 31 अक्टूबर 2019

देश में बढ़ते वायु प्रदूषण के चलते जहरीली होती आबोहवा



देश में बढ़ते वायु प्रदूषण के चलते जहरीली होती आबोहवा

हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी 
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार


देश की राजधानी दिल्ली व एनसीआर का क्षेत्र दीपावली के त्यौहार के बाद से एकबार फिर मीडिया की जबरदस्त चर्चाओं में शामिल है। हर बार की तरह इस बार भी चर्चा की वजह है दिल्ली में बढ़ता वायु प्रदूषण, अपने जानलेवा वायु प्रदूषण के लिए विश्व में प्रसिद्ध हो गयी देश की राजधानी दिल्ली दीपावली के बाद से काले धुएं के बादलों के आगोश में छिपी हुई है। वायु प्रदूषण के चलते लोगों को भगवान सूर्यदेव के दर्शन बहुत ही मुश्किल से हो पा रहे हैं। 

"लेकिन हम है कि फिर भी सुधारने का नाम नहीं लेते हैं अपने ही हाथों से अपने प्यारे चमन में आग लगा लेते हैं और स्वर्ग सी भूमि को स्वयं ही प्रदूषित करके नरक बना लेते हैं"

हम सभी अपने चारों तरफ देखे तो ईश्वर की बनाई इस अद्भुत दुनिया के निराले प्राकृतिक नजारों को देखकर हमारा तन-मन प्रफुल्लित हो जाता है। भगवान ने हमको प्रकृति की गोद में हर तरफ कल-कल करती नदियां, प्राकृतिक संगीतमय झरने, मनमोहक प्राकृतिक सौन्दर्य युक्त पहाड़, तरह-तरह के सुंदर जीव-जंतु, सुंदर फूल, कंदमूल-फल, तरह-तरह के अनाज, बेल-लताएं, हरे-भरे छोटे और विशालकाय वृक्ष, प्यारे-प्यारे चहचहाते पक्षी आदि से परिपूर्ण साक्षात स्वर्ग रूपी सुंदर संसार दिया है, यह वो संसार है जो आदिकाल से और आज भी हम सभी इंसानों के आकर्षण का हमेशा केंद्र बिंदु रहा है। लेकिन आज इंसान ने अपनी जिज्ञासा और नई-नई खोज की अभिलाषा में जब से प्रकृति के कार्यो में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया है, तब से पर्यावरण की हालात दिन-प्रतिदिन चिंताजनक होकर बेहद प्रदूषित होती जा रही है। आज देश में हालात यह हो गये हैं कि देश में बढ़ते वायु प्रदूषण के चलते दिन आबोहवा जहरीली होने के चलते हमारे शहर व गांव तक भी गैस चैम्बर में तब्दील हो रहे है। विज्ञान के द्वार उपलब्ध उन्नत तकनीक के बाद भी आजकल सभी लोगों को सांस लेने के लिए स्वच्छ आक्सीजन तक मिलना दुश्वार होता जा रहा है। आज स्थिति यह हो गयी है कि हम अपने परिवारों, दोस्तों व परिचितों का बहुत ख्याल रखते हैं, परंतु जब बात पर्यावरण के संरक्षण और उसके ध्यान रखने की आती है तो हम केवल प्रथ्वी दिवस, पर्यावरण दिवस, गांधी जयंती, आदि पर वृक्षारोपण करके या फिर सरकार प्रायोजित स्वच्छ भारत अभियान चला करके पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपने दायित्वों की इतिश्री कर लेते है। लेकिन अब समय आ गया है कि हमको पृथ्वी को प्रदूषण से मुक्त करने के बारे में ठोस कारगर पहल कागजों से निकलकर धरातल पर करनी होगी तब ही हम प्रकृति का संरक्षण करके हर तरह के प्रदूषण से बच सकते हैं। 

वैसे तो आज जहरीली होती आबोहवा ने दुनिया भर के लोगों को परेशान कर रखा है, लेकिन हमारे प्यारे देश भारत पर इसका असर कुछ ज्यादा ही गम्भीर रूप से होता नजर आ रहा है। 'विश्व स्वास्थ्य संगठन' के अनुसार भारत में वायु प्रदूषण की वजह से 20 लाख लोग हर वर्ष असमय काल का ग्रास बन जाते हैं जो बेहद चिंताजनक स्थिति हैं। हर वर्ष की तरह ही इस बार भी दीपावली के पावन पर्व को हर्षोल्लास से मनाने के बाद, लोगों को घरों के अंदर व बाहर सड़कों पर हर जगह आंखों में जलन से लेकर सांस लेने तक में तकलीफ हो रही है। प्रदूषण के चलते कुछ लोगों को तो अस्पताल जाकर उपचार तक कराना पड़ रहा है। हालांकि फिर भी देश में बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो रोजमर्रा के जीवन संघर्ष में रोजीरोटी कमाने के जुगाड़ व काम की आपाधापी में वायु प्रदूषण से होने वाली परेशानी को अनदेखा कर अपने कर्तव्यों का निर्वाह लगातार करते रहते हैं। वायु प्रदूषण पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों के मुताबिक वैसे तो अब वायु प्रदूषण हर वक्त हर पल हम लोगों के जीवन को चुनौती दे रहा है, लेकिन यह हर वर्ष दीपावली के पावन पर्व के बाद ऊपर हवा में सामान्य से दस गुना तक बढ़ जाने के चलते सभी को स्पष्ट नजर आने लगती हैं। सोचनीय बात यह है कि आज वायु प्रदूषण के चलते हर छोटे बड़े शहर की आबोहवा में गम्भीर बीमारियों को जन्म देने वाले विषैले प्रदूषक तत्‍वों का भंडार मंडरा रहा है। लेकिन इसमें भी कोई शक नहीं कि इस बार लोगों के कुछ जागरूक होने की वजह से और हवा चलती रहने की वजह से दिल्ली व एनसीआर में दीपावली पर वायु प्रदूषण पिछले वर्षों की तुलना में कुछ कम हुआ है। लेकिन अगर हम वायु प्रदूषण के लिए केवल दीपावली की आतिशबाजी को जिम्मेदार ठहराएंगे तो यह नाइंसाफी होगी। इतना जरूर हैं कि हर वर्ष दीपावली पर होने वाली आतिशबाजी के बाद हवा में प्रदूषण इस कदर बढ़ जाता हैं कि वो एकदम सबके लिए एक बेहद चुनौती पूर्ण गंभीर समस्या बन जाता है और आम लोगों को दिक्कत होने के चलते सभी को नजर आने लगता है।

यहाँ उल्‍लेखनीय है कि वायु प्रदूषण की गम्भीर समस्‍या से निपटने के लिए 'पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय' ने राष्‍ट्रीय स्‍वच्‍छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) शुरू कर रखा है। यह सरकार की एक मध्‍यमकालिक पंचवर्षीय कार्य योजना है जिसमें देश के 102 शहरों में पीएम 2.5 और पीएम 10 (सूक्ष्‍म धूल कण) के स्‍तर में 20-30 प्रतिशत की उल्‍लेखनीय कमी करने के लक्ष्‍य रखे गये हैं। इन 102 शहरों में से 84 शहरों ने अपनी-अपनी कार्य योजनाएं पहले ही पेश कर दी हैं। एनसीएपी का मुख्‍य उद्देश्‍य देश भर में वायु प्रदूषण को नियंत्रण में रखते हुए उसमें उल्‍लेखनीय कमी सुनिश्चित करना है। क्योंकि आज हमारे देश में जिस तरह से दिन-प्रतिदिन वायु प्रदूषण बढ़ता जा रहा है उसका निदान करना आमजन के साथ-साथ सरकार के लिए भी बहुत बड़ी चुनौती है। क्योंकि देश में अब वायु प्रदूषण का स्तर दिन-प्रतिदिन बेहद घातक व जानलेवा होता जा रहा है। जो की हम सभी देशवासियों के जानमाल व स्वास्थ्य के लिये बेहद खतरनाक साबित हो रहा है। जिस तरह से हाल के वर्षों में बहुत ही तेजी से हमारे देश का वायुमंडल जहरीले गैस चैम्बर में तब्दील होता जा रहा है वह चिंता का विषय है। लेकिन फिर भी हम सभी देशवासी व सरकार इस ज्वंलत समस्या का कारगर समाधान ना करके , कबूतर की तरह आँख बंद करके बेफिक्र बैठे हुए है, यह स्थिति सोचनीय है।

आज देश में जहरीली होती आबोहवा की वजह से साँस, एलर्जी सम्बन्धी व अन्य प्रकार की तरह-तरह की गम्भीर बीमारियों का खतरा हम सभी देशवासियों पर बहुत तेजी से मंडरा रहा है। जहरीली हवा के चलते लोगों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता घटने से व गम्भीर बीमारियों के बढ़ने से देश में मृत्युदर में काफी तेजी से इजाफा हुआ है। प्रदूषण की वजह से दम तोड़ते लोगों के आकडों में साल दर साल बहुत ही तेजी से वृद्धि हो रही है। जहरीले वायु प्रदूषण की भयावहता का अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आज हमारे देश का हर छोटा व बड़ा शहर एक गैस चैम्बर के रूप में परिवर्तित होता जा रहा हैं, जिसको अगर जल्दी ही नियंत्रित नहीं किया गया तो भविष्य में बहुत बड़ी संख्या में देश के लोग वायु प्रदूषण की वजह से असमय काल के ग्रास बन जायेंगे। प्रदूषण   के इस मसले पर कुछ समय पहले विश्व प्रसिद्ध अमेरिका के दो संस्थान "हेल्थ इफेक्ट्स इंस्टिट्यूट" (HEI) एवं "इंस्टिट्यूट फॉर हेल्थ मैट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन" (IHME) ने हाल ही में विश्व भर में वायु की गुणवत्ता से सम्बंधित आकडों पर अपनी एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की थी। जिस रिपोर्ट का शीर्षक था - "स्टेट ऑफ़ ग्लोबल एयर-2019" इस रिपोर्ट के अनुसार विश्व भर में वायु प्रदूषण से होने वाली 5 मिलियन मौतों में से 50% मौत केवल भारत और चीन में ही होती है जो कि बहुत ही भयावह  स्थिति को दर्शाने वाले आकड़े हैं। इस विस्तृत रिपोर्ट में कहा गया है कि लंबे समय तक घर से बाहर रहने या घर में वायु प्रदूषण के चलते वर्ष 2017 में स्ट्रोक, डायबिटीज, हार्ट अटैक, फेफड़े के कैंसर या फेफड़े आदि की गम्भीर बीमारियों से विश्व में लगभग 50 लाख लोगों की मौत हुई है। इस रिपोर्ट के अनुसार आज भारत में वायु प्रदूषण अब स्वास्थ्य के लिए सबसे खतरनाक जोखिमों के तीसरे पायदान पर पहुँच गया है, जो कि अब देश में मौत का तीसरा सबसे बड़ा गम्भीर कारक बन गया है। जो देश में धूम्रपान से होने वाली मौतों के ठीक ऊपर है। रिपोर्ट के आंकडों के अनुसार वर्ष 2017 में असुरक्षित प्रदूषित वायु के संपर्क में आने से 6,73,100 मौतें बाह्य PM2.5 के संपर्क में आने के कारण हुईं और 4,81,700 से अधिक मौतें भारत में घरेलू वायु प्रदूषण के कारण हुईं थी। 2017 में भारत की लगभग 60% आबादी घरेलू प्रदूषण के संपर्क में थी। आंकड़ों पर गौर करे तो आज हमारे देश की अधिकांश आबादी 10 µg / m3 के WHO वायु गुणवत्ता दिशा-निर्देश के ऊपर PM2.5 सांद्रता वाले क्षेत्रों में रहती है तथा केवल 15% आबादी ही WHO के कम-से-कम कड़े लक्ष्य 35 µg / m3 के नीचे PM2.5 सांद्रता वाले क्षेत्रों में रहती है। इस रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि यदि वायु प्रदूषण इसी प्रकार बरकरार रहता है तो भविष्य में लोगों के सामने बहुत ही गम्भीर स्वास्थ्य संकट उत्पन्न होंगे जिससे भविष्य में लोगों की जीवन प्रत्याशा (एक व्यक्ति के औसत जीवनकाल) में 20 महीने कम हो जाएगी।
इस रिपोर्ट में जब भारत की वायु गुणवत्ता का अध्ययन किया गया है, तो पाया कि विश्व में सबसे अधिक भारत में वायु प्रदूषण की वजह से लोगों की मृत्यु हो रही हैं जो कि भविष्य में देशहित के लिए ठीक नहीं है। यहाँ उल्लेखनीय है कि नाइट्रोजन, सल्फर ऑक्साइड और कार्बन खासकर पीएम 2.5 जैसे वायु प्रदूषक तत्वों को असमय मौत का एक बहुत बड़ा कारक माना जाता है। ठीक उसी प्रकार "केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड" ने अपनी रिपोर्ट में जिन शहरों को सबसे अधिक प्रदूषित शहर माना है। लेकिन फिर भी सरकार ना जानें क्यों उन शहरों के वायु प्रदूषण के संदर्भ में आयी रिपोर्टों को खास तवज्जो नहीं देती हैं, जिसके चलते देश में ना तो सही ढंग से प्रदूषण नियंत्रण हो पा रहा है ना ही सही आंकड़े सभी देशवासियों के सामने आ रहे हैं। लेकिन विदेशी संस्थाओं की रिपोर्ट में दी गयी इस बात से तो सहमत हुआ जा सकता है कि वायु प्रदूषण की वजह से देश में होने वाली मौतों की जो संख्या व इस रिपोर्ट में दी गई है उसकी संख्या कम या ज्यादा तो हो सकती हैं, लेकिन यह भी कड़वा सत्य है कि वायु प्रदूषण के चलते देश के शहर दिन-प्रतिदिन जहरीले गैस के चैम्बर बनते जा रहे है और उससे अब लोग असमय काल का ग्रास बन रहे हैं। इस सच्चाई से अब ना तो सरकार और ना ही आम-आदमी मुँह मोड़ सकता हैं। क्योंकि अब यह सबको समझ आ गया है कि वायु प्रदूषण एक बहुत ही गम्भीर पर्यावरणीय समस्या है जिसका जल्द से जल्द कारगर समाधान करने के लिए सरकार को आम-जनमानस के सहयोग से प्रभावी कदम उठाने होंगे, वरना इस जहरीले वायु प्रदूषण के चलते देश में लोगों की आये-दिन जान जाती रहेंगी। इतना कुछ होने के बाद भी आज देश में वायु प्रदूषण को लेकर बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि दिल्ली सरकार को छोडकर अब तक देश के बाकी राज्यों की तमाम सरकारों व आम-जनमानस ने वायु प्रदूषण की इस समस्या को कभी गम्भीरता से नहीं लिया है जो कि भविष्य के लिए बहुत ही घातक स्थिति है। देश में आज भी हालत यह है कि वायु प्रदूषण कम करने की कोशिशें केवल देश के चंद बड़े शहरों दिल्ली, मुम्बई आदि जैसे बड़े-बड़े महानगरों तक केन्द्रित रहीं हैं। इस गम्भीर समस्या के मसले पर सरकारों ने छोटे शहरों व गांवों के निवासियों को भगवान भरोसे छोड़ दिया है जो लोगों के स्वास्थ्य के लिए घातक स्थिति है। यह हालात तब है जब वर्ष 2016 में "विश्व स्वास्थ्य संगठन" ने दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों की सूची जारी की थी, उनमें भारत के 10 शहर शामिल थे। फिर भी अभी तक सरकार ने छोटे शहरों व गांवों के प्रदूषण रोकने के लिए कोई ठोस कारगर पहल नहीं की है। सबसे अचरज की बात यह है कि ना तो हम व ना ही स्थानीय प्रशासन अपने शहरों में वायु प्रदूषण का अन्दाजा ठीक से नहीं लगा पा रहे हैं, तो इसकी वजह से आम जनता की सेहत पर पड़ने वाले कुप्रभावों का अन्दाज हम ठीक प्रकार से कैसे लगा पाएँगे? इसके लिये जरूरी बुनियादी ढाँचे के अभाव की स्थिति में हम वैश्विक स्तर पर किये जा रहे इन विदेशी आकड़ों पर विश्वास करके वायु प्रदूषण से निपटने के लिए प्रभावी कदम उठा सकते हैं, जब तक कि हमारा ढाँचा प्रभावी रूप से विकसित नहीं हो जाता है तब तक हमारे पास विदेशी आकड़ों व रिपोर्ट पर विश्वास करने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं बचता है।
 
लेकिन यह भी कटु सत्य है कि देश में भविष्य में जब प्रभावी संसाधन हो जायेंगे और हम वास्तव में अपने छोटे-छोटे शहरों और गाँवों केे प्रदूषणों के आंकड़े संग्रहित करेंगे तो सच्चाई इस विदेशी रिपोर्ट के आंकड़ों से भी कहीं और अधिक गम्भीर व भयावह होगी। ऐसे में पर्यावरण मंत्रालय के लिये तब तक इस तरह की विदेशी रिपोर्ट को देश में वायु प्रदूषण कम करने के लिए प्रभावी कदम उठाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। जिससे की आने वाले समय में देश में जहरीले वायु प्रदूषण को नियंत्रित किये जाने की दिशा में कारगर प्रभावी कदम उठाने में मदद मिल सकेगी। आज हम सभी लोगों का यह नैतिक कर्तव्य है की जिस पृथ्वी और पर्यावरण में हम रहते है उसका संरक्षण व सुरक्षा स्वयं अच्छे ढंग से करें और उसे प्रदूषित न होने दे। लेकिन बड़े दुःख की बात है की आज का इंसान इतना स्वार्थी हो गया है की पर्यावरण की तरफ वह कोई ध्यान नही दे रहा है। आज हम लोग केवल अधिक से अधिक मुनाफा कमाने के लिए देश में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों अव्यवस्थित ढंग से दोहन कर रहे है, जिसके लिए हम अंधाधुंध पेड़ काट रहे है, गृहकार्य, कृषि व फैक्ट्री के लिए भूमिगत जल का जिस तरह से बेहिसाब दोहन कर रहे है यह स्थिति सभी देशवासियों के लिए बेहद चिंताजनक है। आज देश में अव्यवस्थित औद्योगिक विकास, शहरीकरण और विकास के नाम पर आज हर दिन हम लोग अपने हाथों से पर्यावरण को दूषित कर रहे है। आज प्रदूषण के चलते देश की आबोहवा में रोजाना कार्बन डाईऑक्साइड (CO2) की मात्रा तेजी से बढ़ती जा रही है। लेकिन अब समय आ गया है कि सरकार को आमजनमानस के सहयोग से इस ज्वंलत समस्या का स्थाई समाधान ढूंढ कर दीर्घकालिक निदान करना चाहिए।
साथ ही देश में अब वह समय भी आ गया है की जब हम सभी देशवासी संकल्प ले कि प्रकृति से हम केवल लेंगे ही नही बल्कि प्राकृतिक संसाधनों व प्रकृति की सुरक्षा के लिए प्रभावी कदम उठाकर प्रकृति को कुछ वापिस भी अवश्य करेंगे, इस संकल्प से ही भविष्य में प्रकृति व पर्यावरण की सुरक्षा हो सकती है।

हम सभी को समझना होगा कि आजकल हमारे देश के सभी शहरों में तरह-तरह का इतना प्रदूषण और शोर है की पक्षी तक भी वहां से पलायन करने लगे है। अब पक्षियों के नाम पर शहरों में सिर्फ कुछ गिने चुने चंद प्रजाति के पक्षी ही देखने को मिलते है। आज शहर व गाँव में तरह-तरह के प्रदूषण की वजह से लोग आयेदिन गम्भीर बीमारियाँ से ग्रसित हो रहे है। प्रदूषण के चलते शहर का तो हर दूसरा व्यक्ति किसी न किसी प्रकार के रोग से ग्रसित हो गया है। देश की राजधानी दिल्ली व उसके आसपास के इलाकों में तो अब इतना वायु प्रदूषण बढ़ गया की लोगों का साँस लेना मुश्किल हो गया। इसलिए अब समय आ गया है कि हम सभी देशवासी सरकार के साथ मिलकर फाईलों से बाहर आकर धरातल पर पर्यावरण के सरंक्षण व सुरक्षा के लिए हर संभव ठोस कारगर उपाय करें। ना कि कभी दीपावली की आतिशबाजी , कभी पराली जलाने, कभी वाहनों के धुएं के चलते प्रदूषण , कभी औधोगिक ईकाईयों से या कभी अत्यधिक निर्माण कार्यो के चलते गम्भीर प्रदूषण हो रहा है पर बात टाल कर सभी अपनी जिम्मेदारी से इतिश्री ना करें।

गुरुवार, 24 अक्टूबर 2019

महाराष्ट्र व हरियाणा के विधानसभा चुनाव परिणाम से राजनैतिक दल व विश्लेषक भौंचक्के

महाराष्ट्र व हरियाणा के विधानसभा चुनाव परिणाम से राजनैतिक दल व विश्लेषक भौंचक्के

हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार

महाराष्ट्र व हरियाणा विधानसभा चुनावों के परिणाम आ गये हैं, आमजनमानस की सर्वोच्च अदालत के द्वारा दिए गये अंतिम निर्णय को देखकर सभी राजनैतिक दल व राजनैतिक विश्लेषक एकदम भौंचक्के हैं। क्योंकि हरियाणा व महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों के परिणाम आने से पूर्व, देश के अधिकांश चुनावी रणनीतिकारों का मानना था कि मोदी-शाह की जोडी़ के मैजिक और केंद्र सरकार के हाल के दिनों में लिये गये निर्णयों के चलते महाराष्ट्र व हरियाणा में भाजपा के पक्ष में एकतरफा भारी बहुमत से विजय वाले चुनाव परिणाम नजर आयेंगे। लेकिन बृहस्पतिवार को जब मतदाताओं के द्वारा दी गयी वोटों का पिटारा खुलकर सबके सामने आया तो हर कोई आश्चर्यचकित रह गया, जनता ने महाराष्ट्र में स्पष्ट बहुमत के साथ भाजपा गठबंधन की सरकार और हरियाणा में भाजपा को सरकार बनाने के बहुत करीब लाकर छोड़ दिया है। दोनों राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम सत्ता पक्ष, विपक्ष और अधिकांश राजनैतिक विशेषज्ञों की उम्मीद के विपरीत नजर आये। महाराष्ट्र में जहां भाजपा शिवसेना गठबंधन 288 विधानसभा सीटों में से 161 विधानसभा सीटों पर जीतकर सरकार बना रहा है, लेकिन फिर भी भाजपा शिवसेना गठबंधन के शीर्ष नेतृत्व की उम्मीद व आकलन के अनुसार उनको सीट नहीं मिल पायी है जिससे नेतृत्व आश्चर्यचकित है। वहीं कांग्रेस एनसीपी गठबंधन ने भी महाराष्ट्र में 98 सीटों पर विजय पताका फहरायी, परिणामों में उम्मीद से अधिक सीट जीतने पर कांग्रेस एनसीपी गठबंधन भी आश्चर्यचकित नजर आ रहा है।

वहीं हरियाणा में 90 विधानसभा सीटों में से 40 विधानसभा सीटों पर चुनाव जीतकर दोबारा सरकार बनाने से महज चंद कदम दूर खड़ी भाजपा, उम्मीद के विपरीत जनता के प्रहार से बेहाल नजर आयी और वहीं आपसी खेमेबंदी और तल्ख गुटबाजी से बेहद कमजोर हो चुकी कांग्रेस को जनता ने 31 सीटों पर विजयी बनाकर आक्सीजन प्रदान करके सभी राजनैतिक दलों व पंडितों को भौंचक्का कर दिया है। उधर अभी चंद माह पूर्व जन्म लेने वाली दुष्यंत चौटाला की पार्टी जेजेपी को जनता ने 10 सीटों पर जीताकर अपने भरपूर प्यार से नवाजा कर  राज्य की राजनीति में एक नया विकल्प तैयार कर दिया है।

दोनों राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणामों को ध्यान से देखें तो महाराष्ट्र में भाजपा शिवसेना गठबंधन की स्पष्ट बहुमत वाली सरकार बनना तय है और हरियाणा में भी देश के गृहमंत्री व चाणक्य की उपाधि से नवाजे जाने वाले अमित शाह के राजनैतिक कौशल से निर्दलीय के सहयोग से भाजपा की पुनः सरकार बनना तय है।

लेकिन विचारयोग्य बात यह है कि दोनों राज्यों में भी भाजपा की सरकार बनने के बाद भी, क्या इन चुनाव परिणामों में कहीं ना कहीं देश में कमजोर होती आर्थिक हालत ने भाजपा की हालात को जनता के बीच कमजोर करने की शुरुआत तो नहीं कर दी है। वहीं अन्य राजनैतिक दलों को भी स्पष्ट संदेश दे दिया हैं कि जनता सत्ता पक्ष से पूर्ण रूप से संतुष्ट नहीं है, आप जनहित के मुद्दों को लेकर सड़कों पर उतरो तो सही, लेकिन विपक्षी दलों की आरामतलबी व गलत रवैये और जनता को नेतृत्व प्रदान करने वाले चहरे के अभाव के चलते जनता पूर्ण रूप से उनके साथ भी खड़ी नहीं हो पा रही है। कोई माने या ना माने लेकिन इन चुनाव परिणामों से लगता है कि अब लोगों को अपनी रोजीरोटी रोजगार की चिंता सताने लगी है। ये चुनाव परिणाम इस बात को दर्शातें हैं कि अब कुछ मतदाताओं के लिए सरकार के निर्णयों को छोडकर देश की कमजोर होती अर्थव्यवस्था मायने रखती है। जबकि इन चुनावों के प्रचार के दौरान सत्ता पक्ष ने विपक्षी दलों को जनहित के मुद्दों को छोड़कर केवल अनुच्छेद-370, वीर सावरकर और पाकिस्तान के मसले पर ही उलझाए रखा था। इन विधानसभा चुनावों में सत्ता पक्ष ने सम्पूर्ण चुनाव प्रचार के दौरान विपक्ष को अपने जाल में उलझाये रखा और सत्ता पक्ष ने अपनी चाणक्य नीति से आमजनमानस के हित के किसी भी मुद्दे पर विपक्ष को सरकार से सवाल जवाब करने का मौका ही नहीं आने दिया। लेकिन फिर एक वर्ग के मतदाताओं के मन में कहीं ना कहीं कमजोर होती भारतीय अर्थव्यवस्था इन चुनावों में अंदर ही अंदर बड़ा मुद्दा थी। जिसके चलते ही आज सभी दलों के लिए इस तरह के आश्चर्यजनक चुनाव परिणाम आये है, ये चुनाव परिणाम उस वर्ग की जनता के आक्रोश व प्रेम की ही देन हैं।

वैसे हम आकलन करें तो 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद संपन्न हुए ये दो राज्यों के विधानसभा चुनाव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व गृहमंत्री अमित शाह की जोडी़ के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। क्योंकि 2019 के लोकसभा चुनावों में जनता के द्वारा दिये गये भारी बहुमत से चुनाव जीतने के बाद देश में ये पहले विधानसभा चुनाव हैं। ये चुनाव मोदी सरकार के बेहद आक्रामक महत्वपूर्ण फैसलों जैसे कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 को हटाना, कश्मीर मसले पर पाकिस्तान को विश्व समुदाय के बीच अलगथलग करना, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) का मसला तथा ट्रिपल तलाक पर मोदी सरकार के द्वारा लगायी गयी रोक जैसे अभूतपूर्व निर्णयों के बाद केंद्र सरकार के द्वारा आम जनमानस के विश्वास पर खरा उतरने की परीक्षा हैं। हालांकि इन चुनावों में भी दोनों राज्यों में भाजपा का राज्य स्तरीय नेतृत्व पूर्व की भांति ही पूर्ण रूप से केवल मोदी-शाह की जोडी़ के मैजिक पर ही निर्भर रहा है।

दोनों राज्यों में सरकार का गठन होने तक शुक्रवार धनतेरस के पावन पर्व के दिन भी सभी दलों की नजरें चुनाव परिणामों पर एकटक टिकी हुई हैं। भाजपा गठबंधन, कांग्रेस गठबंधन व अन्य राजनैतिक दलों के वरिष्ठ नेता, महाराष्ट्र और हरियाणा राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे के साथ-साथ देश के 17 राज्यों में 52 सीटों पर हुए उपचुनाव के परिणामों के बाद एक-एक सीट का ध्यान से मंथन कर रहे हैं। इस बार महाराष्ट्र व हरियाणा के साथ 17 राज्यों में 50 विधानसभा और 2 लोकसभा सीटों पर भी उपचुनाव हुए थे। जिनका चुनाव परिणाम देश में भविष्य की राजनीति की दशा व दिशा तय करने वाला है।

हरियाणा व महाराष्ट्र राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा ने जीत हासिल की है लेकिन चुनाव परिणाम पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की उम्मीद के विपरीत आये है। इन राज्यों के चुनाव परिणामों अब स्पष्ट हो गया हैं कि जनता ने भाजपा का 75 सीट पार के मिशन हरियाणा व 220 सीट पार के मिशन महाराष्ट्र के सपने को जबरदस्त झटका दे दिया है। इसका भाजपा पार्टी और उसके नीतिनिर्माताओं को बैठकर आत्मंथन अवश्य करना चाहिए। महाराष्ट्र में भाजपा शिवसेना गठबंधन के चुनाव जीतने के बाद भी और हरियाणा में भाजपा के बहुमत से चंद सीट दूर रहने के बाद भाजपा, विपक्षी पार्टियों व राजनैतिक विश्लेषकों के बीच मौजूदा राजनैतिक हालात को लेकर आत्मंथन का एक नया दौर शुरू हो गया है। देश में राजनैतिक समझ रखने वाले विद्वान इन चुनाव परिणामों का विश्लेषण करने में जुट गये हैं कि ऐसा क्या कारण है जो हरियाणा व महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में हरियाणा की खट्टर सरकार और महाराष्ट्र की फडणवीस सरकार के दिग्गजों को हार का सामना करना पड़ा है।

आपको बता दे कि महाराष्ट्र सरकार में मंत्री रही पंकजा मुंडे अपने गढ़ परली से चुनाव हार गई हैं। पंकजा को उनके चचेरे भाई धनंजय मुंडे ने हराया है।

वहीं दूसरी तरफ हरियाणा में तो भाजपा के बड़े-बड़े दिग्गजों को जनता ने राजनैतिक पिच पर आऊट कर दिया है। हरियाणा में तो भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और टोहाना से उम्मीदवार सुभाष बराला को जननायक जनता पार्टी के देवेंद्र सिंह बबली ने बुरी तरह हराया है।

हरियाणा के ही नरनौंद से भाजपा के उम्मीदवार और हरियाणा सरकार में वित्तमंत्री रहे कैप्टन अभिमन्यू को जननायक जनता पार्टी के राम कुमार गौतम ने करारी शिकस्त दी है।

हरियाणा में ही भाजपा सरकार में मंत्री रही कविता जैन सोनीपत सीट से कांग्रेस के उरेंद्र पंवार से हार गई हैं।

हरियाणा की उचान कलां विधानसभा से पूर्व केंद्रीय मंत्री और राज्यसभा सांसद चौधरी बीरेंद्र सिंह की पत्नी प्रेमलता को कुछ दिन पहले जन्मीं जननायक जनता पार्टी के दुष्यंत चौटाला ने बुरी तरह हरा दिया है।

हरियाणा में ही आदमपुर विधानसभा सीट से दिग्गज टिकटॉक स्टार और भाजपा उम्मीदवार सोनाली फोगाट कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कुलदीप बिश्नोई से चुनाव हार गयी हैं।

हरियाणा में खेल के मैदान से राजनीति के मैदान में कदम रखने वाले पिहोवा से मैदान में उतरे भाजपा उम्मीदवार योगेश्वर दत्त को कांग्रेस के उम्मीदवार श्रीकृष्ण हुड्डा ने हरा दिया।

देश की दिग्गज खिलाड़ी बबीता फोगाट कॉमनवेल्थ गेम्स में दो बार की गोल्ड मेडलिस्ट रह चुकी हैं। उन्होंने इस बार विधानसभा चुनाव को लड़ने के लिए हरियाणा पुलिस की नौकरी भी छोड़ी थी और चरखी दादरी विधानसभा से भाजपा उम्मीदवार बनी थी लेकिन बबीता फोगाट को भी निर्दलीय उम्मीदवार सोमवीर ने हरा दिया है।

वहीं 2019 के लोकसभा चुनावों के परिणाम के बाद अपने अंदुरुनी कलह के मसलों को सुलझाने में बुरी तरह उलझी कांग्रेस पार्टी को जनता ने कुछ संजीवनी जरूर प्रदान कर दी है। हालांकि कांग्रेस अपनी गलत नीतियों व आरामतलबी के आदत के चलते शुरुआत से ही चुनाव प्रचार में पिछड़ती दिख रही थी, लेकिन फिर भी जनता ने नेताओं व राजनैतिक विशेषज्ञों की उम्मीद के विपरीत कांग्रेस व अन्य राजनैतिक दलों की जो स्थिति रखी है, उसने सभी राजनैतिक विश्लेषकों के आकलनों को धवस्त कर दिया है। साथ ही जनता ने कांग्रेस मुक्त भारत का सपना देखने वाले राजनेताओं को भी जबरदस्त झटका दे दिया है। इन चुनाव परिणामों ने देश में मृतप्रायः हो चुकी कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि अगर महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनावों में वह समय रहते अपने महलों से निकल कर धरातल पर आकर सामुहिक रूप से मेहनत करते तो आज जो चुनाव परिणाम आये हैं वो बदल सकते थे इन राज्यों में कांग्रेस सत्ता में लौटती दिख सकती थी और भाजपा के साथ चल रही कांटे की टक्कर में भी कांग्रेस बाज़ी मारती हुई नज़र आ सकती थी।

इन राज्यों की जनता ने विधानसभा चुनाव परिणाम से सत्ता में बैठे लोगों को भी इस बात का संदेश दे दिया हैं कि देश के मौजूदा आर्थिक व बेरोजगारी के हालातों पर सरकार ने जल्द ही कुछ ठोस कारगर कदम धरातल पर नहीं उठाया तो देश को कांग्रेस मुक्त करने का सपना देखने वाले राजनेताओं व दलों को भविष्य में होने वाले चुनावों में जबरदस्त झटका लग सकता और आने वाले समय में कांग्रेस के बेहद कमजोर हो चुके पंजे में जनता के प्रेम से दोबारा जान आ सकती हैं। लेकिन स्थिति जो भी है सबके सामने अब स्पष्ट हो चुकी है और सबसे बड़ा कमाल जनता ने यह करा है कि इसबार उसने किसी भी राजनैतिक दल को निराश नहीं किया हैं। जनता ने सबकी झोली वोटों से भरकर अमनचैन, प्यार-मोहब्बत, प्रकाश व खुशियों के पावन पर्व दीपावली को भारतीय परम्पराओं के अनुसार शानदार ढंग से मनाने का अवसर प्रदान किया है।

हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार
ईमेल -: deepaklawguy@gmail.com